सिद्धासन का नाम कैसे पड़ा?
Sivananda लिखते हैं कि पुराने समय के बहुत से सिद्ध योगी इस आसन का अभ्यास करते थे, इसलिए इसका नाम सिद्धासन पड़ा।
सिद्धासन करने की विधि
आधुनिक अभ्यास
विधि Sivananda की "Yoga Asanas" के अनुसार है।
- एक एड़ी गुदा के पास रखिए।
- दूसरी एड़ी जननेंद्रिय की जड़ के ऊपर रखिए।
- पैर ऐसे रखिए कि दोनों टखने आपस में मिलें।
- हाथ पद्मासन की तरह घुटनों पर रखिए, और सिर, गर्दन व धड़ एक सीध में।
सिद्धासन का उद्देश्य
हठयोग प्रदीपिका कहती है कि 84 आसनों में सिद्धासन का अभ्यास हमेशा करना चाहिए, और सिद्धासन जैसा कोई आसन नहीं। Sivananda भी इसे ध्यान के लिए पद्मासन जितना, कुछ लोगों के लिए उससे भी अच्छा, बताते हैं।
सिद्धासन में क्या सावधानी रखें?
पहले यह पढ़िए
घुटने, टखने या कूल्हे में दर्द हो तो इसे ज़बरदस्ती मत कीजिए, और पहले चिकित्सक या योग विशेषज्ञ से पूछिए।
क्या सिद्धासन पुराने ग्रंथों में है?
ग्रंथ में
हाँ। हठयोग प्रदीपिका पहले अध्याय में सिद्धासन का सबसे लंबा वर्णन करती है, इसे वज्रासन, मुक्तासन और गुप्तासन भी कहती है, और कहती है कि सिद्धासन जैसा कोई आसन नहीं।
घेरंड संहिता और शिव संहिता में भी सिद्धासन है; शिव संहिता इसे चार प्रमुख आसनों में पहला रखती है।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार बाएँ पैर की एड़ी मूलाधार (गुदा और जननेंद्रिय के बीच) पर दृढ़ता से दबाकर, दाहिनी एड़ी जननेंद्रिय के ऊपर रखी जाती है; ठोड़ी छाती पर टिकाकर, इंद्रियों को रोककर, शांत बैठकर दोनों भौंहों के बीच स्थिर दृष्टि रखी जाती है। ग्रंथ इसे मोक्ष के द्वार को खोलने वाला कहता है। इसे बाईं एड़ी जननेंद्रिय के ऊपर और दाहिनी उसके ऊपर रखकर भी किया जाता है।
प्रदीपिका कहती है: जैसे यमों में मिताहार (थोड़ा भोजन) और नियमों में अहिंसा प्रमुख है, वैसे ही सिद्ध योगी सिद्धासन को सब आसनों में प्रमुख कहते हैं। 84 आसनों में सिद्धासन का अभ्यास सदा करना चाहिए, क्योंकि यह 72,000 नाड़ियों की अशुद्धियाँ साफ़ करता है।
ग्रंथ के अनुसार आत्म-चिंतन, मिताहार और बारह वर्ष तक सिद्धासन के अभ्यास से योगी सिद्धि पाता है। सिद्धासन सध जाने और केवल कुंभक से प्राण शांत हो जाने पर दूसरे आसनों की ज़रूरत नहीं रहती; अकेले सिद्धासन के दृढ़ होने से उन्मनी अवस्था तुरंत मिलती है और तीनों बंध अपने आप लग जाते हैं।
प्रदीपिका का प्रसिद्ध कथन है: सिद्धासन जैसा कोई आसन नहीं, केवल जैसा कोई कुंभक नहीं, खेचरी जैसी कोई मुद्रा नहीं, और नाद जैसा कोई लय नहीं।
घेरंड संहिता के अनुसार इंद्रियों को जीतने वाला साधक एक एड़ी गुदा-छिद्र पर और दूसरी जननेंद्रिय की जड़ पर रखकर, ठोड़ी छाती पर टिकाकर, शांत और सीधा बैठकर भौंहों के बीच देखे; यह मुक्ति की ओर ले जाता है। घेरंड में इससे मिलता-जुलता मुक्तासन भी है, जिसमें बाईं एड़ी जननेंद्रिय की जड़ पर और दाहिनी उसके ऊपर रखी जाती है, और जिसे ग्रंथ सिद्धि देने वाला कहता है।
शिव संहिता कहती है कि सिद्धासन एकांत, शोर-रहित जगह में, शरीर को बिल्कुल सीधा रखकर, भौंहों के बीच ऊपर देखते हुए किया जाए। योग की शीघ्र सिद्धि चाहने वाला सिद्धासन लेकर प्राणायाम करे; इससे योगी परम गति पाता है, और संसार में इससे अधिक गुप्त कोई आसन नहीं।
आगे पढ़ें
- पद्मासन — Padmasana (Lotus Posture): ध्यान और जप का प्रमुख आसन
- सुखासन — Sukhasana (Easy Posture): जप और ध्यान के लिए सहज बैठना
- वज्रासन — Vajrasana (Thunderbolt Posture): एड़ियों के बीच बैठने वाला ध्यान का आसन
- ध्यान कैसे करें? — शुरुआत करने वालों के लिए, गीता और आयुष प्रोटोकॉल के आधार पर

