भक्ति योग

भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय: प्रेम और समर्पण का मार्ग

संक्षेप में

भक्ति योग भगवान में मन और बुद्धि लगाकर, प्रेम और श्रद्धा से उनकी उपासना करने का मार्ग है। भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय इसी नाम से जाना जाता है। गीता कहती है कि प्रेम से अर्पित एक पत्ता, फूल, फल या जल भी भगवान स्वीकार करते हैं।

एक नज़र में

मुख्य ग्रंथ
भगवद्गीता, अध्याय 12 (भक्तियोग) और 9
मूल भाव
भगवान में मन और बुद्धि लगाना (12.8)
भेंट
पत्र, पुष्प, फल, जल, भक्ति से (9.26)
भक्त के लक्षण
द्वेष-रहित, मैत्री और करुणा वाला (12.13)

भक्ति योग क्या है?

ग्रंथ में

कुछ लोगों के लिए भगवान तक पहुँचने का रास्ता तर्क से नहीं, प्रेम से खुलता है। गीता इस रास्ते को पूरा सम्मान देती है। बारहवें अध्याय की शुरुआत में अर्जुन पूछते हैं कि उत्तम योगी कौन है, और उत्तर मिलता है: जो मुझमें मन लगाकर, नित्य जुड़े रहकर, परम श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं।

गीता का यह अध्याय पारंपरिक रूप से "भक्तियोग" नाम से जाना जाता है; अध्याय के अंत की पुष्पिका में यही नाम है।

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥

अपना मन मुझमें ही लगाओ, अपनी बुद्धि मुझमें ही स्थिर करो। इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें संशय नहीं।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 12.8

भक्ति में क्या अर्पित करें?

ग्रंथ में

भक्ति का मार्ग साधनों की बड़ी सूची नहीं माँगता। गीता के नौवें अध्याय का यह श्लोक इस मार्ग की सरलता बताता है: भेंट का मूल्य उसकी कीमत से नहीं, उसके पीछे के भाव से है।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

जो मुझे भक्ति से एक पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, शुद्ध मन वाले उस भक्त की प्रेम से दी हुई भेंट मैं स्वीकार करता हूँ।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 9.26

भक्त का भगवान से संबंध

ग्रंथ में

गीता भक्त को अकेला नहीं छोड़ती। जो सारे कर्म भगवान को अर्पित करके, उन्हीं में लगे रहकर, अनन्य भाव से ध्यान और उपासना करते हैं, उनके लिए भगवान कहते हैं कि मैं उन्हें मृत्यु-रूपी संसार-सागर से शीघ्र पार कर देता हूँ।

गीता के अनुसार भक्त के लक्षण

ग्रंथ में

गीता बताती है कि भगवान को कैसा भक्त प्रिय है। ये लक्षण पूजा की विधि नहीं, स्वभाव की बात करते हैं।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में समान और क्षमाशील है।

— श्रीमद्भगवद्गीता, मूल श्लोक (Gita Supersite, IIT Kanpur), गीता 12.13

भक्ति की परंपरा

भक्ति का यह मार्ग ग्रंथों से निकलकर संतों और भक्तों के जीवन में उतरा। उनकी कथाएँ और वाणी इस कोश के संत और भक्त खंडों में हैं, स्रोत सहित।

गीता का बारहवाँ अध्याय: भक्ति योग

ग्रंथ में

अर्जुन पूछते हैं कि जो भक्त निरंतर भगवान के साकार रूप की उपासना करते हैं, और जो अव्यक्त, अविनाशी की, उनमें योग को सबसे अच्छा कौन जानता है? भगवान कहते हैं कि जो मन को उनमें लगाकर, निरंतर युक्त होकर, परम श्रद्धा से उनकी उपासना करते हैं, वे उन्हें सबसे श्रेष्ठ योगी मान्य हैं।

जो इंद्रियों को वश में करके, सब में सम-बुद्धि रखकर, सब प्राणियों के हित में लगे रहकर अनिर्देश्य, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिंत्य, कूटस्थ, अचल और ध्रुव की उपासना करते हैं, वे भी भगवान को ही पाते हैं; पर अव्यक्त में मन लगाने वालों का कष्ट अधिक है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की गति कठिन है।

जो सब कर्म भगवान को अर्पित करके, उन्हें ही परम लक्ष्य मानकर, अनन्य योग से उनका ध्यान करते हुए उपासना करते हैं, उन्हें भगवान बिना देर मृत्यु-रूपी संसार-सागर से पार उतारते हैं। इसलिए मन भगवान में लगाओ, बुद्धि उनमें टिकाओ; तब निःसंदेह उन्हीं में निवास करोगे।

गीता यहाँ एक के बाद एक सरल रास्ते देती है: मन स्थिर न हो, तो अभ्यास-योग से भगवान को पाने की इच्छा करो; अभ्यास भी न हो, तो भगवान के लिए कर्म करना ही लक्ष्य बनाओ, उससे भी सिद्धि मिलेगी; यह भी न हो, तो संयम से सब कर्मों के फल का त्याग करो। अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान, ध्यान से कर्म-फल का त्याग, और त्याग से तुरंत शांति मिलती है।

फिर भगवान अपने प्रिय भक्त के लक्षण गिनाते हैं: जो किसी से द्वेष नहीं करता, मित्रता और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुख में सम और क्षमाशील है, संतुष्ट, सदा युक्त, संयमी और दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसका मन और बुद्धि भगवान को अर्पित हैं; जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, क्रोध, भय और उद्वेग से मुक्त है।

जो निरपेक्ष, पवित्र, दक्ष, उदासीन और व्यथा-रहित है, और सब आरंभों को छोड़ चुका है; जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और शुभ-अशुभ, दोनों को छोड़ चुका है; जो मित्र-शत्रु, मान-अपमान, सर्दी-गर्मी और सुख-दुख में सम है, आसक्ति से मुक्त है, जिसके लिए निंदा और स्तुति बराबर हैं, जो मौनी है, जो मिले उसी में संतुष्ट है, जिसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं, और जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह भक्त भगवान को प्रिय है। और जो श्रद्धा से, भगवान को परम मानकर इस धर्ममय अमृत का पालन करते हैं, वे भगवान को अत्यंत प्रिय हैं।

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