नाड़ियाँ क्या हैं?
ग्रंथ में
शिव संहिता के अनुसार मनुष्य के शरीर में 3,50,000 नाड़ियाँ हैं, उनमें 14 प्रमुख हैं, और उन 14 में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना मुख्य हैं।
हठयोग प्रदीपिका अलग संख्या देती है: वह कहती है कि उसके बताए अभ्यास 72,000 नाड़ियों की अशुद्धि साफ़ करते हैं। यानी कुल संख्या पर ग्रंथ एकमत नहीं।
| नाड़ी | स्थान | स्रोत |
|---|---|---|
| इड़ा | बाईं ओर; बाईं नासिका तक जाती है | शिव संहिता (Vasu अनु.), अध्याय 2, इड़ा |
| पिंगला | दाहिनी ओर; दाहिनी नासिका तक जाती है | शिव संहिता (Vasu अनु.), अध्याय 2, पिंगला |
| सुषुम्ना | इड़ा और पिंगला के बीच; इसमें छह कमल | शिव संहिता (Vasu अनु.), 2.27 |
सुषुम्ना नाड़ी
ग्रंथ में
शिव संहिता कहती है कि इड़ा और पिंगला के बीच की नाड़ी निश्चित ही सुषुम्ना है, और उसमें छह अवस्थाएँ, छह शक्तियाँ और छह कमल हैं।
हठयोग प्रदीपिका सुषुम्ना के कई नाम एक साथ देती है: शून्य पदवी, ब्रह्मरंध्र, महापथ, श्मशान, शांभवी और मध्य मार्ग। ग्रंथ के अनुसार कुंडलिनी के जागने पर सुषुम्ना प्राण का मुख्य मार्ग बन जाती है।
नाड़ियों को कैसे समझें?
नाड़ियाँ सूक्ष्म शरीर की पारंपरिक अवधारणा हैं, शरीर की नसें या रक्त-वाहिनियाँ नहीं। अनुवादक Sinh अपनी टिप्पणी में सुषुम्ना को मेरुदंड के भीतर के मार्ग से जोड़ते हैं; वह अनुवादक की व्याख्या है, ग्रंथ का शब्द नहीं।
नासिका और नाड़ी
परंपरा
परंपरा में बाईं नासिका को चंद्र (इड़ा) और दाहिनी को सूर्य (पिंगला) से जोड़ा जाता है। अनुलोम-विलोम और सूर्यभेदन जैसे अभ्यासों के नाम इसी से जुड़े हैं।
चक्र-ध्यान में सावधानी
तुरंत "चक्र जागरण" के दावों से बचें
ग्रंथ चक्रों पर ध्यान के फल बताते हैं, पर उन्हें गुरु के मार्गदर्शन और लंबी साधना से जोड़ते हैं; हठयोग प्रदीपिका कुंडलिनी के जागरण को गुरु की कृपा से जोड़ती है। "कुछ दिनों में चक्र खोलिए" जैसे दावों पर भरोसा न करें।
ध्यान में बेचैनी, घबराहट या असामान्य अनुभव बढ़ें तो रुकिए, और किसी अनुभवी से बात कीजिए। यह किसी रोग का इलाज नहीं है।
आगे पढ़ें
- कुंडलिनी क्या है? — मूलाधार में साढ़े तीन कुंडलियों वाली शक्ति: ग्रंथों की अवधारणा
- अनुलोम-विलोम (नाड़ी शोधन) — बारी-बारी नासिका से श्वास: आयुष प्रोटोकॉल और हठयोग प्रदीपिका
- सूर्यभेदन — दाहिनी नासिका से श्वास भरना: हठयोग प्रदीपिका का पहला कुंभक
- चक्र और कुंडलिनी — सात चक्र, तीन नाड़ियाँ और कुंडलिनी: शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका के अनुसार
