ज्ञान योग क्या है?
ग्रंथ में
हम अक्सर जानकारी को ज्ञान समझ लेते हैं। गीता का ज्ञान कुछ और है: ऐसी समझ जो जीवन को बदल दे। तीसरे अध्याय में वह बताती है कि इस लोक में दो निष्ठाएँ कही गई हैं, सांख्यों के लिए ज्ञान योग और योगियों के लिए कर्म योग।
चौथे अध्याय में गीता कहती है कि द्रव्य से किए जाने वाले यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है, और सारे कर्म अंत में ज्ञान में ही पूरे होते हैं।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर उसे स्वयं अपने भीतर पा लेता है।
ज्ञान कैसे मिलता है?
ग्रंथ में
गीता ज्ञान को अकेले किताबों से पाने की बात नहीं कहती। वह कहती है कि तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी से विनम्रता से झुककर, प्रश्न पूछकर और सेवा करके ज्ञान लो, वे तुम्हें उपदेश देंगे।
और वह पात्रता भी बताती है: श्रद्धावान, उसमें लगा हुआ और इंद्रियों को संयम में रखने वाला ही ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर शीघ्र परम शांति पाता है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥उस ज्ञान को विनम्र प्रणाम से, प्रश्न पूछकर और सेवा से जानो। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी तुम्हें उसका उपदेश देंगे।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥श्रद्धा वाला, उसमें लगा हुआ और इंद्रियों को वश में रखने वाला ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर शीघ्र परम शांति पाता है।
ज्ञान योग और कर्म योग
ग्रंथ में
गीता ज्ञान को कर्म का विरोधी नहीं बनाती। वह कहती है कि केवल कर्म न करने से कोई कर्म से मुक्त नहीं होता, और केवल संन्यास से सिद्धि नहीं मिलती। ज्ञान का मार्ग भी जीवन से भागने का मार्ग नहीं है।
गीता: ज्ञान की अग्नि
ग्रंथ में
चौथे अध्याय में भगवान अनेक तरह के यज्ञ गिनाते हैं: इंद्रियों का संयम, प्राणायाम, द्रव्य, तप, योग और स्वाध्याय के यज्ञ, और फिर कहते हैं कि ज्ञान-यज्ञ द्रव्य-यज्ञ से श्रेष्ठ है, क्योंकि सारे कर्म पूरी तरह ज्ञान में समा जाते हैं।
यह ज्ञान कैसे मिले, इस पर गीता कहती है: प्रणाम, प्रश्न और सेवा से उसे सीखो; तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे। उसे जानकर तुम फिर इस तरह मोह में नहीं पड़ोगे, और उससे सब प्राणियों को पहले अपने में और फिर भगवान में देखोगे।
गीता कहती है कि सब पापियों में सबसे बड़े पापी भी ज्ञान की नाव से ही सब पापों को पार कर लेते हैं। जैसे अच्छी तरह जली आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को राख कर देती है। इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं, और योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय पर उसे अपने भीतर ही पा लेता है।
श्रद्धा वाला, इंद्रियों को वश में रखने वाला और तत्पर व्यक्ति ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर बिना देर परम शांति पाता है। अज्ञानी, श्रद्धाहीन और संशय से भरा व्यक्ति नष्ट होता है; संशय वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख। इसलिए अज्ञान से पैदा हुए हृदय के संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग में लगो, उठो।
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