राज योग का अर्थ क्या है?
ग्रंथ में
यह प्रश्न सरल लगता है, पर इसका उत्तर इस पर निर्भर करता है कि आप किस ग्रंथ से पूछ रहे हैं। हठयोग प्रदीपिका के चौथे अध्याय में राज योग को समाधि, उन्मनी, मनोन्मनी, अमरत्व, लय, तत्त्व, शून्य, अशून्य, परम पद, अमनस्क, अद्वैत, निरालंब, निरंजन, जीवन्मुक्ति, सहज और तुर्या के साथ एक ही अर्थ में रखा गया है।
इस ग्रंथ में राज योग कोई अलग अभ्यास-पद्धति नहीं, बल्कि साधना की चरम अवस्था है।
राज योग और हठ योग का क्या संबंध है?
ग्रंथ में
ग्रंथ की शुरुआत में ही स्वात्माराम कहते हैं कि वे राज योग की प्राप्ति के लिए हठ योग का उपदेश कर रहे हैं। उनके अनुसार मतों की बहुलता के अँधेरे में लोग राज योग को नहीं जान पाते, और प्रदीपिका उसी अँधेरे के लिए दीपक है।
पहले अध्याय के अंत में वे कहते हैं कि आसन, कुंभक और दूसरे साधन तब तक करने चाहिए जब तक राज योग का फल न मिल जाए।
दूसरे अध्याय में बात और साफ़ है: हठ योग के बिना राज योग की सिद्धि नहीं, और राज योग के बिना हठ योग की सिद्धि नहीं। इसलिए दोनों का अभ्यास सिद्धि तक करना चाहिए।
क्या राज योग और अष्टांग योग एक ही हैं?
विद्वानों में मतभेद
आज की बोलचाल में पतंजलि के अष्टांग योग को अक्सर राज योग कह दिया जाता है। यह चलन है, पर योगसूत्र में स्वयं यह नाम नहीं मिलता। पतंजलि अपने मार्ग को आठ अंगों वाला योग और क्रिया योग कहते हैं।
दोनों में एक गहरा मेल ज़रूर है: दोनों का केंद्र मन की अवस्था है और दोनों की ऊँचाई समाधि है। इसलिए संबंध मानना ग़लत नहीं, पर दोनों शब्दों को हर ग्रंथ में एक मानना भी सही नहीं।
| शब्द | कहाँ | अर्थ | स्रोत |
|---|---|---|---|
| अष्टांग योग | पतंजलि योगसूत्र | यम से समाधि तक आठ अंगों का मार्ग | पतंजलि योगसूत्र, 2.29 |
| राज योग | हठयोग प्रदीपिका | समाधि की चरम अवस्था, हठ का फल | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 4.3–4 |
| हठ योग | हठयोग प्रदीपिका | आसन, कुंभक आदि का मार्ग, राज योग का साधन | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 1.2, 1.69 |
हठ ग्रंथों में राज योग
ग्रंथ में
शिव संहिता चार योगों में राज योग को चौथा रखती है, जो द्वैत को मिटाता है।
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि मन और नाद का मिलन राज योग है, और उससे सदा आनंद मिलता है। ग्रंथ साफ़ कहता है कि जो राज योग को न जानकर केवल हठ योग करते हैं, वे अपना परिश्रम व्यर्थ करते हैं।
घेरंड संहिता के छह समाधियों में अंतिम राज योग समाधि है, जो मनो-मूर्छा कुंभक से मिलती है।
आगे पढ़ें
- अष्टांग योग — पतंजलि के योग के आठ अंग: यम से समाधि तक
- हठ योग — शरीर और प्राण से मन तक पहुँचने वाला मार्ग
- लय योग — मन का अपने स्रोत में विलीन होना: योगतत्त्व और प्रदीपिका में
- हठयोग प्रदीपिका — स्वात्माराम का ग्रंथ: आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि
- धारणा, ध्यान और समाधि — योगसूत्र के तीन अंतरंग अंग, और उनका अंतर
