वराह पुराण: पृथ्वी के प्रश्न, वराह के उत्तर

वराह-रूप विष्णु ने पृथ्वी को सुनाया: सृष्टि, तिथियों के देवता, दशावतार की द्वादशियाँ, अगस्त्य-गीता, पूजा के बत्तीस अपराध, मथुरा और गोकर्ण के माहात्म्य, नचिकेता की यमलोक-यात्रा

संक्षेप में

वराह पुराण अठारह महापुराणों में बारहवाँ है। इसमें वराह-रूप विष्णु, जिन्होंने पृथ्वी को रसातल से उठाया, पृथ्वी के प्रश्नों के उत्तर देते हैं। इसके अध्याय स्वयं को "भगवच्छास्त्र" कहते हैं। इसमें तिथियों के देवताओं की उत्पत्ति, दस अवतारों के द्वादशी-व्रत, पूजा के बत्तीस अपराध, मथुरा और गोकर्ण के माहात्म्य, और नचिकेता की यमलोक-यात्रा है।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में बारहवाँ (विष्णु पुराण 3.6.22)
संवाद
वराह-रूप विष्णु और पृथ्वी (धरणी); बाहरी कथा सूत की
परंपरागत श्लोक-संख्या
24,000 (भागवत 12.13.4–8; मत्स्य 53.39–40)
इस पृष्ठ का पाठ
संस्कृत विकिस्रोत: 218 अध्याय, हर पुष्पिका में "भगवच्छास्त्र"
अनोखे विषय
तिथियों के देवताओं की उत्पत्ति, दस अवतारों की द्वादशियाँ, धेनु-दान, सेवा-अपराध और प्रायश्चित्त, मूर्ति-स्थापना
बड़े माहात्म्य
मथुरा (लगभग 30 अध्याय), गोकर्ण, कोकामुख, बदरी, शालग्राम, द्वारका
अंतिम भाग
नचिकेता का यमलोक-वर्णन ("संसार-चक्र"), पतिव्रता-माहात्म्य, पाप-नाश के उपाय

वराह पुराण क्या है?

वराह पुराण वराह की वंदना से खुलता है: "उन वराह को नमस्कार, जो लीला से पृथ्वी को उठाते हैं, और जिनके खुरों के बीच मेरु खनखनाता है।" फिर सूत कहते हैं कि जिस समय विष्णु ने वराह-रूप में पृथ्वी को उठाया, तब पृथ्वी ने भक्ति से परमेश्वर से प्रश्न किए। यही पूरा पुराण है: पृथ्वी के प्रश्न और वराह के उत्तर।

पृथ्वी के प्रश्न बहुत सुंदर हैं: "हर कल्प में आप ही मुझे उठाते हैं, फिर भी मैं न आपका रूप जानती हूँ, न आदि सृष्टि। वेद नष्ट हुए तो आप मत्स्य बनकर रसातल से उन्हें लाए; मंथन में कूर्म बनकर मंदर को उठाया; वराह बनकर एक दाँत से मुझे महासागर से निकाला; हिरण्यकशिपु को मारा, वामन बनकर बलि को बाँधा, परशुराम बनकर पृथ्वी को क्षत्रिय-रहित किया, और रावण का नाश किया। पर मैं आपकी कोई लीला नहीं जानती। मुझे उठाकर आप सृष्टि कैसे रचते हैं, युगों की गणना कैसे होती है, और कौन-से यज्ञकर्ता और राजा परम सिद्धि को पहुँचे?"

अठारह पुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में वराह बारहवाँ है। मत्स्य पुराण इसका परिचय देता है: जिसमें विष्णु ने मानव कल्प के प्रसंग में पृथ्वी को महावराह का माहात्म्य सुनाया, चौबीस हज़ार श्लोकों का। भागवत भी चौबीस हज़ार कहता है। पुराण के हर अध्याय की पुष्पिका इसे "भगवच्छास्त्र", यानी भगवान का शास्त्र, कहती है।

हँसते वराह के उदर में ब्रह्मांड

पृथ्वी के प्रश्न सुनकर वराह-रूप परमेश्वर हँस पड़े। और जब वे हँसे, तो जगत को धारण करने वाली पृथ्वी ने उनके उदर में रुद्र, वसु, देवता, सिद्धों के समूह और महर्षि देखे; चंद्र, सूर्य, ग्रह और सातों लोक, सब अपने-अपने धर्म में स्थित, भीतर दिखे। यह सब देखते हुए पृथ्वी का पूरा शरीर काँपने लगा।

जब महात्मा वराह ने मुख खोला, तो निर्मल अंगों वाली पृथ्वी ने उन्हें उनके चतुर्भुज रूप में महासागर में शेष की शय्या पर सोते देखा, और उनकी नाभि के कमल में चतुर्मुख ब्रह्मा को। हाथ जोड़कर पृथ्वी ने स्तुति की: "कमल-नयन, पीतांबरधारी, देवताओं के शत्रुओं का नाश करने वाले परमात्मा को नमस्कार; शेष-शय्या पर सोने वाले, वक्षस्थल पर लक्ष्मी धारण करने वाले, मोक्ष देने वाले, आपकी शरण हूँ।"

आगे अध्याय 113 और 114 में वराह अवतार की कथा पूरी होती है: कल्प के अंत में रसातल गई पृथ्वी माधव की स्तुति करती है, और वराह कहते हैं कि उन्होंने अपने बाएँ दाँत से पृथ्वी को पकड़कर ऊपर उठाया, और हज़ार वर्ष तक अपने वज्र जैसे दाँत पर उसे धारण किया। पुराण के अंत में धरणी-वराह संवाद के सुनने का फल और पुराण पढ़ने की अनुक्रमणिका है।

संरचना: 218 अध्याय

संस्कृत विकिस्रोत पर वराह पुराण के 218 अध्याय हैं, और साथ में एक विस्तृत विषयानुक्रमणिका, जिसमें हर अध्याय के विषय गिनाए गए हैं। नीचे की तालिका उसी से बनी है। Wilson के समय इसकी प्रतियाँ दस हज़ार श्लोकों से थोड़ी अधिक थीं, यानी परंपरा में बताई चौबीस हज़ार की संख्या के आधे से भी कम।

Wilson ने इस पुराण को सामान्य परिभाषा वाला पुराण नहीं माना, क्योंकि इसमें सृष्टि और राजाओं के शासन के केवल थोड़े, बिखरे उल्लेख हैं, न विस्तृत वंशावलियाँ, न मन्वन्तरों का वर्णन। उनके अनुसार यह लिंग पुराण की तरह एक "धार्मिक नियम-पुस्तिका" है, जो विष्णु की प्रार्थनाओं और उपासना के नियमों से भरी है, और जिसकी अधिकांश कथाएँ इसी की अपनी हैं।

वराह पुराण: अध्याय-समूह और विषय (विकिस्रोत की विषयानुक्रमणिका से)
अध्यायविषयस्रोत
1–17पृथ्वी के प्रश्न; सृष्टि; प्रियव्रत और नारद; अश्वशिरा, वसु, रैभ्य (गया), धर्मव्याध; मत्स्य; दुर्जय और गौरमुख (नैमिषारण्य का नाम); श्राद्धकल्प; दशावतार-स्तोत्र; सरमा; महातपावराह पुराण (मूल संस्कृत), 1–17
18–35तिथियों के देवताओं की उत्पत्ति: अग्नि (प्रतिपदा), अश्विनी (द्वितीया), गौरी (तृतीया), गणपति (चतुर्थी), नाग (पंचमी), कार्तिकेय (षष्ठी), आदित्य (सप्तमी), मातृकाएँ, दुर्गा, दिशाएँ (दशमी), कुबेर (एकादशी), विष्णु (द्वादशी), धर्म, रुद्र, पितर, सोम (पूर्णिमा)वराह पुराण (मूल संस्कृत), 18–35
36–50प्राचीन इतिहास; आरुणि और व्याध; दस अवतारों के द्वादशी-व्रत (मत्स्य से कल्कि तक) और पद्मनाभ द्वादशी; धरणी-व्रतवराह पुराण (मूल संस्कृत), 36–50
51–65अगस्त्य-गीता और मोक्ष-धर्म; पशुपाल उपाख्यान; अनेक काम्य व्रत (शुभ, धन्य, कांति, सौभाग्य, विघ्नहर, शांति, काम, आरोग्य, पुत्र-प्राप्ति, शौर्य, सार्वभौम)वराह पुराण (मूल संस्कृत), 51–65
66–89पांचरात्र; विष्णु और नारायण के आश्चर्य; युग; प्रकृति-पुरुष; भुवन-कोश, मेरु, द्वीपवराह पुराण (मूल संस्कृत), 66–89
90–98त्रिशक्ति-माहात्म्य: सरस्वती, वैष्णवी, महिषासुर-वध, रौद्री; रुद्र-माहात्म्य; पर्वाध्यायवराह पुराण (मूल संस्कृत), 90–98
99–112धेनु-दान: तिल, जल, रस, गुड़, शर्करा, मधु, क्षीर, दधि, नवनीत, लवण, कपास, धान्य, कपिला, उभयतोमुखीवराह पुराण (मूल संस्कृत), 99–112
113–136वराह अवतार; पूजा के बत्तीस अपराध; देवोपचार; भोजन-नियम; त्रिसंध्या; कोकामुख; कुब्जाम्रक; चारों वर्णों की दीक्षा; अपराधों के प्रायश्चित्तवराह पुराण (मूल संस्कृत), 113–136
137–151तीर्थ: सौकरव, कोकामुख, बदरिकाश्रम, मंदार, शालग्राम, रुरुक्षेत्र (हृषीकेश), द्वारका, लोहार्गलवराह पुराण (मूल संस्कृत), 137–151
152–181मथुरा-माहात्म्य: विश्रांति, यमुना, अक्रूर तीर्थ, मथुरा-परिक्रमा, बारह वन, गोवर्धन, गोकर्ण वैश्य की कथा, शत्रुघ्न-चरितवराह पुराण (मूल संस्कृत), 152–181
181–192लकड़ी, पत्थर, मिट्टी, ताँबा, काँसा, चाँदी और सोने की प्रतिमाओं की स्थापना; श्राद्ध और पिंड-कल्प; मधुपर्क; सर्व-शांतिवराह पुराण (मूल संस्कृत), 181–192
193–212"संसार-चक्र": नचिकेता की यमलोक-यात्रा, यमपुरी, नरक, कर्म-विपाक, शुभ कर्मों के फल, पतिव्रता-माहात्म्य, पाप-नाश के उपायवराह पुराण (मूल संस्कृत), 193–212
213–218गोकर्णेश्वर, जलेश्वर, शृंगेश्वर; धरणी-वराह संवाद की फलश्रुति; पुराण-पठनवराह पुराण (मूल संस्कृत), 213–218

आरंभ की कथाएँ: धर्मव्याध, दुर्जय और नैमिषारण्य

सृष्टि-वर्णन के बाद वराह पुराण भक्ति से मोक्ष पाने वालों की कथाओं की एक माला देता है। राजा प्रियव्रत की सभा में नारद आते हैं और बताते हैं कि उन्होंने कन्या-रूप में सावित्री के दर्शन किए, जिन्होंने उन्हें वेद आदि दिए; फिर नारद अपने पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं। राजा अश्वशिरा के अश्वमेध में कपिल और जैगीषव्य आते हैं, और राजा के संदेह को दूर करने के लिए योग-माया से विष्णु और गरुड़ का रूप धरते हैं, और फिर शेष पर सोते नारायण का दर्शन कराते हैं। रैभ्य मुनि गया में तप करते हैं, जहाँ सनत्कुमार आकर राजा विशाल के पितरों की मुक्ति की कथा से गया का माहात्म्य बताते हैं।

धर्मव्याध की कथा (अध्याय 8) विशेष है। धर्मव्याध केवल प्राण-रक्षा जितना ही करता था और किसी जीव को (व्यर्थ) नहीं मारता था। मातंग नाम के ब्राह्मण ने उसकी पुत्री अर्जुनकी से अपने पुत्र का विवाह माँगा, और धर्मव्याध ने कन्या दे दी। पर मातंग के घर आने पर व्याध ने देखा कि वहाँ गेहूँ, धान आदि खाने में भी करोड़ों जीवों का नाश होता है; यह देखकर वह तप करने पुरुषोत्तम तीर्थ गया, विष्णु की स्तुति की, वर पाया और ब्रह्म में लीन हो गया। यह कथा अहिंसा के एक बहुत सूक्ष्म विचार की ओर संकेत करती है।

दुर्जय की कथा (अध्याय 10 से 12) नैमिषारण्य के नाम से जुड़ती है। राजा सुप्रतीक के पुत्र दुर्जय ने भारत आदि वर्ष जीते, इंद्र से भी लड़ने चला, और लौटते हुए वन में गौरमुख मुनि के आश्रम पहुँचा। गौरमुख की स्तुति से प्रसन्न नारायण ने उन्हें एक दिव्य मणि दी, जिसके प्रभाव से मुनि ने राजा की पूरी अक्षौहिणी सेना का सत्कार किया। लोभ में आकर राजा ने मणि छीननी चाही; तब मणि से योद्धा निकले और बड़ा युद्ध हुआ, और गौरमुख की प्रार्थना पर हरि ने चक्र से पूरी सेना का नाश किया और कहा कि आगे यह क्षेत्र "नैमिषारण्य" नाम से प्रसिद्ध होगा। बाद में गौरमुख प्रभास में मार्कण्डेय से पितरों और श्राद्ध के बारे में पूछते हैं, और दशावतार-स्तोत्र से मोक्ष पाते हैं।

एक और सुंदर कथा व्याध से ऋषि बनने वाले सत्यतपा की है (अध्याय 37, 38 और 98)। देविका नदी के तट पर तप करते आरुणि मुनि का वल्कल छीनने एक व्याध आया, पर मुनि के ब्रह्म-तेज से दब गया और वहीं रहने लगा। एक दिन भूखा बाघ मुनि पर झपटा, तो व्याध ने बाघ को मारकर ब्राह्मण की रक्षा की; मरते बाघ ने "नमो नारायणाय" मंत्र सुना और मुक्त हो गया, और फिर बताया कि वह पूर्वजन्म में शापित था। आरुणि ने व्याध को मोक्ष का मार्ग बताया। व्याध केवल वायु पीकर तप करने लगा; दुर्वासा आए और भोजन माँगा, तो आकाश से अन्न का पात्र गिरा, और व्याध की स्तुति से प्रसन्न देविका नदी स्वयं जल लेकर आई। इस आतिथ्य से प्रसन्न दुर्वासा ने उसे वेद आदि का वर दिया और नाम रखा "सत्यतपा"। आगे एक प्रसंग में कुल्हाड़ी से कुश उखाड़ते हुए सत्यतपा की उँगली कट गई और उसमें से रक्त नहीं, भस्म निकली; यह देखकर एक किन्नर ने इंद्र और विष्णु को बताया, जिन्होंने उसे वर दिया, और अंत में सत्यतपा और आरुणि मुक्त हुए। अवतारों की द्वादशियों की कथा भी इसी सत्यतपा और दुर्वासा के संवाद में कही गई है।

माया-चक्र (अध्याय 125) में पृथ्वी पूछती है: "हे विष्णु, माया क्या है, कैसी है, किसे माया कहते हैं? मैं यह परम रहस्य जानना चाहती हूँ।" वराह पहले कहते हैं, "हे भूमि, मुझसे मेरी माया के बारे में मत पूछो," पर फिर सोमशर्मा नाम के ब्राह्मण को दिखाई गई माया की कथा सुनाते हैं। तीर्थों की महिमा बताने वाली छोटी कथाएँ भी सुंदर हैं: सौकरव (शूकर-क्षेत्र) में मरा एक खंजरीट पक्षी, जिसे खेलते बच्चों ने गंगा-जल में फेंक दिया, मनुष्य-जन्म पाता है; और एक गीदड़ी और गिद्ध उस क्षेत्र में मरकर मनुष्य बनते हैं। मथुरा-माहात्म्य में कृष्ण के पुत्र सांब की कथा भी है: द्वारका की स्त्रियाँ उसके रूप से मोहित हुईं, कृष्ण ने उसे शाप दिया, और नारद के उपदेश से सांब ने सूर्य की आराधना करके वर पाया और सूर्य की प्रतिष्ठा की।

तिथियों के देवता: हर दिन की अपनी कथा

वराह पुराण का एक अनोखा भाग (अध्याय 18 से 35) हर तिथि को एक देवता की उत्पत्ति-कथा से जोड़ता है, और बताता है कि उस तिथि पर उस देवता का व्रत क्यों किया जाता है। अग्नि की उत्पत्ति के बाद उन्हें प्रतिपदा तिथि दी गई; अश्विनीकुमारों को द्वितीया; गौरी को तृतीया; गणपति को चतुर्थी; नागों को पंचमी; कार्तिकेय को षष्ठी; सूर्य को सप्तमी; मातृकाओं को अष्टमी; दुर्गा को नवमी; दिशाओं को दशमी; कुबेर को एकादशी; विष्णु को द्वादशी; धर्म को त्रयोदशी; रुद्र को चतुर्दशी; पितरों को अमावस्या; और सोम को पूर्णिमा।

इन कथाओं में कई ऐसे रूप हैं जो दूसरे पुराणों से अलग हैं। अश्विनीकुमारों की कथा में त्वष्टा ने अपनी कन्या मार्तंड (सूर्य) को दी, जो उनका तेज न सह सकी और घोड़ी बन गई, और उससे अश्विनी जन्मे। तृतीया के प्रसंग में गौरी का विवाह है: शिव बूढ़े ब्राह्मण के वेश में तप करती पार्वती के पास आते हैं, और स्नान करते शिव को मगर से बचाते हुए पार्वती उनका असली रूप देखती हैं। पंचमी के प्रसंग में कद्रू से अनंत, वासुकि आदि नागों का जन्म, उनके द्वारा मनुष्यों का नाश, और ब्रह्मा का उन्हें शाप और फिर अनुग्रह।

तृतीया के ठीक पहले वाले अध्याय (21) में दक्ष-यज्ञ की कथा का भी एक अलग रूप है। प्रजा रचने में असमर्थ रुद्र जल में डूबकर तप करने लगे, और इस बीच दक्ष ने सृष्टि रचकर यज्ञ शुरू कर दिया। जल से निकलकर दूसरों की रची सृष्टि देखकर क्रोधित रुद्र के कानों से भूत-प्रेत निकले, और उनके साथ रुद्र ने यज्ञ पर आक्रमण किया। वहाँ विष्णु से उनका युद्ध हुआ, और आकाश में हरि और हर के छोड़े नारायणास्त्र और पाशुपतास्त्र आपस में भिड़ गए। तब ब्रह्मा ने आकर हरि-हर का युद्ध शांत किया, यज्ञ में रुद्र का भाग तय हुआ, देवताओं ने रुद्र की स्तुति की, और प्रसन्न रुद्र ने सबके अंग फिर ठीक कर दिए; अंत में दक्ष ने दाक्षायणी रुद्र को दी।

दुर्गा की कथा (अध्याय 28) में सिंधुद्वीप नाम के राजा की कथा है, जिसने इंद्र-वध के लिए तप किया; वेत्रवती नदी मनुष्य-रूप में उसके पास आई, और उससे वेत्रासुर जन्मा, जिसने ब्रह्मा आदि देवताओं को हराया। तब श्वेत वस्त्र, माला और मुकुट धारण किए, सिंह पर सवार एक दिव्य कन्या, महादेवी, प्रकट हुईं, और शिव ने उनकी स्तुति की। इसी कारण नवमी दुर्गा की तिथि है।

गणेश का जन्म: शिव की हँसी से

चतुर्थी के प्रसंग में (अध्याय 23) गणेश के जन्म की एक कथा है जो दूसरे पुराणों से बिल्कुल अलग है। देवता कैलास आए, और प्रश्न हुआ कि गणपति का जन्म कैसे हुआ। पुराण कहता है कि (आकाश के बारे में विचार करते हुए) देव (शिव) हँस पड़े, और उस हँसी से एक कुमार प्रकट हुआ: कांति, दीप्ति, रूप और तेज से भरा, देखने वालों की आँखों को मोहित करने वाला।

उस कुमार का अत्यंत सुंदर और मोहक रूप देखकर परमेश्वर (शिव) को आशंका हुई (कि वह स्त्रियों को मोहित करेगा), और तीव्र क्रोध में उन्होंने उसे शाप दिया: "कुमार, तुम हाथी के मुख वाले और लंबे पेट वाले होओगे।" फिर जब उसने सिर हिलाया, तो उसके शरीर से अनेक प्रकार के गजमुख "विनायक" प्रकट हुए, जिनसे पृथ्वी क्षुब्ध हो गई। देवताओं ने उनके नाम रखे, गजमुख को सब यज्ञों में सबसे पहले पूजा का अधिकार मिला, और देवताओं ने गणनायक की स्तुति की। यह सब चतुर्थी को हुआ, इसलिए उस दिन तिल खाकर गणनायक की आराधना का विधान है।

दस अवतारों की द्वादशियाँ

अध्याय 39 से 50 में एक सुंदर व्रत-माला है: हर महीने की शुक्ल द्वादशी एक अवतार को समर्पित है। मत्स्य-द्वादशी (जिसकी कथा सत्यतपा और दुर्वासा के संवाद में है), पौष शुक्ल द्वादशी कूर्म-द्वादशी, माघ शुक्ल वराह-द्वादशी, फाल्गुन शुक्ल नृसिंह-द्वादशी, वामन-द्वादशी, वैशाख शुक्ल जामदग्न्य (परशुराम) द्वादशी, ज्येष्ठ शुक्ल राम-द्वादशी, कृष्ण-द्वादशी, श्रावण शुक्ल बुद्ध-द्वादशी, भाद्रपद शुक्ल कल्कि-द्वादशी, आश्विन शुक्ल पद्मनाभ-द्वादशी, और अंत में कार्तिक में धरणी-व्रत।

इस सूची में बुद्ध का नाम दस अवतारों में आता है, और उनके लिए श्रावण शुक्ल द्वादशी का व्रत बताया गया है। बुद्ध-द्वादशी के अध्याय में एक राजा की कथा भी है, जिसकी इस द्वादशी से रक्षा हुई। यह भाग दिखाता है कि यह पुराण अवतारों को कितने व्यावहारिक, कैलेंडर से जुड़े रूप में देखता है।

इसके बाद अगस्त्य-गीता (अध्याय 51 से) आती है, जिसमें अगस्त्य राजा भद्राश्व के घर लौटकर मोक्ष-धर्म का उपदेश देते हैं, और "पशुपाल" नाम के राजा का उपाख्यान सुनाते हैं। फिर काम्य व्रतों की एक लंबी सूची है: उत्तम पति की प्राप्ति का व्रत (जो नारद ने अप्सराओं को बताया), शुभ, धन्य, कांति, सौभाग्य, विघ्नहर, शांति, काम, आरोग्य, पुत्र-प्राप्ति (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी), शौर्य (आश्विन शुक्ल नवमी, दुर्गा की पूजा) और सार्वभौम (कार्तिक शुक्ल दशमी) व्रत।

सेवा के बत्तीस अपराध

वैष्णव पूजा-परंपरा के लिए वराह पुराण का सबसे प्रभावशाली योगदान शायद "बत्तीस अपराधों" की सूची है (अध्याय 117)। यहाँ वराह स्वयं पृथ्वी को एक-एक करके बताते हैं कि भगवान की सेवा में कौन-से आचरण अपराध हैं: "हे वसुंधरा, पहला अपराध मैं यह मानता हूँ... दूसरा अपराध धर्म में विघ्न डालने वाला है... तीसरा..." और इसी तरह बत्तीस तक। उदाहरण के लिए, मृत व्यक्ति को छूकर बिना शुद्ध हुए भगवान के पास आना, या दीपक को छूकर (हाथ धोए बिना) भगवान की सेवा करना।

इसके बाद के अध्याय इन्हीं अपराधों के प्रायश्चित्त हैं: राज-अन्न खाने का, दातुन चबाने का, शव छूने का, पूजा के समय शारीरिक अशुद्धि का, और पूजा के समय मौन तोड़ने जैसे अन्य अपराधों का प्रायश्चित्त; और प्रायश्चित्त-कर्म का सूत्र। साथ ही देवोपचार की विधि, भोजन के नियम, त्रिसंध्या के मंत्र, भगवत्-परायण लोगों के लक्षण, और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, चारों वर्णों की वैष्णव दीक्षा का विधान है। मथुरा-माहात्म्य में आगे फिर इन बत्तीस अपराधों के प्रायश्चित्त मथुरा के तीर्थों में बताए गए हैं।

मथुरा-माहात्म्य: "मथुरा से बढ़कर कुछ नहीं"

वराह पुराण का मथुरा-माहात्म्य (अध्याय 152 से 181 के आसपास) मथुरा और व्रज के तीर्थों का बहुत विस्तृत वर्णन है, और Wilson ने भी इस पुराण के परिचय में मथुरा-वर्णन का उल्लेख किया। वराह पृथ्वी से कहते हैं: "हे वसुंधरा, मुझे मथुरा के समान प्रिय कुछ नहीं; इसलिए मथुरा नाम से प्रसिद्ध इस स्थान से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं।" और "हे देवी, सुनो, मैं पापों को हरने वाली मथुरा की कैसी स्तुति करता हूँ।"

फिर तीर्थ-दर-तीर्थ वर्णन: विश्रांति तीर्थ, संयमन तीर्थ, यमुना-तीर्थ और पीवरी का वृत्तांत, अक्रूर तीर्थ और सुधन्वा की कथा, मथुरा में आदित्य का स्थान, मथुरा की रक्षा करने वाले दिक्पाल, मथुरा की प्रदक्षिणा और परिक्रमा का फल, बारह वनों की यात्रा, चक्र तीर्थ, कपिल-वराह, मथुरा के पश्चिम में गोवर्धन की अन्नकूट-परिक्रमा, असिकुंड, और मथुरा में महादेव का क्षेत्रपाल होना। बीच में गोकर्ण नाम के एक वैश्य की लंबी कथा है, जो तोते का पिंजरा लेकर मथुरा आता है और अंत में मोक्ष पाता है, और शत्रुघ्न का चरित भी।

मथुरा के अलावा दूसरे तीर्थ भी हैं: कोकामुख, जहाँ एक शक राजा के पूर्वजन्म की कथा है; बदरिकाश्रम और उसका ब्रह्मकुंड; मंदार; शालग्राम क्षेत्र, जहाँ भगवान ने सालंकायन मुनि को तपस्या का वर दिया और उस स्थान को "शालग्राम" नाम दिया; रुरुक्षेत्र में हृषीकेश; द्वारका; लोहार्गल; और अंत में गोकर्णेश्वर और उसके पास के शिव-तीर्थ।

मथुरेति च विख्यातं तस्मान्नास्ति परं मम ।

(वराह:) मथुरा नाम से प्रसिद्ध (यह स्थान), इसलिए मेरे लिए इससे बढ़कर (प्रिय) कुछ नहीं है।

— वराहपुराणम् (218 अध्याय, विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 152.11

संसार-चक्र: नचिकेता की यमलोक-यात्रा

वराह पुराण के अंतिम बड़े भाग का नाम "संसार-चक्र" है (अध्याय 193 से 212)। इसकी बाहरी कथा में राजा जनमेजय, प्रायश्चित्त करके हस्तिनापुर लौटे, गंगा-तट पर व्यास के शिष्य (वैशंपायन) से पूछते हैं कि यमलोक कैसा है। उत्तर में उद्दालक नाम के, सब वेदांगों के ज्ञाता ऋषि के पुत्र नचिकेता की कथा आती है, जो यमलोक जाकर लौटे।

नचिकेता लौटकर पिता के पास आते हैं और तपस्वियों के प्रश्नों पर संयमनी (यमपुरी) का पूरा वर्णन करते हैं: यमलोक के पापी, धर्मराज के नगर का माप, फूलों और जल वाली नदियाँ, धर्मात्माओं और पापियों के प्रवेश के अलग-अलग द्वार, यातनाओं के रूप, वैतरणी नदी, यम के दूतों और राक्षस-किंकरों का युद्ध, चित्रगुप्त के आदेश, और फिर शुभ कर्म करने वालों के उत्तम स्थान। उपनिषद की नचिकेता-कथा जहाँ आत्मा के ज्ञान पर केंद्रित है, वहाँ वराह पुराण का नचिकेता यमलोक का एक विस्तृत "यात्रा-वृत्तांत" देता है।

इसी भाग में नारद यम की सभा में आते हैं, पतिव्रता स्त्रियों की कथा और उनके आचरण का वर्णन है, और अंत में पाप-नाश के उपाय: प्रजापति के कहे उपाय, चारों वर्णों के लिए पाप-नाश के उपाय, और महापातकियों के लिए भी प्रायश्चित्त। यानी यमलोक का भयानक वर्णन अंत में आशा पर समाप्त होता है।

धेनु-दान, मूर्ति-स्थापना और श्राद्ध

अध्याय 99 से 112 में "धेनु-दान" के चौदह प्रकार हैं: तिल, जल, रस, गुड़, शर्करा, मधु, दूध, दही, मक्खन, नमक, कपास और धान्य से बनी प्रतीकात्मक गाय का दान, कपिला गाय का दान, और "उभयतोमुखी" (प्रसव करती) गाय का दान, साथ में सोने का कलश। हर दान की विधि, फल और उसे सुनने का फल अलग-अलग बताया गया है।

अध्याय 181 से 186 में भगवान की प्रतिमाओं की स्थापना की विधियाँ हैं, सामग्री के अनुसार: मधु-काष्ठ (लकड़ी), पत्थर, मिट्टी, ताँबा, काँसा, चाँदी और सोना; हर एक के अभिषेक, पूजन और फल सहित। फिर श्राद्ध का शास्त्र: सृष्टि और पितृ-यज्ञ, पिंड-कल्प की उत्पत्ति (मृत व्यक्ति के लिए पिंडदान क्यों), श्राद्ध में खाने योग्य और अयोग्य, मधुपर्क की उत्पत्ति, और सर्व-शांति।

इसी के बाद रुद्र-माहात्म्य (अध्याय 97) में कपालमोचन की कथा वराह पुराण के अपने रूप में है: ब्रह्मा के "कपाल" शब्द कहने से क्रोधित रुद्र ने ब्रह्मा का सिर काट दिया; हाथ से चिपका कपाल छुड़ाने के लिए वे सब तीर्थों में घूमे, और अंत में वाराणसी पहुँचकर गंगा में स्नान करते ही कपाल हाथ से छूट गया; तब वहाँ आए ब्रह्मा ने ही उस तीर्थ का नाम "कपालमोचन" रखा, और रुद्र कैलास चले गए। सरमा की कथा (अध्याय 16) इस प्रकार है: दुर्वासा के शाप से इंद्र वाराणसी में रहते हैं; बृहस्पति के कहने पर देवता गोमेध यज्ञ शुरू करते हैं; शुक्र के कहने पर असुर गायें चुरा लेते हैं; और सरमा के पीछे चलकर इंद्र दैत्यों को हराते हैं और गायें लौटा लाते हैं।

त्रिशक्ति-माहात्म्य (अध्याय 90 से 96) भी उल्लेखनीय है: अंधकासुर-वध के प्रसंग में ब्रह्मा और विष्णु का कैलास जाना, सरस्वती, वैष्णवी (मंदराचल पर तप करती देवी) और रौद्री, तीन शक्तियों का माहात्म्य, और महिषासुर-वध। Wilson ने लिखा कि Colonel Vans Kennedy ने भी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती, इन तीन शक्तियों की उत्पत्ति वाला अंश इसी पुराण से अनुवाद किया था, और वह अंश Wilson की प्रति में भी था।

विद्वानों के मत: वैष्णव उपासना की नियम-पुस्तिका

Wilson ने 1840 में संदेह किया था कि आज का वराह पुराण वही है जिसका वर्णन मत्स्य करता है, क्योंकि उनकी प्रति चौबीस हज़ार के आधे से भी कम थी। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि पुराण स्वयं किसी पहले के ग्रंथ की ओर संकेत करता है: मथुरा के वर्णन में सुमंतु मुनि कहते हैं कि "दिव्य वराह ने पहले पृथ्वी का भ्रम दूर करने के लिए एक पुराण कहा था।"

उनके अनुसार इस पुराण की कई कथाएँ, विष्णु-ग्रंथ होने के बावजूद, शिव और दुर्गा से जुड़ी हैं, और इसका बड़ा भाग वैष्णव तीर्थों का वर्णन है, विशेषकर मथुरा। उन्होंने यह भी लिखा कि इसमें कृष्ण की विशेष उपासना की ओर झुकाव नहीं है, न रथयात्रा और जन्माष्टमी जैसे उत्सवों का विधान; इससे उन्हें यह वैष्णव उपासना के एक पहले चरण का लगा, और उन्होंने इसे रामानुज के समय, बारहवीं शताब्दी के आरंभ, से जोड़ा। ये 1840 के अनुमान हैं, और आज के बड़े पाठ में अनेक परतें हो सकती हैं।

महत्व और आज के लिए अर्थ

वराह पुराण का पूरा ढाँचा एक भावनात्मक चित्र पर टिका है: डूबती पृथ्वी को अपने दाँत पर उठाए भगवान, और उनसे सवाल पूछती पृथ्वी। आज जब पृथ्वी के संकट की बात होती है, तब यह पुराण एक पुरानी याद दिलाता है कि हमारी परंपरा में पृथ्वी एक माता है, जो प्रश्न पूछ सकती है, और जिसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

व्यावहारिक रूप से, वराह पुराण ने वैष्णव जीवन को एक कैलेंडर दिया: हर तिथि का देवता, हर महीने की द्वादशी का अवतार, सेवा के बत्तीस अपराधों से बचने की सावधानी, और मथुरा-व्रज की परिक्रमा का मार्ग।

आगे पढ़ें

  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
  • मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • श्रीकृष्ण — मथुरा और व्रज
  • श्री गणेश — चतुर्थी और गणेश-जन्म
  • महर्षि अगस्त्य — अगस्त्य-गीता

स्रोत एवं संदर्भ

  • वराहपुराणम् (218 अध्याय, विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · 1.1–1.4, 1.5–1.15, पुष्पिकाएँ, 1.16–1.17, 1.18–1.23, 113–114, 114, "वामया दंष्ट्रया", 217–218, विषयानुक्रमणिका, 1–17, 18–35, 36–50, 51–65, 66–89, 90–98, 99–112, 113–136, 137–151, 152–181, 181–192, 193–212, 213–218, 2–7, विषयानुक्रमणिका, 8.4–8.10, 8, विषयानुक्रमणिका, 11.29–11.67, 10–15, विषयानुक्रमणिका, 37–39, विषयानुक्रमणिका, 98, विषयानुक्रमणिका, 125.5–125.7, 137–138, विषयानुक्रमणिका, 177.1–177.11, 18–35, विषयानुक्रमणिका, 20, विषयानुक्रमणिका, 22, विषयानुक्रमणिका, 24, विषयानुक्रमणिका, 21, विषयानुक्रमणिका, 28, 23.1–23.14, 23.15–23.17, 23, विषयानुक्रमणिका, 39–50, विषयानुक्रमणिका, 47, 47.18–47.20, 51.1–51.23, 54–65, विषयानुक्रमणिका, 117, 117.8, 117.23, 118–136, विषयानुक्रमणिका, 179, विषयानुक्रमणिका, 152.8–152.12, 152–180, विषयानुक्रमणिका, 122, 140–151, विषयानुक्रमणिका, 145, 213–216, 193.1–193.12, 194–206, विषयानुक्रमणिका, 207–212, विषयानुक्रमणिका, 99–112, विषयानुक्रमणिका, 181–192, विषयानुक्रमणिका, 97, विषयानुक्रमणिका, 16, विषयानुक्रमणिका, 90–96, विषयानुक्रमणिका, 1.4–1.23, 18–50, 159–161, 152.11
  • विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.22
  • मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.39–40
  • भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.4–8
  • The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, p. lxx, Preface, pp. lxx–lxxi, Preface, p. lxxi, Preface, p. lxxii, Preface, pp. lxxi–lxxii

वराह पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न