वेद क्या हैं?
"वेद" शब्द संस्कृत की "विद्" धातु से बना है, जिसका अर्थ है जानना। वेद यानी ज्ञान। पर सनातन परंपरा में यह शब्द किसी भी ज्ञान के लिए नहीं, उन विशेष मंत्र-संग्रहों के लिए है जिन्हें "श्रुति" कहा जाता है: वह ज्ञान जो ऋषियों ने ध्यान में सुना और देखा, और जो फिर गुरु के मुख से शिष्य के कान तक पहुँचता रहा। इसीलिए वेदों को अपौरुषेय, यानी किसी मनुष्य की रचना नहीं, माना जाता है।
विष्णु पुराण वेदों के चार होने की कथा कहता है। आरंभ में वेद एक था। पर हर द्वापर युग में मनुष्यों की शक्ति और स्मृति घटती जाती है, इसलिए भगवान व्यास का रूप लेकर उसे चार भागों में बाँटते हैं। इस द्वापर के व्यास, कृष्ण द्वैपायन ने ऋग्वेद पैल को, यजुर्वेद वैशम्पायन को, सामवेद जैमिनि को और अथर्ववेद सुमन्तु को सौंपा। इतिहास-पुराण का भार उन्होंने सूत रोमहर्षण को दिया।
| वेद | व्यास के शिष्य | यज्ञ में ऋत्विज | ऋत्विज का काम | स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | पैल | होता | ऋचाओं से देवताओं का आह्वान और स्तुति | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 41, 43) |
| यजुर्वेद | वैशम्पायन | अध्वर्यु | यज्ञ की सारी क्रिया करना, यजुष् बोलते हुए | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 41–43) |
| सामवेद | जैमिनि | उद्गाता | साम का गान | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 42–43) |
| अथर्ववेद | सुमन्तु | ब्रह्मा | पूरे यज्ञ की निगरानी, भूल का सुधार | विष्णु पुराण (Wilson अनु.), 3.4 (pp. 42–43) |
चारों वेदों का परिचय
ऋग्वेद सबसे पुराना है और बाकी तीनों की नींव। उसमें 10 मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ हैं, जो अग्नि, इंद्र, सोम, वरुण, उषा जैसे देवताओं की स्तुतियाँ हैं, और दसवें मंडल में सृष्टि पर गहरे दार्शनिक प्रश्न भी। आज इसकी केवल शाकल शाखा का पूरा पाठ बचा है।
सामवेद गान का वेद है। Macdonell के अनुसार इसमें 1,549 मंत्र हैं, जो दो भागों में बँटे हैं, जिन्हें "आर्चिक" कहते हैं। लगभग सारे मंत्र ऋग्वेद से लिए गए हैं; केवल 75 नए हैं। इसका महत्व मंत्रों में नहीं, उनके गाने के ढंग में है: वही ऋचा जब विशेष स्वर-लहरी में गाई जाती है, तो "साम" बन जाती है। इसकी कौथुम और राणायनीय शाखाएँ प्रसिद्ध हैं, और जैमिनीय (तलवकार) शाखा के ब्राह्मण भी बचे हैं।
यजुर्वेद यज्ञ की विधि का वेद है। "यजुस्" उन गद्य सूत्रों को कहते हैं जो अध्वर्यु यज्ञ की हर क्रिया करते हुए बोलता है। इसकी दो बड़ी धाराएँ हैं। "शुक्ल" यजुर्वेद की वाजसनेयी संहिता में 40 अध्याय हैं, और उसके मंत्र और उनकी व्याख्या (शतपथ ब्राह्मण) अलग-अलग रखे गए हैं। "कृष्ण" यजुर्वेद की तैत्तिरीय, मैत्रायणी और काठक संहिताओं में मंत्र और व्याख्या का गद्य साथ-साथ मिला हुआ है। Macdonell के अनुसार वाजसनेयी संहिता का आधा भाग ऋचाएँ हैं, जिनमें 700 से अधिक ऋग्वेद में भी मिलती हैं, और बाकी आधा यजुस्।
अथर्ववेद बाकी तीनों से अलग स्वभाव का है। यज्ञ के बड़े अनुष्ठानों से ज़्यादा यह घर-गृहस्थी और रोज़ के जीवन का वेद है: रोग और भय से रक्षा, लंबी आयु, विवाह, संतान, शत्रु से बचाव, राजा और राज्य, और साथ में ब्रह्म का गहरा चिंतन। इसकी शौनक शाखा की संहिता में 20 कांड, 730 सूक्त और लगभग 6,000 मंत्र हैं, और लगभग छठा भाग गद्य है। इसकी दूसरी शाखा पैप्पलाद है।
चारों वेदों की तुलना
नीचे की तालिका चारों वेदों को एक साथ रखती है। ध्यान रहे, संख्याएँ शाखा और संस्करण के साथ बदलती हैं, इसलिए हर संख्या के साथ उसकी शाखा लिखी है। "मुख्य स्वभाव" वाला खाना केवल पहचान के लिए है; हर वेद में उससे बाहर की बातें भी हैं। जैसे अथर्ववेद केवल "जादू-टोने" का वेद नहीं, उसमें उपनिषदों जैसा ब्रह्म-चिंतन भी है, और ऋग्वेद केवल स्तुति नहीं, उसमें विवाह और अंत्येष्टि के सूक्त भी हैं।
| वेद | मुख्य स्वभाव | आकार (शाखा) | प्रमुख शाखाएँ | ब्राह्मण | उपनिषद | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ऋग्वेद | देवताओं की स्तुति के मंत्र | 10 मंडल, 1,028 सूक्त, 10,552 ऋचाएँ (शाकल) | शाकल (उपलब्ध), बाष्कल | ऐतरेय, कौषीतकि | ऐतरेय, कौषीतकि | ऋग्वेद संहिता (मूल संस्कृत), स्वयं गिनती; Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III, VIII |
| सामवेद | गाए जाने वाले मंत्र | 1,549 मंत्र, दो आर्चिक | कौथुम, राणायनीय, जैमिनीय | पंचविंश (ताण्ड्य), जैमिनीय | छान्दोग्य, केन | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII |
| शुक्ल यजुर्वेद | यज्ञ के मंत्र और यजुस् | वाजसनेयी संहिता, 40 अध्याय | माध्यन्दिन, काण्व | शतपथ | बृहदारण्यक, ईश | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII |
| कृष्ण यजुर्वेद | मंत्र और व्याख्या साथ-साथ | तैत्तिरीय संहिता: 7 कांड, 44 प्रपाठक | तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक | तैत्तिरीय | तैत्तिरीय, कठ | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII |
| अथर्ववेद | गृहस्थी, स्वास्थ्य, राज्य और ब्रह्म-चिंतन | 20 कांड, 730 सूक्त, लगभग 6,000 मंत्र (शौनक) | शौनक, पैप्पलाद | गोपथ | मुण्डक, प्रश्न, माण्डूक्य | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII, VIII |
वैदिक साहित्य की चार परतें: संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद
हर वेद एक किताब नहीं, ग्रंथों का पूरा परिवार है, और उसकी चार परतें मानी जाती हैं। पहली "संहिता" है, यानी मंत्रों का संग्रह; जब कोई कहता है "ऋग्वेद", तो आमतौर पर उसका अर्थ यही होता है। दूसरी "ब्राह्मण" है: गद्य के ग्रंथ, जो बताते हैं कि यज्ञ में कौन-सा मंत्र कब और क्यों बोला जाए, और साथ में कथाएँ सुनाते हैं। तीसरी "आरण्यक" है, यानी वन में पढ़े जाने वाले ग्रंथ, जिनमें यज्ञ के बाहरी कर्म से हटकर उसके भीतरी अर्थ पर चिंतन है। चौथी "उपनिषद" है: आत्मा, ब्रह्म और मुक्ति का ज्ञान, जिसे "वेदांत", यानी वेद का अंतिम भाग, भी कहते हैं।
पर इन परतों के बीच की दीवारें पक्की नहीं हैं, और यह समझना ज़रूरी है। कई उपनिषद आरण्यक के भीतर ही हैं: ऐतरेय उपनिषद ऐतरेय आरण्यक का हिस्सा है, और बृहदारण्यक उपनिषद शतपथ ब्राह्मण के अंतिम भाग, आरण्यक, के अंतिम छह अध्याय हैं। ईश उपनिषद तो वाजसनेयी संहिता का अंतिम अध्याय ही है, यानी वह संहिता के भीतर है। कृष्ण यजुर्वेद में ब्राह्मण का गद्य संहिता के भीतर ही मिला हुआ है, और केन उपनिषद जैमिनीय शाखा के "उपनिषद ब्राह्मण" के भीतर है। इसलिए "संहिता, फिर ब्राह्मण, फिर आरण्यक, फिर उपनिषद" को समय की सीधी रेखा नहीं, विषय का एक मोटा क्रम समझना चाहिए।
विषय के हिसाब से भी एक क्रम दिखता है: संहिता में स्तुति और प्रार्थना, ब्राह्मण में कर्मकांड की व्याख्या, आरण्यक में कर्म के प्रतीकों पर ध्यान, और उपनिषद में "मैं कौन हूँ" का ज्ञान। यह बाहर से भीतर की ओर की यात्रा है। आगे चलकर पूरा वेदांत दर्शन इन्हीं उपनिषदों पर खड़ा हुआ; Macdonell बताते हैं कि बादरायण और शंकर जैसे वेदांत के आचार्य मुण्डक और प्रश्न जैसे उपनिषदों को बहुत उद्धृत करते हैं। इसका पूरा विस्तार "वैदिक साहित्य की चार परतें" लेख में है।
वेदों की शाखाएँ
हर वेद गुरु-शिष्य की कई धाराओं में चला, और हर धारा ने उसे थोड़े अलग रूप में सँभाला। ऐसी धारा को "शाखा" कहते हैं। विष्णु पुराण इसे एक पेड़ के फैलकर जंगल बन जाने की उपमा देता है। समय के साथ ज़्यादातर शाखाओं के पाठ खो गए, और आज हर वेद की कुछ ही शाखाएँ बची हैं: ऋग्वेद की शाकल, सामवेद की कौथुम, राणायनीय और जैमिनीय, शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन और काण्व, कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय, मैत्रायणी और काठक, और अथर्ववेद की शौनक और पैप्पलाद।
Macdonell शाखाओं के पुराने भूगोल का भी एक चित्र देते हैं। उनके अनुसार कठ शाखा यूनानियों के समय पंजाब में थी, और बाद में केवल कश्मीर में रह गई; तैत्तिरीय शाखा नर्मदा के दक्षिण में मिलती है; और वाजसनेयी शाखा गंगा की घाटी में पूर्व की ओर फैली। व्यास से शुरू होकर किस शिष्य ने किस वेद को कितने भागों में बाँटा, यह पूरी कथा इस साइट के "वेद-विभाजन" लेख में है।
ऋषि, मंत्र और सूक्त
वैदिक परंपरा में हर मंत्र के साथ तीन बातें याद रखी जाती हैं: उसके ऋषि (जिसने मंत्र देखा), देवता (जिसकी स्तुति है) और छंद (जिस लय में मंत्र है)। कई मंत्र मिलकर एक "सूक्त" बनाते हैं, यानी एक पूरी स्तुति। ऋग्वेद के सूक्तों की ऐसी सूची, "सर्वानुक्रमणी", आज भी उपलब्ध है, और उसमें हर सूक्त के ऋषि, देवता और छंद दर्ज हैं।
ऋषियों में पुरुष भी हैं और स्त्रियाँ भी। लोपामुद्रा, अपाला और शश्वती जैसी ऋषिकाओं के मंत्र ऋग्वेद में हैं। विश्वामित्र, वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और गृत्समद के पूरे-पूरे मंडल हैं। ये वही ऋषि हैं जिनके नाम आज गोत्रों में जीवित हैं। किस मंडल के कौन ऋषि हैं, यह "मन्त्र-द्रष्टा ऋषि" लेख में, और हर ऋषि का जीवन इस साइट के ऋषि ज्ञानकोश में है।
यज्ञ-परंपरा: चार वेद, चार पुरोहित
चार वेदों का बँटवारा असल में यज्ञ के कामों का बँटवारा है। एक बड़े सोम-यज्ञ में होता ऋग्वेद की ऋचाओं से देवताओं को बुलाता है, अध्वर्यु यजुर्वेद के सूत्र बोलते हुए वेदी बनाने से आहुति देने तक का सारा काम करता है, उद्गाता सामवेद के साम गाता है, और ब्रह्मा चुपचाप पूरे यज्ञ पर नज़र रखता है और कोई भूल हो तो उसे सुधारता है। Macdonell इसी कारण कहते हैं कि सामवेद और यजुर्वेद का संकलन व्यावहारिक, यानी यज्ञ के लिए, हुआ, जबकि ऋग्वेद का संकलन पुरानी विरासत को बचाने के लिए।
यज्ञ केवल बड़े राजसी अनुष्ठान नहीं थे। ब्राह्मण ग्रंथ रोज़ के अग्निहोत्र, अमावस्या-पूर्णिमा के दर्श-पूर्णमास, ऋतुओं के चातुर्मास्य, और एक दिन से लेकर साल भर चलने वाले सोम-यज्ञों तक की विधि देते हैं। यज्ञ की इस पूरी परंपरा का विस्तार "यज्ञ-परंपरा" लेख में और यजुर्वेद के पृष्ठ पर है।
बिना लिखे हज़ारों साल: वेदों का मौखिक संरक्षण
वेदों की सबसे अद्भुत बात शायद उनका बचे रहना है। हज़ारों साल तक वे लिखे नहीं गए, केवल याद किए और सुनाए गए, और फिर भी उनका पाठ, स्वर तक, आश्चर्यजनक शुद्धता से बचा रहा। इसके लिए पद, क्रम, जटा और घन जैसे पाठ के तरीके बने, जिनमें शब्दों को अलग-अलग क्रमों में दोहराया जाता है, ताकि एक अक्षर की भी गलती तुरंत पकड़ी जाए। ऋग्वेद के पृष्ठ पर इन पाठों के उदाहरण दिए गए हैं।
यह परंपरा आज भी जीवित है, और विश्व ने भी इसे पहचाना है। UNESCO ने "Tradition of Vedic chanting", यानी वैदिक पाठ की परंपरा, को 2003 में मानवता की मौखिक और अमूर्त धरोहर की उत्कृष्ट कृति घोषित किया, और 2008 में अपनी प्रतिनिधि सूची में दर्ज किया।
वेदों का महत्व
धर्म के लिए वेद सबसे ऊँचा प्रमाण माने गए हैं। संस्कार, विवाह, यज्ञ, संध्या और पूजा के मंत्र आज भी वेदों से ही आते हैं। गायत्री (ऋग्वेद 3.62.10) और महामृत्युंजय (ऋग्वेद 7.59.12) जैसे मंत्र करोड़ों लोग रोज़ जपते हैं, अक्सर यह जाने बिना कि वे किस वेद के किस मंडल में हैं।
ज्ञान के लिए वेद भारतीय चिंतन की जड़ हैं। उपनिषदों से वेदांत निकला, वेदों के पाठ को शुद्ध रखने के लिए शिक्षा, छंद, व्याकरण और निरुक्त जैसे वेदांग बने, और पुराणों ने वेद की बातों को कथाओं में ढालकर हर घर तक पहुँचाया। संसार के लिए वे मानव-सभ्यता के सबसे पुराने जीवित ग्रंथों में से हैं, जो आज भी उसी परंपरा में पढ़े जाते हैं जिसमें हज़ारों साल पहले पढ़े जाते थे।
चारों वेद
वेद से जुड़े लेख
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- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
- यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
- अथर्ववेद — घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद
- वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
- वेद-पाठ की परंपरा — संहिता, पद, क्रम, जटा और घन पाठ; उदात्त, अनुदात्त और स्वरित स्वर; शिक्षा, प्रातिशाख्य और अनुक्रमणियाँ: स्मृति की रक्षा का एक पूरा विज्ञान
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- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- वेद-विभाजन — व्यास, 28 व्यास और शाखाओं का पेड़
- मन्त्र-द्रष्टा ऋषि — ऋग्वेद के मंडल और उनके ऋषि
- नचिकेता और यम — कठ उपनिषद की कथा
- जनक की सभा — बृहदारण्यक उपनिषद का शास्त्रार्थ
- योग उपनिषद — उपनिषदों में योग
स्रोत एवं संदर्भ
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. III, The Rigveda, ch. III, ch. VII, The Later Vedas; ch. VIII, ch. VII, The Later Vedas, ch. III, VII, ch. III, VIII, ch. VII, VIII, ch. VIII, The Brahmanas, ch. VIII, ch. VIII, IX
- Kâtyâyana's Sarvânukramanî of the Rigveda (सर्वानुक्रमणी) — ए. ए. मैकडॉनल (सं.) (1886) · सूत्र 2.4, 1–46, 12–36
- The Vishnu Purana, vol. 3 (Book III) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1866) · अंश 3, अध्याय 3–4 (vol. 3, pp. 33–43), 3.4 (pp. 41, 43), 3.4 (pp. 41–43), 3.4 (pp. 42–43), अंश 3, अध्याय 4 (vol. 3, p. 44)
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · सभी मंडल (स्वयं गिनती), स्वयं गिनती, 3.62.10, 7.59.12
- Tradition of Vedic chanting (Representative List, element 00062) — UNESCO Intangible Cultural Heritage (2008) · element 00062
