ब्रह्मवैवर्त पुराण क्या है?
ब्रह्मवैवर्त पुराण नैमिषारण्य में शुरू होता है। सौति (सूत) सिद्धेश्वर से आते हुए और नारायण के आश्रम की ओर जाते हुए वहाँ ब्राह्मणों को प्रणाम करने रुकते हैं, और शौनक आदि ऋषि उनसे वह पुराण माँगते हैं जो भारत की पवित्र भूमि पर श्रीकृष्ण के अवतार की कथा कहे: वे किसके घर जन्मे, किस माता को यह सौभाग्य मिला, उन्होंने पृथ्वी का भार कैसे उतारा और फिर गोलोक क्यों लौटे। सौति कहते हैं कि यह सब उस पुराण में विस्तार से है जो "सब पुराणों का सार" है।
सौति इस पुराण के चार खंड गिनाते हैं: पहला परमात्मा और देवी-देवताओं की उत्पत्ति का; दूसरा प्रकृति का, जिसमें सब देवियों के चरित्र, उनके कवच, स्तोत्र, मंत्र और पूजा, कर्म-विपाक, शालग्राम, स्वर्ग-नरक और रोगों से मुक्ति हैं; तीसरा गणेश के जन्म का; और चौथा भारत में श्रीकृष्ण के जन्म और कर्मों का। "इसमें ब्रह्म का पूरा वर्णन है, इसलिए यह ब्रह्मवैवर्त पुराण कहलाता है।" अध्याय यह भी कहता है कि व्यास के रचे इस पुराण में अठारह हज़ार श्लोक हैं।
पुराण अपनी परंपरा भी बताता है: गोलोक में श्रीकृष्ण ने यह पहले ब्रह्मा को दिया; ब्रह्मा ने पुष्कर तीर्थ में धर्म को; धर्म ने अपने पुत्र नारायण ऋषि को; नारायण ने नारद को; नारद ने गंगा-तट पर व्यास को; और व्यास ने इसे संक्षिप्त करके सिद्धक्षेत्र में सौति को दिया। इसीलिए पूरे पुराण में मुख्य संवाद नारायण ऋषि और नारद का है। अठारह पुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में यह दसवाँ है, और भागवत भी इसकी संख्या अठारह हज़ार देता है।
चार खंड: संरचना
ब्रह्मवैवर्त पुराण बाकी पुराणों से इस मायने में अलग है कि इसका हर खंड एक देवता या तत्त्व को समर्पित है। Wilson ने भी यही लिखा: चार खंड, ब्राह्म, प्रकृति, गणेश और कृष्णजन्म, क्रम से ब्रह्मा, देवी, गणेश और कृष्ण के कर्म बताते हैं, पर पूरे ग्रंथ की रुचि और महत्व अंत में कृष्ण पर ही केंद्रित रहता है।
Rajendra Nath Sen का अंग्रेज़ी अनुवाद (Sacred Books of the Hindus, 1920 से) अध्यायों की विषय-सूची देता है: ब्रह्म खंड में 30 अध्याय हैं, और प्रकृति खंड की सूची साठ से अधिक अध्यायों तक जाती है (संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में 67, अंतिम तीन में सुरथ, दुर्गा-स्तोत्र और दुर्गा-कवच); गणेश खंड 46 अध्यायों का है। श्रीकृष्णजन्म खंड सबसे बड़ा है: कलकत्ता के एक संस्कृत संस्करण में इसके 130वें अध्याय में अनुक्रमणिका है और 131वें में पुराण सुनने-पढ़ने का माहात्म्य, जबकि संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में यह खंड 133 अध्यायों का है (अंतिम दो में पुराण का सार और लक्षण)। यानी संस्करणों में अध्यायों का बँटवारा थोड़ा अलग है। नीचे की तालिका इन्हीं से बनी है।
| खंड | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| ब्रह्म खंड (1–30) | गोलोक; कृष्ण के शरीर से नारायण, शिव, ब्रह्मा, धर्म, सरस्वती, लक्ष्मी, राधा आदि; सृष्टि; वर्ण और जातियाँ; नारद का पूर्वजन्म (गंधर्व उपबर्हण और मालावती); आयुर्वेद; नारद को शिव से कृष्ण-मंत्र | ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म और प्रकृति खंड (SBH अनु.), ब्रह्म खंड, विषय-सूची |
| प्रकृति खंड | पाँच प्रकृतियाँ; सरस्वती, लक्ष्मी, गंगा का परस्पर शाप; पृथ्वी; गंगावतरण; तुलसी, वेदवती, शंखचूड़; सावित्री-सत्यवान और कर्म-विपाक, नरक; लक्ष्मी; स्वाहा, स्वधा, दक्षिणा, षष्ठी, मंगलचंडी, मनसा; राधा; दुर्गा के सोलह नाम; तारा, सुरथ और समाधि | ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म और प्रकृति खंड (SBH अनु.), प्रकृति खंड, विषय-सूची |
| गणेश खंड (1–46) | पार्वती का पुण्यक व्रत; गणेश का जन्म; शनि की दृष्टि और गजमुख; एकदंत; परशुराम, कार्तवीर्य और रेणुका | ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणेश खंड (SBH अनु.), गणेश खंड |
| श्रीकृष्णजन्म खंड (131 या 133 अध्याय, संस्करण के अनुसार) | नारद के प्रश्न; गोलोक में राधा, विरजा और श्रीदामा; कृष्ण का जन्म और व्रज की लीलाएँ (कालिया, ब्रह्मा द्वारा गायों का हरण, इंद्र-यज्ञ, धेनुक); भांडीर में राधा-कृष्ण विवाह; रास; देवताओं के दर्प-हरण; मथुरा और कंस-वध; कृष्ण-नंद संवाद; उद्धव और राधा; द्वारका, रुक्मिणी, बाणासुर; सिद्धाश्रम में राधा-कृष्ण मिलन; गोलोक-गमन; पुराण का सार और माहात्म्य | ब्रह्मवैवर्त पुराण, गणेश खंड (SBH अनु.), श्रीकृष्णजन्म खंड 1–17; ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड (SBH अनु.), श्रीकृष्णजन्म खंड 18–27; ब्रह्मवैवर्त पुराण, श्रीकृष्णजन्म खंड (मूल संस्कृत), अध्याय 130–131; ब्रह्मवैवर्त पुराण (मूल संस्कृत, चारों खंड), श्रीकृष्णजन्म खंड 1–133, विषयानुक्रमणिका |
गोलोक और श्रीकृष्ण से देवताओं का प्रकट होना
ब्रह्म खंड की सृष्टि-कथा दूसरे पुराणों से बिल्कुल अलग है। प्रलय के समय केवल एक अविनाशी तेज-पुंज था, करोड़ों सूर्यों जैसा, जिसमें तीनों लोक लीन थे। उसके ऊपर गोलोक है, भगवान की तरह अविनाशी, गोल; उसके दाईं ओर वैकुंठ है और बाईं ओर शिवलोक। गोलोक में श्रीकृष्ण परम पुरुष हैं, और सारी सृष्टि उन्हीं के शरीर से प्रकट होती है।
पहले कृष्ण के दाहिने भाग से प्रकृति के तीन गुण, फिर महत्, अहंकार और तन्मात्राएँ निकलीं। दाहिने भाग से ही चतुर्भुज, कौस्तुभधारी, लक्ष्मीपति नारायण प्रकट हुए और कृष्ण की स्तुति की। बाएँ भाग से पाँच मुख वाले, स्फटिक जैसे गोरे, जटाधारी, तीन-तीन नेत्रों वाले महेश प्रकट हुए। फिर कृष्ण के वक्ष से धर्म, मुख से वीणा और पुस्तक लिए सरस्वती, मन से धन की देवी लक्ष्मी, और इसी तरह और देवता और देवियाँ प्रकट हुईं।
इसी क्रम में कृष्ण की आँखों, कानों, रोम-कूपों और श्वास से अनेक देवता, भैरव, गोप और गोपियाँ प्रकट होते हैं, और ब्रह्मा भी आगे सृष्टि का कार्य उन्हीं की आज्ञा से करते हैं। यानी इस पुराण में विष्णु (नारायण), शिव और ब्रह्मा तीनों श्रीकृष्ण के ही अंश हैं। यह दृष्टि भागवत से भी आगे जाती है, जहाँ कृष्ण विष्णु के अवतार हैं; यहाँ वे सबके मूल स्वयं परब्रह्म हैं।
राधा: कृष्ण के प्राणों से प्रकट
ब्रह्मवैवर्त पुराण राधा का पुराण भी है, और यहाँ राधा का प्रकट होना सृष्टि-कथा का ही भाग है। रास-मंडल में कृष्ण के बाएँ भाग से एक सुंदर कन्या प्रकट हुई, जिसने फूल लाकर कृष्ण के चरणों में अर्घ्य दिया। पाठ कहता है कि प्रकट होते ही वह कृष्ण की ओर दौड़ी, इसलिए पुराणों के जानकार उसे "राधा" कहते हैं। वह कृष्ण की पत्नियों की अधिष्ठात्री देवी हैं, और कृष्ण के प्राणों से निकली हैं, इसलिए उन्हें प्राणों से भी प्रिय हैं।
प्रकृति खंड में राधा को पाँच प्रकृतियों में गिना गया है, और एक पूरा भाग उन्हें समर्पित है: शिव पार्वती को "राधा" शब्द का अर्थ और राधा की कथा सुनाते हैं, फिर विरजा का प्रसंग, विरजा का नदी बनना, राधा और श्रीदामा का विवाद, राधा की पूजा-विधि, कृष्ण द्वारा रचित राधा-स्तोत्र, और राधा-कवच।
श्रीकृष्णजन्म खंड बताता है कि राधा पृथ्वी पर क्यों जन्मीं। गोलोक में विरजा के प्रसंग पर राधा रूठ गईं, और श्रीदामा से उनका विवाद हुआ। तब कृष्ण ने उन्हें सांत्वना दी: "वराह कल्प में मैं पृथ्वी पर उतरूँगा, और यह पहले से तय है कि तुम भी मेरे साथ वहाँ जन्म लोगी; व्रज के वनों में हम साथ विहार करेंगे।" पुराण कहता है कि इसीलिए जगत के स्वामी नंद के गोकुल गए, कंस का भय तो केवल बहाना था।
नारद का पूर्वजन्म: गंधर्व उपबर्हण और मालावती
ब्रह्म खंड का एक बड़ा भाग (अध्याय 11–22) नारद के पूर्वजन्म की कथा है। नारद पहले उपबर्हण नाम के गंधर्व थे। एक शाप से उपबर्हण की मृत्यु हुई, और उनकी पत्नी मालावती ने बहुत विलाप किया। तब विष्णु एक ब्राह्मण-बालक के वेश में मालावती के पास आए; दोनों में कर्म के फलों पर संवाद हुआ, और फिर मालावती का काल-पुरुष (यम के दूत) से संवाद हुआ। मालावती के परमात्मा-स्तोत्र से उपबर्हण फिर जीवित हुए।
इसी कथा के बीच अध्याय 16 में एक पूरा "आयुर्वेद" का प्रसंग है, यानी चिकित्सा-शास्त्र, जिसे अनुवादक ने "a treatise on medical science" कहा है। फिर उपबर्हण का एक शूद्र स्त्री के गर्भ से जन्म, "नारद" नाम की व्युत्पत्ति और शाप से मुक्ति, ब्रह्मा के कहने पर नारद का शिवलोक जाना, शिव से कृष्ण-मंत्र और दैनिक पूजा की विधि लेना, भक्ष्य-अभक्ष्य का निर्णय, और अंत में नारद का नारायण ऋषि के आश्रम पहुँचना। वहीं से पूरे पुराण का नारायण-नारद संवाद शुरू होता है।
ब्रह्म खंड के दसवें अध्याय में वर्णों और मिश्र जातियों की उत्पत्ति की एक लंबी सूची भी है, जो उस समय की सामाजिक मान्यताओं को दिखाती है। Wilson ने लिखा था कि शिल्पी जातियों की उत्पत्ति का यह वर्णन इसलिए महत्वपूर्ण रहा कि उनसे जुड़े मामलों में इसे प्रमाण के रूप में उद्धृत किया जाता था।
प्रकृति खंड: एक शक्ति, पाँच रूप
प्रकृति खंड का आधार एक विचार है: विष्णु की सनातन माया, यानी प्रकृति, एक ही है, पर सृष्टि के समय पाँच रूपों में बँट जाती है। कृष्ण की सबसे प्रिय, उनके प्राणों की अधिष्ठात्री राधा; सब समृद्धि की देवी, विष्णु-पत्नी लक्ष्मी; विद्या और कलाओं की देवी सरस्वती; वेदों की माता, ब्रह्मा की पत्नी सावित्री; और गणेश की माता, शंकर की पत्नी दुर्गा। "यह मूल, आदि देवी प्रकृति इन पाँच रूपों में प्रकट होती है।"
इससे एक सामाजिक बात भी निकलती है, जिसे पुराण स्पष्ट कहता है: प्रकृति अपनी माया से संसार में स्त्री के रूप में उतरती है, इसलिए स्त्री का अनादर प्रकृति का अनादर है, और पतिव्रता, पुत्रवती स्त्री का सम्मान स्वयं प्रकृति की पूजा है। फिर नारद पूछते हैं: प्रकृति क्यों प्रकट हुई, उसका स्वरूप क्या है, वह पाँच भागों में क्यों बँटी, और इनकी पूजा कैसे हो। पूरा प्रकृति खंड इन्हीं प्रश्नों का उत्तर है।
इस खंड की एक प्रसिद्ध कथा है सरस्वती, लक्ष्मी और गंगा का आपसी विवाद, जिसमें तीनों ने एक-दूसरे को शाप दिया और उनके शरीर नदियाँ बने। फिर पृथ्वी की उत्पत्ति, पूजा और भूमि-दान का फल; गंगा की कथा, भगीरथ द्वारा गंगावतरण और गंगा की पूजा; और "विष्णुपदी" नाम के प्रसंग में राधा का कृष्ण को उलाहना।
तुलसी, शंखचूड़ और सावित्री
प्रकृति खंड में तुलसी की कथा विस्तार से है (अध्याय 13–22)। पहले तुलसी की वंशावली और वेदवती की कथा, जिसके साथ रामायण का संक्षिप्त वर्णन आता है। फिर तुलसी का जन्म, बदरिकाश्रम में उनका तप और ब्रह्मा से वर; शंखचूड़ का तुलसी के आश्रम आना और दोनों का विवाह। शंखचूड़ के अत्याचारों से देवता वैकुंठ गए; शिव ने शंखचूड़ के पास दूत भेजकर युद्ध की चुनौती दी, और भयंकर युद्ध में कार्तिकेय भी हारे।
कथा का अंत कठिन है, और पुराण उसे छिपाता नहीं। विष्णु ने बूढ़े ब्राह्मण के वेश में शंखचूड़ का कवच माँग लिया, तब शिव ने शंखचूड़ का वध किया, और उसकी अस्थियों से शंख उत्पन्न हुए। विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धरकर तुलसी का सतीत्व भंग किया; फिर वर देने के बहाने उन्होंने तुलसी-पत्र की महिमा बताई। अगले अध्याय में तुलसी के आठ नाम और उनकी पूजा-विधि है।
फिर सावित्री की कथा (अध्याय 23–34), जो महाभारत वाली कथा से काफ़ी बड़ी है। पराशर राजा अश्वपति को सावित्री देवी की पूजा की सलाह देते हैं; सावित्री और सत्यवान का विवाह, सत्यवान का परलोक जाना, और फिर सावित्री और यम का लंबा संवाद, जिसमें यम कर्म-विपाक, यानी कर्मों के फल का सिद्धांत, समझाते हैं। सावित्री यम की स्तुति करती हैं; यम नरक-कुंडों की संख्या और अलग-अलग पापों के लिए अलग नरकों का वर्णन करते हैं, और बताते हैं कि हरि की सेवा कर्म-बंधन से छुड़ाती है। अंत में सत्यवान जीवित होते हैं।
लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा, षष्ठी, मनसा और दुर्गा
प्रकृति खंड के अगले अध्याय उन देवियों की कथाएँ हैं जिनकी पूजा आज भी घरों में होती है, पर जिनकी पौराणिक कथा कम लोग जानते हैं। दुर्वासा के शाप से इंद्र की श्री का नष्ट होना, बृहस्पति का उन्हें सांत्वना देना, देवताओं का ब्रह्मलोक और फिर वैकुंठ जाना, और इंद्र के प्रश्न पर लक्ष्मी का मंत्र, ध्यान और पूजा-विधि। फिर अग्नि की पत्नी स्वाहा, स्वधा, और दक्षिणा की कथाएँ, और यज्ञ द्वारा रचित दक्षिणा-स्तोत्र।
फिर षष्ठी देवी की कथा और राजा प्रियव्रत द्वारा रचित उनकी स्तुति; मंगलचंडी की पूजा, ध्यान, मंत्र और स्तुति; और मनसा देवी के बारह नामों की व्युत्पत्ति, जरत्कारु से उनका विवाह, आस्तीक का जन्म, और जनमेजय के सर्प-यज्ञ में आस्तीक द्वारा नाग-वंश की रक्षा।
खंड के अंत में दुर्गा के सोलह नामों की व्युत्पत्ति, चंद्रमा द्वारा तारा के हरण की कथा, बुध का जन्म, और राजा सुरथ और समाधि वैश्य की कथा आती है, जिन्होंने देवी की आराधना की; यही कथा मार्कण्डेय पुराण के देवी-माहात्म्य की भूमिका भी है। सबसे अंत में नारायण द्वारा कहा गया दुर्गा का स्तोत्र और कवच है।
गणेश खंड: शनि की दृष्टि और गजमुख
गणेश खंड नारद के एक प्रश्न से शुरू होता है: "गणेश पार्वती के गर्भ के बिना कैसे जन्मे? वे किसके अंश हैं? ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रहते पूजा में उन्हें प्रथम स्थान क्यों? उनका मुख हाथी का और एक दाँत का क्यों, और पेट बड़ा क्यों?" उत्तर में नारायण कहते हैं कि यह कथा पाप, विघ्न और दुख दूर करने वाली है। पार्वती ने पुत्र के लिए "पुण्यक" नाम का व्रत किया, जिसे पुराण सब व्रतों में श्रेष्ठ कहता है।
व्रत के प्रसंग में भविष्यवाणी भी है: पुण्यक व्रत के फल से वह बालक जन्म लेगा; बड़े पेट के कारण लंबोदर कहलाएगा; शनि की दृष्टि से कटे उसके सिर की जगह हाथी का सिर लगेगा; और परशुराम के फरसे से उसका एक दाँत टूटेगा, इसलिए वह एकदंत कहलाएगा। यानी इस पुराण में गणेश के नामों की कथाएँ एक ही सूत्र में बँधी हैं।
गणेश के जन्म-उत्सव में सब देवता आए, और सूर्य-पुत्र, महातपस्वी शनि भी। पार्वती ने उत्सुकता से कहा, "मुझे और मेरे पुत्र को देखो।" भाग्य के विधान को कौन टाल सकता है? शनि ने बालक का मुख देखा, और उसी क्षण बालक का सिर कट गया। विष्णु गरुड़ पर निकले, एक वन में हाथियों के राजा को अपनी हथिनी के साथ सोते देखा, उसका सिर लाए और बालक के शरीर से जोड़ दिया; फिर हथिनी के विलाप पर उस हाथी को भी जीवन का वर दिया।
इसके बाद देवताओं में चर्चा होती है: कश्यप बताते हैं कि शनि एक शाप के कारण वक्र-दृष्टि हुए, यम पूछते हैं कि जब पार्वती ने ही शनि को देखने को कहा, तो उन्हें शाप क्यों, और ब्रह्मा कहते हैं कि पार्वती ने निर्दोष शनि को शाप दिया। अंत में पार्वती शनि को वर देती हैं। आगे के अध्यायों में यह भी समझाया गया है कि हाथी का सिर ही क्यों लगा (इंद्र के ऐरावत से जुड़ी एक कथा), और एकदंत होने की पूरी कथा: परशुराम का कार्तवीर्य से युद्ध, माता रेणुका का प्रसंग, और फिर परशुराम का गणेश से सामना।
हाथी का सिर ही क्यों, इसकी कथा भी रोचक है, और यह गणेश की "प्रथम पूजा" से जुड़ती है। एक बार ऐश्वर्य के मद में इंद्र पुष्पभद्रा नदी के तट पर एक उपवन में थे। उसी समय वैकुंठ से कैलास जाते हुए दुर्वासा मुनि ने उन्हें वह पारिजात का फूल दिया जो उन्हें स्वयं नारायण से मिला था, और कहा: "यह फूल सब विघ्नों का नाश करता है; जो इसे अपने सिर पर धारण करता है, वह सब जगह विजयी होता है और सब देवताओं में पहले पूजा का अधिकारी होता है; और जो अहंकार में हरि को अर्पित इस फूल को सिर पर नहीं रखता, वह श्री खो देता है।"
पर अप्सरा रंभा में आसक्त इंद्र ने वह फूल अपने सिर पर रखने के बजाय अपने हाथी ऐरावत के सिर पर डाल दिया। फूल के प्रभाव से बलवान हुए हाथी ने इंद्र को पीठ से गिरा दिया और घने वन में चला गया; और उसी हाथी का सिर हरि ने काटा, जो गणेश के शरीर से जोड़ा गया। यानी जो प्रथम-पूजा का अधिकार उस फूल में था, वह उस सिर के साथ गणेश को मिला। आगे यह भी बताया गया है कि ब्राह्मण के शाप से देवताओं की श्री कैसे गई, और ब्रह्मा ने इंद्र को शची के होते दूसरी स्त्रियों के पीछे जाने पर कैसे डाँटा।
श्रीकृष्णजन्म खंड: व्रज की लीलाएँ
श्रीकृष्णजन्म खंड में नारद नारायण से वे सब प्रश्न पूछते हैं जो हर भक्त के मन में आते हैं: पूर्ण परमेश्वर कृष्ण से पृथ्वी पर उतरने की प्रार्थना किसने की? वे किस युग में, क्यों और कहाँ प्रकट हुए? वसुदेव और देवकी कौन थे? कंस जैसे तुच्छ से निर्भय भगवान डरे क्यों, और जन्म के कमरे से गोकुल क्यों गए? नंद, यशोदा, गोपियाँ और गोप कौन थे, और किस पुण्य से उन्हें भगवान का साथ मिला? गोलोक की राधा व्रज में कृष्ण की प्रिया कैसे बनीं? और कृष्ण गोपियों को छोड़कर मथुरा क्यों गए?
उत्तर में पहले गोलोक की कथा आती है: पृथ्वी के भार से दुखी होकर देवता ब्रह्मा के साथ गोलोक जाते हैं, और वहाँ के रास-मंडल, अनगिनत गोप-गोपियों, वृषभानु और चंद्रभानु जैसे प्रमुख गोपों और रत्नों से बने भवनों का वर्णन है। फिर कृष्ण का जन्म और व्रज की लीलाएँ। SBH अनुवाद के अध्याय 19 से 22 में कालिया-दमन, ब्रह्मा का कृष्ण की शक्ति परखने के लिए गायों और बछड़ों को चुराना, नंद द्वारा इंद्र-यज्ञ की तैयारी, और ताड़-वन में गधे के रूप वाले धेनुक असुर का वध है। अगले अध्याय में बताया गया है कि धेनुक बलि का पुत्र था, जो दुर्वासा के शाप से गधा बना था।
Wilson ने लिखा कि कृष्ण के जीवन की घटनाएँ इसमें वही हैं जो विष्णु और भागवत पुराण में हैं, पर संक्षिप्त करके, ताकि नई सामग्री के लिए जगह बने; और गोलोक और वृंदावन के वर्णन, कृष्ण की स्तुतियाँ और राधा-गोपियों के प्रेम के प्रसंग इस पुराण का बड़ा भाग हैं। श्रीकृष्णजन्म खंड के अंत में (संस्कृत संस्करण के अनुसार) पूरे पुराण की अनुक्रमणिका और पुराण पढ़ने-सुनने का माहात्म्य है।
कालिया की पत्नी सुवला और ब्रह्मा का मोह
ब्रह्मवैवर्त में व्रज की कुछ लीलाएँ भागवत से अलग विवरणों के साथ हैं, और कालिया की कथा (श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 19) इसका अच्छा उदाहरण है। एक दिन कृष्ण बलराम के बिना, केवल ग्वाल-बालों के साथ यमुना के उस तट पर गए जहाँ कालिया रहता था। खेल में मग्न बच्चों की गायों ने विषैला जल पी लिया और मर गईं; कृष्ण ने उन्हें फिर जीवित किया। फिर वे कदंब के पेड़ से कालिया के कुंड में कूदे। कालिया ने उन्हें निगल लिया, पर जैसे कोई अनजाने में लाल-गर्म लोहा पकड़ ले, वैसे उसका गला और पेट जलने लगे; उसने कृष्ण को उगल दिया, चबाने की कोशिश में उसके दाँत टूट गए, और कृष्ण उसके सिर पर बैठ गए।
तब कालिया की पतिव्रता पत्नी सुवला हाथ जोड़कर रोती हुई कृष्ण के चरणों में गिरीं और एक लंबी स्तुति की: "जब शिव, ब्रह्मा, अनंत, कार्तिकेय, सरस्वती और वेद भी आपकी स्तुति में मौन हो जाते हैं, तो मुझ जैसी तुच्छ नागिन क्या कहे?" कृष्ण प्रसन्न हुए और बोले, "तुम्हारा पति जरा और मृत्यु से मुक्त होगा; मैंने उसके सिर पर अपने चरण-चिह्न छोड़े हैं, इसलिए गरुड़ भी उसका सम्मान करेगा; परिवार सहित रमणक द्वीप चले जाओ।" पर सुवला ने कोई सांसारिक वर नहीं माँगा: "मेरा मन भौंरे की तरह आपके चरण-कमलों में रहे; सालोक्य आदि मुक्तियाँ भी आपकी दासता से सोलह गुना छोटी हैं।" पुराण कहता है कि कृष्ण ने उसकी इच्छा पूरी की, एक रत्न-रथ उसे गोलोक ले गया, और कालिया को उसकी छाया दी गई।
अध्याय 20 में ब्रह्मा कृष्ण की शक्ति परखने के लिए गायें, बछड़े और ग्वाल-बाल चुरा लेते हैं। कृष्ण अपनी योग-शक्ति से वह सब फिर रच देते हैं और एक वर्ष तक उन्हीं के साथ वन जाते-आते रहते हैं। जब ब्रह्मा लज्जित होकर वृंदावन लौटे, तो उन्होंने देखा कि गायें, बछड़े, ग्वाल-बाल, पेड़, झाड़ियाँ और लताएँ, सब कृष्ण का ही रूप हैं; ध्यान में भी सारा विश्व हरि से भरा दिखा, और यह तय करना असंभव हो गया कि कौन कृष्ण है। ब्रह्मा अवाक होकर, आँसू बहाते हुए हाथ जोड़कर ध्यान में बैठ गए। अध्याय 21 में नंद इंद्र-यज्ञ की बड़ी तैयारी करते हैं, जिसमें गर्ग, याज्ञवल्क्य, पाणिनि, व्यास, पराशर और जैमिनि जैसे अनेक मुनि आते हैं।
श्रीकृष्णजन्म खंड, आगे की कथा: रास से गोलोक-गमन तक
श्रीकृष्णजन्म खंड इस पुराण का आधे से अधिक भाग है। संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में इसके 133 अध्याय हैं, और उसकी विषयानुक्रमणिका हर अध्याय का विषय और श्लोक-संख्या देती है; अध्याय 55 से "उत्तरार्ध" शुरू होता है। व्रज की लीलाओं में ब्रह्मवैवर्त की एक अपनी कथा पंद्रहवें अध्याय में है: भांडीर वन में राधा और कृष्ण का विवाह। ब्रह्मा प्रकट होकर दोनों की स्तुति करते हैं, उनके बीच अग्नि जलाकर हवन करते हैं, और पारिजात की मालाएँ राधा के हाथ से कृष्ण को और कृष्ण के हाथ से राधा को पहनवाते हैं।
अध्याय 28 में रास है, और फिर कुछ ऐसे प्रसंग जो कृष्ण-कथा के बीच दूसरे देवताओं के अभिमान टूटने की कथाएँ बन जाते हैं: अष्टावक्र मुनि का उद्धार, मोहिनी और ब्रह्मा, गंगा का जन्म, और शिव-पार्वती का पूरा विवाह-चरित (अध्याय 36 से 46: सती का गर्व, पार्वती का जन्म और तप, कामदहन, नर्तक-वेष में शिव, वसिष्ठ और अरुंधती का हिमालय को समझाना, विवाह और काम का पुनर्जीवन)। फिर इंद्र, सूर्य, अग्नि, दुर्वासा, धन्वंतरि, और फिर संक्षेप में विष्णु, ब्रह्मा, शिव, यम, लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा आदि सबके "दर्प-हरण" की कथाएँ हैं, जिनका संदेश एक ही है: श्रीकृष्ण के आगे हर अभिमान टूटता है।
अध्याय 63 से कथा मथुरा की ओर मुड़ती है: कंस के बुरे सपने, धनुर्यज्ञ, अक्रूर का व्रज आना, राधा की भेजी गोपियों का अक्रूर का रथ तोड़ देना (उस दिन कृष्ण व्रज में ही रुके), और फिर मथुरा में कुब्जा, धोबी, धनुष-भंग, कुवलयापीड, मल्लों और कंस का वध, उग्रसेन का राज्याभिषेक। इसके बाद एक लंबा भाग (अध्याय 73 से 90) कृष्ण और नंद के संवाद का है, जिसमें कृष्ण दुखी नंद को आध्यात्मिक ज्ञान, अच्छे-बुरे सपनों के फल, वर्ण-आश्रम और स्त्रियों के धर्म, कर्म-विपाक, केदार राजा की पुत्री वृंदा की कथा, और दुर्गा-स्तोत्रराज देते हैं, और वर देते हैं कि नंद व्रजवासियों सहित गोलोक जाएँगे।
इसी संवाद में एक प्रसंग आज की एक लोक-मान्यता से सीधे जुड़ता है। कृष्ण नंद को बताते हैं कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखना वर्जित क्यों है: एक बार भाद्र मास की चतुर्थी को चंद्रमा ने देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा का हरण किया। तारा ने उसे समझाया, "मैं तुम्हारी गुरु-पत्नी, माता समान हूँ," और न मानने पर शाप दिया: "तुम राहु और बादलों से ग्रस्त होगे, तुम्हें देखना पाप होगा, और तुम कलंकी और यक्ष्मा से ग्रस्त होगे।" फिर शुक्राचार्य ने भी चंद्रमा को तारा लौटाने को कहा, और अगले अध्याय में देव-असुर युद्ध की तैयारी के बाद तारा छुड़ाई गई।
उद्धव का व्रज जाना (अध्याय 91 से 98) यहाँ राधा के इर्द-गिर्द है: उद्धव राधा की स्तुति करते हैं, राधा विरह में मूर्छित होती हैं, सखी माधवी कृष्ण का स्वरूप बताती है, और अंत में राधा स्वयं उद्धव को संसार-सागर पार करने का ज्ञान देती हैं। फिर राम-कृष्ण का उपनयन (जिसके शुभारंभ में गणेश-पूजन है), सांदीपनि के यहाँ विद्या, विश्वकर्मा से द्वारका का निर्माण, रुक्मिणी-विवाह (रेवती-बलराम विवाह के साथ), प्रद्युम्न, सोलह हज़ार एक सौ सात रानियाँ, शिशुपाल, ऊषा-अनिरुद्ध और बाणासुर से युद्ध (जिसमें शिव की शरण गए बाण को कृष्ण अजर-अमर होने का वर देते हैं), शृगाल वासुदेव और स्यमंतक मणि आती हैं।
अंत के अध्याय भावुक हैं। सिद्धाश्रम में सौ वर्ष बाद राधा और कृष्ण फिर मिलते हैं, जहाँ राधा सबसे पहले गणेश की पूजा करती हैं, पार्वती उन्हें वर देती हैं, और श्रीदामा का सौ वर्ष का शाप पूरा होता है। फिर राधा के साथ कृष्ण का विहार, और भांडीर वन में एक दिन गोलोक से आया रथ राधा, गोपियों और गोकुल-वासियों को गोलोक ले जाता है। उसके बाद ब्राह्मण के शाप से यादवों का आपसी युद्ध में अंत, द्वारका का छूटना, और ब्रह्मा आदि की स्तुति के बीच कृष्ण का अपने धाम गोलोक लौटना। अंतिम तीन अध्यायों में नारद का विवाह और सनत्कुमार का उपदेश, अग्नि और सुवर्ण की उत्पत्ति, पूरे पुराण की कथाओं का सार, और पुराण के लक्षण और माहात्म्य हैं।
विद्वानों के मत: मत्स्य का वर्णन और आज का पाठ
मत्स्य पुराण ब्रह्मवैवर्त का परिचय ऐसे देता है: जिसे सावर्णि ने नारद को सुनाया, जिसमें कृष्ण की महिमा और रथंतर कल्प के वृत्तांत हैं, जहाँ ब्रह्म-वराह की कथा बार-बार आती है, और जिसमें अठारह हज़ार श्लोक हैं। Wilson ने माना कि श्लोक-संख्या और कृष्ण-माहात्म्य वाली बात आज के पाठ से मेल खाती है, पर बाकी नहीं: आज का पुराण सावर्णि नहीं, नारायण ऋषि द्वारा नारद को कहा गया है, और उसमें न विष्णु के वराह अवतार का वर्णन है, न रथंतर कल्प का।
इसलिए Wilson का निष्कर्ष था कि मत्स्य के समय कृष्ण को समर्पित एक ब्रह्मवैवर्त पुराण अवश्य था, पर आज का ब्रह्मवैवर्त वही ग्रंथ नहीं हो सकता। उनके अनुसार आज के पाठ का स्वरूप बाल-कृष्ण और राधा की उपासना वाले संप्रदाय का है, जिसे वे अपेक्षाकृत बाद का मानते थे। उन्होंने इस पुराण के बारे में बहुत कड़ी भाषा में लिखा, और यह भी माना कि प्रकृति और गणेश खंडों की कुछ कथाएँ पूरी तरह नई नहीं हैं, भले उनका स्रोत न मिला हो।
दूसरी ओर, इस पुराण के अनुवादक Rajendra Nath Sen ने अपनी 1920 की भूमिका में परंपरागत मत रखा: पुराण स्वयं कहता है कि यह व्यास का रचा अठारह हज़ार श्लोकों का ग्रंथ है, और वे मानते थे कि पुराण महाभारत और ब्रह्मसूत्र के समय के ही हैं। साथ ही उन्होंने स्वीकार किया कि पुराणों के काल पर बड़ा विवाद है और बाहरी प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं। दोनों मत यहाँ इसलिए दिए गए हैं ताकि पाठक स्वयं समझ सके कि यह प्रश्न खुला है।
महत्व और आज के लिए अर्थ
आज की लोक-भक्ति में ब्रह्मवैवर्त पुराण की उपस्थिति बहुत बड़ी है, भले लोग इसका नाम कम लेते हों। राधा को कृष्ण की आदि-शक्ति मानना, गोलोक की कल्पना, तुलसी-शालग्राम की कथा, सावित्री-यम संवाद में कर्मफल और नरकों का वर्णन, मनसा, षष्ठी और मंगलचंडी जैसी लोक-देवियों की पूजा, और शनि की दृष्टि से गणेश के गजमुख की कथा, ये सब इसी पुराण में अपने विस्तृत रूप में मिलते हैं।
इसका मूल संदेश प्रेम और भक्ति का है: परमात्मा केवल सृष्टि के स्वामी नहीं, प्रेम करने वाले और प्रेम पाने वाले भी हैं, और उनकी शक्ति हर स्त्री में है। प्रकृति खंड का वह वाक्य शायद आज सबसे ज़्यादा याद रखने योग्य है: स्त्री का अनादर स्वयं प्रकृति का, यानी देवी का अनादर है।
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- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- मार्कण्डेय पुराण — जैमिनि के प्रश्न और चार ज्ञानी पक्षी: हरिश्चंद्र, मदालसा की लोरी, दत्तात्रेय का योग, चौदह मन्वन्तर, और दुर्गा सप्तशती का मूल देवी-माहात्म्य
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- श्री राधा — राधा का देवता-पृष्ठ
- श्रीकृष्ण — कृष्ण का देवता-पृष्ठ
- श्री गणेश — गणेश का देवता-पृष्ठ
- सावित्री और सत्यवान — महाभारत वाली कथा
स्रोत एवं संदर्भ
- The Brahma-Vaivarta Puranam, Part I: Brahma and Prakriti Khandas (Sacred Books of the Hindus, vol. 24) — Rajendra Nath Sen (अनु.); B. D. Basu (सं.) (1920) · ब्रह्म खंड, अध्याय 1, ब्रह्म खंड, अध्याय 1, श्लोक 53–69, ब्रह्म खंड, अध्याय 1, श्लोक 61–69, विषय-सूची, ब्रह्म खंड, विषय-सूची, प्रकृति खंड, विषय-सूची, ब्रह्म खंड, अध्याय 2, ब्रह्म खंड, अध्याय 3, ब्रह्म खंड, अध्याय 3–5, ब्रह्म खंड, अध्याय 5, प्रकृति खंड, विषय-सूची, अध्याय 48–56, ब्रह्म खंड, अध्याय 11–18, ब्रह्म खंड, अध्याय 16–30, ब्रह्म खंड, अध्याय 10, ब्रह्म खंड, अध्याय 30; प्रकृति खंड, अध्याय 1, ब्रह्म खंड, अध्याय 30, प्रकृति खंड, अध्याय 1, प्रकृति खंड, अध्याय 4–12, प्रकृति खंड, अध्याय 13–19, प्रकृति खंड, अध्याय 20–22, प्रकृति खंड, अध्याय 23–34, प्रकृति खंड, अध्याय 36–42, प्रकृति खंड, अध्याय 43–46, प्रकृति खंड, अध्याय 57–66, Preface, प्रकृति खंड
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.22
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.4–8
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. lxv–lxvi, Preface, p. lxvii, Preface, pp. lxvi–lxvii
- The Brahma-Vaivarta Puranam: Ganesa Khanda and Krisna Janma Khanda ch. 1–17 (Sacred Books of the Hindus, vol. 24) — Rajendra Nath Sen (अनु.) · गणेश खंड, अध्याय 1–46, गणेश खंड, श्रीकृष्णजन्म खंड 1–17, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 2, गणेश खंड, अध्याय 1 और पुण्यक व्रत, गणेश खंड, पुण्यक व्रत का फल, गणेश खंड, शनि-प्रसंग, गणेश खंड, शनि-प्रसंग के बाद, गणेश खंड, गजमुख और एकदंत के प्रश्न, गणेश खंड, गजमुख का प्रश्न, गणेश खंड, गजमुख का प्रश्न और आगे, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 1, श्रीकृष्णजन्म खंड, आरंभिक अध्याय
- ब्रह्मवैवर्तपुराणम्, द्वितीय भाग: श्रीकृष्णजन्मखण्ड (गुरुमण्डल ग्रन्थमाला, कलकत्ता, सं. 2012) — राधाकृष्ण मोर (प्रकाशक) (1955) · अध्याय 130–131 की पुष्पिकाएँ, अध्याय 130–131
- ब्रह्मवैवर्तपुराणम् (चारों खंड, हर खंड की विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · श्रीकृष्णजन्म खंड, विषयानुक्रमणिका, श्रीकृष्णजन्म खंड 1–133, विषयानुक्रमणिका, 4.15.89–4.15.137, 4.28–4.62, विषयानुक्रमणिका, 4.63–4.72, विषयानुक्रमणिका, 4.73–4.90, विषयानुक्रमणिका, 4.80, विषयानुक्रमणिका, 4.80.8–4.80.17, 4.80.32–4.80.36, 4.81, 4.91–4.98, 4.99–4.122, विषयानुक्रमणिका, 4.123–4.124, 4.124.42, 4.126–4.128, 4.128.41–4.128.44, 4.129, 4.130–4.133, विषयानुक्रमणिका
- The Brahma-Vaivarta Puranam: Krisna Janma Khanda ch. 18–27 (Sacred Books of the Hindus, vol. 24, no. 145) — Rajendra Nath Sen (अनु.) (1921) · श्रीकृष्णजन्म खंड 18–27, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 19–23, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 19, श्लोक 1–20, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 19, श्लोक 20–58, श्रीकृष्णजन्म खंड, अध्याय 20–21
