अथर्ववेद: 20 काण्ड, पृथ्वी सूक्त, गृहस्थी, राज्य और ब्रह्मविद्या

घर-गृहस्थी और जीवन का वेद: शांति, स्वास्थ्य, विवाह, राज्य, "माता भूमिः" का पृथ्वी सूक्त, काल और प्राण सूक्त, और मुण्डक-माण्डूक्य उपनिषद

संक्षेप में

अथर्ववेद चौथा वेद है, जो यज्ञ से अधिक रोज़ के जीवन का वेद है: रोग और भय से रक्षा, लंबी आयु, विवाह, परिवार में प्रेम, राजा और राज्य, और साथ में ब्रह्म का गहरा चिंतन। शौनक शाखा में इसके 20 काण्ड और लगभग 730 सूक्त हैं। मुण्डक, प्रश्न और माण्डूक्य उपनिषद इसी के हैं।

एक नज़र में

सबसे पुराना नाम
अथर्वाङ्गिरस: अथर्वन् और अङ्गिरस, दो पुराने पुरोहित-कुलों के नाम से
यज्ञ में ऋत्विज
ब्रह्मा: पूरे यज्ञ की निगरानी और भूल का सुधार
व्यास के शिष्य
सुमन्तु (विष्णु पुराण 3.4)
आकार (शौनक)
20 काण्ड, 730 सूक्त, लगभग 6,000 मंत्र; लगभग छठा भाग गद्य
ऋग्वेद से
लगभग 1,200 मंत्र; बीसवें काण्ड के 143 में से 131 सूक्त ज्यों के त्यों
शाखाएँ
शौनक (छपा पाठ), पैप्पलाद (कश्मीर की भोजपत्र पांडुलिपि)
प्रसिद्ध सूक्त
पृथ्वी (12.1), काल (19.53–54), प्राण (11.4), ब्रह्मचारी (11.5), स्कम्भ (10.7–8), सांमनस्य (3.30)
ब्राह्मण
गोपथ ब्राह्मण
उपनिषद
मुण्डक, प्रश्न, माण्डूक्य

अथर्ववेद क्या है?

बाकी तीन वेद यज्ञ-वेदी के चारों ओर घूमते हैं। अथर्ववेद घर के आँगन में आता है। कोई बीमार है, किसी की शादी है, किसी के घर में झगड़ा है, किसी को लंबी यात्रा पर जाना है, किसी राजा का अभिषेक है, किसी की अंत्येष्टि: जीवन के हर मोड़ के लिए अथर्ववेद में मंत्र हैं। इसीलिए इसे जन-जीवन का वेद कहा जाता है। और इसी वेद में भारतीय दर्शन के कुछ सबसे गहरे सूक्त और उपनिषद भी हैं।

Macdonell बताते हैं कि अथर्ववेद के मंत्र मुख्य रूप से उन घरेलू संस्कारों में प्रयोग होते थे जिनका वर्णन गृह्यसूत्रों में है: जन्म, विवाह और मृत्यु, और साथ में राजाओं के अभिषेक जैसे राजनीतिक संस्कार। उनके अनुसार इसके दो पहलू हैं। एक ओर शांति और आशीर्वाद के मंत्र: परिवार और गाँव में मेल, शत्रुओं से सुलह, लंबी आयु, स्वास्थ्य, समृद्धि, यात्रा में रक्षा। दूसरी ओर रोग, हानिकारक जीवों, राक्षसों और शत्रुओं के विरुद्ध मंत्र।

परंपरा के अनुसार व्यास ने यह वेद अपने शिष्य सुमन्तु को सौंपा, और यज्ञ में इसका ऋत्विज "ब्रह्मा" है, जो पूरे यज्ञ पर नज़र रखता है और कोई भूल हो तो उसका सुधार करता है। Macdonell यह भी बताते हैं कि अथर्ववेद को बहुत समय बाद चौथे वेद का पूरा दर्जा मिला, और उसका बीसवाँ काण्ड इसी उद्देश्य से जोड़ा गया लगता है।

नाम का अर्थ: अथर्वाङ्गिरस

Macdonell के अनुसार इस वेद का सबसे पुराना नाम "अथर्वाङ्गिरस" है। यह नाम स्वयं अथर्ववेद के पाठ में आता है, और उसकी पांडुलिपियों के आरंभ में भी लिखा मिलता है। यह दो पुराने पुरोहित-कुलों के नाम से बना है: अथर्वन् और अङ्गिरस। विद्वान Bloomfield का मत था कि "अथर्वन्" शुभ और कल्याणकारी मंत्रों का सूचक है, और "अङ्गिरस" शत्रु और बाधा के विरुद्ध मंत्रों का। आगे चलकर केवल "अथर्व" नाम पूरे वेद के लिए चल पड़ा, जो उसके कल्याणकारी पक्ष को दिखाता है।

उपनिषद भी इस नाम की परंपरा याद रखते हैं। मुण्डक उपनिषद का पहला मंत्र कहता है कि देवताओं में पहले ब्रह्मा ने ब्रह्मविद्या अपने बड़े पुत्र अथर्वा को दी; अथर्वा ने अङ्गिर को, अङ्गिर ने सत्यवाह भारद्वाज को, और भारद्वाज ने अङ्गिरस को। फिर महागृहस्थ शौनक विनय के साथ अङ्गिरस के पास गए। यानी अथर्ववेद की ब्रह्मविद्या भी उसी अथर्वा और अङ्गिरस की परंपरा से जुड़ी है जिनके नाम पर यह वेद है।

चारों वेदों में अथर्ववेद का स्थान

अथर्ववेद का स्थान बाकी तीनों से अलग है, और इसका कारण उसका विषय है। ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद "त्रयी" कहलाते थे, क्योंकि बड़े श्रौत यज्ञ इन्हीं तीन के ऋत्विजों से चलते थे। अथर्ववेद का संबंध यज्ञ से अधिक घर और समाज से था। Macdonell लिखते हैं कि उसका बीसवाँ काण्ड, जिसमें लगभग सारे इंद्र के सोम-सूक्त ऋग्वेद से लिए गए हैं, स्पष्ट रूप से इसीलिए जोड़ा गया कि अथर्ववेद को तीन पुराने वेदों के यज्ञ-कर्म से जोड़ा जा सके और चौथे वेद का पूरा दर्जा मिले।

फिर भी Macdonell स्वयं मानते हैं कि देवताओं और ईश्वर से जुड़े ऊँचे विचारों में अथर्ववेद ऋग्वेद से आगे की अवस्था दिखाता है, और उसमें बाकी किसी भी संहिता से अधिक दार्शनिक सामग्री है। उनके अनुसार सभ्यता के इतिहास के लिए यह कुल मिलाकर ऋग्वेद से भी अधिक रोचक और महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसमें आम लोगों का जीवन दिखता है। मुण्डक उपनिषद तो चारों वेदों को "अपरा विद्या" में एक साथ गिनाता है, बिना किसी भेद के।

संरचना: 20 काण्ड, तीन बड़े भाग

छपी हुई शौनक संहिता बीस काण्डों में है। Macdonell के अनुसार इसमें 730 सूक्त और लगभग 6,000 मंत्र हैं। इनमें से लगभग 1,200 मंत्र ऋग्वेद से आए हैं, ज़्यादातर उसके दसवें, पहले और आठवें मंडल से। लगभग छठा भाग गद्य है: पचास से अधिक सूक्त पूरी तरह छंद-रहित हैं, जिनमें पूरा पंद्रहवाँ और सोलहवाँ काण्ड भी है। Whitney के अनुसार पूरी अथर्ववेद-संहिता का आकार ऋग्वेद का लगभग आधा है।

अथर्ववेद की बनावट में एक अनोखा तर्क है। Whitney पहले अठारह काण्डों को तीन बड़े भागों में बाँटते हैं। पहला भाग (काण्ड 1–7) छोटे सूक्तों का है, जिनके विषय मिले-जुले हैं, और यहाँ सूक्त अपनी लंबाई के हिसाब से सजे हैं: Macdonell के अनुसार पहले काण्ड के सूक्तों में औसतन चार मंत्र हैं, दूसरे में पाँच, तीसरे में छह, चौथे में सात, और सातवें काण्ड के लगभग आधे सूक्तों में केवल एक मंत्र। दूसरा भाग (काण्ड 8–12) लंबे सूक्तों का है, जिनके बीच में गद्य भी है। तीसरा भाग (काण्ड 13–18) ऐसे काण्डों का है जिनमें हर काण्ड का एक ही विषय है।

उन्नीसवाँ काण्ड पूरक सूक्तों का मिश्रण है, और बीसवाँ लगभग पूरा ऋग्वेद के इंद्र-सूक्तों का। Macdonell बताते हैं कि अथर्ववेद का प्रातिशाख्य इन दोनों काण्डों को नहीं जानता, इसलिए ये उसके बाद जोड़े गए। बीसवें काण्ड के 143 सूक्तों में से 12 को छोड़कर सब ऋग्वेद से बिना किसी बदलाव के लिए गए हैं। उसका अपना मौलिक भाग केवल "कुन्ताप" सूक्त (127–136) हैं, जो उदार राजाओं की प्रशंसा के गीत हैं।

अथर्ववेद (शौनक) की बनावट
काण्डस्वरूपप्रमुख विषयस्रोत
1–7छोटे सूक्त, लंबाई के क्रम मेंस्वास्थ्य, रक्षा, परिवार में मेल, आशीर्वाद; 3.30 सांमनस्य; 4.16 वरुणअथर्ववेद (Whitney अनु.), भाग 1, Introduction; Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII
8–12लंबे सूक्त, बीच में गद्य8.7 औषधियाँ; 10.7–8 स्कम्भ; 11.4 प्राण; 11.5 ब्रह्मचारी; 12.1 पृथ्वीअथर्ववेद (Whitney अनु.), भाग 2, Contents; अथर्ववेद संहिता (मूल संस्कृत, शौनक), 8–12
13एक विषयरोहित (उगता लाल सूर्य)अथर्ववेद (Whitney अनु.), भाग 2, Book XIII, introduction
14एक विषयविवाह (दो सूक्त, अधिकांश ऋग्वेद के दसवें मंडल से)Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII; अथर्ववेद संहिता (मूल संस्कृत, शौनक), 14.1–2
15एक विषय, पूरा गद्यव्रात्य के रूप में परम सत्ता की महिमाMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII
16–17छोटे काण्ड16: नौ सूक्त, अधिकांश गद्य; 17: केवल एक सूक्तMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII
18एक विषयअंत्येष्टि और पितर (चार सूक्त)Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII; अथर्ववेद संहिता (मूल संस्कृत, शौनक), 18.1–4
19पूरकमिले-जुले सूक्त; 19.53–54 कालMacdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII; अथर्ववेद संहिता (मूल संस्कृत, शौनक), 19.53–54
20बाद में जोड़ा गया143 सूक्त, 131 ऋग्वेद से ज्यों के त्यों; कुन्ताप सूक्त 127–136Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. VII

अथर्ववेद की शाखाएँ: शौनक और पैप्पलाद

अथर्ववेद की दो शाखाओं के पाठ बचे हैं। आज जो संहिता छपती और पढ़ी जाती है, वह शौनक शाखा की है। Macdonell बताते हैं कि Roth और Whitney ने 1856 में इसका पहला छपा संस्करण निकाला, और सायण के अथर्ववेद-भाष्य का भी लगभग पूरा भाग भारत में प्रकाशित हुआ। यह पृष्ठ इसी शौनक पाठ पर है।

दूसरी शाखा, पैप्पलाद, की कहानी किसी रोमांचक खोज जैसी है। Macdonell के समय यह केवल एक भोजपत्र की पांडुलिपि से जानी जाती थी, जो पुरानी थी पर अशुद्ध, और जिसमें ज़्यादातर स्वर-चिह्न नहीं थे। यह पांडुलिपि Bühler को कश्मीर में मिली थी। Whitney विस्तार से बताते हैं कि Roth ने 1874 में इसकी देवनागरी प्रति बनवाई, 1876 में मूल भोजपत्र पांडुलिपि ट्यूबिंगेन पहुँची, और 1901 में उसकी फ़ोटो-प्रति छपी। वे इस पांडुलिपि का समय लगभग 1519 ई. के आसपास मानते हैं।

पैप्पलाद शाखा का नाम ऋषि पिप्पलाद से जुड़ा है, और यह नाम प्रश्न उपनिषद में भी आता है, जहाँ छह जिज्ञासु "भगवान पिप्पलाद" के पास समिधा लेकर जाते हैं। Macdonell मानते हैं कि अथर्ववेद के एक परिशिष्ट में जिन "पैप्पलाद मंत्रों" का उल्लेख है, वे इसी शाखा के हैं। Whitney ने अपने अनुवाद में हर मंत्र के साथ पैप्पलाद के पाठ-भेद भी दिए हैं।

शांति और मेल के मंत्र: सांमनस्य सूक्त (3.30)

अथर्ववेद का सबसे सुंदर पक्ष उसके शांति और मेल के मंत्र हैं। सूक्त 3.30 परिवार में प्रेम और एकता के लिए है। इसका पहला मंत्र कहता है: "मैं तुम्हें एक हृदय वाला, एक मन वाला और द्वेष-रहित बनाता हूँ। एक-दूसरे को ऐसे प्यार करो जैसे गाय अपने नए जन्मे बछड़े को करती है।" परिवार के बीच प्रेम के लिए इससे कोमल उपमा शायद ही कहीं मिले।

इसी सूक्त के आगे के मंत्र (कुल सात) पुत्र को पिता के अनुकूल, माँ के साथ एक मन वाला, और पत्नी को पति से मीठी, शांत वाणी बोलने वाला बनने की प्रार्थना करते हैं, और कहते हैं कि भाई भाई से और बहन बहन से द्वेष न करे। अथर्ववेद में ऐसे मंत्र कई हैं: गाँव में मेल के, सभा में वाणी के सफल होने के, और शत्रुओं से सुलह के।

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः । अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥

मैं तुम्हें एक हृदय वाला, एक मन वाला और द्वेष-रहित बनाता हूँ। तुम एक-दूसरे को ऐसे चाहो जैसे गाय अपने नए जन्मे बछड़े को।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.30.1

स्वास्थ्य, औषधि और वनस्पति के मंत्र

एक ज़रूरी बात

अथर्ववेद के स्वास्थ्य संबंधी मंत्र उस परंपरा की आस्था और उस समय का ज्ञान हैं, आज के चिकित्सा-विज्ञान का विकल्प नहीं। किसी भी रोग में योग्य डॉक्टर की सलाह और इलाज ही लें। ये मंत्र श्रद्धा से पढ़े जा सकते हैं, पर इलाज की जगह नहीं।

अथर्ववेद में रोगों से रक्षा और स्वास्थ्य के लिए बहुत-से मंत्र हैं, और भारतीय चिकित्सा-परंपरा के इतिहास में इनका बड़ा महत्व है। Macdonell बताते हैं कि अथर्ववेद के कुछ रोग-निवारक मंत्र अपने उद्देश्य और विषय में, और कुछ हद तक रूप में भी, पुराने जर्मन, लातवियाई और रूसी मंत्रों से मिलते हैं। Adalbert Kuhn के इस शोध के आधार पर वे अनुमान लगाते हैं कि इनमें से कुछ बहुत पुराने समय से चले आ रहे हैं।

वनस्पतियों के प्रति अथर्ववेद का भाव आदर का है। काण्ड 8 का सातवाँ सूक्त, जिसे Whitney "पौधों के प्रति: किसी के स्वास्थ्य-लाभ के लिए" शीर्षक देते हैं, औषधियों की लंबी स्तुति है, जिसमें उन्हें माता की तरह पुकारा गया है। आयुर्वेद की उत्पत्ति की कथा, चरक संहिता के अनुसार, इस साइट के ऋषि खंड के "आयुर्वेद" लेख में है।

Macdonell का मूल्यांकन मिला-जुला है, और उसे भी ईमानदारी से जानना चाहिए। वे इन मंत्रों को आम लोगों में प्रचलित पुरानी धारणाओं का संग्रह मानते हैं, और साथ ही कहते हैं कि सभ्यता के इतिहास के लिए यही अथर्ववेद को इतना मूल्यवान बनाता है। यानी ये मंत्र हमें बताते हैं कि हज़ारों साल पहले लोग बीमारी, डर और आशा को कैसे देखते थे।

परिवार, विवाह और गृहस्थ जीवन

अथर्ववेद का चौदहवाँ काण्ड पूरा विवाह का है। इसमें दो लंबे सूक्त हैं, पहले में 64 और दूसरे में 75 मंत्र। Macdonell बताते हैं कि इसके मंत्र अधिकतर ऋग्वेद के दसवें मंडल से हैं, यानी सूर्या के विवाह वाले सूक्त (ऋग्वेद 10.85) की परंपरा से। अथर्ववेद ने उन्हें विवाह-संस्कार के पूरे क्रम में सजा दिया, ताकि हर रस्म के लिए मंत्र हो।

गृहस्थ जीवन के लिए अथर्ववेद में घर बनाने, खेती, पशुओं की रक्षा, संतान, लंबी आयु और समृद्धि के मंत्र हैं। Macdonell कहते हैं कि इसके मंत्र मुख्य रूप से उन्हीं संस्कारों से जुड़े थे जिनका वर्णन गृह्यसूत्रों में है: जन्म, विवाह और मृत्यु। अठारहवाँ काण्ड अंत्येष्टि और पितरों का है, चार सूक्तों का, और उसके मंत्र भी अधिकतर ऋग्वेद के दसवें मंडल से हैं।

राजा, राज्य और शासन

अथर्ववेद में राजा से जुड़े मंत्र भी बहुत हैं: राज्याभिषेक, विजय, सेना की रक्षा और प्रजा का कल्याण। Macdonell बताते हैं कि इसके मंत्र घरेलू संस्कारों के साथ-साथ राजाओं के अभिषेक जैसे राजनीतिक संस्कारों में भी प्रयोग होते थे। यानी अथर्ववेद केवल व्यक्ति और परिवार का नहीं, पूरे राज्य की रक्षा और शांति का भी वेद था।

राजा के लिए अथर्ववेद की सबसे गहरी शिक्षा वरुण के एक सूक्त (4.16) में है। उसका दूसरा मंत्र कहता है: जो खड़ा है, जो चलता है, जो छिपकर चलता है, जो धोखा देता है, जो दो लोग एकांत में बैठकर कुछ गुप्त सलाह करते हैं, राजा वरुण वहाँ तीसरा बनकर सब जानता है। यानी शासक के ऊपर भी एक शासक है, और कोई भी बात उससे छिपी नहीं।

यस्तिष्ठति चरति यश्च वञ्चति यो निलायं चरति यः प्रतङ्कम् । द्वौ संनिषद्य यन्मन्त्रयेते राजा तद्वेद वरुणस्तृतीयः ॥

जो खड़ा है, जो चलता है, जो धोखा देता है, जो छिपकर या दबे पाँव चलता है; दो लोग एक साथ बैठकर जो गुप्त सलाह करते हैं, राजा वरुण वहाँ तीसरा बनकर उसे जानता है।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 4.16.2

पृथ्वी सूक्त: "माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः" (12.1)

अथर्ववेद का सबसे प्रसिद्ध सूक्त बारहवें काण्ड का पहला सूक्त है, जिसे "पृथ्वी सूक्त" या "भूमि सूक्त" कहते हैं। इसमें 63 मंत्र हैं, और पूरा सूक्त धरती को माता के रूप में देखता है। इसका पहला मंत्र बताता है कि धरती को धारण कौन करता है: सत्य, महान ऋत, उग्रता, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ। यानी धरती केवल मिट्टी और पत्थर पर नहीं, सत्य और धर्म पर टिकी है।

इसका बारहवाँ मंत्र भारतीय चिंतन के सबसे प्रसिद्ध वाक्यों में है: "माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः", यानी भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ; और पर्जन्य (वर्षा के देवता) पिता हैं। आगे के मंत्र धरती के पर्वतों, नदियों, जंगलों और उसके हर जीव की स्तुति करते हैं। मंत्र 45 तो बहुत सुंदर है: अनेक भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धर्म मानने वाले लोगों को एक घर की तरह धारण करने वाली पृथ्वी हमें धन की हज़ार धाराएँ दे, जैसे स्थिर खड़ी, शांत गाय दूध देती है।

आज जब पर्यावरण की बात होती है, तो पृथ्वी सूक्त को अक्सर याद किया जाता है, और ठीक ही। हज़ारों साल पहले का यह सूक्त धरती को उपभोग की वस्तु नहीं, माँ मानता है, जिसकी रक्षा पुत्र का कर्तव्य है। यह इस पृष्ठ की हमारी व्याख्या है; सूक्त स्वयं धरती की महिमा और उससे आशीर्वाद की प्रार्थना है।

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति । सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥

सत्य, महान ऋत, उग्र तेज, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ पृथ्वी को धारण करते हैं। जो भूत और भविष्य की स्वामिनी है, वह पृथ्वी हमें विशाल स्थान दे।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 12.1.1
यत्ते मध्यं पृथिवि यच्च नभ्यं यास्त ऊर्जस्तन्वः संबभूवुः । तासु नो धेह्यभि नः पवस्व माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः पर्जन्यः पिता स उ नः पिपर्तु ॥

हे पृथ्वी, तुम्हारा जो मध्य है, जो नाभि है, तुम्हारे शरीर से जो पोषक शक्तियाँ उत्पन्न हुई हैं, उनमें हमें स्थान दो और हमें पवित्र करो। भूमि माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ; पर्जन्य पिता हैं, वे हमारा पालन करें।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 12.1.12

काल सूक्त: समय रूपी घोड़ा (19.53–54)

उन्नीसवें काण्ड के दो सूक्त, 53 (दस मंत्र) और 54 (पाँच मंत्र), "काल" यानी समय को सृष्टि की मूल शक्ति के रूप में देखते हैं। पहला मंत्र एक अद्भुत चित्र देता है: काल एक घोड़ा है जो सात रस्सियों (किरणों) से चलता है, जिसकी हज़ार आँखें हैं, जो कभी बूढ़ा नहीं होता और जिसमें अपार बीज-शक्ति है। ज्ञानी कवि उस पर चढ़ते हैं, और सारे लोक उसके पहिये हैं।

आगे के मंत्र कहते हैं कि काल ने ही धरती और आकाश को जन्म दिया, उसी में भूत और भविष्य टिके हैं, उसी से प्रजापति और तप पैदा हुए। भारतीय चिंतन में समय को चक्र के रूप में देखने की जो परंपरा है, जिसमें युग, कल्प और मन्वन्तर बार-बार घूमते हैं, उसकी एक पुरानी जड़ यह सूक्त है। आगे पुराणों में "काल" भगवान का एक रूप माना गया, और गीता (11.32) में कृष्ण विश्वरूप दिखाते हुए कहते हैं: "कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धः", मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ।

कालो अश्वो वहति सप्तरश्मिः सहस्राक्षो अजरो भूरिरेताः । तमा रोहन्ति कवयो विपश्चितस्तस्य चक्रा भुवनानि विश्वा ॥

काल एक घोड़ा है जो सात रस्सियों से चलता है, हज़ार आँखों वाला, कभी बूढ़ा न होने वाला और अपार शक्ति वाला। ज्ञानी कवि उस पर चढ़ते हैं; सारे लोक उसके पहिये हैं।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 19.53.1

प्राण सूक्त और ब्रह्मचारी सूक्त (11.4–5)

ग्यारहवें काण्ड का चौथा सूक्त "प्राण" की स्तुति है। Whitney के अनुवाद में उसका पहला मंत्र है: "प्राण को नमस्कार, जिसके वश में यह सब है, जो सबका स्वामी है, जिसमें सब प्रतिष्ठित है।" आगे के मंत्र प्राण की गर्जना, कड़क, बिजली और वर्षा को नमस्कार करते हैं, और कहते हैं कि जब प्राण ऋतु आने पर गरजकर औषधियों पर बरसता है, तो वे गर्भ धारण करती हैं, बहुत-सी उगती हैं, और धरती पर सब कुछ आनंदित हो जाता है। आगे उपनिषदों में, ख़ासकर प्रश्न उपनिषद में, प्राण का जो गहरा चिंतन है, उसकी जड़ यहीं है।

उसके बाद का सूक्त (11.5) "ब्रह्मचारी" की स्तुति है, यानी वेद पढ़ने वाले विद्यार्थी की। इसमें ब्रह्मचारी को ऐसी शक्ति के रूप में देखा गया है जो धरती और आकाश, दोनों को चलाता है, जिसके पीछे देवता चलते हैं, और जो समिधा, मेखला, श्रम और तप से लोकों को भर देता है। विद्या और अनुशासन की ऐसी महिमा बहुत कम ग्रंथों में मिलती है।

ब्रह्मविद्या: स्कम्भ, व्रात्य और आत्मा

अथर्ववेद को केवल मंत्र-तंत्र का वेद समझना बड़ी भूल है। दसवें काण्ड के सातवें और आठवें सूक्त (44-44 मंत्र) "स्कम्भ" के हैं, यानी वह खंभा या आधार जिस पर पूरा ब्रह्मांड टिका है। सूक्त 10.7 प्रश्नों से शुरू होता है: इसके किस अंग में तप है, किसमें ऋत, कहाँ व्रत है, कहाँ श्रद्धा, किस अंग में सत्य प्रतिष्ठित है? और उत्तर देता है कि वह आधार स्कम्भ है, जो सबको धारण करता है।

सूक्त 10.8 का अंतिम मंत्र तो उपनिषदों जैसा ही है: जो इच्छा-रहित, धीर, अमर, स्वयंभू है, रस से तृप्त है और जिसमें कोई कमी नहीं, उस धीर, अजर, सदा युवा आत्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता। पंद्रहवाँ काण्ड, जो पूरा गद्य में है, "व्रात्य" के रूप में परम सत्ता की महिमा गाता है, और उसका पहला वाक्य कहता है कि व्रात्य था, उसने चलते-चलते प्रजापति को प्रेरित किया।

कस्मिन्नङ्गे तपो अस्याधि तिष्ठति कस्मिन्नङ्ग ऋतमस्याध्याहितम् । क्व व्रतं क्व श्रद्धास्य तिष्ठति कस्मिन्नङ्गे सत्यमस्य प्रतिष्ठितम् ॥

इसके किस अंग में तप स्थित है? किस अंग में ऋत रखा गया है? इसका व्रत कहाँ है, श्रद्धा कहाँ टिकी है? किस अंग में इसका सत्य प्रतिष्ठित है?

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.7.1
अकामो धीरो अमृतः स्वयंभू रसेन तृप्तो न कुतश्चनोनः । तमेव विद्वान्न बिभाय मृत्योरात्मानं धीरमजरं युवानम् ॥

जो इच्छा-रहित, धीर, अमर, स्वयंभू, रस से तृप्त है, और जिसमें कहीं कोई कमी नहीं, उसी धीर, अजर, सदा युवा आत्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।

— अथर्ववेद-संहिता, शौनक शाखा — GRETIL e-text, पृष्ठ 10.8.44

मुण्डक उपनिषद: परा और अपरा विद्या, "सत्यमेव जयते"

अथर्ववेद से जुड़े उपनिषदों के बारे में Macdonell एक ज़रूरी बात बताते हैं: अथर्ववेद के नाम से बहुत-से उपनिषद जुड़े हैं, सबसे मान्य सूची में सत्ताईस, पर उनमें से ज़्यादातर बहुत बाद के हैं। सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण मुण्डक और प्रश्न हैं, और कुछ कम हद तक माण्डूक्य। उनके अनुसार बादरायण और शंकर जैसे वेदांत के आचार्य मुण्डक और प्रश्न को बहुत उद्धृत करते हैं।

मुण्डक उपनिषद में शौनक, महागृहस्थ, अङ्गिरस के पास जाकर पूछते हैं: "वह क्या है, जिसे जान लेने से सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?" अङ्गिरस कहते हैं कि दो विद्याएँ जाननी चाहिए, परा और अपरा। अपरा विद्या में चारों वेद और छहों वेदांग (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) आते हैं, और परा विद्या वह है जिससे अविनाशी ब्रह्म को जाना जाता है। यानी वेद स्वयं कहता है कि वेदों को पढ़ लेना भी अंतिम ज्ञान नहीं; अंतिम ज्ञान ब्रह्म का अनुभव है।

तीसरा मुण्डक एक प्रसिद्ध उपमा से शुरू होता है, जो ऋग्वेद (1.164.20) में भी है: दो पक्षी, जो अटूट मित्र हैं, एक ही पेड़ पर बैठे हैं। एक मीठे फल खाता है, और दूसरा बिना खाए बस देखता है। उपनिषद समझाता है कि उसी पेड़ पर बैठा मनुष्य अपनी असमर्थता से मोहित होकर दुखी रहता है; पर जब वह दूसरे, संतुष्ट ईश्वर को देखता है और उसकी महिमा जानता है, तो उसका दुख मिट जाता है। जीव और ईश्वर, भोक्ता और साक्षी, के संबंध को समझाने के लिए यह उपमा आज तक दोहराई जाती है।

इसी उपनिषद के तीसरे मुण्डक का एक वाक्य आज भारत का राष्ट्रीय आदर्श-वाक्य है: "सत्यमेव जयते"। Max Müller के अनुवाद में: "सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं; सत्य से ही देवयान का मार्ग बिछा है, जिस पर पुराने ऋषि चलकर सत्य के उस परम धाम तक पहुँचते हैं।" राष्ट्र-चिह्न के नीचे लिखा यह वाक्य अथर्ववेद की परंपरा का उपहार है।

प्रश्न और माण्डूक्य उपनिषद

प्रश्न उपनिषद एक सुंदर दृश्य से शुरू होता है। छह जिज्ञासु, जो ब्रह्म में निष्ठा रखने वाले और परम ब्रह्म की खोज में थे, हाथ में समिधा लेकर भगवान पिप्पलाद के पास आए: भारद्वाज सुकेशा, शैब्य सत्यकाम, गार्ग्य सौर्यायणी, आश्वलायन कौसल्य, भार्गव वैदर्भि और कात्यायन कबन्धी। उन्हें विश्वास था कि पिप्पलाद सब बता देंगे। उपनिषद इन छह के छह प्रश्नों और पिप्पलाद के उत्तरों का है: प्रजा कहाँ से आई, शरीर को कौन धारण करता है, प्राण कहाँ से आता है, सोते समय कौन जागता है, ॐ के ध्यान का फल क्या है, और सोलह कलाओं वाला पुरुष कौन है।

इन प्रश्नों में दूसरा प्रश्न एक प्यारी कथा बन जाता है। भार्गव वैदर्भि ने पूछा: "भगवन्, कितने देवता शरीर को धारण करते हैं, और उनमें सबसे बड़ा कौन है?" पिप्पलाद ने बताया कि आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, मन, आँख और कान, सब अपनी-अपनी महिमा दिखाकर कहने लगे: "हम इस शरीर को थामे हुए हैं।" तब सबसे बड़े, प्राण, ने कहा: "भ्रम में मत पड़ो; मैं ही अपने को पाँच भागों में बाँटकर इसे थामे हूँ।" उन्होंने विश्वास नहीं किया।

तब प्राण अभिमान से मानो शरीर से ऊपर उठने लगा, और उसके उठते ही बाकी सब भी उठने लगे; वह ठहरा, तो सब ठहर गए। पिप्पलाद कहते हैं: जैसे रानी मक्खी के उड़ने पर सारी मधुमक्खियाँ उड़ जाती हैं और उसके बैठने पर सब बैठ जाती हैं, वैसे ही वाणी, मन, आँख और कान प्राण के साथ हैं। यह देखकर सब प्रसन्न होकर प्राण की स्तुति करने लगे। अथर्ववेद के प्राण सूक्त (11.4) का विचार यहाँ एक कथा बनकर लौटता है।

माण्डूक्य उपनिषद सबसे छोटे उपनिषदों में है, पर उसका प्रभाव बहुत बड़ा है। उसका पहला वाक्य है: "ॐ, यह अक्षर ही यह सब है। जो हुआ, जो है और जो होगा, सब ॐकार ही है, और जो तीनों कालों से परे है, वह भी ॐकार ही है।" आगे यह उपनिषद आत्मा की चार अवस्थाएँ बताता है: जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, और चौथी, "तुरीय", जो इन तीनों से परे शुद्ध चेतना है। इसी उपनिषद पर गौडपाद की प्रसिद्ध "माण्डूक्य-कारिका" लिखी गई, जो वेदांत की परंपरा में बहुत पढ़ी जाती है।

ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥

ॐ, यह अक्षर ही यह सब है। उसकी व्याख्या यह है: जो हो चुका, जो है और जो होगा, सब ॐकार ही है; और जो तीनों कालों से परे है, वह भी ॐकार ही है।

— माण्डूक्य उपनिषद्, भाष्य सहित — GRETIL e-text, पृष्ठ 1

गोपथ ब्राह्मण

अथर्ववेद का ब्राह्मण गोपथ ब्राह्मण है। Macdonell के अनुसार यह दो भागों में है: पहले में पाँच अध्याय और दूसरे में छह। दोनों भाग बहुत बाद के हैं; इनका अथर्ववेद-संहिता से कोई विशेष संबंध नहीं, और ये वैतान सूत्र के बाद रचे गए। पहले भाग का मुख्य उद्देश्य अथर्ववेद और ब्रह्मा नाम के चौथे पुरोहित की महिमा बताना है, और उसकी बहुत-सी सामग्री शतपथ ब्राह्मण के ग्यारहवें और बारहवें काण्ड से ली गई है। दूसरा भाग यज्ञ-क्रम का नियमित वर्णन है।

अथर्ववेद की प्रमुख शिक्षाएँ

पहली शिक्षा है प्रेम और मेल: परिवार को गाय और बछड़े जैसे स्नेह से बँधा होना चाहिए (3.30)। दूसरी है धरती के प्रति कृतज्ञता: भूमि माता है और हम उसके पुत्र (12.1.12)। तीसरी है सत्य: धरती सत्य और ऋत पर टिकी है (12.1.1), और अंत में विजय सत्य की ही होती है (मुण्डक)। चौथी है कि कोई भी बात ईश्वर से छिपी नहीं, दो लोगों की गुप्त बातचीत में भी वह तीसरा है (4.16.2)।

और अंतिम शिक्षा अथर्ववेद की ब्रह्मविद्या की है: जो धीर, अजर, अमर आत्मा को जान लेता है, वह मृत्यु से नहीं डरता (10.8.44)। एक ओर रोग, भय और रोज़ की चिंताओं के मंत्र, और दूसरी ओर मृत्यु से परे की आत्मा का ज्ञान: अथर्ववेद मनुष्य को उसकी पूरी यात्रा में साथ लेकर चलता है, आँगन से लेकर आत्मा तक।

भारतीय संस्कृति और परंपरा पर प्रभाव

भारत के लोक-जीवन पर अथर्ववेद का प्रभाव सबसे गहरा है, क्योंकि वह स्वयं लोक-जीवन का वेद है। विवाह, अंत्येष्टि और गृह-संस्कारों के मंत्र, परिवार में मेल की प्रार्थनाएँ, और रक्षा और कल्याण की कामनाओं की परंपरा इसी से आती है। रोग और औषधि के प्रति इसका ध्यान भारतीय चिकित्सा-परंपरा के इतिहास का भी एक पुराना पन्ना है।

दर्शन में अथर्ववेद ने भारत को मुण्डक और माण्डूक्य जैसे उपनिषद दिए, जिन पर वेदांत की बड़ी इमारत खड़ी हुई। और आज के भारत के लिए उसने दो ऐसे वाक्य दिए जो हर भारतीय पहचानता है: "माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः", जो धरती से प्रेम सिखाता है, और "सत्यमेव जयते", जो राष्ट्र के आदर्श के रूप में हर सरकारी मुहर पर लिखा है।

आगे पढ़ें

  • ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
  • सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
  • यजुर्वेद — अध्वर्यु का वेद: यज्ञ की हर क्रिया के मंत्र, याज्ञवल्क्य की कथा, वाजसनेयी के 40 अध्याय और तैत्तिरीय के 7 काण्ड
  • वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
  • वैदिक देवता — तैंतीस देवता, तीन लोक: द्युलोक के वरुण, सविता, विष्णु और उषा; अंतरिक्ष के इंद्र, रुद्र और मरुत; पृथ्वी के अग्नि और सोम; और "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति"
  • आयुर्वेद — चरक संहिता के अनुसार आयुर्वेद की उत्पत्ति
  • महर्षि अङ्गिरा — अथर्वाङ्गिरस परंपरा के ऋषि
  • महर्षि शौनक — मुण्डक उपनिषद के जिज्ञासु
  • वेद-विभाजन — व्यास ने अथर्ववेद सुमन्तु को सौंपा

स्रोत एवं संदर्भ

अथर्ववेद — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न