स्वाधिष्ठान चक्र क्या है?
ग्रंथ में
स्व का अर्थ है अपना, और अधिष्ठान का अर्थ है निवास। शिव संहिता के अनुसार दूसरा चक्र जननेंद्रिय के मूल में स्थित है, और इसका नाम स्वाधिष्ठान है।
शिव संहिता में स्वाधिष्ठान चक्र का स्वरूप
ग्रंथ में
इसकी छह पंखुड़ियाँ ब, भ, म, य, र और ल अक्षरों से चिह्नित हैं।
इस कमल का रंग रक्त-लाल है। इसके अधिष्ठाता सिद्ध बाल हैं, और इसकी देवी राकिणी हैं।
सहस्रार के महाशून्य के ध्यान की बात करते हुए शिव संहिता कहती है कि योगी यह अभ्यास बड़ी सावधानी से स्वाधिष्ठान के मार्ग से करे।
षट्चक्र निरूपण में स्वाधिष्ठान चक्र: तत्व, बीज और देवता
ग्रंथ में
षट्चक्र निरूपण (पूर्णानंद) के अनुसार स्वाधिष्ठान जननेंद्रिय के मूल के पास, मेरुदंड के केंद्र में, छह पंखुड़ियों वाला सिंदूरी कमल है। पंखुड़ियों पर बिजली जैसे चमकते अक्षर बं, भं, मं, यं, रं, लं हैं।
यह जल तत्व का केंद्र है, जिसे वरुण का श्वेत प्रदेश कहा गया है। इसका मंडल अर्धचंद्र के आकार का है, और जल का बीज मंत्र वं है, जो हाथ में पाश लिए श्वेत मकर पर विराजमान है।
यहाँ हरि, यानी विष्णु, और उग्र रूप वाली राकिणी शक्ति हैं। ध्यान दीजिए: शिव संहिता यहाँ के सिद्ध को बाल कहती है, और यह ग्रंथ हरि को; देवी राकिणी दोनों में एक हैं।
नाम के अर्थ पर टीकाकार कहते हैं कि यह "स्व", यानी परम लिंग, के नाम पर है; एक दूसरी व्युत्पत्ति इसे शक्ति का "अपना निवास" बताती है।
स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान के फल, शिव संहिता के अनुसार
ग्रंथ में
जो हर दिन इस स्वाधिष्ठान कमल का ध्यान करता है, वह सब सुंदर देवांगनाओं के प्रेम और आदर का पात्र बनता है।
वह पहले से अनजाने शास्त्रों और विद्याओं को निडर होकर कहने लगता है, सब रोगों से मुक्त होता है, और निर्भय होकर पूरे विश्व में घूमता है।
मृत्यु उसे नहीं खाती, वह मृत्यु को खा जाता है। उसे अणिमा, लघिमा जैसी ऊँची सिद्धियाँ मिलती हैं।
उसके शरीर में वायु समान रूप से चलती है, शरीर के रस बढ़ते हैं, और आकाश-कमल से टपकने वाला अमृत भी उसमें बढ़ता है।
आगे पढ़ें
- मूलाधार चक्र — पहला चक्र: चार पंखुड़ियों वाला आधार-कमल, जहाँ कुंडलिनी सोई है
- मणिपुर चक्र — तीसरा चक्र: नाभि के पास दस पंखुड़ियों वाला सुनहरा कमल
- चक्र और कुंडलिनी — सात चक्र, तीन नाड़ियाँ और कुंडलिनी: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका के अनुसार
