शीर्षासन का नाम कैसे पड़ा?
शीर्ष का अर्थ सिर है। Sivananda इसके दूसरे नाम कपालासन और विपरीतकरणी भी देते हैं, और इसे आसनों का राजा कहते हैं।
शीर्षासन क्या है?
Sivananda के वर्णन के अनुसार इसमें घुटनों के बल बैठकर उँगलियाँ फँसाई जाती हैं, बाँहें कोहनी तक ज़मीन पर रखी जाती हैं, सिर का ऊपरी भाग फँसी उँगलियों के बीच टिकाया जाता है, और फिर पैर धीरे-धीरे सीधे ऊपर उठाए जाते हैं।
Sivananda स्वयं कई सावधानियाँ लिखते हैं: मोटा मुड़ा कंबल बिछाना, बहुत धीरे और बिना झटके करना, केवल नाक से साँस लेना, शुरुआत में दीवार या किसी मित्र का सहारा लेना, और कुछ सेकंड से शुरू करके धीरे-धीरे समय बढ़ाना। उनकी पुस्तक इस आसन के बहुत से रोग-उपचार वाले लाभ भी गिनाती है; वे हमने नहीं दोहराए, क्योंकि उनका प्रमाण हमें नहीं मिला।
ग्रंथों की विपरीतकरणी मुद्रा
शीर्षासन और सर्वांगासन के नाम हठ ग्रंथों की आसन-सूचियों में नहीं हैं, पर सिर नीचे और पैर ऊपर करने वाला एक अभ्यास ग्रंथों में मुद्रा के रूप में है: विपरीतकरणी।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार नाभि के ऊपर सूर्य और तालु के नीचे चंद्र है; चंद्र से टपकने वाला अमृत सूर्य निगल लेता है, जिससे शरीर बूढ़ा होता है। इसे रोकने का उत्तम उपाय विपरीतकरणी है, जो गुरु के निर्देश से ही सीखी जाती है, लाखों चर्चाओं से नहीं।
प्रदीपिका के अनुसार सिर ज़मीन पर और पैर आकाश की ओर रखे जाते हैं; पहले दिन केवल एक क्षण के लिए, और फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा समय बढ़ाया जाता है। ग्रंथ कहता है कि यह अभ्यास भूख बढ़ाता है, इसलिए अभ्यासी को पर्याप्त भोजन मिलना चाहिए; भोजन कम हो तो यह उसे तुरंत जला देता है।
प्रदीपिका कहती है कि छह महीने के बाद झुर्रियाँ और सफ़ेद बाल नहीं दिखते, और जो इसे रोज़ दो घंटे भी करे, वह मृत्यु को जीत लेता है। ग्रंथ इसे शाम और आधी रात को करने को कहता है, भोजन के तुरंत बाद नहीं।
घेरंड संहिता के अनुसार सूर्य नाभि की जड़ में और चंद्र तालु की जड़ में रहता है; जिस प्रक्रिया से सूर्य ऊपर और चंद्र नीचे लाया जाता है, वह विपरीतकरणी है, जो सब तंत्रों में गुप्त मुद्रा है। सिर ज़मीन पर रखकर, हाथ फैलाकर, पैर ऊपर उठाकर स्थिर रहना विपरीतकरणी है। ग्रंथ कहता है कि इसके निरंतर अभ्यास से बुढ़ापा और मृत्यु नष्ट होते हैं, और साधक सिद्ध होकर प्रलय में भी नष्ट नहीं होता।
शीर्षासन में क्या सावधानी रखें?
यह आसन प्रशिक्षक से ही सीखिए
NCCIH नए अभ्यासियों को शीर्षासन, सर्वांगासन और पद्मासन जैसे कठिन अभ्यासों से बचने को कहता है, और योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में सीखने को। बिना देखरेख सीखने में जोखिम बढ़ता है।
आयुष की पुस्तिका इस आसन के निषेध नहीं देती, इसलिए इस पृष्ठ पर घर पर करने की चरण-दर-चरण विधि नहीं है। गर्दन, रीढ़, आँख, रक्तचाप या हृदय की कोई भी समस्या हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।
क्या शीर्षासन पुराने ग्रंथों में है?
हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता और शिव संहिता की आसन-सूचियों में शीर्षासन का नाम नहीं मिला। Sivananda इसका एक नाम "विपरीतकरणी" भी बताते हैं; प्रदीपिका और घेरंड में विपरीतकरणी एक मुद्रा के रूप में आती है, आसन के रूप में नहीं। दोनों एक हैं या नहीं, यह हमने स्वयं नहीं जाँचा।
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