शिव संहिता में कुंडलिनी
ग्रंथ में
शिव संहिता मूलाधार का वर्णन करते हुए बताती है कि वहाँ देवी कुंडलिनी रहती हैं। वे सब नाड़ियों को घेरे हुए हैं, उनकी साढ़े तीन कुंडलियाँ हैं, और वे अपनी पूँछ अपने मुँह में लेकर सुषुम्ना के छिद्र में विश्राम करती हैं।
ग्रंथ उन्हें वाणी की देवी, और सत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों की माता कहता है। वे सर्प की तरह सोई हैं, अपने प्रकाश से चमकती हैं, तपे सोने जैसी हैं, और ग्रंथ उन्हें विष्णु की शक्ति कहता है।
शिव संहिता यह भी कहती है कि सब नाड़ियाँ आठ गाँठों से बँधी हैं, और केवल कुंडलिनी इन गाँठों को भेदकर ब्रह्मरंध्र से निकलती है और मुक्ति का मार्ग दिखाती है।
हठयोग प्रदीपिका में कुंडलिनी
ग्रंथ में
प्रदीपिका का तीसरा अध्याय कहता है कि जैसे सर्पों के राजा पृथ्वी को धारण करते हैं, वैसे ही सारे योग-अभ्यास कुंडलिनी पर टिके हैं; और गुरु की कृपा से जब सोई कुंडलिनी जागती है, तब सारे कमल और ग्रंथियाँ भिद जाती हैं।
प्रदीपिका कुंडलिनी के कई नाम देती है और कहती है कि ये सब एक ही अर्थ के हैं: कुटिलांगी, कुंडलिनी, भुजंगी, शक्ति, ईश्वरी, कुंडली और अरुंधती।
घेरंड संहिता में भी कुंडलिनी का प्रसंग शक्तिचालनी मुद्रा के साथ आता है।
कुंडलिनी को कैसे समझें?
कुंडलिनी सूक्ष्म शरीर की पारंपरिक आध्यात्मिक अवधारणा है, शरीर-विज्ञान नहीं। अनुवादक Sinh अपनी टिप्पणी में इसे मेरुदंड से जोड़ते हैं, पर वह अनुवादक की व्याख्या है, ग्रंथ का शब्द नहीं।
चक्र-ध्यान में सावधानी
तुरंत "चक्र जागरण" के दावों से बचें
ग्रंथ चक्रों पर ध्यान के फल बताते हैं, पर उन्हें गुरु के मार्गदर्शन और लंबी साधना से जोड़ते हैं; हठयोग प्रदीपिका कुंडलिनी के जागरण को गुरु की कृपा से जोड़ती है। "कुछ दिनों में चक्र खोलिए" जैसे दावों पर भरोसा न करें।
ध्यान में बेचैनी, घबराहट या असामान्य अनुभव बढ़ें तो रुकिए, और किसी अनुभवी से बात कीजिए। यह किसी रोग का इलाज नहीं है।
आगे पढ़ें
- कुंडलिनी योग — हठ ग्रंथों की कुंडलिनी: आधार, जागरण और सावधानी
- मूलाधार चक्र — पहला चक्र: चार पंखुड़ियों वाला आधार-कमल, जहाँ कुंडलिनी सोई है
- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी — सूक्ष्म शरीर की तीन मुख्य नाड़ियाँ: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका
- चक्र और कुंडलिनी — सात चक्र, तीन नाड़ियाँ और कुंडलिनी: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका के अनुसार
