पुराण क्या हैं?
"पुराण" का शाब्दिक अर्थ है पुराना। पर पुराण-ग्रंथ केवल पुरानी कथाएँ नहीं, एक पूरी विद्या हैं: संसार कैसे बना, कैसे नष्ट होता है और फिर बनता है, देवताओं, ऋषियों और राजाओं के वंश कैसे चले, समय के बड़े-बड़े चक्र कैसे घूमते हैं, और इन सबके बीच मनुष्य का धर्म क्या है। सदियों तक भारत के आम लोगों ने धर्म वेद पढ़कर नहीं, पुराणों की कथाएँ सुनकर सीखा।
पुराण अपने जन्म की कथा स्वयं कहते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार पुराण मूल में एक था, देवलोक में सौ करोड़ श्लोकों का। हर द्वापर में भगवान व्यास का रूप लेकर उसका सार चार लाख श्लोकों में अठारह भागों में बाँटते हैं, और वही मनुष्यों के लोक में प्रकाशित होता है। विष्णु पुराण बताता है कि व्यास ने पुराण-संहिता अपने शिष्य सूत रोमहर्षण को दी। रोमहर्षण के छह शिष्य हुए, जिनमें से काश्यप (अकृतव्रण), सावर्णि और शांशपायन ने अपनी-अपनी संहिताएँ बनाईं, और रोमहर्षण की संहिता "मूल संहिता" कहलाई।
इस कथा से एक ऐतिहासिक सच भी झलकता है, जिसे आधुनिक विद्वान भी मानते हैं: पुराण किसी एक व्यक्ति ने एक बार में नहीं लिखे। वे कथावाचकों की परंपरा में सदियों तक बोले, सुने, बढ़ाए और बदले गए। इसीलिए एक ही पुराण के अलग-अलग संस्करणों में अध्याय और श्लोक अलग-अलग मिलते हैं, और परंपरा में कही गई श्लोक-संख्या और आज के पाठ में मिलने वाली संख्या में अक्सर बड़ा अंतर होता है। विष्णु पुराण इसका अच्छा उदाहरण है: परंपरा उसे 23,000 श्लोकों का बताती है, Wilson की पांडुलिपियों में सात हज़ार से कम मिले, और समीक्षित संस्करण में 5,707 हैं।
अठारह महापुराण: नाम और क्रम
अठारह महापुराणों की जो सूची सबसे अधिक मानी जाती है, वह विष्णु पुराण के तीसरे अंश में है। पराशर पहले कहते हैं कि सब पुराणों में पहला ब्राह्म पुराण है, और फिर अठारहों के नाम क्रम से गिनाते हैं। इस ज्ञानकोश के अठारह पुराण-पृष्ठ इसी सूची और इसी क्रम में हैं। भागवत पुराण (12.7.23–24) भी यही अठारह नाम देता है, बस क्रम थोड़ा अलग है, और उसमें भी चौथा नाम "शैव" है।
सूची में हर पुराण को उसके रूप में गिना गया है: "ब्राह्मं" यानी ब्रह्म का, "पाद्मं" पद्म का, "वैष्णवं" विष्णु का, "शैवं" शिव का, "आग्नेयं" अग्नि का, "लैङ्गं" लिंग का, "स्कान्दं" स्कंद का, "मात्स्यं" मत्स्य का, "गारुडं" गरुड़ का। इसलिए "विष्णु पुराण" का पुराना नाम "वैष्णव पुराण" और "गरुड़ पुराण" का "गारुड" है। भागवत के एक श्लोक में गरुड़ पुराण को "सौपर्ण" भी कहा गया है, क्योंकि गरुड़ का एक नाम सुपर्ण है।
ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा । तथान्यं नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्तमम् ॥ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव और भागवत; फिर नारदीय, और सातवाँ मार्कण्डेय। (आगे के श्लोक आठवें आग्नेय से अठारहवें ब्रह्माण्ड तक गिनाते हैं।)
| क्रम | पुराण | भागवत 12.13 के अनुसार श्लोक | मत्स्य 53 के अनुसार श्लोक | मत्स्य 53 का परिचय | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | ब्राह्म | 10,000 | 13,000 | ब्रह्मा ने मरीचि को सुनाया | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.12–13 |
| 2 | पाद्म | 55,000 | 55,000 | जब जगत सोने के कमल के रूप में था, उसका वृत्तांत | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.14 |
| 3 | वैष्णव (विष्णु) | 23,000 | 23,000 | पराशर ने वाराह कल्प के प्रसंग से सारे धर्म कहे | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.16–17 |
| 4 | शैव / वायवीय | 24,000 (शैव) | 24,000 (वायवीय) | वायु ने श्वेत कल्प के प्रसंग से धर्म कहे, रुद्र-माहात्म्य सहित | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.18 |
| 5 | भागवत | 18,000 | 18,000 | गायत्री से आरंभ, वृत्रासुर-वध सहित; सारस्वत कल्प | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.20–22 |
| 6 | नारदीय | 25,000 | 25,000 | नारद ने बृहत् कल्प के आश्रय से धर्म कहे | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.23 |
| 7 | मार्कण्डेय | 9,000 | 9,000 | पक्षियों के माध्यम से धर्म-अधर्म का विचार; मार्कण्डेय ने कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.25–26 |
| 8 | आग्नेय | 15,400 | 16,000 | अग्नि ने ईशान कल्प के प्रसंग से वसिष्ठ को कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.28–30 |
| 9 | भविष्य | 14,500 | 14,500 | ब्रह्मा ने मनु को आदित्य-माहात्म्य कहा; भविष्य का चरित | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.31–32 |
| 10 | ब्रह्मवैवर्त | 18,000 | 18,000 | सावर्णि ने नारद को रथन्तर कल्प में कृष्ण-माहात्म्य कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.34–35 |
| 11 | लैङ्ग | 11,000 | 11,000 | अग्नि-लिंग के बीच स्थित महेश्वर ने कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.37–38 |
| 12 | वाराह | 24,000 | 24,000 | विष्णु ने पृथ्वी को महावराह का माहात्म्य कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.39–40 |
| 13 | स्कान्द | 81,100 | 81,100 | षण्मुख ने तत्पुरुष कल्प में माहेश्वर धर्म कहे | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.42–43 |
| 14 | वामन | 10,000 | 10,000 | ब्रह्मा ने त्रिविक्रम का माहात्म्य कहा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.45–46 |
| 15 | कौर्म | 17,000 | 18,000 | कूर्म-रूपी जनार्दन ने इन्द्रद्युम्न-प्रसंग में धर्म कहे | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.47–48 |
| 16 | मात्स्य | 14,000 | 14,000 | मत्स्य-रूप भगवान ने मनु को, नरसिंह-वर्णन सहित | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.50–51 |
| 17 | गारुड | 19,000 | 19,000 | कृष्ण ने गरुड़ कल्प में गरुड़ की उत्पत्ति कही | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.53–54 |
| 18 | ब्रह्माण्ड | 12,000 | 12,200 | ब्रह्मा ने ब्रह्मांड-माहात्म्य और भविष्य के कल्प कहे | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4–8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.55–56 |
सूचियों में भिन्नता: शिव या वायु? भागवत या देवी भागवत?
यह जानना ज़रूरी है कि अठारह महापुराणों की हर पुरानी सूची एक जैसी नहीं है। सबसे बड़ा अंतर चौथे पुराण का है। विष्णु पुराण और भागवत चौथा पुराण "शैव" बताते हैं, पर मत्स्य पुराण (53.18) उस स्थान पर "वायवीय" पुराण रखता है: वह पुराण जिसमें वायु ने श्वेत कल्प के प्रसंग से धर्म कहे, जिसमें रुद्र का माहात्म्य है, और जिसके 24,000 श्लोक हैं। मत्स्य पुराण की सूची में "शैव" नाम आता ही नहीं।
Wilson ने 1840 में ही इस पर ध्यान दिलाया था। वे लिखते हैं कि जिन सूचियों में शिव पुराण है, उनमें वायु पुराण नहीं है, और जिनमें वायु है, उनमें शिव नहीं। मत्स्य वायवीय पुराण को रुद्र-माहात्म्य वाला बताता है, और भागवत तथा मत्स्य दोनों उसकी संख्या 24,000 ही बताते हैं। इसलिए Wilson का अनुमान था कि दोनों सूचियाँ एक ही ग्रंथ को दो नामों से गिन रही हैं। साथ ही उन्होंने बताया कि उन्हें मिली शिव पुराण की प्रति में लगभग सात हज़ार ही श्लोक थे। आज छपे शिव पुराण और वायु पुराण, दोनों अलग ग्रंथों के रूप में मिलते हैं। इस ज्ञानकोश में मुख्य सूची विष्णु पुराण वाली है, इसलिए शिव पुराण का अलग पृष्ठ है, और वायु पुराण की चर्चा "महापुराणों की अलग-अलग सूचियाँ" लेख में है।
दूसरा अंतर भागवत का है। मत्स्य पुराण (53.20) भागवत की पहचान ऐसे देता है: "जिसमें गायत्री को आधार बनाकर धर्म का विस्तार हो, और जिसमें वृत्रासुर-वध हो, वह भागवत कहलाता है।" इसी पहचान को लेकर सदियों से बहस रही है। Wilson लिखते हैं कि कुछ लोगों का मत था कि "भागवत" नाम श्रीमद्भागवत का नहीं, देवी भागवत का है, और इस पर दोनों पक्षों में अलग-अलग ग्रंथ लिखे गए। वैष्णव परंपरा श्रीमद्भागवत को महापुराण मानती है, और देवी की उपासक परंपराएँ देवी भागवत को। ये दो अलग ग्रंथ हैं: श्रीमद्भागवत के बारह स्कंधों का केंद्र कृष्ण और भक्ति है, और देवी भागवत का केंद्र देवी। इस ज्ञानकोश की मुख्य सूची में श्रीमद्भागवत महापुराण है; देवी भागवत की चर्चा सूचियों वाले लेख में है, और दोनों को कहीं मिलाया नहीं गया।
श्वेतकल्पप्रसङ्गेन धर्मान्वायुरिहाब्रवीत् । यत्र तद्वायवीयं स्याद्रुद्रमाहात्म्यसंयुतम् ॥जिसमें वायु ने श्वेत कल्प के प्रसंग से धर्म कहे, और जो रुद्र के माहात्म्य से युक्त है, वह वायवीय पुराण है।
पुराण के लक्षण: पाँच या दस?
पुराण की सबसे पुरानी परिभाषा "पंचलक्षण" की है, यानी जिसमें पाँच विषय हों। विष्णु पुराण (3.6.24) कहता है कि सब पुराणों में सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित कहे जाते हैं। सर्ग का अर्थ है सृष्टि, प्रतिसर्ग का प्रलय और फिर से सृष्टि, वंश का देवताओं और ऋषियों की वंशावली, मन्वन्तर का मनुओं के काल, और वंशानुचरित का राजवंशों के चरित।
भागवत पुराण एक बड़ी परिभाषा देता है: दस लक्षण। सर्ग, विसर्ग, वृत्ति (जीवों की जीविका), रक्षा (युग-युग में अवतारों द्वारा), अन्तर (मन्वन्तर), वंश, वंशानुचरित, संस्था (प्रलय), हेतु (जीव, जो सृष्टि का कारण बनता है) और अपाश्रय (ब्रह्म, जो सबका आधार है)। फिर भागवत स्वयं कहता है: "कुछ लोग बड़े और छोटे पुराण के भेद से पाँच लक्षण कहते हैं।" यानी पाँच और दस में झगड़ा नहीं; छोटे पुराण के लिए पाँच, बड़े के लिए दस।
एक बात ईमानदारी से कहनी ज़रूरी है: आज उपलब्ध हर महापुराण इन लक्षणों को एक जैसे अनुपात में नहीं निभाता। विष्णु पुराण का ढाँचा पंचलक्षण के बहुत क़रीब है, पर कई पुराणों में तीर्थ-माहात्म्य, व्रत, पूजा-विधि, स्तोत्र, यहाँ तक कि व्याकरण और आयुर्वेद जैसे विषय बहुत बड़ा भाग घेरते हैं। इसलिए हर पुराण के पृष्ठ पर बताया गया है कि उसमें कौन-से लक्षण सच में कितने हैं। पूरी चर्चा "पंचलक्षण" लेख में है।
महापुराण और उपपुराण
अठारह महापुराणों के अलावा "उपपुराण" भी हैं, यानी छोटे या सहायक पुराण। मत्स्य पुराण अठारहों का वर्णन पूरा करके कहता है: "अब मैं उनके उपभेद बताता हूँ, जो लोक में प्रतिष्ठित हैं", और पहला नाम नरसिंह पुराण का लेता है, जिसके 18,000 श्लोक हैं। विष्णु पुराण की कुछ पांडुलिपियों में भी अठारह के बाद पंक्ति आती है: "ये अठारह महापुराण हैं, और मुनियों ने उपपुराण भी कहे हैं।"
यहाँ एक बारीक, पर रोचक बात है। विष्णु पुराण के समीक्षित संस्करण ने यह "महापुराण… उपपुराण" वाली पंक्ति मूल पाठ में नहीं, बाद में जोड़ी गई पंक्तियों में रखी है, क्योंकि वह सब पांडुलिपियों में नहीं मिलती। यानी "महापुराण" और "उपपुराण" का भेद पुराणों के पुराने स्तर में उतना पक्का नहीं था जितना बाद में बना। उपपुराणों की गिनती और नाम अलग-अलग सूचियों में अलग हैं; इसकी पूरी चर्चा "महापुराण और उपपुराण" लेख में है।
पुराणों में क्या-क्या मिलता है
पुराणों का संसार बहुत बड़ा है, और मोटे तौर पर उसके पाँच बड़े क्षेत्र हैं। पहला, सृष्टि और काल: कल्प, मन्वन्तर, चार युग, प्रलय, और ब्रह्मांड के द्वीप, समुद्र और लोक। दूसरा, वंश और इतिहास: सूर्य और चंद्र वंश, ऋषियों की वंशावलियाँ, और कलियुग के राजाओं की सूचियाँ। तीसरा, अवतार और देवता: विष्णु के अवतार, शिव और देवी की कथाएँ, गणेश और स्कंद। चौथा, भक्ति और धर्म: ध्रुव, प्रह्लाद जैसे भक्तों की कथाएँ, वर्णाश्रम, संस्कार, श्राद्ध, व्रत और दान। और पाँचवाँ, तीर्थ: नदियों, क्षेत्रों और मंदिरों के माहात्म्य।
मत्स्य पुराण के वर्णन से दिखता है कि हर पुराण का अपना केंद्र है। कोई किसी कल्प की कथा से जुड़ा है, कोई किसी विशेष वक्ता से: अग्नि पुराण अग्नि ने वसिष्ठ को सुनाया, वराह पुराण विष्णु ने पृथ्वी को, स्कंद पुराण षण्मुख (कार्तिकेय) ने कहा, और मत्स्य पुराण स्वयं मत्स्य-रूप भगवान ने मनु को। ऊपर की तालिका में अठारहों का यह परिचय दिया गया है।
पुराणों का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव
आज के हिंदू जीवन का बहुत बड़ा भाग पुराणों से आता है। व्रत और त्योहारों की कथाएँ, तीर्थों की महिमा, मंदिरों में पूजे जाने वाले देवताओं के रूप, श्राद्ध की विधि, और रामायण-महाभारत के बाहर की लगभग सारी लोकप्रिय कथाएँ, जैसे समुद्र-मंथन, ध्रुव, प्रह्लाद, वामन और गंगावतरण, पुराणों की देन हैं। कलियुग में नाम-कीर्तन को सबसे सरल साधन बताने वाला विचार भी विष्णु पुराण जैसे ग्रंथों से आया, जिस पर आगे पूरी संत-परंपरा खड़ी हुई।
पुराणों को पढ़ते समय दो बातें साथ रखें। एक, वे आस्था और परंपरा के ग्रंथ हैं, उनकी कथाओं में गहरी नैतिक और आध्यात्मिक सीख है, और उन्हें उसी आदर से पढ़ना चाहिए। दो, वे सदियों में बढ़े और बदले हैं, इसलिए उनके हर अंश को एक ही समय का, या आधुनिक इतिहास और विज्ञान की तरह, पढ़ना ठीक नहीं। इस ज्ञानकोश के हर पुराण-पृष्ठ पर यही संतुलन रखने का प्रयास है।
अठारह महापुराण
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- महापुराण और उपपुराण — अठारह महापुराणों के अलावा जो पुराण गिनाए जाते हैं, वे कहाँ से आए: मत्स्य के चार "उपभेद", कूर्म और गरुड़ के कथन, उपपुराणों की अलग-अलग सूचियाँ और "भागवत या भार्गव" की बहस
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- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- वेद व्यास — पुराणों के संकलनकर्ता
- महर्षि पराशर — विष्णु पुराण के वक्ता
- महान भक्त ज्ञानकोश — पुराणों के भक्तों की कथाएँ
- दुर्गा सप्तशती — मार्कण्डेय पुराण का देवी-माहात्म्य
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.24, 3.6.16–19, अंश 1–6 (स्वयं गिनती), 3.6.20–23, 3.6.21–23, 3.6.21, अंश 1–6, 3.6.23*8 (प्रक्षिप्त पंक्ति), 3.6.23*8, 1.9, 1.11–12, 1.16–20, 6.2.17
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.4, 53.9–11, 53.12–13, 53.14, 53.16–17, 53.18, 53.20–22, 53.23, 53.25–26, 53.28–30, 53.31–32, 53.34–35, 53.37–38, 53.39–40, 53.42–43, 53.45–46, 53.47–48, 53.50–51, 53.53–54, 53.55–56, 53.18–19, 53.20–21, 53.59–60, 53.12–57, 53.28, 53.39, 53.42, 53.50, 53.9
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, p. xxxv, Preface, pp. xxxv–xxxvi, Preface, pp. xlvi–xlvii, Preface
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.7.23–24, 12.13.8, 12.13.4–8, 12.7.23, 12.13.4, 12.7.9–10
