पश्चिमोत्तानासन का नाम कैसे पड़ा?
यह नाम पुराने ग्रंथों में मिलता है: हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता दोनों में। नाम की व्युत्पत्ति हमारे पढ़े स्रोत नहीं समझाते, इसलिए हम उसका कोई अर्थ नहीं गढ़ रहे।
पश्चिमोत्तानासन करने की विधि
आधुनिक अभ्यास
विधि Sivananda की "Yoga Asanas" के अनुसार है।
- ज़मीन पर बैठकर पैर सामने लाठी की तरह सीधे फैलाइए।
- साँस छोड़ते हुए, बिना झटके, धीरे-धीरे आगे झुकिए।
- अँगूठे, तर्जनी और मध्यमा से पैरों के अँगूठे पकड़िए, और पेट को भीतर खींचते हुए माथा घुटनों की ओर ले जाइए।
- सिर को दोनों हाथों के बीच रखिए। Sivananda 5 सेकंड से शुरू करने को कहते हैं।
- धीरे-धीरे ऊपर उठकर सीधे बैठ जाइए।
पश्चिमोत्तानासन में साँस कैसे लें?
आधुनिक अभ्यास
आगे झुकते समय साँस छोड़िए।
पश्चिमोत्तानासन का उद्देश्य
Sivananda इसे रीढ़ को आगे की ओर मोड़ने वाला आसन बताते हैं, जिसके बाद धनुरासन, भुजंगासन और शलभासन जैसे पीछे मोड़ने वाले आसन संतुलन के लिए किए जाते हैं।
पश्चिमोत्तानासन में क्या सावधानी रखें?
पहले यह पढ़िए
कमर या रीढ़ की कोई समस्या हो तो पहले चिकित्सक से पूछिए। Sivananda स्वयं लिखते हैं कि बड़ी आयु में, कड़ी रीढ़ के साथ, पूरा रूप आने में दो हफ़्ते से एक महीना लग सकता है; ज़बरदस्ती न झुकिए।
शुरुआती लोग पश्चिमोत्तानासन कैसे करें?
आधुनिक अभ्यास
पूरा आसन कठिन लगे तो पहले आधा रूप कीजिए: एक बार में एक पैर और उसी ओर का हाथ, फिर दूसरा। Sivananda इसे आसान बताते हैं।
पश्चिमोत्तानासन की आम ग़लतियाँ
आधुनिक अभ्यास
- झटके से झुकना: Sivananda बार-बार धीरे, बिना झटके झुकने को कहते हैं।
क्या पश्चिमोत्तानासन पुराने ग्रंथों में है?
ग्रंथ में
हाँ। घेरंड संहिता के अनुसार दोनों पैर ज़मीन पर लाठी की तरह फैलाकर, माथा घुटनों पर रखना और हाथों से पैरों के अँगूठे पकड़ना पश्चिमोत्तानासन है। हठयोग प्रदीपिका के पहले अध्याय में भी इसका वर्णन है।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार दोनों पैर ज़मीन पर लाठी की तरह फैलाकर, दोनों हाथों से दोनों पैरों के अँगूठे पकड़कर, माथा जाँघों पर टिकाकर बैठना पश्चिमतान है। ग्रंथ कहता है कि यह वायु को शरीर के आगे से पीछे, यानी सुषुम्ना में ले जाता है, जठराग्नि जगाता है, मोटापा घटाता है, और मनुष्यों के सब रोग मिटाता है।
शिव संहिता इसे उग्रासन कहती है: दोनों पैर फैलाकर अलग रखना, दोनों हाथों से सिर पकड़कर घुटनों पर रखना। ग्रंथ के अनुसार यह वायु की गति को जगाता है, शरीर की जड़ता और बेचैनी मिटाता है, और इसे पश्चिमोत्तान भी कहते हैं; इसके अभ्यासी को सब सिद्धियाँ मिलती हैं, वायु-सिद्धि आसानी से मिलती है, और बहुत से दुख मिटते हैं। ग्रंथ इसे बड़े यत्न से गुप्त रखने को कहता है।

