मूलाधार चक्र

पहला चक्र: चार पंखुड़ियों वाला आधार-कमल, जहाँ कुंडलिनी सोई है

संक्षेप में

मूलाधार पहला चक्र है। शिव संहिता के अनुसार यह गुदा से दो अंगुल ऊपर और जननेंद्रिय से दो अंगुल नीचे है। इसके कमल की चार पंखुड़ियाँ व, श, ष, स हैं, सिद्ध द्विरण्ड और देवी डाकिनी हैं, और यहीं कुंडलिनी साढ़े तीन कुंडलियाँ मारकर सोई रहती है।

एक नज़र में

क्रम
पहला चक्र
स्थान
गुदा और जननेंद्रिय के बीच (5.56)
पंखुड़ियाँ
4: व, श, ष, स (5.63)
सिद्ध और देवी
द्विरण्ड और डाकिनी (5.64)
विशेष
कुंडलिनी, स्वयम्भू-लिंग, काम-बीज
तत्व और बीज
पृथ्वी, लं (षट्चक्र निरूपण)
ग्रंथ में
शिव संहिता 5.56–74

मूलाधार चक्र क्या है?

ग्रंथ में

मूल का अर्थ है जड़, और आधार का अर्थ है टिकने की जगह। शिव संहिता के अनुसार गुदा से दो अंगुल ऊपर और जननेंद्रिय से दो अंगुल नीचे, चार अंगुल चौड़ा, कंद जैसा एक स्थान है।

इस स्थान के बीच एक योनि है, जिसका मुख पीछे की ओर है। इसी स्थान को मूल कहा गया है, और यहीं देवी कुंडलिनी रहती हैं।

शिव संहिता में मूलाधार चक्र का स्वरूप

ग्रंथ में

कुंडलिनी सब नाड़ियों को घेरे हुए हैं, उनकी साढ़े तीन कुंडलियाँ हैं, और वे अपनी पूँछ अपने मुँह में लेकर सुषुम्ना के छिद्र में विश्राम करती हैं।

वे वहाँ सर्प की तरह सोई हैं और अपने ही प्रकाश से चमकती हैं। ग्रंथ उन्हें वाणी की देवी कहता है, और बीज भी।

तेज से भरी, तपे सोने जैसी इस कुंडलिनी को विष्णु की शक्ति जानो। वे सत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों की माता हैं।

वहीं बंधूक के फूल जैसा सुंदर काम-बीज रखा है, जो तपे सोने-सा चमकता है और योग में नित्य कहा गया है।

सुषुम्ना भी उसे घेरे हुए है। वह बीज शरद के चंद्रमा-सा चमकता है, उसमें करोड़ों सूर्यों का प्रकाश और करोड़ों चंद्रमाओं की शीतलता है। अग्नि, सूर्य और चंद्र, ये तीनों मिलकर देवी त्रिपुरा भैरवी हैं, और इसे महाशक्ति भी कहा गया है।

यह बीज क्रिया और संवेदना की शक्ति से युक्त है और पूरे शरीर में घूमता है। यह सूक्ष्म है, अग्नि की लौ जैसा है; कभी ऊपर उठता है, कभी नीचे जल में गिरता है। मूलाधार में स्थित इस महाशक्ति को स्वयम्भू-लिंग कहा गया है।

यह सब मिलकर आधार-पद्म कहलाता है, और इसकी चार पंखुड़ियाँ व, श, ष और स अक्षरों से चिह्नित हैं।

स्वयम्भू-लिंग के पास कुल नाम का एक सुनहरा क्षेत्र है। इसके सिद्ध द्विरण्ड हैं और देवी डाकिनी। कमल के बीच की योनि में कुंडलिनी रहती हैं, और उनके ऊपर घूमती तेजस्वी ऊर्जा काम-बीज कहलाती है।

षट्चक्र निरूपण में मूलाधार चक्र: तत्व, बीज और देवता

ग्रंथ में

तांत्रिक ग्रंथ षट्चक्र निरूपण (पूर्णानंद) मूलाधार का वर्णन कुछ अलग ढंग से करता है। इसके अनुसार यह चार पंखुड़ियों वाला गहरा लाल कमल है, जिसकी पंखुड़ियों पर सुनहरे अक्षर वं, शं, षं, सं हैं।

यह पृथ्वी तत्व का केंद्र है। पृथ्वी का मंडल चौकोर और पीला है, और उसका बीज मंत्र लं है, जो ऐरावत हाथी पर विराजमान है; हाथी पृथ्वी तत्व की दृढ़ता का प्रतीक है।

यहाँ के देवता सृष्टि करने वाले ब्रह्मा हैं, उनकी शक्ति सावित्री, और यहाँ की शक्ति डाकिनी हैं। यहीं त्रिपुरा नाम का त्रिकोण है, जिसमें नए पत्ते के रंग और आकार का स्वयम्भू लिंग है।

बिजली जैसी चमकती कुंडलिनी इस लिंग के चारों ओर साढ़े तीन बार लिपटकर सोई हैं, और अपने सिर से सुषुम्ना का द्वार, ब्रह्मद्वार, ढके हुए हैं।

मूलाधार का सूर्य

ग्रंथ में

शिव संहिता आगे बताती है कि मूलाधार के चार पंखुड़ियों वाले कमल के बीच सूर्य रहता है। उस सूर्य-मंडल से निरंतर विष टपकता है, और वह बहुत गरम विष पिंगला से होकर दाहिनी नासिका तक जाता है।

इसके उलट, सहस्रार के चंद्र से अमृत टपककर इड़ा से बाईं नासिका तक जाता है। यानी ग्रंथ नीचे सूर्य और विष, और ऊपर चंद्र और अमृत की जोड़ी बताता है।

मूलाधार चक्र पर ध्यान के फल, शिव संहिता के अनुसार

ग्रंथ में

जो बुद्धिमान सदा इस मूलाधार का ध्यान करता है, उसे दार्दुरी सिद्धि मिलती है, यानी मेंढक की तरह उछलने की शक्ति, और धीरे-धीरे वह भूमि को पूरी तरह छोड़ सकता है, यानी हवा में उठ सकता है।

शरीर की कांति बढ़ती है, जठराग्नि प्रबल होती है, और रोगों से मुक्ति, चतुराई और सर्वज्ञता आती है।

वह जानता है कि क्या हो चुका, क्या हो रहा है और क्या होगा, उनके कारणों के साथ; और पहले न सुनी गई विद्याओं को उनके रहस्यों सहित जान लेता है।

उसकी जीभ पर विद्या की देवी सदा नाचती हैं, और केवल निरंतर जप से उसे मंत्र-सिद्धि मिलती है।

गुरु का वचन है कि यह बुढ़ापे, मृत्यु और अनगिनत कष्टों को नष्ट करता है। प्राणायाम के अभ्यासी को सदा इसका ध्यान करना चाहिए; इसके चिंतन से ही महायोगी सब पापों से छूट जाता है।

जब योगी इस मूलाधार कमल, यानी स्वयम्भू-लिंग, का ध्यान करता है, उसी क्षण उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

मन जो चाहता है, वह पाता है। निरंतर अभ्यास से वह उस मोक्ष-दाता को देखता है जो भीतर और बाहर सबसे श्रेष्ठ है। ग्रंथ में शिव कहते हैं: उससे बढ़कर मैं किसी को नहीं जानता।

जो भीतर के शिव को छोड़कर बाहर के रूपों को पूजता है, वह उस आदमी जैसा है जो हाथ की मिठाई फेंककर भोजन की खोज में भटकता है।

इसलिए हर दिन, बिना आलस के, अपने स्वयम्भू-लिंग का ध्यान करे। ग्रंथ कहता है कि इसी से सारी शक्तियाँ आएँगी, और निरंतर अभ्यास से छह महीने में सफलता मिलती है और वायु सुषुम्ना में प्रवेश करती है।

वह मन को जीत लेता है, श्वास और वीर्य को रोक सकता है, और इस लोक व परलोक, दोनों में सफल होता है।

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मूलाधार चक्र — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न