मत्स्य पुराण क्या है?
मत्स्य पुराण का नाम उसके वक्ता से है। भगवान विष्णु ने मत्स्य यानी मछली का रूप लिया, प्रलय के समुद्र में राजा मनु की नाव को अपने सींग से बाँधकर खींचा, और उसी यात्रा में मनु के प्रश्नों के उत्तर में जो कहा, वही यह पुराण है। मूल पाठ स्वयं कहता है: "मत्स्य-रूपी भगवान ने मनु के पूछने पर जो पुराण कहा, वह अब मैं कहता हूँ, हे श्रेष्ठ ऋषियो, सुनिए।" यानी पूरा पुराण एक बहती हुई नाव पर हुआ संवाद है।
अठारह महापुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में मत्स्य सोलहवाँ है, कूर्म के बाद और गरुड़ से पहले। पुराण अपने अध्याय 53 में अपना परिचय भी देता है: जिसमें कल्प के आरंभ में श्रुतियों की प्रवृत्ति के लिए जनार्दन ने मत्स्य-रूप से मनु को नरसिंह का वर्णन और सात कल्पों का वृत्तांत कहा, उसे "मात्स्य" जानो, जिसमें चौदह हज़ार श्लोक हैं। भागवत पुराण भी इसकी संख्या चौदह हज़ार ही बताता है।
मत्स्य पुराण की सबसे बड़ी पहचान उसका फैलाव है। कथाएँ तो इसमें हैं ही: मत्स्य अवतार, ययाति और देवयानी, त्रिपुर-दाह, तारकासुर और कुमार का जन्म, नरसिंह, सावित्री-सत्यवान। पर इसके साथ इसमें पितरों के वंश और श्राद्ध की पूरी विधि, साठ से अधिक व्रत, तीर्थों की महिमा, ऋषियों के गोत्र और प्रवर की लंबी सूचियाँ, राजा के कर्तव्य, शकुन और स्वप्न, घर और मंदिर बनाने के नियम, मूर्तियों के माप और सोलह महादान भी हैं। एक तरह से यह गृहस्थ और राजा, दोनों के लिए एक संपूर्ण धर्म-ग्रंथ है।
मत्स्य अवतार की कथा: जैसी पुराण में है
प्राचीन काल में मनु नाम के एक राजा थे, सूर्य के पुत्र, क्षमाशील और वीर। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य सौंपा और मलय पर्वत के एक भाग में जाकर तप करने लगे। सुख-दुख में समान रहकर उन्होंने उत्तम योग प्राप्त किया। लंबे तप के बाद कमल पर बैठने वाले ब्रह्मा प्रसन्न हुए और बोले, "वर माँगो।" मनु ने एक ही वर माँगा: जब प्रलय आए, तब मैं सारे चर-अचर प्राणियों की रक्षा करने में समर्थ हो सकूँ। ब्रह्मा "ऐसा ही हो" कहकर अंतर्धान हो गए, और आकाश से फूलों की वर्षा हुई।
एक दिन मनु अपने आश्रम में पितरों का तर्पण कर रहे थे, तभी उनकी अंजलि के जल में एक छोटी-सी मछली आ गिरी। दयालु राजा ने उसे बचाने के लिए अपने कमंडलु में रख लिया। एक ही दिन-रात में वह सोलह अंगुल की हो गई और बोली, "मेरी रक्षा करो, रक्षा करो।" मनु ने उसे एक बड़े जल-पात्र में डाला, वहाँ एक रात में वह तीन हाथ की हो गई। फिर कुएँ में, फिर सरोवर में, जहाँ वह एक योजन तक फैल गई। फिर गंगा में, और अंत में समुद्र में। और जब वह पूरे समुद्र में फैल गई, तब मनु डर गए।
मनु ने कहा: "आप कोई असुरों के स्वामी हैं, या स्वयं वासुदेव हैं? और कौन ऐसा हो सकता है? किसका शरीर बीस अयुत योजन का हो सकता है? मैंने पहचान लिया, आप मत्स्य-रूप में केशव हैं, मुझे परख रहे हैं। हृषीकेश, जगन्नाथ, आपको नमस्कार।" भगवान ने कहा, "साधु, साधु, तुमने ठीक पहचाना।" फिर उन्होंने बताया कि थोड़े ही समय में पर्वतों और वनों सहित पूरी पृथ्वी जल में डूब जाएगी। सब देवताओं ने मिलकर एक नाव बनाई है; उसमें पसीने से, अंडे से, बीज से और गर्भ से जन्मे सब प्राणियों को रख लेना, और जब प्रलय की हवा नाव को थपेड़े दे, तब उसे मेरे इस सींग से बाँध देना।
भगवान ने प्रलय का पूरा क्रम भी बताया, और यह वर्णन बहुत कम लोग जानते हैं। पहले सौ वर्ष से अधिक समय तक धरती पर वर्षा नहीं होगी और भयानक अकाल पड़ेगा। फिर सूर्य की सात दारुण किरणें अंगारे बरसाएँगी। पाताल से संकर्षण (शेष) के मुख से विष की आग निकलेगी, और शिव के ललाट के तीसरे नेत्र की आग भी तीनों लोकों को जलाएगी। जब पृथ्वी राख जैसी हो जाएगी, तब संवर्त, भीमनाद, द्रोण, चंड, बलाहक, विद्युत्पताक और शोण नाम के सात प्रलय-मेघ बरसेंगे, और सब समुद्र मिलकर एक हो जाएँगे। यह प्रलय चाक्षुष मन्वन्तर के अंत का है।
उस एकार्णव में कौन बचेगा, यह भी भगवान ने गिनाया: चंद्रमा और सूर्य, स्वयं वे, चार लोकों सहित ब्रह्मा, पवित्र नर्मदा नदी, महर्षि मार्कण्डेय, शिव, वेद और विद्याओं सहित पुराण। "ये सब तुम्हारे साथ रहेंगे, और तुम्हारी सृष्टि के आरंभ में मैं वेदों को फिर प्रवृत्त करूँगा।" मनु योग का अभ्यास करते रहे। समय आने पर सींग वाली मछली प्रकट हुई, एक सर्प रस्सी बनकर मनु के पास आया, और मनु ने सब प्राणियों को योग-बल से नाव में चढ़ाकर उस सर्प-रस्सी से नाव को मत्स्य के सींग से बाँध दिया। फिर नाव पर बैठकर उन्होंने भगवान को प्रणाम किया, और प्रश्न पूछने लगे।
नौरियं सर्वदेवानां निकायेन विनिर्मिता । महाजीवनिकायस्य रक्षणार्थं महीपते ॥हे राजन, यह नाव सब देवताओं के समूह ने मिलकर बनाई है, प्राणियों के इस महान समूह की रक्षा के लिए।
नर्मदा च नदी पुण्या मार्कण्डेयो महानृषिः । भवो वेदाः पुराणानि विद्याभिः सर्वतोवृतम् ॥पवित्र नर्मदा नदी, महर्षि मार्कण्डेय, शिव, वेद, और सब विद्याओं से घिरे पुराण (प्रलय में भी बचे रहेंगे)।
मनु के प्रश्न: पूरे पुराण का नक़्शा
नाव पर बैठे मनु ने जो पूछा, वह इस पुराण की विषय-सूची ही है। उन्होंने कहा: सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय, वंश और मन्वन्तर, वंशों के चरित्र, भुवन का विस्तार, दान-धर्म की विधि, शाश्वत श्राद्ध-कल्प, वर्ण और आश्रम का विभाग, इष्टापूर्त (यज्ञ और जनहित के काम, जैसे कुआँ-तालाब), देवताओं की प्रतिष्ठा, और पृथ्वी पर जो कुछ भी है, वह सब विस्तार से समझाइए। आगे के 289 अध्याय इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हैं।
इस सूची पर ध्यान दें: पुराण के पाँच पारंपरिक विषय (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित) तो इसमें हैं ही, पर मनु उससे आगे पूछते हैं: दान, श्राद्ध, वर्णाश्रम, कुएँ-तालाब-बगीचे बनवाना, मंदिरों में मूर्तियों की प्रतिष्ठा। यानी मत्स्य पुराण शुरू से ही कथा के साथ "करने" का शास्त्र भी बनना चाहता है। यही कारण है कि इसमें व्रतों, दानों और निर्माण-विधियों के इतने अध्याय हैं।
ऋषियों का पहला प्रश्न भी ध्यान देने योग्य है। अध्याय 1 में शौनक आदि ऋषि सूत से तीन बातें पूछते हैं: भगवान ने मछली का रूप क्यों लिया, महादेव भैरव और त्रिपुरारि कैसे बने, और वे भिक्षु क्यों बने। यानी पुराण आरंभ में ही विष्णु और शिव दोनों की कथाएँ एक साथ जोड़ता है, और आगे भी दोनों बराबर चलती हैं।
दानधर्मविधिं चैव श्राद्धकल्पं च शाश्वतम् । वर्णाश्रमविभागं च तथेष्टापूर्तसंज्ञितम् ॥(मनु ने पूछा:) दान-धर्म की विधि, शाश्वत श्राद्ध-कल्प, वर्ण और आश्रम का विभाग, और जिन्हें इष्ट और पूर्त कहते हैं (वे यज्ञ और जनहित के कर्म भी समझाइए)।
संरचना: 291 अध्याय
मत्स्य पुराण का पूरा अंग्रेज़ी अनुवाद "Sacred Books of the Hindus" शृंखला में दो भागों में छपा (1916 और 1917)। उसमें 291 अध्याय हैं। अंतिम अध्याय में सूत स्वयं पूरे पुराण की अनुक्रमणिका सुनाते हैं, मनु-मत्स्य संवाद से लेकर कल्पों के नाम तक, और कहते हैं कि यह पुराण "सब शास्त्रों का मुकुट" है। GRETIL पर मूल संस्कृत का जो इलेक्ट्रॉनिक पाठ है, वह केवल अध्याय 1 से 176 तक का है।
नीचे की तालिका अनुवाद के अध्याय-शीर्षकों और पुराण की अपनी अनुक्रमणिका से बनी है। विषयों के क्रम में एक बात दिखती है: पहले आधे में सृष्टि, पितर, वंश और व्रत-दान हैं; दूसरे आधे में बड़ी देव-कथाएँ, तीर्थ, गोत्र, राजधर्म, शिल्प और महादान। Wilson ने भी इसका यही क्रम बताया था।
| अध्याय | विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| 1–2 | मत्स्य और मनु, प्रलय का क्रम, नाव, मनु के प्रश्न | मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 1–2 |
| 3–12 | ब्रह्मा की सृष्टि, शतरूपा, दक्ष की कन्याएँ, कश्यप-वंश, मरुतों का जन्म, वेन और पृथु, सूर्य-वंश, इला और बुध | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 3–12 |
| 13–22 | पितरों के वंश (वैराज, अग्निष्वात्त, बर्हिषद), श्राद्ध-विधि, सपिंडीकरण, श्राद्ध के तीर्थ | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 13–22 |
| 23–52 | चंद्रमा, बुध, पुरूरवा; ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा; कार्तवीर्य; वृष्णि-वंश, स्यमंतक मणि, कृष्ण-जन्म; पुरु-वंश; अग्नि-वंश | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 23–52 |
| 53 | अठारह पुराणों की सूची, उनकी श्लोक-संख्या और पुराण-दान | मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53 |
| 54–101 | व्रत (तृतीया, सप्तमी, द्वादशी, शिवचतुर्दशी आदि), तालाब और वृक्ष-प्रतिष्ठा, दस पर्वत-दान, नवग्रह-शांति, साठ व्रत | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 54–101 |
| 102–112 | स्नान-विधि, प्रयाग-माहात्म्य (मार्कण्डेय-युधिष्ठिर संवाद) | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 102–112 |
| 113–128 | भुवन-कोश: द्वीप, भारतवर्ष, हिमालय पर पुरूरवा, सूर्य-चंद्र और ग्रहों के रथ, ध्रुव | मत्स्य पुराण, भाग 1 (SBH अनु.), ch. 113–128 |
| 129–145 | त्रिपुर-दाह; युगों का माप, त्रेता में यज्ञ का आरंभ, मन्वन्तर | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 129–145 |
| 146–160 | तारकासुर, पार्वती का तप और विवाह, काम-दहन, कुमार कार्तिकेय का जन्म और तारक-वध | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 146–160 |
| 161–179 | नरसिंह; प्रलय और कमल से सृष्टि, मधु-कैटभ; कालनेमि; अंधक-वध और मातृकाएँ | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 161–179 |
| 180–194 | अविमुक्त (वाराणसी) और नर्मदा-माहात्म्य, ओंकारेश्वर | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 180–194 |
| 195–207 | भृगु, अंगिरा, अत्रि, कश्यप, वसिष्ठ, अगस्त्य के गोत्र-प्रवर; गो-दान, कृष्णाजिन-दान, वृषोत्सर्ग | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 195–207 |
| 208–214 | पतिव्रता-माहात्म्य: सावित्री और सत्यवान | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 208–214 |
| 215–243 | राजधर्म, दुर्ग, साम-दान-भेद-दंड, दंड-विधान, गर्ग के उत्पात, ग्रह-यज्ञ, युद्ध-यात्रा, शकुन और स्वप्न | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 215–243 |
| 244–251 | बलि और वामन, वराह, समुद्र-मंथन, शिव का विष-पान, धन्वंतरि | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 244–251 |
| 252–270 | वास्तु, गृह-निर्माण, कर्मयोग, प्रतिमा-लक्षण, पीठ, लिंग, प्रतिष्ठा, मंदिर और मंडप | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 252–270 |
| 271–273 | कलियुग के भावी राजवंश | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 271–273 |
| 274–291 | सोलह महादान; कल्पों के नाम; पुराण की अनुक्रमणिका | मत्स्य पुराण (SBH अनु.), ch. 274–291 |
सृष्टि और पितर: मत्स्य पुराण की विशेष देन
सृष्टि वाले अध्यायों में मनु पूछते हैं कि ब्रह्मा चार मुख वाले कैसे हुए। उत्तर में ब्रह्मा से वेदों की उत्पत्ति, मरीचि आदि दस मानस पुत्र, दक्ष और फिर शतरूपा का प्रसंग आता है। अगले अध्यायों में दक्ष की साठ कन्याओं का धर्म, कश्यप आदि से विवाह, दिति का मदन-द्वादशी व्रत और इंद्र द्वारा उसके गर्भ के उनचास टुकड़े, जिनसे मरुत बने, वेन के शरीर-मंथन से पृथु का जन्म और पृथ्वी-दोहन, और सूर्य की पत्नी संज्ञा और छाया की कथा आती है।
पर मत्स्य पुराण का सबसे अलग योगदान पितरों का वर्णन है। Wilson ने भी लिखा कि इसके कुछ विवरण "विशेष" हैं, ख़ासकर पितरों से जुड़े। पुराण पितरों के अलग-अलग गण बताता है: वैराज, अग्निष्वात्त, बर्हिषद, और राजाओं के पितर। हर गण की "मानसी कन्या" की कथा भी है। वैराज पितरों की कन्या मेना हिमालय की पत्नी बनीं, जिनसे उमा, एकपर्णा और अपर्णा जन्मीं।
अग्निष्वात्त पितरों की कन्या अच्छोदा की कथा तो महाभारत के पूरे वंश से जुड़ जाती है। उसने एक हज़ार दिव्य वर्ष तप किया, पर जब पितर वर देने आए, तो वह मोहित होकर अपने तप से गिर गई। पितरों ने कहा: तुम मनुष्य-लोक में राजा वसु की पुत्री बनोगी, पराशर से तुम्हें बादरायण (व्यास) नाम का पुत्र मिलेगा जो एक वेद को कई भागों में बाँटेगा, और तुम शांतनु के घर चित्रांगद और विचित्रवीर्य की माता बनोगी; पृथ्वी पर तुम्हारा नाम सत्यवती होगा। इसी तरह बर्हिषद पितरों की कन्या पीवरी को शुकदेव की पत्नी होने का वर मिला।
इसके बाद श्राद्ध का पूरा शास्त्र आता है: श्राद्ध किस दिन और कैसे हो, किन ब्राह्मणों को बुलाया जाए और किन्हें नहीं, पिंड किसे दिए जाएँ, कौन-से अन्न पितरों को प्रिय हैं, चारों वर्णों का आशौच (सूतक), पहले दिन से सपिंडीकरण तक के कर्तव्य, और श्राद्ध के तीर्थ। Wilson ने बताया कि पितरों और श्राद्ध वाले ये अध्याय पद्म पुराण के सृष्टि-खंड से लगभग शब्दशः मिलते हैं।
राजवंश: इला से ययाति और कृष्ण तक
सूर्य-वंश में वैवस्वत मनु के दस पुत्र बताए गए हैं, इक्ष्वाकु आदि। उनमें इला शिव के उपवन में पहुँचकर उनके शाप से स्त्री बन गए। वन में घूमते चंद्रमा के पुत्र बुध ने उन्हें देखा और विवाह किया। इला के भाइयों ने वसिष्ठ से कारण जानकर शिव को प्रसन्न किया, और शिव के कहने पर इक्ष्वाकु ने अश्वमेध किया, जिससे इला "किंपुरुष" बने: एक मास स्त्री, एक मास पुरुष। बुध के घर रहते हुए इला से पुरूरवा जन्मे, जिनसे चंद्र-वंश आगे बढ़ा।
चंद्र-वंश में ययाति की कथा मत्स्य पुराण में सबसे विस्तार से है, लगभग बीस अध्यायों में। पहले कच की कथा: देवताओं के भेजे कच शुक्राचार्य से मृत-संजीवनी विद्या सीखने गए। फिर शुक्र की पुत्री देवयानी और असुर-राज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा का झगड़ा, शर्मिष्ठा का देवयानी को कुएँ में धकेलना, राजा ययाति का उसे निकालना, और शर्मिष्ठा का देवयानी की दासी बनना। फिर देवयानी से यदु और तुर्वसु, शर्मिष्ठा से पुरु; शुक्र के शाप से ययाति को बुढ़ापा, और पुरु का अपने पिता का बुढ़ापा अपने ऊपर ले लेना।
ययाति की कथा का दूसरा भाग कम सुना गया है, पर बहुत गहरा है। ययाति स्वर्ग जाते हैं, अपने पुण्य का बखान करने पर नीचे गिरते हैं, और गिरते हुए राजर्षि अष्टक से मिलते हैं। दोनों के बीच लंबा संवाद है: चारों आश्रमों के धर्म, मुनि के लक्षण, स्वर्ग के लोक। अष्टक और दूसरे राजा अपना पुण्य ययाति को देना चाहते हैं, पर ययाति दूसरों के दिए पुण्य से स्वर्ग जाने से मना कर देते हैं। अंत में वे राजा वसुमान आदि के साथ फिर स्वर्ग जाते हैं।
आगे यदु-वंश: कार्तवीर्य अर्जुन का दत्तात्रेय से चार वर माँगना और सहस्र भुजाओं से समुद्र को शांत करना; वृष्णि-वंश, स्यमंतक मणि और सत्यभामा से कृष्ण का विवाह; कृष्ण का जन्म और उनकी पत्नियों और पुत्रों के नाम। फिर पुरु-वंश, बृहस्पति से भरद्वाज का जन्म, और अग्नि का वंश, यानी अग्नि के अलग-अलग नाम। Wilson के अनुसार ये वंशावलियाँ बहुत हद तक विष्णु पुराण जैसी ही हैं।
अध्याय 53: पुराणों का पुराण-परिचय
अठारह पुराणों की, हर पुराण के परिचय सहित, एक प्रसिद्ध सूची मत्स्य पुराण के अध्याय 53 में है; Wilson जैसे विद्वानों ने पुराणों की श्लोक-संख्या पर बात करते समय इसी का हवाला दिया। हर पुराण के बारे में यह बताता है कि उसे किसने किसको, किस कल्प के प्रसंग में कहा, उसमें कितने श्लोक हैं, और उसकी प्रति किस पर्व पर किस वस्तु के साथ दान करनी चाहिए। अपने बारे में यह कहता है: जो विषुव (संक्रांति) के दिन सोने की मछली और दूध देने वाली गाय के साथ मत्स्य पुराण दान करता है, वह मानो पूरी पृथ्वी दान कर देता है।
इसी अध्याय में यह भी है कि पुराणों में किस देवता की महिमा अधिक है: सात्त्विक पुराणों में हरि की, राजस में ब्रह्मा की, तामस में अग्नि और शिव की, और "संकीर्ण" (मिले-जुले) पुराणों में सरस्वती और पितरों की। ध्यान दें कि यहाँ किसी एक देवता को छोटा नहीं कहा गया, केवल यह बताया गया है कि किस वर्ग के पुराण में किसका वर्णन अधिक है। फिर यह कहता है कि महाभारत एक लाख श्लोकों में वेद के अर्थ का विस्तार है, और वाल्मीकि का रामोपाख्यान धर्म, अर्थ और काम का साधन है।
पुराण अपना काम भी साफ़ करता है। अध्याय 53 कहता है कि सब पुराणों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन है, और ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और रुद्र की महिमा भी। और अठारह के अलावा जो दूसरे पुराण (उपपुराण) बताए जाते हैं, उन्हें "इन्हीं से निकला" समझना चाहिए। पुराणों की पूरी सूची और श्लोक-संख्या की तालिका पुराण कोश पृष्ठ पर दी गई है।
सात्त्विकेषु पुराणेषु माहात्म्यमधिकं हरेः । राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणो विदुः ॥ तद्वदग्नेश्च माहात्म्यं तामसेषु शिवस्य च । संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणां च निगद्यते ॥सात्त्विक पुराणों में हरि की महिमा अधिक है, राजस में ब्रह्मा की। उसी तरह तामस पुराणों में अग्नि और शिव की महिमा है, और संकीर्ण पुराणों में सरस्वती और पितरों की।
श्रुतीनां यत्र कल्पादौ प्रवृत्त्यर्थं जनार्दनः । मत्स्यरूपेण मनवे नरसिंहोपवर्णनम् ॥ अधिकृत्याब्रवीत्सप्तकल्पवृत्तं मुनीश्वराः । तन्मात्स्यमिति जानीध्वं सहस्राणि चतुर्दश ॥हे मुनिश्रेष्ठो, जिसमें कल्प के आरंभ में श्रुतियों की प्रवृत्ति के लिए जनार्दन ने मत्स्य-रूप से मनु को नरसिंह-वर्णन को आधार बनाकर सात कल्पों का वृत्तांत कहा, उसे मात्स्य जानो; उसमें चौदह हज़ार श्लोक हैं।
व्रत, दान और जनहित के काम
अध्याय 54 से 101 तक मत्स्य पुराण व्रतों का बड़ा भंडार है। आरंभ में कहा गया है कि ये व्रत महादेव और नारद के संवाद में कहे गए: कैलास पर बैठे शिव से नारद ने पूछा कि स्त्री हो या पुरुष, कौन-सा व्रत आरोग्य, सौभाग्य और अंत में मुक्ति देता है। पुराण की अपनी अनुक्रमणिका इनके नाम गिनाती है: नक्षत्र-पुरुष व्रत, आदित्य-शयन, कृष्णाष्टमी, रोहिणी-चंद्र-शयन, सौभाग्य-शयन, अगस्त्य-पूजा, अनंत-तृतीया, रस-कल्याणिनी तृतीया, आर्द्रानंदकरी, सारस्वत व्रत, भीम-द्वादशी, अनंग-दान, अंगारक व्रत, सात सप्तमियाँ (कल्याण, विशोक, फल, शर्करा आदि), विशोक-द्वादशी, शिवचतुर्दशी, सर्वफल-त्याग, रविवार व्रत, संक्रांति व्रत, विभूति-द्वादशी, और अंत में "साठ व्रत" का एक पूरा अध्याय।
इन व्रतों के बीच दो अध्याय गृहस्थ के जनहित-कर्म पर हैं, और ये मनु के "इष्टापूर्त" वाले प्रश्न का उत्तर हैं। अध्याय 58 में मनु पूछते हैं कि तालाब, बगीचे, कुएँ, बावड़ी, कमल-ताल और देव-मंदिर बनवाने की विधि क्या है, उसमें ऋत्विज कौन हों, वेदी कैसी हो, दक्षिणा और समय क्या हो। अध्याय 59 में पेड़ लगाने और उनकी प्रतिष्ठा (वृक्षोद्यापन) की विधि, और उसका फल है। यानी पुराण पेड़ लगाने और पानी का स्रोत बनवाने को भी धर्म का अंग मानता है।
अध्याय 83 से 92 तक "मेरु-दान" के दस रूप हैं, यानी अन्न, नमक, गुड़ आदि के प्रतीकात्मक पर्वत बनाकर दान करना। पुराण इनका क्रम भी देता है: पहला धान्य-शैल, दूसरा लवण-अचल, तीसरा गुड़-अचल, चौथा हेम (सोने का) पर्वत, पाँचवाँ तिल-शैल, छठा कार्पास (कपास) पर्वत, सातवाँ घृत-शैल, आठवाँ रत्न-शैल, नौवाँ रजत (चाँदी का) और दसवाँ शर्करा-अचल। इनके दान के अवसर हैं: अयन, विषुव, व्यतीपात और तिथि-क्षय जैसे पुण्य दिन। शर्करा-पर्वत के प्रसंग में वेश्या लीलावती की कथा भी है।
अध्याय 93 में नवग्रह-शांति है, जिसे पुराण "सब शास्त्रों को देखकर, विस्तार को संक्षिप्त करके" कहता है। ग्रह-यज्ञ तीन प्रकार का बताया गया है: अयुत-होम (दस हज़ार आहुतियाँ), लक्ष-होम (एक लाख) और कोटि-होम (एक करोड़)। ग्रहों और उनके अधिदेवताओं की स्थापना, किस ग्रह को कौन-सा अन्न और समिधा प्रिय है, और अगले अध्याय में नौ ग्रहों के रूप का वर्णन। आज जो नवग्रह-पूजा होती है, उसकी पुरानी विधियों में यह एक प्रमुख स्रोत है।
तीर्थ: प्रयाग, वाराणसी और नर्मदा
मत्स्य पुराण के तीन बड़े तीर्थ-माहात्म्य हैं। पहला प्रयाग का (अध्याय 103–112)। इसे नंदिकेश्वर नारद को सुनाते हैं: महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर भीष्म, द्रोण, कर्ण और अपने स्वजनों के मारे जाने से इतने दुखी थे कि राज्य करने का अर्थ ही नहीं देख पा रहे थे। तब मार्कण्डेय हस्तिनापुर आए और उन्हें प्रयाग जाने की सलाह दी। फिर प्रयाग में स्नान, उपवास और मृत्यु का फल, यमुना की महिमा, मानस-तीर्थ, सोम-तीर्थ, और "सब तीर्थों में प्रयाग श्रेष्ठ", यह स्तुति आती है।
दूसरा वाराणसी का, जिसे यहाँ "अविमुक्त" कहा गया है, यानी वह क्षेत्र जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते (अध्याय 180–185)। इसमें पिंगल के क्षेत्रपाल बनने की कथा है, शिव और पार्वती का संवाद है, और ब्रह्मा का पाँचवाँ सिर कटने का प्रसंग है। शिव कहते हैं कि यह सब श्मशानों में सबसे रहस्यमय है, और यहाँ रहने वाले इसी जीवन में योग और आनंद पाते हैं। व्यास की एक कथा भी है: छह महीने तक काशी में किसी ने उन्हें भिक्षा नहीं दी, तो भूख से व्याकुल होकर वे पूरे नगर को शाप देने को उद्यत हो गए, और यह जानकर शिव भी चिंतित हुए।
तीसरा नर्मदा का (अध्याय 186–194), और यह मत्स्य पुराण के आरंभ से सुंदर ढंग से जुड़ता है। अध्याय 2 में भगवान ने कहा था कि प्रलय में भी नर्मदा और मार्कण्डेय बचे रहेंगे। अब वही मार्कण्डेय युधिष्ठिर को नर्मदा की महिमा सुनाते हैं: अमरकंटक, कावेरी-नर्मदा संगम जहाँ कुबेर यक्षों के स्वामी बने, त्रिपुर-दाह के समय नर्मदा तट पर शिव, और सौ से अधिक तटवर्ती तीर्थ। Wilson ने लिखा कि नर्मदा-माहात्म्य में "कुछ रोचक विवरण" हैं। इसी भाग के अंत में ओंकारेश्वर की महिमा है।
शिव-कथाएँ: त्रिपुर, तारक और अंधक
त्रिपुर-दाह की कथा मत्स्य पुराण में बारह अध्यायों (129–140) में फैली है। असुर-शिल्पी मय ने अपनी माया से तीन नगरों वाला दुर्ग "त्रिपुर" बनाया, जिसे न देवता जीत सकें न असुर। जब उसमें रहने वाले दानव बस्तियाँ और आश्रम उजाड़ने लगे, तो ब्रह्मा और देवता शिव के पास गए। देवताओं ने मिलकर एक अद्भुत रथ बनाया, नारद त्रिपुर में मय से मिलने गए, और भयंकर युद्ध हुआ। मय स्वयं अपने दानवों से कहता है कि यह दुर्ग तभी गिरेगा जब पुष्य नक्षत्र के योग में कोई एक ही बाण से तीनों पुरों को भेद दे। अंत में शिव ने त्रिपुर को भस्म किया, और इसी से वे "त्रिपुरारि" कहलाए।
तारकासुर की कथा (अध्याय 146–160) एक पूरे महाकाव्य जैसी है। वज्रांग और वरांगी से तारक का जन्म, ब्रह्मा से वर कि उसे केवल एक बालक मार सकेगा, देवासुर युद्ध में विष्णु तक का पीछे हटना। फिर पार्वती का जन्म, शिव का तप, काम-दहन, रति का विलाप, पार्वती का तप, शिव-पार्वती का विवाह, पार्वती की द्वारपाल वीरक को डाँट, और अंत में कुमार कार्तिकेय का जन्म और तारक-वध। Wilson ने इन्हें मत्स्य की "शैव कथाएँ" कहा, जिनके बीच वैष्णव अवतार-कथाएँ भी गुँथी हैं।
अंधकासुर के वध (अध्याय 179) में एक विशेष बात है: अंधक के रक्त की हर बूँद से नए अंधक पैदा होते थे, इसलिए उस रक्त को पीने के लिए शिव ने माहेश्वरी आदि मातृकाओं को रचा। मातृकाओं की उत्पत्ति की यह कथा देवी-उपासना के इतिहास में महत्वपूर्ण है।
गोत्र और प्रवर: ऋषि-कुलों का रजिस्टर
मत्स्य पुराण का एक भाग आज भी रोज़ काम आता है, भले लोग इसका नाम न जानें। अध्याय 195 से 204 में नर्मदा-माहात्म्य सुनने के बाद मनु मत्स्य से ऋषि-कुलों के बारे में पूछते हैं, और मत्स्य एक-एक करके भृगु, अंगिरा, अत्रि, कश्यप, वसिष्ठ और अगस्त्य के वंशज ब्राह्मण-कुलों के नाम और उनके प्रवर (गोत्र के मूल ऋषि जिनका नाम संकल्प में लिया जाता है) गिनाते हैं।
इन सूचियों का एक व्यावहारिक उद्देश्य है: विवाह में यह देखना कि वर और कन्या एक ही प्रवर के न हों। इसीलिए गोत्र-प्रवर पर लिखने वाले विद्वानों ने मत्स्य पुराण की इन सूचियों को सदा एक मुख्य स्रोत माना है। VedikMarg के गोत्र-प्रवर पृष्ठ भी इन्हीं अध्यायों का सहारा लेते हैं। इसी भाग में वसिष्ठ और राजा निमि की कथा, और धर्म के वंश के उन ब्राह्मणों का भी वर्णन है जिन्हें श्राद्ध में भोजन कराना उत्तम माना गया।
इसके तुरंत बाद दान के तीन अध्याय हैं: बछड़ा देने वाली गाय का दान कैसे हो, काले मृग की खाल (कृष्णाजिन) का दान और उसका योग्य पात्र कौन हो, और वृषोत्सर्ग, यानी किन गुणों वाले बैल को छोड़ा जाए। ये सब मनु के उस पहले प्रश्न से जुड़े हैं, जिसमें उन्होंने दान-धर्म की विधि पूछी थी।
सावित्री और सत्यवान: पतिव्रता-माहात्म्य
मनु ने मत्स्य से पूछा: "पतिव्रताओं में सबसे श्रेष्ठ कौन है? किसने मृत्यु को जीता? किसका नाम लोग रोज़ लें?" मत्स्य ने उत्तर दिया कि धर्मराज (यम) भी पतिव्रता स्त्रियों की इच्छा के विरुद्ध कुछ करने का साहस नहीं करते, और फिर सावित्री की कथा सुनाई (अध्याय 208–214)। मद्र देश के राजा अश्वपति ने संतान के लिए सावित्री देवी की आराधना की; दस मास तक ब्राह्मणों ने सफ़ेद तिलों से होम किया, देवी प्रसन्न हुईं, रानी मालती से कन्या हुई, और उसका नाम सावित्री रखा गया।
सावित्री का विवाह सत्यवान से तय हुआ, पर नारद ने बताया कि सत्यवान एक वर्ष में मर जाएगा। सावित्री अपने निश्चय पर रहीं। सत्यवान के पिता का राज्य छिन चुका था और वे वन में रहते थे। जब सत्यवान की मृत्यु के चार दिन बचे, तब सावित्री ने सास-ससुर की आज्ञा से तीन दिन का उपवास किया। लकड़ी काटते समय सत्यवान के सिर में पीड़ा हुई, वे सावित्री की गोद में सो गए, और तभी नीले कमल जैसे वर्ण वाले धर्मराज आए और पाश से सत्यवान का प्राण ले चले।
सावित्री यम के पीछे चलीं और धर्म पर ऐसी बातें कहीं कि यम बार-बार वर देते गए, केवल सत्यवान का जीवन छोड़कर। पहले वर में सावित्री ने ससुर के लिए उनका खोया राज्य और आँखें माँगीं, दूसरे में अपने पुत्रहीन पिता के लिए सौ पुत्र, और तीसरे में सत्यवान से अपने सौ पुत्र, क्योंकि "पुत्र के बिना परलोक में गति नहीं।" यह वर पति के जीवन के बिना पूरा हो ही नहीं सकता था। यम ने सत्यवान को लौटा दिया और कहा कि वे सावित्री के साथ पाँच सौ वर्ष राज करेंगे। Wilson के अनुसार यह कथा महाभारत से ली गई है, पर संक्षिप्त रूप में।
राजधर्म, उत्पात और शकुन
अध्याय 215 से 227 मनु के प्रश्नों पर राजधर्म का एक छोटा शास्त्र हैं: राज्याभिषेक के समय राजा के कर्तव्य, राज्य के सेवक कैसे हों, राजधानी और दुर्ग कहाँ बनें, दुर्ग में कौन-सी औषधियाँ और विष-नाशक वस्तुएँ रखी जाएँ, राजकुमार की रक्षा। एक अध्याय में मनु पूछते हैं कि भाग्य बड़ा है या पुरुषार्थ, और मत्स्य उत्तर देते हैं। फिर साम, दान, भेद और दंड, चारों उपायों का अलग-अलग वर्णन, जिसमें दान को सबसे अच्छा उपाय कहा गया है। फिर दंड-विधान: धरोहर हड़पने जैसे अपराधों पर कितना दंड हो।
अध्याय 228 से 238 में ऋषि गर्ग "अद्भुत" यानी असामान्य घटनाओं (उत्पात) और उनकी शांति के बारे में बताते हैं: देव-मूर्तियों का नाचना, काँपना या धुआँ और रक्त उगलना, बिना ईंधन के आग लगना, पेड़ों से रोने-हँसने की आवाज़ या बिना कारण डालियाँ गिरना, अतिवृष्टि और अनावृष्टि, नदियों का रास्ता बदलना, असामान्य जन्म, पशुओं का अजीब व्यवहार, जंगली जानवरों का नगर में आना, महलों का अचानक गिरना। हर उत्पात के लिए शांति-कर्म भी बताया गया है। यह भाग प्राचीन भारत के "शकुन-शास्त्र" का अच्छा नमूना है।
आगे ग्रह-यज्ञ, लक्ष-होम और कोटि-होम की विधि (239), राजा युद्ध के लिए कब और कैसे निकले (240), अच्छे-बुरे शकुन (241), स्वप्नों के फल और शुभ लक्षण (242), और यात्रा के शुभ शकुन (243)। पुराण की अनुक्रमणिका इन सबको "राजाओं के कर्तव्य, यात्रा के समय और स्वप्नों के फल" कहकर गिनाती है।
वास्तु, मूर्ति और मंदिर
ऋषियों के पूछने पर सूत बताते हैं कि राजमहल और घर कैसे बनें (अध्याय 252–257): घर बनाने का शुभ समय, "चतुःशाला" यानी चारों ओर कमरों वाले आँगन-घर के प्रकार और उनके नाम, खंभों का माप (घर की ऊँचाई से गणना करके), भूमि की परीक्षा, और लकड़ी के लिए पेड़ काटने के शुभ नक्षत्र। Wilson ने भी लिखा कि मत्स्य में घर बनाने और मूर्तियाँ गढ़ने के निर्देश वाला एक भाग है।
फिर प्रतिमा-लक्षण (अध्याय 259–263): अलग-अलग देवताओं की मूर्तियों का रूप, अर्धनारीश्वर की प्रतिमा (आधा शिव, आधी पार्वती), मूर्तियों की पीठिकाएँ, जिनके लिए पीठ को सोलह भागों में बाँटा जाता है, और शिवलिंग के गुण और माप। इसके बाद मूर्ति-प्रतिष्ठा (264–266): अधिवास, प्रतिष्ठा कराने वाले आचार्य के गुण, और मंत्र।
अंत में मंदिर-निर्माण (अध्याय 267–270): समृद्धि चाहने वाले किस माप के मंदिर बनाएँ, वास्तु-पूजा के बाद मंदिर की भूमि को सोलह भागों में बाँटना, और मंदिर से जुड़े अलग-अलग मंडपों के लक्षण। गर्भगृह भूमि के बीच के चार भागों में हो, और मंदिर के चारों ओर द्वार बनें।
कलियुग के राजवंश और काल का प्रश्न
अध्याय 271 से 273 में "भविष्य के राजा" हैं, यानी कलियुग में होने वाले राजवंश: पुरु-वंश के भावी राजा, बृहद्रथ, प्रद्योत, शिशुनाग, नंद, मौर्य, शुंग, कण्व और आंध्र, और फिर आभीर, गर्दभिल, शक, यवन, तुषार, मुरुंड और हूण जैसे स्थानीय वंश। पुराण इन्हें भविष्य-काल में "होंगे" कहकर बताता है।
इतिहासकार F. E. Pargiter ने पुराणों की इन राज-सूचियों का गहरा अध्ययन किया। SBH अनुवाद उनका मत उद्धृत करता है: इन वंशों की संख्या और अवधि उस समय के हिसाब से है जब यह वृत्तांत पहली बार संकलित हुआ, यानी लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी के मध्य, और यह रूप मत्स्य पुराण में सुरक्षित है; वायु और ब्रह्माण्ड पुराण में इसी के संशोधित रूप हैं। अनुवादक यह भी लिखते हैं कि मत्स्य का वंश-वृत्तांत यहीं समाप्त होता है।
यानी Pargiter के मत में मत्स्य पुराण का राजवंश वाला भाग वायु और ब्रह्माण्ड में मिलने वाले रूप से पुराना है। यह पूरे पुराण का काल नहीं है, क्योंकि पुराण कई सदियों में बढ़ते रहे; पर इससे यह ज़रूर पता चलता है कि मत्स्य पुराण में बहुत पुरानी सामग्री सुरक्षित है।
सोलह महादान और कल्पों के नाम
मत्स्य पुराण का अंतिम बड़ा भाग सोलह "महादानों" का है (अध्याय 274–289), जिन्हें पुराण "अब तक कहीं और नहीं कहा गया" बताता है। पहला और सबसे श्रेष्ठ है तुला-पुरुष दान, जिसमें दाता को तराज़ू के एक पलड़े पर बैठाकर दूसरे पलड़े में सोना तब तक रखा जाता है जब तक पलड़ा बराबर न हो जाए, और वह सोना दान किया जाता है। बाकी हैं: हिरण्यगर्भ, ब्रह्माण्ड, कल्पपादप, गोसहस्र, हिरण्य-कामधेनु, हिरण्याश्व, हिरण्याश्व-रथ, हेम-हस्ति-रथ, पंचलांगल, धरा, विश्वचक्र, कल्पलता, सप्तसागर, रत्नधेनु और महाभूतघट।
पुराण कहता है कि ये दान पहले भगवान वासुदेव, अंबरीष, भार्गव (परशुराम), सहस्रबाहु (कार्तवीर्य), प्रह्लाद, पृथु और भरत जैसे राजाओं ने किए थे। इनके अवसर भी बताए गए हैं: अयन, विषुव, व्यतीपात, युग और मन्वन्तर का पहला दिन, संक्रांति, पर्व के दिन, विवाह और उत्सव, बुरा स्वप्न देखने के बाद, या धन मिलने पर; और स्थान: तीर्थ, मंदिर, गोशाला, कुएँ, बगीचे या सुंदर तालाब के पास।
अध्याय 290 में मनु मत्स्य से संक्षेप में कल्पों के नाम पूछते हैं, और मत्स्य उन्हें गिनाकर कहते हैं कि जब विष्णु जागते हैं तो संसार चेतन होता है, और जब वे विश्राम करते हैं तो उसका लय हो जाता है। इतना कहकर मत्स्य भगवान अंतर्धान हो जाते हैं। सूत बताते हैं कि आज भी सूर्य-वंश के वैवस्वत मनु का राज्य, यानी वैवस्वत मन्वन्तर चल रहा है। अध्याय 291 में सूत पूरे पुराण की अनुक्रमणिका सुनाकर कहते हैं कि इसका एक पाद पढ़ने वाला भी पापों से मुक्त होता है।
विद्वानों के मत: संकलन, उधार और प्राचीनता
H. H. Wilson ने 1840 में मत्स्य पुराण को "एक मिश्रित संकलन" कहा, जिसमें असली पुराण के तत्व भी हैं। उनके अनुसार इसकी वंशावलियाँ विष्णु पुराण जैसी हैं, पितर और श्राद्ध वाले अध्याय पद्म पुराण के सृष्टि-खंड जैसे हैं, और इसने महाभारत से भी बहुत लिया है, सावित्री की कथा इसका उदाहरण है। वे इसे शैव मानते थे, पर "केवल शैव नहीं", और लिखते हैं कि इसमें कूर्म और लिंग जैसी सांप्रदायिक अतिशयोक्तियाँ नहीं हैं। उनका निष्कर्ष था कि यदि इसने पद्म से लिया है, तो यह पद्म के बाद का है।
Wilson ने मत्स्य अवतार की कथा पर एक रोचक तुलना भी की। महाभारत भी यही कथा कहता है, और उसमें मत्स्य पुराण को इसका आधार बताया गया है। पर Wilson के अनुसार महाभारत वाला रूप सरल और पुराना लगता है: वहाँ मनु बीजों को नाव में इकट्ठा करते हैं, यहाँ योग-बल से; वहाँ नाव रस्सियों के बने रस्से से बँधती है, यहाँ बड़े सर्प रस्सी बनकर आते हैं।
श्लोक-संख्या पर भी Wilson ने ध्यान दिया। उनके पास के संस्कृत पाठ में मत्स्य अपनी संख्या बीस हज़ार बताता था, पर उनकी तीन अच्छी प्रतियों में चौदह से पंद्रह हज़ार के बीच ही श्लोक थे, इसलिए उन्होंने भागवत की चौदह हज़ार वाली संख्या को सच के निकट माना। उनके संपादक F. Hall ने टिप्पणी में लिखा कि इंडिया ऑफ़िस की चार में से दो पांडुलिपियों में "चौदह हज़ार" ही है, और देवी-भागवत और रेवा-माहात्म्य भी यही कहते हैं। GRETIL के मूल पाठ में भी अध्याय 53 में "सहस्राणि चतुर्दश", यानी चौदह हज़ार ही है।
महत्व और आज के लिए अर्थ
मत्स्य पुराण की कथा एक सुंदर विचार से शुरू होती है: एक राजा जो प्रलय में प्राणियों की रक्षा का वर माँगता है, और एक छोटी मछली पर दया करता है जो उसकी अंजलि में आ गिरी। जिसकी रक्षा मनु ने की, वही आगे चलकर पूरी सृष्टि की रक्षा का साधन बना। पुराण इसी दया और रक्षा के भाव से आगे बढ़ता है: पितरों का स्मरण, पेड़ लगाना, तालाब बनवाना, दान, और राजा का प्रजा की रक्षा करना।
आज के पाठक के लिए मत्स्य पुराण कई दरवाज़े खोलता है। श्रद्धालु के लिए इसमें व्रत, तीर्थ और सावित्री जैसी कथाएँ हैं। गोत्र-प्रवर जानने वाले के लिए ऋषि-कुलों की सूचियाँ हैं। इतिहास पढ़ने वाले के लिए कलियुग के राजवंश हैं, और स्थापत्य पढ़ने वाले के लिए घर, मूर्ति और मंदिर के नियम। पर इन सबके केंद्र में वह नाव है, जिसमें बैठकर मनु ने पूछा और भगवान ने उत्तर दिया। पुराण का संदेश यही है कि संसार के सब काम उसी प्रश्न-उत्तर की तरह भगवान के सान्निध्य में किए जाएँ।
आगे पढ़ें
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- अग्नि पुराण — अग्नि ने वसिष्ठ को कहा "विद्या का सार": अवतार, पूजा, मंदिर और मूर्ति-शास्त्र, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, राजनीति, धनुर्वेद, आयुर्वेद, काव्यशास्त्र, व्याकरण, कोश और योग, सब एक ग्रंथ में
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- गोत्र और प्रवर — मत्स्य पुराण की प्रवर-सूचियों पर आधारित
- सावित्री और सत्यवान — महाभारत वाली पूरी कथा
- महर्षि मार्कण्डेय — प्रलय में भी बचे रहने वाले ऋषि
- महर्षि वसिष्ठ — इला और निमि की कथाओं में
स्रोत एवं संदर्भ
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 2.17–2.20, 53.50–51, 1.11–1.16, 1.17–1.24, 1.25–1.32, 2.3–2.14, 2.12–2.19, 2.21–2.24, 2.22–2.24, अध्याय 1–176, 1–2, 53, 53.12–56, 53.52, 53.68–72, 53.64–67, 54.1–7, 58.1–3, 59.1–2, 83.2–7, 93.1–5, 2.13, 53.50, 165.1–2, 2.18–2.19, 53.51, 1.14–1.18, 2.20–2.24, 1.30, 2.23, 53.68–69
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.23
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.8
- The Matsya Puranam, Part 2 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.) (1917) · ch. 291 (पुराण की अपनी अनुक्रमणिका), Table of Contents, ch. 1, ch. 290–291, ch. 129–291, ch. 129–145, ch. 146–160, ch. 161–179, ch. 180–194, ch. 195–207, ch. 208–214, ch. 215–243, ch. 244–251, ch. 252–270, ch. 271–273, ch. 274–291, ch. 291 (अनुक्रमणिका), ch. 180–185, ch. 185.13–22, ch. 186–195, ch. 129–140, ch. 179, ch. 161–163, ch. 164–171, ch. 172–178, ch. 195–204, ch. 200–204, ch. 205–207, ch. 208, ch. 208–210, ch. 211–214, ch. 215–227, ch. 228–238, ch. 239–243, ch. 291, ch. 252–257, ch. 259–266, ch. 267–270, ch. 273, टिप्पणी (Pargiter उद्धृत), ch. 273, टिप्पणी, ch. 274
- The Matsya Puranam, Part 1, ch. 1–128 (Sacred Books of the Hindus, vol. 17) — A Taluqdar of Oudh (अनु.); Sris Chandra Vidyarnava (प्रस्तावना) (1916) · ch. 1–128, ch. 3–12, ch. 13–22, ch. 23–52, ch. 54–101, ch. 102–112, ch. 113–128, ch. 3–11, ch. 13–15, ch. 14–15, ch. 16–22, ch. 11–12, ch. 24–34, ch. 35–42, ch. 43–51, ch. 84–92, ch. 93–94, ch. 103–112
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. lxxxi–lxxxii, Preface, p. lxxxi, Preface, p. lxxxiii, Preface, p. lxxxii, Preface, p. lxxx और Hall की टिप्पणी
