हठयोग प्रदीपिका किसने लिखी?
ग्रंथ में
ग्रंथ स्वयं अपना परिचय देता है। योगी स्वात्माराम अपने गुरु श्रीनाथ को प्रणाम करके राज योग की प्राप्ति के लिए हठ योग का उपदेश करते हैं। अगले श्लोक में वे कहते हैं कि मतों की बहुलता के अँधेरे में लोग राज योग को नहीं जान पाते, इसलिए करुणावश वे यह प्रदीपिका, यानी दीपक, रचते हैं।
हठयोग प्रदीपिका के चार अध्याय
ग्रंथ में
| अध्याय | विषय | मुख्य बातें | स्रोत |
|---|---|---|---|
| 1 | आसन | 15 आसनों का वर्णन; सिद्धासन को श्रेष्ठ कहा | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), अध्याय 1 |
| 2 | प्राणायाम | नाड़ी-शुद्धि, षट्कर्म, आठ कुंभक | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 2.7–10, 2.21–22, 2.44 |
| 3 | मुद्रा | कुंडलिनी, बंध और मुद्राएँ | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 3.1–3 |
| 4 | समाधि | राज योग के पर्याय, लय और नाद | हठयोग प्रदीपिका (Sinh अनु.), 4.3–4, 4.29, 4.65 |
हठयोग प्रदीपिका की मुख्य शिक्षाएँ
ग्रंथ में
- हठ का लक्ष्य राज योग है; आसन, कुंभक और दूसरे साधन राज योग का फल मिलने तक करने हैं।
- हठ और राज योग एक-दूसरे के बिना सिद्ध नहीं होते।
- षट्कर्म केवल मेद या कफ की अधिकता वालों के लिए हैं, सबके लिए नहीं।
- युवा, वृद्ध, रोगी या दुर्बल, कोई भी आलस छोड़कर अभ्यास करे तो सिद्धि पाता है; केवल पढ़ने से नहीं।
- कुंडलिनी सारे योग-अभ्यासों का आधार है, और गुरु-कृपा से जागती है।
हमने कौन-सा संस्करण पढ़ा?
इस कोश में प्रदीपिका के सारे श्लोक-क्रमांक Pancham Sinh के 1915 के अंग्रेज़ी अनुवाद के अनुसार हैं, जो अब सार्वजनिक (public domain) है। दूसरे संस्करणों में श्लोक-क्रमांक थोड़े अलग हो सकते हैं।
पहला अध्याय: परंपरा, स्थान और नियम
ग्रंथ में
प्रदीपिका आदिनाथ शिव को प्रणाम से शुरू होती है, जिन्होंने हठ योग की विद्या सिखाई, जो सीढ़ी की तरह साधक को राज योग के ऊँचे शिखर तक ले जाती है। स्वात्माराम कहते हैं कि मत्स्येन्द्र, गोरक्ष आदि हठ विद्या जानते थे, और उन्हीं की कृपा से उन्होंने यह सीखी।
ग्रंथ पुराने सिद्धों की लंबी सूची देता है, जिनमें आदिनाथ, मत्स्येन्द्र, शाबर, आनंद, भैरव, चौरंगी, मीननाथ, गोरक्षनाथ, विरूपाक्ष, बिलेशय आदि हैं, और कहता है कि ये महासिद्ध मृत्यु का दंड तोड़कर ब्रह्मांड में विचरते हैं।
प्रदीपिका की उपमा: जैसे घर सूर्य की तपन से बचाता है, वैसे ही हठ योग अपने अभ्यासी को तीन तापों से बचाता है; और योग में लगे लोगों के लिए यह सहारा देने वाले कच्छप जैसा है। ग्रंथ कहता है कि सिद्धि चाहने वाला योगी हठ विद्या को गुप्त रखे, क्योंकि छिपाने से वह शक्तिशाली रहती है और उजागर करने से निर्बल।
अभ्यास की जगह के लिए ग्रंथ कहता है: ऐसे देश में जहाँ न्याय से राज हो, अच्छे लोग रहते हों और भोजन आसानी से भरपूर मिले, एकांत में चार हाथ लंबी-चौड़ी एक छोटी कोठरी हो, जो पत्थर, आग, पानी और हर तरह के विघ्न से मुक्त हो। उसका दरवाज़ा छोटा हो, उसमें छेद या गड्ढे न हों, वह न बहुत ऊँची न बहुत नीची हो, गोबर से अच्छी तरह लिपी हो, और गंदगी व कीड़ों से मुक्त हो; बाहर कुंज, चबूतरा, कुआँ और अहाता हो। ऐसी कोठरी में चिंता-रहित होकर, गुरु के बताए अनुसार योग करे।
प्रदीपिका के अनुसार ये छह बातें योग को नष्ट करती हैं: बहुत खाना, बहुत परिश्रम, बहुत बोलना, नियमों से चिपके रहना (जैसे सुबह ठंडे पानी से नहाना, रात को खाना, या केवल फल खाना), लोगों की संगत, और चंचलता। और ये छह जल्दी सफलता देती हैं: साहस, हिम्मत, लगन, विवेक, श्रद्धा, और संगत से दूरी।
ग्रंथ दस यम गिनाता है: अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, क्षमा, धैर्य, दया, नम्रता, मिताहार और शौच। और दस नियम: तप, संतोष, आस्तिकता, दान, ईश्वर-पूजा, सिद्धांत-वचनों का श्रवण, लज्जा, मति, जप और यज्ञ।
मिताहार और भोजन
ग्रंथ में
प्रदीपिका मिताहार को ऐसा भोजन कहती है जो घी और मिठास के साथ अच्छी तरह पका हो, भूख से कुछ कम खाया जाए, और भगवान को अर्पित करके खाया जाए।
योगी के लिए हानिकारक बताए गए पदार्थ: कड़वे, खट्टे, नमकीन, तीखे, हरी सब्ज़ियाँ, खमीर उठे, तेल वाले, तिल और सरसों वाले, मादक पेय, मछली, मांस, दही और छाछ; और दोबारा गरम किया, सूखा, बहुत नमक वाला, खट्टा, घटिया अनाज, और जलन पैदा करने वाली सब्ज़ियाँ। गोरक्ष के कथन के अनुसार दुष्टों की संगत, आग, स्त्रियों की संगत, यात्रा, सुबह जल्दी नहाना, उपवास और हर तरह का शारीरिक परिश्रम भी टालना चाहिए।
योगी के लिए लाभकारी बताए गए पदार्थ: गेहूँ, चावल, जौ, साठी चावल, अच्छे अनाज, दूध, घी, शक्कर, मक्खन, मिश्री, शहद, सोंठ, परवल, पाँच तरह की सब्ज़ियाँ, मूँग और शुद्ध पानी; और बल देने वाले, मीठे, घी वाले पदार्थ, दूध, मक्खन आदि, अपनी इच्छा के अनुसार।
तीसरा और चौथा अध्याय: मुद्राएँ और नाद
ग्रंथ में
तीसरा अध्याय दस मुद्राएँ गिनाता है, जो ग्रंथ के अनुसार बुढ़ापे और मृत्यु का नाश करती हैं: महामुद्रा, महाबंध, महावेध, खेचरी, उड्डीयान बंध, मूल बंध, जालंधर बंध, विपरीतकरणी, वज्रोली और शक्तिचालन। ग्रंथ कहता है कि इन्हें आदिनाथ ने बताया, ये आठ तरह के ऐश्वर्य देती हैं, सब सिद्धों को प्रिय हैं और मरुतों के लिए भी कठिन हैं।
चौथे अध्याय में स्वात्माराम गोरक्षनाथ के बताए अनाहत नाद के अभ्यास का वर्णन करते हैं, उनके लिए जो तत्त्व-ज्ञान नहीं समझ पाते। ग्रंथ कहता है कि आदिनाथ ने लय के करोड़ों उपाय बताए, और उनमें अनाहत नाद का श्रवण ही सबसे श्रेष्ठ है। मुक्तासन में शांभवी मुद्रा के साथ बैठकर योगी एकाग्र मन से दाहिने कान के भीतर की ध्वनि सुने; कान, आँख, नाक और मुँह बंद करने पर शुद्ध सुषुम्ना के मार्ग में साफ़ ध्वनि सुनाई देती है।
ग्रंथ के अनुसार सब योगों में चार अवस्थाएँ हैं: आरंभ, घट, परिचय और निष्पत्ति। आरंभ में प्राणायाम से हृदय की ब्रह्म ग्रंथि भिदती है, हृदय के शून्य में सुख होता है, और आभूषणों की झंकार जैसे अनाहत नाद सुनाई देते हैं; योगी का शरीर दिव्य, तेजस्वी, स्वस्थ और सुगंधित होता है।
दूसरी, घट अवस्था में वायु एक होकर मध्य मार्ग में चलने लगती है, आसन दृढ़ होता है, और योगी देवता जैसा ज्ञानी होता है; कंठ की विष्णु ग्रंथि भिदती है और कंठ के शून्य में भेरी (नगाड़े) जैसी ध्वनि उठती है। तीसरी, परिचय अवस्था में भौंहों के बीच के शून्य में ढोल की ध्वनि होती है और वायु महाशून्य में जाती है, जो सब सिद्धियों का घर है।
चौथी, निष्पत्ति अवस्था में रुद्र ग्रंथि भिदती है और वायु भौंहों के बीच ईश्वर के स्थान में प्रवेश करती है, जहाँ पूर्ण नाद होता है। मन और नाद का मिलन राज योग कहलाता है। ग्रंथ कहता है कि जो राज योग को न जानकर केवल हठ योग करते हैं, वे अपना परिश्रम व्यर्थ करते हैं।
आगे पढ़ें
- हठ योग — शरीर और प्राण से मन तक पहुँचने वाला मार्ग
- राज योग — मन की वह अवस्था, जिसे हठयोग अपना लक्ष्य कहता है
- घेरंड संहिता — घेरंड और चंडकापालि का संवाद: शरीर की शुद्धि से समाधि तक सात साधन
- कुंडलिनी योग — हठ ग्रंथों की कुंडलिनी: आधार, जागरण और सावधानी
- लय योग — मन का अपने स्रोत में विलीन होना: योगतत्त्व और प्रदीपिका में
