गरुड़ पुराण क्या है?
गरुड़ पुराण का नाम सुनते ही बहुत-से लोगों के मन में घर में हुई किसी मृत्यु के बाद के दिन याद आ जाते हैं। यह स्वाभाविक है, क्योंकि इस पुराण का एक बड़ा भाग, प्रेतकल्प, मृत्यु, उसके बाद की यात्रा और श्राद्ध का वर्णन करता है। पर यह पूरे पुराण का केवल एक हिस्सा है। गरुड़ पुराण का दूसरा, उससे भी बड़ा हिस्सा पूजा, व्रत, तीर्थ, ज्योतिष, रत्न-परीक्षा, आयुर्वेद, नीति, व्याकरण और छंद जैसे विषयों का एक पूरा विश्वकोश है।
पुराण की शुरुआत नैमिषारण्य से होती है। तीर्थ-यात्रा पर आए, विष्णु का ध्यान करते सूत से शौनक आदि ऋषि पूछते हैं: किसका ध्यान करें, जगत किसने बनाया, कौन उसका पालन करता है, धर्म किससे चलता है, भगवान के अवतार कौन हैं, और किन व्रतों से वे प्रसन्न होते हैं? सूत उत्तर में वह पुराण सुनाते हैं जो भगवान ने गरुड़ को कहा था, और पहला उत्तर यही है: एक नारायण ही सब देवताओं के ईश्वर, परमात्मा और परब्रह्म हैं।
मत्स्य पुराण इसका परिचय ऐसे देता है: गरुड़ कल्प में, विश्व-अंड से गरुड़ के जन्म को आधार बनाकर, कृष्ण ने जो कहा, वह गारुड पुराण है, 19,000 श्लोकों का। भागवत इसे "सौपर्ण" कहता है, क्योंकि गरुड़ का एक नाम सुपर्ण है। अठारह महापुराणों की परंपरागत सूची में यह सत्रहवाँ है।
संरचना: तीन खंड, लगभग 318 अध्याय
गरुड़ पुराण के कई पाठ हैं, और उनमें बनावट अलग-अलग है। हमने वेंकटेश्वर प्रेस, बंबई के पाठ पर आधारित GRETIL e-text में अध्याय स्वयं गिने। उसमें तीन खंड हैं। पहला "पूर्व खंड" है, जिसे पाठ स्वयं "आचार काण्ड" या "कर्म काण्ड" कहता है, 240 अध्यायों का (एक अध्याय-संख्या e-text में छूटी है)। दूसरा "उत्तर खंड" है, जिसे "धर्म काण्ड" या "प्रेतकल्प" कहा गया, 49 अध्यायों का। तीसरा "ब्रह्म काण्ड" है, 29 अध्यायों का। इस e-text में कुल लगभग 11,978 श्लोक-संख्याएँ हैं।
परंपरा 19,000 श्लोक कहती है, और आज के पाठ उससे कम हैं। H. H. Wilson को 1840 में मिले गरुड़ पुराण में केवल लगभग सात हज़ार श्लोक थे। M. N. Dutt ने 1908 में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद किया, और प्रेतकल्प के छोटे सार-ग्रंथ अलग से भी प्रचलित हैं। इसलिए जब कोई "गरुड़ पुराण" पढ़ने की बात करता है, तो अक्सर उसका अर्थ इसी प्रेतकल्प या उसके किसी सार से होता है।
| खंड | दूसरा नाम | अध्याय | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| पूर्व खंड | आचार काण्ड / कर्म काण्ड | 240 | पूजा, ध्यान, मंत्र, भुवन-कोश, शुभ-अशुभ लक्षण, रत्न-परीक्षा, गया-माहात्म्य, श्राद्ध, व्रत, रामायण-वर्णन, आयुर्वेद, नीतिसार, व्याकरण, छंद, आत्म-ज्ञान | गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), 1.1–1.240 |
| उत्तर खंड | धर्म काण्ड / प्रेतकल्प | 49 | मृत्यु, यमलोक का मार्ग, नरक, प्रेत, वृषोत्सर्ग, दान, सपिंडन, सूतक, कर्म-विपाक, मोक्ष | गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), 2.1–2.49 |
| ब्रह्म काण्ड | 29 | पुराणों और देवताओं का तारतम्य, सृष्टि, अवतार, महालक्ष्मी, वेंकटेश (तिरुमला) यात्रा, तत्त्व-रहस्य | गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), 3.1–3.29 | |
| कुल | 318 | गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), खंड 1–3 |
पूर्व खंड: पूजा, व्रत, तीर्थ और आचार
पूर्व खंड की शुरुआत पुराण के प्रकट होने के कारण से होती है, फिर विष्णु की पूजा, ध्यान-योग, और अलग-अलग कामों के मंत्रों का वर्णन आता है, जिनमें विष उतारने के मंत्र भी हैं। इसके बाद भुवन-कोश, यानी ब्रह्मांड के लोकों और प्रियव्रत के वंश के माध्यम से पृथ्वी के द्वीपों का वर्णन है।
धर्म और आचार के विषय में यह खंड याज्ञवल्क्य के धर्मशास्त्र पर टिका दिखता है: इसके कई अध्याय स्वयं को "याज्ञवल्क्य द्वारा कहा गया श्राद्ध-विधान" और "याज्ञवल्क्य द्वारा कहा गया प्रायश्चित्त-विवेक" कहते हैं। इसी खंड में गया तीर्थ का माहात्म्य, एकादशी जैसे कई व्रतों की विधि, देवताओं का तर्पण, युग-धर्म, और एक अध्याय में पूरी रामायण का संक्षिप्त वर्णन भी है।
पूर्व खंड का विश्वकोश: रत्न, आयुर्वेद, नीति और व्याकरण
गरुड़ पुराण का पूर्व खंड पढ़कर लगता है जैसे किसी ने उस समय की सारी उपयोगी विद्याएँ एक जगह रख दी हों। इसमें शरीर के शुभ-अशुभ लक्षणों का वर्णन है, और रत्नों की परीक्षा पर कई अध्याय हैं: मोती के प्रमाण और गुण, कर्केतन जैसे रत्नों की पहचान। Wilson ने भी अपने समय के गरुड़ पुराण में ज्योतिष, सामुद्रिक और रत्नों पर ग्रंथ, और उससे भी बड़ा चिकित्सा पर ग्रंथ पाया था।
आयुर्वेद का भाग इस पुराण का सबसे बड़ा विद्या-भाग है। इसमें रोगों के निदान पर अलग-अलग अध्याय हैं: श्वास-रोग, अर्श (बवासीर), कुष्ठ, स्त्री-रोगों की चिकित्सा, तरह-तरह की औषधियों के प्रयोग, और यहाँ तक कि हाथी और घोड़ों का आयुर्वेद भी। यह पुराण की परंपरा का ज्ञान है; किसी भी रोग में आज के योग्य चिकित्सक से ही इलाज कराना चाहिए।
नीति के विषय में इसमें शौनक द्वारा कहा गया "नीतिसार" है (अध्याय 108 से 115), जिसका विस्तार नीचे अलग खंड में है। और भाषा की विद्याओं पर इसमें व्याकरण का एक अध्याय, और छंद-शास्त्र की संज्ञाओं और परिभाषाओं पर अध्याय भी हैं। पूर्व खंड का अंत आत्म-ज्ञान के स्वरूप के वर्णन पर होता है, यानी इतनी सब व्यावहारिक विद्याओं के बाद अंतिम विषय फिर आत्मा ही है।
नीतिसार: पूर्व खंड के व्यावहारिक उपदेश (अध्याय 108–115)
गरुड़ पुराण के पूर्व खंड के आठ अध्याय "नीतिसार" कहलाते हैं, जो शौनक के कहे बताए गए हैं। ये छोटे, सीधे श्लोक हैं, जो रोज़ के व्यवहार की बात करते हैं। पहला ही उपदेश संगति का है: जो सफलता चाहता है, वह सज्जनों का साथ करे, दुर्जनों का साथ न इस लोक में हितकारी है, न परलोक में। और यह भी कि ओछी बहस, मित्र से वैर और शत्रु के सेवक से मित्रता से बचना चाहिए।
राजा के लिए नीतिसार एक बहुत सुंदर उपमा देता है: राजा को प्रजा से कर ऐसे लेना चाहिए जैसे वन में माली फूल-फूल चुनता है, जड़ नहीं काटता; उस कोयला बनाने वाले की तरह नहीं, जो पूरा पेड़ जला देता है। सेवक को परखने के लिए वह सोने की उपमा देता है: जैसे सोने को रगड़कर, काटकर, तपाकर और पीटकर परखा जाता है, वैसे ही सेवक को उसके व्रत, शील, कुल और कर्म, इन चार से परखना चाहिए।
नीतिसार में घर और समय की भी बातें हैं: दुष्ट आचरण वाले घर में रहने से नरक में रहना अच्छा, क्योंकि नरक से पाप घटता है, बुरे घर से नहीं छूटता। और काल पर: काल ही प्राणियों को पकाता है, काल ही उनका संहार करता है, सब सोते हैं तब भी काल जागता है, और काल को कोई लाँघ नहीं सकता। इन व्यावहारिक उपदेशों के बीच भी भक्ति की एक पंक्ति आती है: जिसने एक बार भी "हरि" ये दो अक्षर बोल दिए, उसने मोक्ष की ओर चलने के लिए कमर कस ली।
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः । तथा चतुर्भिर्भृतकं परीक्षयेद्व्रतेन शीलेन कुलेन कर्मणा ॥जैसे सोने को रगड़ने, काटने, तपाने और पीटने, इन चार से परखा जाता है, वैसे ही सेवक को उसके व्रत, शील, कुल और कर्म, इन चार से परखना चाहिए।
प्रेतकल्प कैसे शुरू होता है: गरुड़ का दुख
उत्तर खंड, यानी प्रेतकल्प, एक सुंदर रूपक से शुरू होता है: मधुसूदन एक वृक्ष हैं, जिसकी जड़ धर्म में मज़बूती से बँधी है, वेद जिसका तना है, पुराण जिसकी शाखाएँ हैं, यज्ञ जिसके फूल हैं, और मोक्ष जिसका फल। फिर नैमिषारण्य में ऋषि सूत से एक प्रश्न पूछते हैं: कुछ लोग कहते हैं कि मरने के बाद जीव तुरंत दूसरा शरीर पा लेता है, जैसे जोंक एक तिनके से दूसरे पर जाती है; और कुछ कहते हैं कि पहले यम-लोक की यातनाएँ भोगता है, फिर नया शरीर पाता है। सत्य क्या है?
सूत इस संदेह का उत्तर कृष्ण और गरुड़ के संवाद से देते हैं। एक बार गरुड़ के मन में लोकों को देखने की इच्छा हुई। वे हरि का नाम लेते हुए पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग में घूमे, पर जीवों का दुख देखकर स्वयं बहुत दुखी हो गए, और शांति न पाकर वैकुंठ लौटे। वहाँ उन्होंने भगवान से पूछा कि जीव मरने के बाद कहाँ जाते हैं, क्यों दुख पाते हैं, और उससे कैसे छूटें। यानी प्रेतकल्प भय से नहीं, करुणा से शुरू होता है: दूसरों का दुख देखकर उठा एक प्रश्न।
धर्मदृढबद्धमूलो वेदस्कन्धः पुराणशाखाढ्यः । क्रतुकुसुमो मोक्षफलो मधुसूदनपादपो जयति ॥मधुसूदन-रूपी वह वृक्ष विजयी हो, जिसकी जड़ धर्म में दृढ़ता से बँधी है, जिसका तना वेद है, जो पुराण-रूपी शाखाओं से भरा है, यज्ञ जिसके फूल हैं और मोक्ष जिसका फल है।
प्रेतकल्प: मृत्यु, यमलोक का मार्ग और कर्म-फल
इस खंड को कैसे पढ़ें
प्रेतकल्प में मृत्यु के बाद की यात्रा, यमलोक, नरकों और प्रेत-अवस्था का जो वर्णन है, वह इस पुराण की और इसकी परंपरा की आस्था है, अनुभव से सिद्ध तथ्य नहीं। इसे भय पैदा करने के लिए नहीं, इस उद्देश्य से पढ़ना चाहिए जिसके लिए ग्रंथ इसे कहता है: कि मनुष्य जीते-जी अच्छे कर्म करे।
उत्तर खंड के अध्याय मृत्यु के बाद की यात्रा को क्रम से बताते हैं, और उनके नाम ही उनका विषय बता देते हैं: मृत्यु के बाद के कर्म और कर्म-विपाक, नरक और उनमें प्रवेश और निकास, यमलोक का मार्ग और उसकी यातनाएँ, यमलोक का विस्तार और महिमा, प्रेत की यात्रा, जीव का दूसरा शरीर पाना, और शुभ-अशुभ गति। ग्रंथ के अनुसार जीव अपने ही कर्मों के अनुसार यह यात्रा करता है।
प्रेतकल्प का एक रोचक प्रसंग "श्रवणों" का है। कृष्ण गरुड़ को बताते हैं कि सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा ने बारह तेजस्वी पुत्र बनाए, जिन्हें "श्रवण" कहते हैं। वे दूर से ही सुन सकते और देख सकते हैं, और आकाश में रहकर संसार के हर जीव का हर शुभ-अशुभ कर्म जानते हैं; मृत्यु के समय वे धर्मराज के सामने उसका पूरा हाल बताते हैं। यह रूपक इसी बात पर ज़ोर देता है कि कोई भी कर्म छिपा नहीं रहता।
प्रेतकल्प में "पंच-प्रेत" की कथा भी है, यानी पाँच प्रेतों की, जो बताते हैं कि किन बुरे कर्मों से वे इस दशा में पहुँचे; और प्रेत-अवस्था के कारण और उससे मुक्ति के उपाय। इन सबका सार एक ही है: लोभ, क्रूरता, दूसरों का हक़ मारना और धर्म की उपेक्षा जीव को दुख की ओर ले जाते हैं, और दया, दान और धर्म उसे ऊपर उठाते हैं।
पंच-प्रेत की कथा: सत्संग की शक्ति (उत्तर खंड, अध्याय 7)
प्रेतकल्प की सबसे प्रसिद्ध कथा पाँच प्रेतों की है। संतप्तक नाम का एक ब्राह्मण, जो तप से अपने पाप जला चुका था और संसार को असार जानकर वनों में घूमता था, एक बार तीर्थ-यात्रा पर निकला। मन को बाहर से भीतर समेटे चलते हुए वह रास्ता भटक गया, और एक ऐसे घने वन में पहुँचा जहाँ पक्षियों का भी रास्ता न था। वहाँ एक बरगद पर उसने एक शव बँधा देखा, और उसे खाते हुए पाँच भयानक प्रेत।
प्रेत उसकी ओर दौड़े, पर संतप्तक के तप के तेज के आगे रुक गए, और अपनी कथा सुनाने लगे। पहले ने कहा: "मेरा नाम पर्युषित है। एक बार श्राद्ध में मैंने ब्राह्मण को बुलाया, पर उसे बासी अन्न दिया; उसी पाप से मैं यह योनि पाकर प्रेत बना।" दूसरा सूचीमुख था, जिसका मुँह सुई की नोक जितना छोटा और शरीर पर्वत जितना बड़ा था, यानी भूख अपार और खाने का रास्ता नहीं। बाकी प्रेतों ने भी बताया कि किन पापों ने उन्हें इस दशा में पहुँचाया।
संतप्तक ने तब भगवान विष्णु की स्तुति की, उसी भगवान की, जिसने ग्राह के मुँह से गजेंद्र को छुड़ाया था। भगवान प्रकट हुए, और संतप्तक को अपने लोक ले गए। और कथा का सबसे सुंदर भाग यह है: वे पाँचों प्रेत भी, केवल एक सच्चे साधु के संग के कारण, स्वर्ग चले गए। पुराण कहता है कि संतप्तक आगे विष्वक्सेन नाम से भगवान के गणों में प्रसिद्ध हुए। सत्संग की शक्ति, यानी अच्छे व्यक्ति का साथ बुरे से बुरे को भी उठा सकता है: यही इस कथा का संदेश है।
शोक के दस दिन: परिवार के लिए नियम (उत्तर खंड, अध्याय 5)
प्रेतकल्प का पाँचवाँ अध्याय मृत्यु के बाद परिवार के आचरण के नियम देता है, और ये नियम आज भी बहुत-से घरों में किसी न किसी रूप में माने जाते हैं। ग्रंथ के अनुसार दाह-संस्कार से लौटकर परिवार के लोग नीम के पत्ते चबाते हैं, पत्थर पर खड़े होकर आचमन करते हैं, और फिर घर में प्रवेश करते हैं। पुत्र और सपिंड संबंधियों के लिए दस रात का आशौच, यानी अशुद्धि का काल, माना गया है।
इन दिनों के लिए नियम सादगी और संयम के हैं: खरीदा हुआ या मिला हुआ अन्न खाना, बिना नमक और क्षार का भोजन, मांस न खाना, अलग-अलग और ज़मीन पर सोना, ब्रह्मचर्य, और दान और अध्ययन से विराम। शरीर की मालिश और बाल सँवारना भी छोड़ दिया जाता है। ग्रंथ पहले दिन से दस दिनों तक पिंड देने का क्रम बताता है, और ग्यारहवें दिन वृषोत्सर्ग का। इन नियमों का भाव समझना ज़रूरी है: शोक के समय सादगी, संयम और दिवंगत की स्मृति में एकाग्र रहना।
वैतरणी और कर्म-विपाक: पुराण किन कर्मों को सबसे बुरा मानता है
प्रेतकल्प के अंत के पास कर्म-विपाक, यानी कर्मों के फल, का एक अध्याय है, जिसमें वैतरणी नदी का भयानक वर्णन है, जिसे पापी जीव गोदान के पुण्य से ही पार कर पाता है। इस वर्णन का असली मूल्य इसकी सूची में है: पुराण बताता है कि वहाँ कौन जाते हैं। यानी यह अध्याय, डर की कहानी से ज़्यादा, उस समाज की नैतिक सूची है, जो बताती है कि किन कर्मों को सबसे बड़ा अपराध माना गया।
उस सूची में ये लोग हैं: जो भगवान, आचार्य, गुरु और बड़े-बूढ़ों का अपमान करते हैं; जो सदाचारी, धर्म में अडिग पत्नी को छोड़ देते हैं; जो शांत, भूखे व्यक्ति के भोजन में विघ्न डालते हैं; जो दान का वचन देकर बुलाने पर कह देते हैं "कुछ नहीं है"; जो आग लगाते, विष देते, झूठी गवाही देते, यज्ञ नष्ट करते और चुगली करते हैं; जो कथा में विघ्न डालते, दिया हुआ वापस छीनते, खेतों की मेड़ तोड़ते और पराई स्त्री का अपमान करते हैं; जो प्यासी गायों का पानी रोकते हैं; और जो कन्या को कलंकित करते हैं। ध्यान से देखें, तो ये सब दूसरों के साथ अन्याय और विश्वासघात के कर्म हैं।
प्रेतकल्प आत्मा के स्वरूप पर वही बात कहता है जो भगवद्गीता (2.23) में है: इसे शस्त्र नहीं काटते, आग नहीं जलाती, जल नहीं भिगोता और वायु नहीं सुखाती। और यह भी कि सत्कर्म करने वाले लोग शरीर के ऊपरी द्वारों से निकलते हैं। यानी कर्म-फल के सारे वर्णन के पीछे यह विश्वास है कि आत्मा अमर है, और कर्म ही उसकी यात्रा तय करते हैं।
मनुष्य-जन्म दुर्लभ है
प्रेतकल्प का बारहवाँ अध्याय, जिसका विषय है कि "केवल धर्म ही साथ जाता है", मनुष्य-जीवन के मूल्य पर बहुत सीधी बात कहता है। चौरासी लाख योनियों में, चार प्रकार के जीवों में (अंडे से, पसीने से, धरती से और गर्भ से जन्मे), सब जीवों के लिए मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, और पाँचों इंद्रियों वाला यह शरीर बड़े पुण्य से मिलता है। आहार, नींद, भय और काम तो सब जीवों में समान हैं; विवेक, यानी सही-गलत की समझ, ही मनुष्य की असली पहचान है।
आगे यही अध्याय कहता है कि जिसने मनुष्य-जन्म पाकर भी उसका सदुपयोग नहीं किया, उसने स्वयं को ठगा। और मनुष्य की तृष्णा का एक सटीक चित्र देता है: जिसके पास सौ है, वह हज़ार चाहता है; जिसके पास हज़ार है, वह लाख; लाख वाला राज्य चाहता है, और राजा पूरी पृथ्वी। यानी प्रेतकल्प का असली उपदेश मृत्यु के बारे में नहीं, जीवन के बारे में है: इस दुर्लभ जीवन को लोभ में न गँवाओ।
जरायुजास्तथा प्रोक्ता मनुष्याद्यास्तथा परे । सर्वेषामेव जन्तूनां मानुषत्वं हि दुर्लभम् ॥गर्भ से जन्मने वाले जीव मनुष्य आदि कहे गए हैं; और सब जीवों के लिए मनुष्य-जन्म पाना निश्चय ही दुर्लभ है।
अंत्येष्टि, श्राद्ध, दान और सूतक
प्रेतकल्प का एक बड़ा भाग मृत्यु के बाद के संस्कारों की विधि का है, और भारतीय परंपरा में इसका व्यावहारिक महत्व इसी कारण है। इसमें मृत्यु के बाद के कर्म (और्ध्वदेहिक), बालकों की अंत्येष्टि का अलग विधान, सपिंडन, उदकुंभ श्राद्ध, वार्षिक श्राद्ध, सूतक का काल और शुद्धि के नियम बताए गए हैं।
दान पर इसमें बहुत ज़ोर है: वृषोत्सर्ग (एक बैल को छोड़ने का संस्कार), गोदान, दस दान, भूमि-दान और अनेक तरह के दान, और उनका माहात्म्य। ग्रंथ के अनुसार ये कर्म दिवंगत की आगे की यात्रा में सहायक होते हैं, और परिवार के लिए वे पितरों के प्रति कृतज्ञता और कर्तव्य का रूप हैं। श्राद्ध और पितृ-पक्ष का विस्तृत वर्णन इस साइट के पितृ पक्ष पृष्ठों पर है।
मोक्ष का उपाय: प्रेतकल्प का अंतिम उत्तर
प्रेतकल्प का अंतिम अध्याय उसका सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है, और बहुत कम लोग उसे जानते हैं। सब कुछ सुनने के बाद गरुड़ कहते हैं: "हे दया के सागर, मैंने सुना कि अज्ञान से जीव संसार में भटकता है। अब मैं मोक्ष का सनातन उपाय सुनना चाहता हूँ। अनंत जीव अलग-अलग शरीरों में जन्मते और मरते रहते हैं, सदा दुखी रहते हैं; वे किस उपाय से मुक्त हों?"
भगवान का उत्तर उपनिषदों जैसा है। एक परब्रह्म है: निष्कल, शिव, सर्वज्ञ, सबका कर्ता, निर्मल, अद्वितीय, स्वयं-प्रकाश, आदि और अंत से रहित, निर्गुण, सच्चिदानंद। जीव उसी के अंश हैं, जैसे आग से चिंगारियाँ; अनादि अविद्या से ढके हुए, शरीर आदि उपाधियों से अलग हुए, और अपने कर्मों से बँधे हुए। हर जन्म में वे कर्म के अनुसार शरीर, आयु और भोग पाते हैं, जब तक मोक्ष न हो। यानी मृत्यु और परलोक की सारी कथाओं के बाद गरुड़ पुराण का अंतिम संदेश आत्म-ज्ञान है।
ब्रह्म काण्ड: देवताओं का तारतम्य और वेंकटेश-यात्रा
वेंकटेश्वर पाठ के तीसरे, ब्रह्म काण्ड के 29 अध्यायों का स्वभाव बाकी दोनों खंडों से अलग है। इसके अध्याय पुराणों के विभाजन, पूज्य और अपूज्य देवताओं के भेद, और ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर आदि देवताओं के "तारतम्य", यानी उनकी ऊँच-नीच के क्रम, पर हैं। फिर सृष्टि, गुणों की विषमता, देवताओं की उत्पत्ति और उनके द्वारा की गई विष्णु-स्तुतियाँ, विष्णु के अवतार और महालक्ष्मी के अवतार आते हैं।
इसके बाद कृष्ण की रानियों, नीला, भद्रा और लक्ष्मणा, के विवाह के कारण, और फिर चार अध्यायों में वेंकटेश पर्वत (तिरुमला) की यात्रा का क्रम, पर्वत पर चढ़ने की विधि, उसके नाम, वेंकटेश के दर्शन, स्तुति और वहाँ के दान का वर्णन है। काण्ड "तत्त्व-रहस्य" पर समाप्त होता है। दक्षिण भारत के एक विशेष तीर्थ और देवताओं के तारतम्य पर इतना ज़ोर इस काण्ड को बाकी पुराण से अलग स्वभाव देता है, और यही कारण है कि गरुड़ पुराण के अलग-अलग पाठों में इसकी बनावट एक जैसी नहीं मिलती।
विद्वानों के मत: क्या आज का गरुड़ पुराण वही है?
H. H. Wilson ने 1840 में एक रोचक प्रश्न उठाया था। मत्स्य पुराण के अनुसार गरुड़ पुराण गरुड़ के जन्म की कथा पर टिका है। पर Wilson को जो गरुड़ पुराण मिला, और जो ईस्ट इंडिया कंपनी के पुस्तकालय की दो प्रतियों से मेल खाता था, उसमें गरुड़ के जन्म की कथा थी ही नहीं, और केवल लगभग सात हज़ार श्लोक थे। उसका अधिकांश भाग व्रत, पवित्र दिन, सूर्य के तीर्थ, तांत्रिक प्रार्थनाएँ, ज्योतिष, सामुद्रिक, रत्न और चिकित्सा का था, और अंतिम भाग प्रेतकल्प, जो अंत्येष्टि-कर्मों का।
इस आधार पर Wilson को संदेह था कि क्या "मूल" गरुड़ पुराण आज बचा भी है। उन्होंने यह भी कहा कि मत्स्य पुराण का वर्णन बहुत सामान्य है, और शायद पुराण को देखे बिना केवल उसके नाम से लिखा गया हो। यह 19वीं सदी के एक विद्वान का मत है। परंपरा आज के गरुड़ पुराण को ही महापुराण मानती है, और उसका प्रेतकल्प भारत के सबसे अधिक पढ़े जाने वाले पुराण-अंशों में है। पाठक के लिए सही समझ यह है कि यह पुराण, दूसरे पुराणों की तरह, सदियों में बढ़ता और बदलता रहा, और उसके अलग-अलग पाठों में बनावट अलग है।
परंपरा में स्थान: मृत्यु के बाद का पाठ
उत्तर भारत के बहुत-से हिंदू परिवारों में किसी के देहांत के बाद के दिनों में गरुड़ पुराण के प्रेतकल्प, या उसके किसी सार, का पाठ कराने की परंपरा है। इसका उद्देश्य परिवार को यह याद दिलाना है कि जीवन अनित्य है, कर्म ही साथ जाता है, और दिवंगत के लिए श्राद्ध और दान का कर्तव्य निभाना है। ग्रंथ स्वयं अपने बारहवें अध्याय में यही कहता है कि केवल धर्म ही मरने के बाद साथ जाता है।
कुछ लोग मानते हैं कि घर में सामान्य दिनों में गरुड़ पुराण नहीं पढ़ना चाहिए। यह एक लोक-धारणा है; ग्रंथ के पूर्व खंड में तो पूजा, व्रत, रत्न, आयुर्वेद और नीति जैसे विषय हैं जो किसी भी समय पढ़े जा सकते हैं। प्रेतकल्प के वर्णन भी अंततः भय नहीं, सदाचार और मोक्ष का संदेश देते हैं, जैसा उसका अंतिम अध्याय दिखाता है।
गरुड़ पुराण की शिक्षाएँ
पहली शिक्षा: मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, और विवेक ही मनुष्य की पहचान है (2.12)। दूसरी: कोई कर्म छिपता नहीं; श्रवणों का रूपक यही कहता है (2.17)। तीसरी: तृष्णा का अंत नहीं, सौ वाला हज़ार चाहता है और राजा पूरी धरती (2.12.13), इसलिए संतोष और दान ही रास्ता है। चौथी: पितरों के प्रति कर्तव्य और कृतज्ञता श्राद्ध और दान के रूप में निभाई जाती है।
और अंतिम शिक्षा, जो पूरे पुराण का निचोड़ है: जीव परब्रह्म का ही अंश है, अज्ञान से बँधा है, और ज्ञान से मुक्त होता है (2.49)। गरुड़ पुराण को केवल "मृत्यु का पुराण" समझना उसके साथ अन्याय है; वह जीवन को सही ढंग से जीने का, और अंततः मुक्ति पाने का पुराण है।
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- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- कल्प, मन्वंतर और युग — निमेष से ब्रह्मा की आयु तक: चार युग और उनके वर्ष, चौदह मनु, ब्रह्मा का दिन और रात, परार्ध, और यह कि आज हम कौन-से कल्प और मन्वंतर में हैं
- पितृ पक्ष — श्राद्ध की तिथियाँ, विधि और महत्व
- गरुड़ — भगवान विष्णु के वाहन और भक्त
- धन्वंतरि — आयुर्वेद के आदि-देव
- आयुर्वेद — आयुर्वेद की उत्पत्ति, चरक संहिता से
स्रोत एवं संदर्भ
- गरुड़ पुराण (वेंकटेश्वर प्रेस, बंबई के पाठ पर) — GRETIL e-text — input: Sansknet project (2020) · पूर्व खंड 1–240, उत्तर खंड 1–49 (अध्यायों के "इति" वाक्य), 1.1.3–12, खंड 1–3 (स्वयं गिनती), 1.1–1.240, 2.1–2.49, 3.1–3.29, खंड 1–3, 1.1, 1.7, 1.14, 1.20, 1.27, 1.54, 1.83, 1.99, 1.105, 1.116–1.125, 1.143, 1.215, 1.223, 1.61, 1.69, 1.75, 1.150, 1.156, 1.164, 1.172, 1.201–1.203, 1.115, 1.205, 1.207, 1.236, 1.108.2–3, 1.111.2, 1.112.2, 1.108.7, 1.109.2, 1.114.2, 2.1.1–5, 2.1.7–12, 2.2, 2.3, 2.5, 2.15, 2.16, 2.19, 2.33, 2.46, 2.17.2–18, 2.7, 2.23, 2.27, 2.12, 2.47, 2.49, 2.7.3–15, 2.7.47–61, 2.7.78–88, 2.7.26, 2.7.98–102, 2.5.2–3, 2.5.4–6, 2.5.20, 2.5.40, 2.47.3–8, 2.47.9–17, 2.11.6–9, 2.12.2–9, 2.12.12–13, 2.2, 2.24–2.26, 2.35, 2.37, 2.39, 2.43, 2.45, 2.6, 2.9, 2.13–2.14, 2.29–2.30, 2.41–2.42, 2.49.1–4, 2.49.6–10, 3.1–3.16, 3.19–3.29, 2.12, 1.1–1.240, 2.49, 2.12.4–13, 2.17, 2.13–2.14, 1.112.2, 2.1.1, 2.12.4
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