घेरंड संहिता क्या है?
ग्रंथ में
अनुवादक Vasu इस ग्रंथ को हठ योग पर एक तांत्रिक ग्रंथ बताते हैं, जो महर्षि घेरंड और जिज्ञासु चंडकापालि के संवाद के रूप में है। ग्रंथ के पहले उपदेश का आरंभ उस आदि-ईश्वर की वंदना से होता है, जिसने हठ विद्या सिखाई, जो राज योग की ऊँचाई तक ले जाने वाली पहली सीढ़ी है।
Vasu यह भी बताते हैं कि इसके बहुत से श्लोक हठयोग प्रदीपिका से शब्दशः मिलते हैं, इसलिए या तो एक ने दूसरे से लिया है, या दोनों का स्रोत एक है।
घेरंड संहिता के सात उपदेश
ग्रंथ में
| उपदेश | विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| 1 | शरीर की शुद्धि: षट्कर्म | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.12 |
| 2 | आसन: 32 आसन | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 2.3–6 |
| 3 | मुद्रा | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 3, विषय-सूची |
| 4 | प्रत्याहार | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 4, विषय-सूची |
| 5 | प्राणायाम: आठ कुंभक | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 5.46 |
| 6 | ध्यान: स्थूल, ज्योति और सूक्ष्म | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 6, विषय-सूची |
| 7 | समाधि: ध्यान, नाद, रसानंद, लय-सिद्धि आदि | घेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 7, विषय-सूची |
आसन और प्राणायाम
ग्रंथ में
ग्रंथ कहता है कि आसन उतने हैं जितनी जीवों की जातियाँ; उनमें 84 श्रेष्ठ हैं, और उनमें से 32 मनुष्य के लिए उपयोगी हैं। इसके कई आसन नाम में आज के आसनों से मिलते हैं, पर रूप में अलग हैं। जैसे इसका उत्कटासन पंजों पर एड़ी उठाकर किया जाता है, और गरुडासन ज़मीन पर।
इसके आठ कुंभक हैं: सहित, सूर्यभेद, उज्जायी, शीतली, भस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा और केवली। प्रदीपिका की सूची से यह थोड़ी अलग है।
सात साधन और उनके फल
ग्रंथ में
घेरंड संहिता हर साधन का फल बताती है: छह कर्मों से शुद्धि, आसन से दृढ़ता, मुद्रा से स्थिरता, प्रत्याहार से धीरता, प्राणायाम से हल्कापन, ध्यान से आत्मा का प्रत्यक्ष, और समाधि से निर्लिप्तता, जो निश्चित ही मुक्ति है।
पहले उपदेश में षट्कर्म के सारे भेद हैं: धौति के चार भेद और तेरह उपभेद, बस्ती के दो, नेति, लौलिकी, त्राटक, और कपालभाति के तीन भेद। दूसरे में 32 आसन, और तीसरे में 25 मुद्राएँ, जिनमें महामुद्रा, नभो मुद्रा, तीनों बंध, खेचरी, विपरीतकरणी, शक्तिचालनी, शांभवी और पाँच धारणाएँ हैं।
चौथा उपदेश: प्रत्याहार
ग्रंथ में
घेरंड संहिता कहती है कि प्रत्याहार के ज्ञान से काम आदि सब विकार नष्ट होते हैं। जब भी चित्त तरह-तरह के विषयों से खिंचकर भटके, उसे वहाँ से लौटाकर अपने वश में लाओ।
ग्रंथ विषयों के उदाहरण देता है: प्रशंसा हो या निंदा, अच्छी बात हो या बुरी; सुगंध हो या दुर्गंध; मीठा, खट्टा, कड़वा या कसैला स्वाद, जिस भी चीज़ से मन खिंचे, उससे उसे लौटाकर आत्मा के वश में लाओ।
पाँचवाँ उपदेश: प्राणायाम की चार शर्तें
ग्रंथ में
घेरंड संहिता के अनुसार प्राणायाम से मनुष्य देवता जैसा हो जाता है, और इसके लिए चार बातें ज़रूरी हैं: अच्छा स्थान, उचित समय, मिताहार और नाड़ियों की शुद्धि।
स्थान के बारे में ग्रंथ कहता है कि अभ्यास न घर से दूर किसी देश में करे, न वन में, न राजधानी में, न भीड़ में: दूर देश में श्रद्धा घटती है, वन में रक्षा नहीं, और भीड़ में उजागर होने का डर। न्यायप्रिय राजा वाले, सुलभ भोजन वाले, उपद्रव-रहित देश में एक छोटी कुटिया बनाए, चारों ओर दीवार, बीच में कुआँ और तालाब; कुटिया न बहुत ऊँची न बहुत नीची, गोबर से लिपी, और छिपी जगह में।
समय के बारे में ग्रंथ कहता है कि हेमंत, शिशिर, ग्रीष्म और वर्षा में अभ्यास शुरू न करे, नहीं तो रोग होते हैं; शुरुआत वसंत या शरद में करे, जिससे बिना कठिनाई सिद्धि मिलती है। और जो मिताहार के बिना योग करता है, उसे तरह-तरह के रोग होते हैं और सिद्धि नहीं मिलती।
आगे पढ़ें
- हठयोग प्रदीपिका — स्वात्माराम का ग्रंथ: आसन, प्राणायाम, मुद्रा और समाधि
- हठ योग — शरीर और प्राण से मन तक पहुँचने वाला मार्ग
- शुद्धि क्रियाएँ (षट्कर्म) — हठयोग की छह शुद्धि क्रियाएँ: ग्रंथ क्या कहते हैं, और कौन इन्हें करे
- योगासन — आसनों की विधि, सावधानियाँ, और पुराने ग्रंथों में उनका स्थान
- प्राणायाम — श्वास के अभ्यास: ग्रंथों के कुंभक और आज का सुरक्षित अभ्यास
