मयूरासन का नाम कैसे पड़ा?
मयूर का अर्थ मोर है। Sivananda लिखते हैं कि यह आसन पीछे पंख फैलाए मोर जैसा दिखता है।
मयूरासन क्या है?
Sivananda के अनुसार यह सर्वांगासन और मत्स्यासन से कुछ अधिक कठिन है और अच्छी शारीरिक ताक़त माँगता है। इसमें घुटनों के बल बैठकर, दोनों अग्रबाहुओं को जोड़कर हथेलियाँ ज़मीन पर रखी जाती हैं, और कोहनियों पर नाभि का भाग टिकाकर शरीर हवा में उठाया जाता है।
मयूरासन में क्या सावधानी रखें?
यह आसन प्रशिक्षक से ही सीखिए
NCCIH नए अभ्यासियों को शीर्षासन, सर्वांगासन और पद्मासन जैसे कठिन अभ्यासों से बचने को कहता है, और योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में सीखने को। बिना देखरेख सीखने में जोखिम बढ़ता है।
आयुष की पुस्तिका इस आसन के निषेध नहीं देती, इसलिए इस पृष्ठ पर घर पर करने की चरण-दर-चरण विधि नहीं है। गर्दन, रीढ़, आँख, रक्तचाप या हृदय की कोई भी समस्या हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।
- इस आसन में पूरे शरीर का भार कलाइयों और कोहनियों पर आता है, और नाभि के भाग पर दबाव पड़ता है। कलाई, कोहनी या पेट की कोई भी समस्या हो तो इसे न कीजिए।
क्या मयूरासन पुराने ग्रंथों में है?
ग्रंथ में
हाँ। घेरंड संहिता के अनुसार दोनों हथेलियाँ ज़मीन पर रखकर, नाभि के भाग को दोनों कोहनियों पर टिकाकर, हाथों पर खड़े होना, और पैर पद्मासन की तरह मोड़कर हवा में रखना मयूरासन है। हठयोग प्रदीपिका के पहले अध्याय में भी मयूरासन है।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार दोनों हथेलियाँ ज़मीन पर रखकर, नाभि को दोनों कोहनियों पर टिकाकर, संतुलन बनाते हुए शरीर को पीछे की ओर लाठी की तरह फैलाना मयूरासन है।
प्रदीपिका कहती है कि यह आसन सब रोगों को जल्दी नष्ट करता है, पेट के विकार और कफ, पित्त व वात की गड़बड़ी से होने वाले रोग मिटाता है, ज़रूरत से ज़्यादा खाए अहितकर भोजन को पचाता है, भूख बढ़ाता है, और सबसे घातक विष को भी नष्ट करता है।
घेरंड संहिता के वर्णन में पैर हवा में पद्मासन की तरह क्रॉस रहते हैं। ग्रंथ के अनुसार यह अहितकर भोजन के प्रभाव मिटाता है, पेट में ऊष्मा पैदा करता है, घातक विषों के प्रभाव नष्ट करता है, और गुल्म व ज्वर जैसे रोग आसानी से दूर करता है।

