राज योग

मन की वह अवस्था, जिसे हठयोग अपना लक्ष्य कहता है

संक्षेप में

राज योग का सीधा अर्थ समाधि की ऊँची अवस्था से जुड़ा है। हठयोग प्रदीपिका इसे हठ साधना का लक्ष्य कहती है, और इसे समाधि, उन्मनी और मनोन्मनी का पर्याय बताती है। पतंजलि के योगसूत्र में यह शब्द नहीं आता, इसलिए इसे अष्टांग योग का दूसरा नाम मान लेना पूरी बात नहीं है।

एक नज़र में

मुख्य संदर्भ
हठयोग प्रदीपिका 1.2–3, 1.69, 2.76, 4.3–4
पर्याय (प्रदीपिका)
समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, सहज, तुर्या आदि
हठयोग से संबंध
हठ साधन है, राज योग उसका फल

राज योग का अर्थ क्या है?

ग्रंथ में

यह प्रश्न सरल लगता है, पर इसका उत्तर इस पर निर्भर करता है कि आप किस ग्रंथ से पूछ रहे हैं। हठयोग प्रदीपिका के चौथे अध्याय में राज योग को समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्य, अशून्य, परम पद, अमनस्क, अद्वैत, निरालंब, निरंजन, जीवन्मुक्ति, सहज और तुर्या के साथ एक ही अर्थ में रखा गया है।

इस ग्रंथ में राज योग कोई अलग अभ्यास-पद्धति नहीं, बल्कि साधना की चरम अवस्था है।

राज योग और हठ योग का क्या संबंध है?

ग्रंथ में

ग्रंथ की शुरुआत में ही स्वात्माराम कहते हैं कि वे राज योग की प्राप्ति के लिए हठ योग का उपदेश कर रहे हैं। उनके अनुसार मतों की बहुलता के अँधेरे में लोग राज योग को नहीं जान पाते, और प्रदीपिका उसी अँधेरे के लिए दीपक है।

पहले अध्याय के अंत में वे कहते हैं कि आसन, कुंभक और दूसरे साधन तब तक करने चाहिए जब तक राज योग का फल न मिल जाए।

दूसरे अध्याय में बात और साफ़ है: हठ योग के बिना राज योग की सिद्धि नहीं, और राज योग के बिना हठ योग की सिद्धि नहीं। इसलिए दोनों का अभ्यास सिद्धि तक करना चाहिए।

क्या राज योग और अष्टांग योग एक ही हैं?

विद्वानों में मतभेद

आज की बोलचाल में पतंजलि के अष्टांग योग को अक्सर राज योग कह दिया जाता है। यह चलन है, पर योगसूत्र में स्वयं यह नाम नहीं मिलता। पतंजलि अपने मार्ग को आठ अंगों वाला योग और क्रिया योग कहते हैं।

दोनों में एक गहरा मेल ज़रूर है: दोनों का केंद्र मन की अवस्था है और दोनों की ऊँचाई समाधि है। इसलिए संबंध मानना ग़लत नहीं, पर दोनों शब्दों को हर ग्रंथ में एक मानना भी सही नहीं।

तीन शब्दों का भेद
शब्दकहाँअर्थस्रोत
अष्टांग योगपतंजलि योगसूत्रयम से समाधि तक आठ अंगों का मार्गपतंजलि योगसूत्र, 2.29
राज योगहठयोग प्रदीपिकासमाधि की चरम अवस्था, हठ का फलहठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 4.3–4
हठ योगहठयोग प्रदीपिकाआसन, कुंभक आदि का मार्ग, राज योग का साधनहठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.2, 1.69

हठ ग्रंथों में राज योग

ग्रंथ में

शिव संहिता चार योगों में राज योग को चौथा रखती है, जो द्वैत को मिटाता है।

हठयोग प्रदीपिका कहती है कि मन और नाद का मिलन राज योग है, और उससे सदा आनंद मिलता है। ग्रंथ साफ़ कहता है कि जो राज योग को न जानकर केवल हठ योग करते हैं, वे अपना परिश्रम व्यर्थ करते हैं।

घेरंड संहिता के छह समाधियों में अंतिम राज योग समाधि है, जो मनो-मूर्छा कुंभक से मिलती है।

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राज योग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न