आज्ञा चक्र क्या है?
ग्रंथ में
आज्ञा का अर्थ है आदेश। शिव संहिता के अनुसार दो पंखुड़ियों वाला आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच स्थित है।
शिव संहिता में आज्ञा चक्र का स्वरूप
ग्रंथ में
इसकी दो पंखुड़ियाँ ह और क्ष अक्षरों से चिह्नित हैं। इसके अधिष्ठाता सिद्ध शुक्ल महाकाल हैं, यानी श्वेत महाकाल, और देवी हाकिनी।
उस पंखुड़ी के भीतर शरद के चंद्रमा जैसा चमकता नित्य बीज है। जो मुनि इसे जान लेता है, वह कभी नीचे नहीं गिरता।
ग्रंथ इसे वह महान ज्योति कहता है जो सब तंत्रों में गुप्त रखी गई है; इसके चिंतन से सबसे ऊँची सफलता मिलती है।
यहाँ शिव कहते हैं: मैं मुक्ति देने वाला हूँ, तुरीय में मैं तीसरा लिंग हूँ; इसका चिंतन करके योगी निश्चित ही मेरे जैसा हो जाता है।
इस दो पंखुड़ियों वाले कमल में महेश्वर रहते हैं। योगी इसके ऊपर तीन और पवित्र अवस्थाएँ बताते हैं, बिंदु, नाद और शक्ति, जो ललाट के कमल में हैं।
षट्चक्र निरूपण में आज्ञा चक्र: तत्व, बीज और देवता
ग्रंथ में
षट्चक्र निरूपण (पूर्णानंद) के अनुसार इसका नाम आज्ञा इसलिए है कि यहीं ऊपर से गुरु की आज्ञा प्राप्त होती है। यह भौंहों के बीच दो श्वेत पंखुड़ियों वाला कमल है, जिन पर श्वेत अक्षर हं और क्षं हैं।
इन दो अक्षरों के साथ छहों चक्रों के पचास अक्षर पूरे होते हैं: चक्रों में कुल पचास पंखुड़ियाँ और पचास अक्षर हैं। कमल के बीच महामंत्र ॐ है।
यहाँ हंस रूप में परमशिव हैं, सिद्धकाली हैं, अमृत पीकर प्रसन्न श्वेत हाकिनी शक्ति हैं, और एक उलटे त्रिकोण में बिजली जैसा चमकता इतर लिंग है।
ग्रंथ के अनुसार तीन लिंग तीन चक्रों में हैं: स्वयम्भू मूलाधार में, बाण अनाहत में, और इतर आज्ञा में। यही तीन ग्रंथियाँ हैं, जिन्हें भेदना "द्वार खोलना" कहलाता है।
आज्ञा मन का केंद्र है, यहाँ मन और प्रकृति के सूक्ष्म तत्व हैं। ग्रंथ कहता है कि मृत्यु के समय योगी अपने प्राण यहीं रखता है और फिर उस पुराण पुरुष में प्रवेश करता है जो तीनों लोकों से पहले था; शिव संहिता (5.117) भी मृत्यु के समय आज्ञा के ध्यान से परमात्मा में लीन होना बताती है।
भीतर की वाराणसी
ग्रंथ में
शिव संहिता कहती है कि इड़ा और पिंगला नाम की दो नाड़ियाँ ही असली वरणा और असी हैं, और इनके बीच का स्थान वाराणसी है, जहाँ विश्वनाथ रहते हैं।
आज्ञा कमल के दाहिने भाग से निकलकर बाईं नासिका तक जाने वाली इड़ा को यहाँ वरणा कहा गया है, और बाएँ भाग से निकलकर दाहिनी नासिका तक जाने वाली पिंगला को असी। योगी इन दोनों के बीच के स्थान को वाराणसी मानकर ध्यान करे।
ग्रंथ के अनुसार सत्य देखने वाले ऋषियों ने अनेक शास्त्रों में इस पवित्र स्थान की महिमा और इसका गहरा रहस्य बताया है।
ग्रंथ में आज्ञा पर ध्यान
ग्रंथ में
शिव संहिता कहती है कि जीभ को उलटकर तालु के लंबे गड्ढे में रखकर योगी ध्यान करे; यह ध्यान सब भयों को नष्ट करता है।
ग्रंथ यह भी कहता है कि इस पर खड़े या चलते, सोते या जागते, किसी भी अवस्था में चिंतन किया जा सकता है।
आज के अभ्यास में भी भौंहों के बीच हल्का ध्यान रखने की बात आती है: आयुष की पुस्तिका ध्यान में भौंहों के बीच हल्का ध्यान और श्वास के प्रति सजगता रखने को कहती है, ज़ोर से एकाग्र होने को नहीं।
आज्ञा चक्र पर ध्यान के फल, शिव संहिता के अनुसार
ग्रंथ में
जो सदा इस छिपे आज्ञा कमल का ध्यान करता है, वह बिना किसी बाधा के अपने पिछले जन्म के सारे कर्म तुरंत नष्ट कर देता है।
यहाँ टिककर निरंतर ध्यान करने वाले योगी को सारे बाहरी रूप, पूजाएँ और प्रार्थनाएँ व्यर्थ लगने लगती हैं।
यक्ष, राक्षस, गंधर्व, अप्सराएँ और किन्नर, सब उसके चरणों की सेवा करते हैं और उसकी आज्ञा मानते हैं।
जिसका मन यहाँ एक क्षण भी स्थिर रहे, उसके सारे पाप तुरंत नष्ट हो जाते हैं।
बाकी पाँच कमलों के ध्यान के जो फल ऊपर बताए गए, वे सब अकेले इस आज्ञा कमल के ज्ञान से मिल जाते हैं।
जो बुद्धिमान निरंतर इसका ध्यान करता है, वह इच्छाओं की बड़ी ज़ंजीर से मुक्त होकर सुख पाता है।
मृत्यु के समय जो योगी इस कमल का ध्यान करता है, वह शरीर छोड़कर परमात्मा में लीन हो जाता है।
जो खड़े या चलते, सोते या जागते इसका ध्यान करता है, उसे पाप नहीं छूते।
योगी अपने ही प्रयत्न से बंधन से छूट जाता है। ग्रंथ में शिव कहते हैं कि इस दो पंखुड़ियों वाले कमल की महिमा पूरी नहीं कही जा सकती; ब्रह्मा आदि देवताओं ने भी उनसे इसका केवल एक अंश जाना है।
आगे पढ़ें
- विशुद्ध चक्र — पाँचवाँ चक्र: कंठ में सोलह पंखुड़ियों वाला सुनहरा कमल, स्वरों का आसन
- सहस्रार — हज़ार पंखुड़ियों वाला कमल: ब्रह्मरंध्र, अमृत का चंद्र और कैलास
- इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ी — सूक्ष्म शरीर की तीन मुख्य नाड़ियाँ: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका
- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर
- चक्र और कुंडलिनी — सात चक्र, तीन नाड़ियाँ और कुंडलिनी: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका के अनुसार
