धौति

भीतरी शुद्धि की क्रिया: वस्त्र धौति और घेरंड संहिता के चार भेद, तेरह उपभेद

संक्षेप में

धौति हठयोग के छह षट्कर्मों में पहली शुद्धि क्रिया है। हठयोग प्रदीपिका में गीले कपड़े की लंबी पट्टी निगलकर निकालने (वस्त्र धौति) का वर्णन है। घेरंड संहिता धौति के चार भेद बताती है, अंतर्धौति, दंतधौति, हृद्धौति और मूलशोधन, जिनके कुल तेरह उपभेद हैं।

एक नज़र में

षट्कर्म
पहला (प्रदीपिका 2.22)
प्रदीपिका का रूप
वस्त्र धौति (2.24)
घेरंड के भेद
अंतर्धौति, दंतधौति, हृद्धौति, मूलशोधन
कुल उपभेद
13 (घेरंड 1.14–44)
ग्रंथ में
हठयोग प्रदीपिका 2.24–25; घेरंड संहिता 1.13–44

धौति क्या है?

ग्रंथ में

धौति का संबंध धोने से है। यह षट्कर्मों की सूची में पहली क्रिया है, और घेरंड संहिता के अनुसार इसके चारों भेद शरीर की अशुद्धियाँ दूर करते हैं।

हठयोग प्रदीपिका में धौति

ग्रंथ में

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार लगभग तीन इंच चौड़ी और पंद्रह हाथ लंबी कपड़े की पट्टी, गर्म पानी से गीली करके, गुरु के बताए मार्ग से धीरे-धीरे निगली जाती है और फिर निकाली जाती है। इसे धौति कर्म कहते हैं।

अनुवादक Sinh अपनी टिप्पणी में बताते हैं कि पट्टी का सिरा दाँतों से पकड़े रखा जाता है, और यह कई दिनों में थोड़ा-थोड़ा बढ़ाकर सीखी जाती है: पहले दिन एक हाथ, दूसरे दिन दो हाथ, और इसी तरह।

घेरंड संहिता में धौति

ग्रंथ में

घेरंड संहिता के अनुसार धौति चार प्रकार की है, और चारों शरीर की अशुद्धियाँ दूर करती हैं: अंतर्धौति (भीतरी धुलाई), दंतधौति (दाँत आदि की सफ़ाई), हृद्धौति (हृदय-क्षेत्र, यानी गले और छाती की सफ़ाई) और मूलशोधन (मलद्वार की सफ़ाई)।

अंतर्धौति के चार भाग हैं। वातसार में कौए की चोंच जैसा मुँह बनाकर धीरे-धीरे हवा पीकर पेट में भरी और घुमाई जाती है, फिर नीचे के मार्ग से निकाली जाती है। वारिसार में कंठ तक पानी भरकर धीरे-धीरे पिया जाता है, पेट में घुमाकर मलद्वार से निकाला जाता है; ग्रंथ इसे सबसे ऊँची धौति कहता है। अग्निसार में नाभि को सौ बार मेरुदंड की ओर दबाया जाता है। बहिष्कृत धौति में काकी मुद्रा से हवा पेट में भरकर डेढ़ घंटे रोकी जाती है, और फिर नाभि तक पानी में खड़े होकर आँतों को धोने का वर्णन है।

ग्रंथ कहता है कि जब तक कोई डेढ़ घंटे तक वायु रोकने की शक्ति न पा ले, तब तक वह बहिष्कृत धौति नहीं कर सकता; और वह इसे बहुत गुप्त रखने को कहता है।

दंतधौति के भेद हैं: दाँतों की जड़ की सफ़ाई (कत्थे के चूर्ण या शुद्ध मिट्टी से), जीभ की जड़ की सफ़ाई (तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से), दोनों कानों के छिद्रों की सफ़ाई (तर्जनी और अनामिका से), और कपालरंध्र, यानी नाक की जड़ के पास माथे के गड्ढे को दाहिने अँगूठे से मलना। ग्रंथ दाँतों की सफ़ाई को योगियों के लिए रोज़ सुबह करने वाली महान धौति कहता है।

जिह्वा-शोधन में जीभ की जड़ साफ़ करके उस पर मक्खन लगाया जाता है और उसे बार-बार दुहा जाता है; ग्रंथ कहता है कि सूर्योदय और सूर्यास्त से पहले रोज़ ऐसा करने से जीभ लंबी होती है, और जीभ का लंबा होना बुढ़ापा, मृत्यु और रोग को नष्ट करता है।

हृद्धौति तीन तरह की है: दंड से, वमन से, और वस्त्र से। दंड धौति में केले के डंठल, हल्दी की डंडी या बेंत को धीरे-धीरे भोजन-नली में डालकर निकाला जाता है। वमन धौति में भोजन के बाद कंठ तक पानी पीकर, कुछ देर ऊपर देखकर, उसे उल्टी करके निकाला जाता है। वस्त्र धौति में चार अंगुल चौड़ा पतला कपड़ा धीरे-धीरे निगलकर फिर निकाला जाता है।

मूलशोधन में हल्दी की जड़ की डंडी या मध्यमा उँगली से, पानी के साथ, मलद्वार को बार-बार सावधानी से साफ़ किया जाता है। ग्रंथ कहता है कि जब तक मलद्वार शुद्ध न हो, अपान वायु ठीक से नहीं चलती।

घेरंड संहिता के अनुसार धौति के भेद
भेदउपभेदस्रोत
अंतर्धौतिवातसार, वारिसार, अग्निसार, बहिष्कृतघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.14–25
दंतधौति (ग्रंथ में पाँच प्रकार)दंतमूल, जिह्वा-शोधन, दोनों कानों की धौति (दो), कपालरंध्रघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.26–35
हृद्धौतिदंड, वमन, वस्त्रघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.36–41
मूलशोधनहल्दी की जड़ या मध्यमा उँगली सेघेरंड और शिव संहिता (Vasu अनु.), घेरंड संहिता 1.42–44

स्वामी शिवानंद की "हठ योग" में धौति

परंपरा

Sivananda धौति को दो तरह की शुद्धि बताते हैं, भीतरी और बाहरी; बाहरी शुद्धि स्नान से होती है, और दाँत व जीभ की सफ़ाई भी धौति के ही रूप हैं।

वस्त्र धौति के लिए वे लगभग तीन इंच चौड़े और पंद्रह फ़ुट लंबे बारीक कपड़े का वर्णन करते हैं, जिसके किनारे अच्छी तरह सिले हों और कोई धागा लटकता न हो। पहले दिन केवल एक फ़ुट निगलकर धीरे से निकाला जाता है; धीरे-धीरे पूरी लंबाई तक बढ़ाया जाता है। वे इसे खाली पेट, सुबह, और चार-पाँच दिन में एक बार करना पर्याप्त कहते हैं, और कपड़ा कभी झटके से न खींचने को कहते हैं। क्रिया के बाद एक प्याला दूध पीने की बात भी वे करते हैं।

अग्निसार धौति में नाभि को मेरुदंड की ओर दबाकर पेट को भीतर खींचा और धीरे से छोड़ा जाता है। Sivananda पहले दिन 12 बार से शुरू करके धीरे-धीरे 108 बार तक बढ़ाने को कहते हैं, और लिखते हैं कि इससे जठराग्नि बढ़ती है, भूख अच्छी लगती है, और पेट की अतिरिक्त चर्बी घटती है।

वातसार और बहिष्कृत धौति को वे हवा निगलकर पेट में रखने और फिर नीचे के मार्ग से निकालने की क्रियाएँ बताते हैं, जिनमें बहिष्कृत में हवा लंबे समय तक रोकी जाती है; और वमन धौति में पेट को पानी से भरकर कुछ मिनट बाद उल्टी करके निकाला जाता है।

ग्रंथों में धौति के लाभ

ग्रंथ में

हठयोग प्रदीपिका कहती है कि धौति कर्म के अभ्यास से खाँसी, दमा, तिल्ली का बढ़ना, कुष्ठ और कफ से पैदा होने वाले बीस प्रकार के रोग निःसंदेह मिट जाते हैं।

घेरंड संहिता के अनुसार वातसार शरीर को शुद्ध करता है, सब रोग नष्ट करता है और जठराग्नि बढ़ाता है; वारिसार से शरीर चमकने लगता है; अग्निसार योग में सफलता देता है, पेट के सब रोग मिटाता है और भीतरी अग्नि बढ़ाता है; और बहिष्कृत धौति से देव-देह, यानी देवताओं जैसा शरीर, मिलता है।

कानों की धौति के रोज़ अभ्यास से भीतर के रहस्यमय नाद सुनाई देते हैं; कपालरंध्र धौति से कफ के विकार मिटते हैं, नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं, और दिव्य दृष्टि आती है। ग्रंथ इसे रोज़ सोकर उठने पर, भोजन के बाद और शाम को करने को कहता है।

दंड धौति से कफ, पित्त और दूसरी अशुद्धियाँ मुँह से बाहर निकलती हैं और हर तरह के ताप-रोग मिटते हैं; वमन धौति से कफ और पित्त के विकार मिटते हैं।

वस्त्र धौति से गुल्म (पेट के रोग), ज्वर, तिल्ली का बढ़ना, कुष्ठ और दूसरे चर्म-रोग, और कफ-पित्त के विकार मिटते हैं, और अभ्यासी दिन-ब-दिन स्वास्थ्य, बल और प्रसन्नता पाता है।

मूलशोधन से कब्ज़, अपच और मंदाग्नि मिटती है, शरीर की सुंदरता और बल बढ़ता है, और जठराग्नि प्रज्वलित होती है।

सावधानी: यह क्रिया गुरु से ही सीखिए

यह ग्रंथ का वर्णन है, घर पर करने की विधि नहीं

कपड़ा या डंडी निगलने, उल्टी करने, या भीतर पानी लेने जैसी क्रियाओं में गले, भोजन-नली, पेट और आँतों को गंभीर चोट का जोखिम है। इन्हें किताब, वीडियो या इस पृष्ठ के आधार पर कभी न आज़माएँ। दोनों ग्रंथ इन्हें गुरु के बताए मार्ग से और गुप्त रूप से सीखने को कहते हैं।

कोई भी रोग हो तो पहले चिकित्सक से पूछिए, और यह क्रिया योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में ही सीखिए।

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धौति — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न