कुंडलिनी योग

हठ ग्रंथों की कुंडलिनी: आधार, जागरण और सावधानी

संक्षेप में

हठ योग के ग्रंथों में कुंडलिनी वह शक्ति है जिसे सारे योग-अभ्यासों का आधार बताया गया है। हठयोग प्रदीपिका कहती है कि गुरु की कृपा से जब सोई कुंडलिनी जागती है, तब सारे चक्र और ग्रंथियाँ भिद जाती हैं। यह एक पारंपरिक आध्यात्मिक अवधारणा है, शरीर-विज्ञान नहीं।

एक नज़र में

मुख्य ग्रंथ
हठयोग प्रदीपिका अध्याय 3; घेरंड संहिता अध्याय 3
प्रदीपिका का कथन
सारे योग-अभ्यास कुंडलिनी पर टिके हैं (3.1)
जागरण
गुरु की कृपा से (3.2)
पर्याय
कुटिलांगी, कुंडलिनी, भुजंगी, शक्ति, ईश्वरी, कुंडली, अरुंधती (3.97)

कुंडलिनी योग क्या है?

ग्रंथ में

प्रदीपिका का तीसरा अध्याय एक सुंदर उपमा से शुरू होता है। जैसे सर्पों के राजा पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी को धारण करते हैं, वैसे ही सारे योग-अभ्यास कुंडलिनी पर टिके हैं।

ग्रंथ आगे कहता है कि जब गुरु की कृपा से सोई हुई कुंडलिनी जागती है, तब सारे कमल (चक्र) और ग्रंथियाँ भिद जाती हैं, और सुषुम्ना प्राण के लिए मुख्य मार्ग बन जाती है।

प्रदीपिका कुंडलिनी के कई नाम एक साथ देती है: कुटिलांगी, कुंडलिनी, भुजंगी, शक्ति, ईश्वरी, कुंडली और अरुंधती, और कहती है कि ये सब एक ही अर्थ के शब्द हैं।

घेरंड संहिता में कुंडलिनी

ग्रंथ में

घेरंड संहिता के तीसरे उपदेश में मुद्राओं के बीच शक्तिचालनी मुद्रा का वर्णन है, जिसका संबंध कुंडलिनी से है। दोनों ग्रंथों में कुंडलिनी का प्रसंग मुद्रा, बंध और कुंभक जैसे अभ्यासों के साथ आता है। इन्हें गुरु से ही सीखने की परंपरा है।

कुंडलिनी को कैसे समझें?

कुंडलिनी, चक्र और नाड़ी सूक्ष्म शरीर की पारंपरिक अवधारणाएँ हैं। इन्हें शरीर की हड्डियों या नसों की तरह मापा नहीं गया है। अनुवादक Sinh ने स्वयं अपनी टिप्पणी में कुंडलिनी को मेरुदंड से जोड़ा है, पर वह अनुवादक की व्याख्या है, ग्रंथ का शब्द नहीं।

कुंडलिनी जागरण में क्या सावधानी रखें?

तुरंत जागरण के दावों से बचें

प्रदीपिका स्वयं जागरण को गुरु की कृपा से जोड़ती है। इसलिए "कुछ दिनों में कुंडलिनी जगाइए" जैसे दावों पर भरोसा न करें, और बंध, मुद्रा व कुंभक के अभ्यास किताब या वीडियो से अकेले न करें।

  • साँस को ज़ोर से रोकने वाले अभ्यास योग्य गुरु से ही सीखिए। जब तक विशेष रूप से न कहा जाए, श्वास नहीं रोकना चाहिए।
  • नए साधक ज़ोर की श्वास जैसे कठिन अभ्यासों से बचें।

योगतत्त्व: कुंडलिनी सुषुम्ना में कैसे जाती है?

ग्रंथ में

योगतत्त्व उपनिषद् के अनुसार परिचय अवस्था में, यत्न से परिचित हुई वायु अग्नि के साथ कुंडलिनी को जगाकर बिना रुकावट सुषुम्ना में प्रवेश करती है; और वायु के साथ चित्त भी उस महापथ में प्रवेश करता है।

उपनिषद् के अनुसार इससे पहले घट अवस्था आती है, जब प्राण, अपान, मन, बुद्धि, जीवात्मा और परमात्मा बिना विरोध के एक होते हैं; और उससे पहले आरंभ, जिसमें नाड़ी-शुद्धि होती है।

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कुंडलिनी योग — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न