सर्वांगासन

Sarvangasana (Shoulder Stand): कंधों के बल, केवल प्रशिक्षक की देखरेख में

संक्षेप में

सर्वांगासन में पीठ के बल लेटकर पैर, कूल्हे और धड़ सीधे ऊपर उठाए जाते हैं, और पूरे शरीर का भार कंधों पर रहता है। Sivananda के अनुसार इसमें शरीर के सारे अंग लगते हैं, इसलिए यह नाम है। NCCIH नए अभ्यासियों को इससे बचने को कहता है, इसलिए इसे प्रशिक्षक से ही सीखिए।

हठयोग प्रदीपिका, घेरंड और शिव संहिता में नहीं मिला

सर्वांगासन: कंधों के बल उलटे साधक, पैर और धड़ सीधे ऊपर, हाथ पीठ को सहारा देते हुए, ठोड़ी छाती से लगी

एक नज़र में

संस्कृत नाम
सर्वांगासन
अंग्रेज़ी नाम
Shoulder Stand
प्रकार
उलटा, कठिन
भार
कंधों पर (Sivananda)

सर्वांगासन का नाम कैसे पड़ा?

सर्व का अर्थ सब, और अंग का अर्थ शरीर का भाग है। Sivananda लिखते हैं कि इसे "सब अंगों का आसन" इसलिए कहा जाता है कि इसमें शरीर के सारे भाग लगते हैं।

सर्वांगासन क्या है?

Sivananda के वर्णन के अनुसार इसमें मोटे कंबल पर पीठ के बल लेटकर पैर, कूल्हे और धड़ सीधे ऊपर उठाए जाते हैं, हाथ पीठ को सहारा देते हैं, कोहनियाँ ज़मीन पर रहती हैं, और ठोड़ी छाती से लगकर जालंधर बंध बनता है। पूरे शरीर का भार कंधों पर रहता है, इसलिए गर्दन पर दबाव आता है। Sivananda भी पैर बहुत धीरे, बिना झटके नीचे लाने को कहते हैं।

ग्रंथों की विपरीतकरणी मुद्रा

शीर्षासन और सर्वांगासन के नाम हठ ग्रंथों की आसन-सूचियों में नहीं हैं, पर सिर नीचे और पैर ऊपर करने वाला एक अभ्यास ग्रंथों में मुद्रा के रूप में है: विपरीतकरणी।

हठयोग प्रदीपिका के अनुसार नाभि के ऊपर सूर्य और तालु के नीचे चंद्र है; चंद्र से टपकने वाला अमृत सूर्य निगल लेता है, जिससे शरीर बूढ़ा होता है। इसे रोकने का उत्तम उपाय विपरीतकरणी है, जो गुरु के निर्देश से ही सीखी जाती है, लाखों चर्चाओं से नहीं।

प्रदीपिका के अनुसार सिर ज़मीन पर और पैर आकाश की ओर रखे जाते हैं; पहले दिन केवल एक क्षण के लिए, और फिर रोज़ थोड़ा-थोड़ा समय बढ़ाया जाता है। ग्रंथ कहता है कि यह अभ्यास भूख बढ़ाता है, इसलिए अभ्यासी को पर्याप्त भोजन मिलना चाहिए; भोजन कम हो तो यह उसे तुरंत जला देता है।

प्रदीपिका कहती है कि छह महीने के बाद झुर्रियाँ और सफ़ेद बाल नहीं दिखते, और जो इसे रोज़ दो घंटे भी करे, वह मृत्यु को जीत लेता है। ग्रंथ इसे शाम और आधी रात को करने को कहता है, भोजन के तुरंत बाद नहीं।

घेरंड संहिता के अनुसार सूर्य नाभि की जड़ में और चंद्र तालु की जड़ में रहता है; जिस प्रक्रिया से सूर्य ऊपर और चंद्र नीचे लाया जाता है, वह विपरीतकरणी है, जो सब तंत्रों में गुप्त मुद्रा है। सिर ज़मीन पर रखकर, हाथ फैलाकर, पैर ऊपर उठाकर स्थिर रहना विपरीतकरणी है। ग्रंथ कहता है कि इसके निरंतर अभ्यास से बुढ़ापा और मृत्यु नष्ट होते हैं, और साधक सिद्ध होकर प्रलय में भी नष्ट नहीं होता।

सर्वांगासन में क्या सावधानी रखें?

यह आसन प्रशिक्षक से ही सीखिए

NCCIH नए अभ्यासियों को शीर्षासन, सर्वांगासन और पद्मासन जैसे कठिन अभ्यासों से बचने को कहता है, और योग्य प्रशिक्षक की देखरेख में सीखने को। बिना देखरेख सीखने में जोखिम बढ़ता है।

आयुष की पुस्तिका इस आसन के निषेध नहीं देती, इसलिए इस पृष्ठ पर घर पर करने की चरण-दर-चरण विधि नहीं है। गर्दन, रीढ़, आँख, रक्तचाप या हृदय की कोई भी समस्या हो, तो पहले चिकित्सक से पूछिए।

  • इस आसन में शरीर का भार कंधों और गर्दन के क्षेत्र पर आता है। गर्दन की कोई भी समस्या हो तो इसे न कीजिए।

क्या सर्वांगासन पुराने ग्रंथों में है?

हठयोग प्रदीपिका, घेरंड संहिता और शिव संहिता की आसन-सूचियों में सर्वांगासन का नाम नहीं मिला।

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  • हलासन — Halasana (Plough Posture): पैर सिर के पीछे, केवल प्रशिक्षक की देखरेख में
  • शीर्षासन — Shirshasana (Headstand): सिर के बल उलटा खड़ा होना, केवल प्रशिक्षक की देखरेख में
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  • योगासन — आसनों की विधि, सावधानियाँ, और पुराने ग्रंथों में उनका स्थान

सर्वांगासन — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न