नारद पुराण: भक्ति, वेदांग और सब पुराणों की सूची

सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन ने नारद को सुनाया: गंगा और एकादशी की महिमा, सदाचार और श्राद्ध, छह वेदांग, मंत्र और उपासना, अठारहों पुराणों की अनुक्रमणिका, और राजा रुक्मांगद और मोहिनी की कथा

संक्षेप में

नारद पुराण अठारह महापुराणों में छठा है। इसके पूर्व भाग में सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन नारद को उपदेश देते हैं: गंगा और एकादशी की महिमा, सदाचार और श्राद्ध, छह वेदांग, मंत्र-उपासना और सभी अठारह पुराणों की विषय-सूची। उत्तर भाग में एकादशी-व्रती राजा रुक्मांगद और मोहिनी की कथा है।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में छठा (विष्णु पुराण 3.6.21)
अपना परिचय
"पच्चीस हज़ार श्लोकों का, बृहत् कल्प की कथा पर आधारित" (1.97.1)
परंपरागत संख्या
25,000 (भागवत 12.13.4–8; मत्स्य 53.23)
वक्ता
पूर्व भाग के चार पादों में क्रम से सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन, नारद को (1.97.3–1.97.9)
पाठ
पूर्व भाग 124 अध्याय (GRETIL, 13,114 संदर्भ); उत्तर भाग 82 अध्याय (1–43 GRETIL, 44–82 संस्कृत विकिस्रोत)
अनोखे विषय
व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, जातक, छंद; गणेश, नृसिंह, हयग्रीव, राम, हनुमान, कृष्ण, देवी के मंत्र; अठारहों पुराणों की अनुक्रमणिका
उत्तर भाग की कथा
एकादशी-व्रती राजा रुक्मांगद, उनका पुत्र धर्मांगद, और ब्रह्मा द्वारा रची मोहिनी

नारद पुराण क्या है?

नारद पुराण की कथा नैमिषारण्य में ऋषियों के एक प्रश्न से शुरू होती है: "सनत्कुमार ने महात्मा नारद को सारे धर्म कैसे सुनाए, और वे दोनों कहाँ मिले?" सूत बताते हैं कि ब्रह्मा के मानस पुत्र सनक, सनंदन, सनत्कुमार और सनातन, ममता और अहंकार से रहित, विष्णु के भक्त, एक बार मेरु के शिखर पर ब्रह्मा की सभा की ओर जा रहे थे, और रास्ते में उन्होंने विष्णुपदी गंगा देखी। वे स्नान करने को तैयार हुए, तभी देवर्षि नारद वहाँ आए, अपने बड़े भाइयों को प्रणाम किया, और प्रेम से हरि के नाम गाने लगे: "नारायण, अच्युत, अनंत, वासुदेव, जनार्दन..." फिर सबने साथ स्नान किया।

यह आरंभ ही पुराण का स्वभाव बता देता है: यह भक्ति, विशेषकर हरि-नाम और विष्णु-सेवा का पुराण है, और इसके मुख्य श्रोता स्वयं नारद हैं, जिनका जीवन ही हरि-गुणगान है। अठारह पुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में यह छठा है।

पुराण अपना परिचय भी स्वयं देता है, जब ब्रह्मा सब पुराणों की अनुक्रमणिका सुनाते हुए इस पर आते हैं: "हे विप्र, सुनो, मैं नारदीय पुराण कहता हूँ, पच्चीस हज़ार श्लोकों का, बृहत् कल्प की कथा पर आधारित।" भागवत और मत्स्य भी इसकी संख्या पच्चीस हज़ार ही देते हैं, और मत्स्य कहता है कि इसमें नारद ने बृहत् कल्प के धर्म कहे।

शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम् । पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहत्कल्पकथाश्रयम् ॥

हे विप्र, सुनो, मैं नारदीय पुराण कहता हूँ, जो पच्चीस हज़ार (श्लोकों) का है और बृहत् कल्प की कथा पर आधारित है।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.97.1

संरचना: चार पाद, चार वक्ता

पुराण की अपनी अनुक्रमणिका (1.97) उसकी पूरी बनावट बताती है। पूर्व भाग, जिसे "बृहदाख्यान" कहते हैं, चार पादों में है। पहले पाद में सनक नारद को अनेक पुण्य धर्म-कथाएँ सुनाते हैं। दूसरे, "मोक्ष-धर्म" नाम के पाद में सनंदन मोक्ष के उपाय, वेदांगों का वर्णन और शुकदेव की उत्पत्ति विस्तार से कहते हैं। तीसरे पाद में सनत्कुमार "महातंत्र" कहते हैं: पशु-पाश से मुक्ति, मंत्रों का शोधन, दीक्षा, मंत्रोद्धार, पूजा, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम और स्तोत्र, क्रम से गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव और शक्ति के। चौथे पाद में सनातन पुराणों के लक्षण, उनका प्रमाण और दान, और चैत्र आदि सब महीनों की प्रतिपदा आदि तिथियों के व्रत बताते हैं।

उत्तर भाग के विषय भी 1.97 में गिनाए गए हैं: एकादशी व्रत पर प्रश्न, वसिष्ठ और मांधाता का संवाद, रुक्मांगद की कथा, मोहिनी की उत्पत्ति और कर्म, वसुओं का मोहिनी को शाप और उसका उद्धार, गंगा, गया-यात्रा, काशी, पुरुषोत्तम, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बदरी, कामाक्षी, प्रभास, पुष्कर, गोकर्ण, सेतु, नर्मदा, अवंती, मथुरा और वृंदावन के माहात्म्य। उत्तर भाग 82 अध्यायों का है: पहले 43 अध्याय रुक्मांगद-मोहिनी की कथा और गंगा-माहात्म्य तक जाते हैं (GRETIL), और 44 से 82 तक गया से वृंदावन तक के तीर्थ-माहात्म्य, वसु की कथा और मोहिनी का अंत हैं (संस्कृत विकिस्रोत)। यह सूची और पाठ, दोनों आपस में मेल खाते हैं।

नारद पुराण: भाग, पाद और विषय (GRETIL पाठ की पुष्पिकाओं और 1.97 से)
भाग / पादवक्ता और मुख्य विषयस्रोत
पूर्व, पहला पाद (2–41)सनक: नारद की विष्णु-स्तुति, सृष्टि और भारतवर्ष, भक्ति और मार्कण्डेय, गंगा-माहात्म्य और गंगा की उत्पत्ति (बलि के प्रसंग से), धर्म, मार्गशीर्ष आदि के व्रत, एकादशी, सदाचार, वर्णाश्रम, श्राद्ध, तिथि-निर्णय, प्रायश्चित्त, यमदूत, भवाटवी, योग, हरि-भक्ति के लक्षण, ज्ञान, विष्णु-सेवा, नाम-माहात्म्यनारद पुराण (मूल संस्कृत), 1.2–1.41, पुष्पिकाएँ
पूर्व, दूसरा पाद (42–62)सनंदन: भृगु-भरद्वाज संवाद में जगत की उत्पत्ति और ब्राह्मणाचार; वेदांग (व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, जातक, छंद); शुक को लुभाने का प्रसंग; मोक्ष-धर्मनारद पुराण (मूल संस्कृत), 1.42–1.62, पुष्पिकाएँ
पूर्व, तीसरा पाद (63–91)सनत्कुमार: संध्या, देव-पूजा; गणेश, नृसिंह, हयग्रीव, राम, हनुमान, कार्तवीर्य, कृष्ण, राधा, पंचप्रकृति, देवी, दुर्गा और महेश के मंत्र, कवच और दीप-विधान; राधा-कृष्ण सहस्रनाम; नित्या-पटलनारद पुराण (मूल संस्कृत), 1.63–1.91, पुष्पिकाएँ
पूर्व, चौथा पाद (92–125)सनातन: ब्रह्म पुराण से ब्रह्माण्ड तक अठारहों पुराणों की अनुक्रमणिका; बारह महीनों की प्रतिपदा से पूर्णिमा तक के व्रत; पुराण-महिमानारद पुराण (मूल संस्कृत), 1.92–1.125, पुष्पिकाएँ
उत्तर भाग (1–43, GRETIL)एकादशी/द्वादशी-माहात्म्य; यम का ब्रह्मलोक जाना और विलाप; मोहिनी की रचना; रुक्मांगद, धर्मांगद और संध्यावली; कार्तिक और माघ माहात्म्य, काशी; रुक्मांगद को भगवान का दर्शन; मोहिनी को शाप; मोहिनी-वसु संवाद में गंगा-माहात्म्यनारद पुराण (मूल संस्कृत), 2.1–2.43, पुष्पिकाएँ
उत्तर भाग (44–82, विकिस्रोत)गया, काशी, पुरुषोत्तम, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बदरी, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर, त्र्यंबक, गोकर्ण, सेतु, नर्मदा, अवंतिका, मथुरा, वृंदावन के माहात्म्य; वसु की कथा; मोहिनी का यमुना-प्रवेश; पुराण-महिमानारद पुराण (मूल संस्कृत, पूरा उत्तर भाग), 2.44–2.82, पुष्पिकाएँ

गंगा, धर्म और एकादशी: पहले पाद का संदेश

पहले पाद में सनक नारद को पहले विष्णु-स्तुति, सृष्टि और भारत-खंड की प्रशंसा, और भक्ति के प्रसंग में मार्कण्डेय का चरित सुनाते हैं। फिर पाँच अध्यायों में गंगा-माहात्म्य है, और गंगा की उत्पत्ति की कथा बलि द्वारा देवताओं की पराजय के प्रसंग से जुड़ती है। इसके बाद धर्म का आख्यान आता है, जिसमें धर्मराज के उपदेश से भगीरथ का प्रसंग भी है।

फिर व्रतों का बड़ा भाग: मार्गशीर्ष शुक्ल द्वादशी का व्रत, मार्गशीर्ष पूर्णिमा पर लक्ष्मी-नारायण का व्रत, ध्वजारोपण, मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी से आरंभ होने वाले मास-व्रत, मास-उपवास, और एकादशी-व्रत की महिमा। इसका उत्तर भाग तो पूरा का पूरा एकादशी के प्रभाव की एक कथा है।

पहले पाद के अंतिम अध्याय आचार और भक्ति के हैं: सदाचार, स्मार्त धर्म में वर्णाश्रम और वेदाध्ययन, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति के धर्म, श्राद्ध-विधि, तिथि-निर्णय, प्रायश्चित्त, यमदूतों के कर्म, "भवाटवी" (संसार-रूपी जंगल) का वर्णन, योग, हरि-भक्ति के लक्षण, ज्ञान, विष्णु-सेवा का प्रभाव, और अंत में नाम-माहात्म्य। यानी पहला पाद एक पूरे धर्मशास्त्र जैसा है, जिसका शिखर हरि का नाम है।

गंगा की उत्पत्ति: वामन का पग और ब्रह्मांड का छेद

नारद अपने भाई सनक से पूछते हैं: "जो विष्णु के पैर के अग्रभाग से उत्पन्न होकर गंगा कहलाती है, उसकी उत्पत्ति बताइए।" उत्तर में वामन अवतार की कथा आती है, और यहाँ यह गंगा की उत्पत्ति की कथा बन जाती है। हिरण्यकशिपु के वंश में बलि हुआ, जिसने पृथ्वी जीतकर स्वर्ग जीतने का मन बनाया; कूष्मांड और कूपकर्ण उसके मंत्री थे, और बाण उसके सौ पुत्रों में प्रमुख। देवता हारकर स्वर्ग छोड़ भागे, और बलि अश्वमेध यज्ञ करके विष्णु को प्रसन्न करने में लगा रहा। अपने पुत्रों का दुख देखकर अदिति ने जल, वायु और निराहार रहकर घोर तप किया और सच्चिदानंद का ध्यान किया; दैत्यों के लाख प्रयत्न पर भी वे समाधि से नहीं डिगीं।

अदिति की स्तुति से प्रसन्न भगवान ने उन्हें अपनी माला और अभय दिया, और फिर चंद्र-मंडल के बीच, शंख-चक्र धारण किए, हाथ में अमृत-कलश और दही-भात लिए वामन रूप में प्रकट हुए; कश्यप ने हर्ष से उनकी स्तुति की। उधर बलि शुक्राचार्य के साथ दीर्घ सत्र कर रहा था। बालक वामन माता-पिता से आज्ञा लेकर यज्ञ में पहुँचे; ज्ञानी ऋषियों ने उन्हें नारायण पहचानकर स्वागत किया। शुक्र ने एकांत में बलि को चेताया कि यह वामन-रूप विष्णु तुम्हारी श्री हरने आए हैं; पर बलि ने कहा कि अग्नि में या ब्राह्मण को जो भी दिया जाता है, उससे विष्णु ही प्रसन्न होते हैं। फिर बलि ने उठकर हाथ जोड़े, वामन के चरण धोए और उस जल को परिवार सहित सिर पर रखा।

वामन ने तप के लिए तीन पग भूमि माँगी, और बलि ने आश्चर्य किया कि राज्य, गाँव या धन क्यों नहीं माँगा। वामन ने उसे भूमि-दान की महिमा समझाई, और भद्रमति नाम के एक गरीब ब्राह्मण की कथा सुनाई, जिसने पाँच हाथ भूमि माँगी और उसके दाता को विष्णुलोक मिला। फिर बलि ने जल-कलश उठाया; पुराण कहता है कि शुक्र जल की धारा रोकने लगे, तो भगवान ने कुश की नोक से उनकी आँख बेध दी। जल छूटते ही विश्वात्मा ब्रह्मलोक तक बढ़ गए, दो पगों में पृथ्वी और ऊपर के लोक नाप लिए, और उनके पैर के अँगूठे की नोक से ब्रह्मांड का कटाह फटकर दो भागों में बँट गया। ब्रह्मांड के बाहर का जल धारा बनकर भीतर आया और ब्रह्मा आदि देवताओं को पवित्र करता हुआ बहा; यही गंगा है। फिर भगवान ने शरणागत बलि को रसातल दिया और भक्त के वश होकर स्वयं उसके द्वारपाल बने, और देवताओं को स्वर्ग लौटा दिया। अध्याय का अंत गंगा की महिमा से होता है: विष्णु के पद से उत्पन्न इस देवी के स्मरण मात्र से मनुष्य सब पापों से छूटता है, और जो देवालय या नदी-तट पर यह गंगा-माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसे अश्वमेध का फल मिलता है।

हरि-भक्ति के लक्षण और संसार का जंगल

पहले पाद में योग के अंग बताने के बाद नारद पूछते हैं कि सर्वेश्वर किस पर प्रसन्न होते हैं, क्योंकि योग भी भक्ति वालों को ही सिद्ध होता है। उत्तर है: "यदि मुक्ति चाहते हो, तो सच्चिदानंद-विग्रह परम देव नारायण को पूरे मन से भजो।" फिर भक्ति के सुंदर लक्षण आते हैं: वे पैर सफल हैं जो विष्णु के मंदिर जाते हैं, वे हाथ सफल हैं जो विष्णु की पूजा करते हैं, वे आँखें सफल हैं जो जनार्दन को देखती हैं, और सज्जन उसी जीभ को जीभ कहते हैं जो हरि का नाम लेती है। "हाथ उठाकर सत्य, सत्य, फिर सत्य कहता हूँ: गुरु के समान कोई तत्त्व नहीं, और केशव से बढ़कर कोई देव नहीं।"

भक्ति के साथ आचरण की शर्त भी है: जिसमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह हैं, उसी पर जगत के स्वामी प्रसन्न होते हैं; जो सब प्राणियों पर दया करता है, सत्कथा में रमता और सत्कथा करता है, सत्संगी और अहंकार-रहित है, उस पर रमापति प्रसन्न होते हैं। और "हरि-भक्ति की कुल्हाड़ी से संसार के मज़बूत, महामोह देने वाले पाश को काटकर अत्यंत सुखी हो जाओ।" इसी अध्याय में जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, आत्मा की तीन अवस्थाओं का भी वर्णन है।

इससे पहले का अध्याय "भवाटवी", यानी संसार-रूपी जंगल, का वर्णन है, और यह गद्य में है, जो पुराणों में कम दिखता है। इसमें जीव की यात्रा बताई गई है: पेड़, झाड़ियाँ, लताएँ और घास, जो महामोह से ढके "स्थावर" हैं, बहुत समय तक काटे जाने, आग, सर्दी और धूप के दुख सहकर मरते हैं; फिर पशु-योनियों में भूख और भय से भटकते हैं; और इस तरह अनेक योनियों में घूमकर क्रम से मनुष्य-जन्म पाते हैं। फिर गर्भ में जीव के विकास का भी वर्णन है: पाँच दिन में कलल, आधे महीने में पल, और एक महीने में प्रादेश-मात्र।

पादौ तौ सफलौ पुंसां यौ विष्णुगृहगामिनौ । तौ करौ सफलौ ज्ञेयौ विष्णुपूजापरौ तु यौ ॥

मनुष्य के वे पैर सफल हैं जो विष्णु के मंदिर जाते हैं, और वे हाथ सफल जानने चाहिए जो विष्णु की पूजा में लगे हैं।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.34.7

युग-धर्म और कलियुग में नाम की महिमा

पहले पाद का अंतिम अध्याय, जिसका नाम "नाम-माहात्म्य" है, युगों के धर्म से शुरू होता है। कृतयुग में देवता, दानव, गंधर्व, यक्ष, राक्षस और नाग सब देवताओं के समान थे; न खरीद-बिक्री थी, न वेदों का विभाग; सब वर्ण अपने आचार में लगे, नारायण-परायण, तप और ध्यान में रत, और उस युग में नारायण शुक्ल (श्वेत) वर्ण के थे। त्रेता में धर्म कुछ पीला पड़ता है और हरि लाल वर्ण के होते हैं; लोग क्रिया-योग और यज्ञ में लगते हैं। द्वापर में धर्म दो पैरों पर रह जाता है, हरि पीत वर्ण के होते हैं और वेदों का विभाग होता है। और कलियुग, जो तामस युग है, उसमें हरि कृष्ण (श्याम) वर्ण के होते हैं और धर्म एक पैर पर रह जाता है।

फिर कलियुग का लंबा और कड़वा वर्णन है: लोग ईर्ष्यालु और दंभी, अल्पायु; वेद से विमुख; सब वर्ण एक जैसे, ऊँचे नीचे और नीचे ऊँचे; रिश्वत पर जीने वाले; धनवान भी याचक; अनावृष्टि के भय से आकाश ताकते, भूख से डरे लोग; और "जब प्रजा यज्ञ और होम नहीं करेगी, तभी कलि की वृद्धि समझनी चाहिए।" पर इस सारे अंधकार के बाद एक वाक्य आता है: "हरि-भक्ति में लगे लोगों को यह कलि कहीं बाधा नहीं देता।"

कृतयुग में ध्यान, त्रेता में यज्ञ, द्वापर में अर्चना से जो मिलता है, वही कलियुग में केशव के कीर्तन से मिलता है; और कृतयुग में दस वर्ष, त्रेता में एक वर्ष और द्वापर में एक महीने में जो पुण्य होता है, वह कलियुग में एक दिन-रात में। जो दिन-रात हरि का नाम लेते हैं, "नमो नारायणाय" कहते हैं, निष्काम हों या सकाम, कलि उन्हें बाधा नहीं देता। और पुराण यहाँ उदार भी है: "हरे, केशव, गोविंद, वासुदेव" कहने वालों को भी, और "शिव, शंकर, रुद्रेश, नीलकंठ, त्रिलोचन" जपने वालों को भी कलि नहीं सताता। अंत में वह प्रसिद्ध श्लोक आता है: "हरि का नाम ही, नाम ही, नाम ही मेरा जीवन है; कलियुग में और कोई गति नहीं है, नहीं है।"

ध्यायन्कृते यजन्यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम् ॥

कृतयुग में ध्यान से, त्रेता में यज्ञों से और द्वापर में पूजा से मनुष्य जो पाता है, वही कलियुग में केशव का संकीर्तन करके पाता है।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.41.92
हरेर्नामैव नामैव नामैव मम जीवनम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

हरि का नाम ही, नाम ही, नाम ही मेरा जीवन है; कलियुग में (इसके सिवा) और कोई गति नहीं है, नहीं है।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.41.115

वेदांग: व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद

नारद पुराण की सबसे अनोखी विशेषता उसका दूसरा पाद है, जिसमें सनंदन नारद को छह वेदांगों का सार सुनाते हैं। पुराण की अनुक्रमणिका भी कहती है कि इस पाद में "वेदांगों का कथन" है। पाद भृगु और भरद्वाज के संवाद से शुरू होता है, जिसमें जगत की उत्पत्ति और ब्राह्मण के आचार का वर्णन है, और फिर एक-एक वेदांग आता है।

व्याकरण वाला अध्याय इस वाक्य से शुरू होता है: "अब मैं संक्षेप में व्याकरण कहूँगा, जो वेद का मुख है।" फिर वह पाणिनीय शैली में पद की परिभाषा देता है ("सुबंत और तिङंत पद"), सात विभक्तियाँ, और प्रथमा, द्वितीया आदि विभक्तियों के प्रयोग। उसके बाद निरुक्त के लक्षण, फिर ज्योतिष, फिर जातक, और फिर छंद का संक्षिप्त वर्णन।

ज्योतिष के अध्याय में कहा गया है कि यह अंग ब्रह्मा ने पहले कहा था और इसे जानने मात्र से मनुष्य को धर्म की सिद्धि होती है। फिर ज्योतिष-शास्त्र के तीन स्कंध गिनाए गए हैं: गणित, जातक और संहिता; और गणित के अंतर्गत परिकर्म, ग्रहों की मध्यम और स्पष्ट गति, सूर्य और चंद्र ग्रहण, छाया, शृंगोन्नति (चंद्रमा के सींग), युति और पात का साधन, और जातक के अंतर्गत राशि-भेद और ग्रह-योनि। एक पुराण में ज्योतिष का इतना तकनीकी सार मिलना इसे विशेष बनाता है।

इस पाद के अंत में शुकदेव की कथा है। मेरु के शिखर पर कर्णिकार-वन में शिव और पार्वती विहार कर रहे थे, और वहीं कृष्णद्वैपायन व्यास पुत्र के लिए योग से कठिन तप कर रहे थे: "अग्नि, भूमि, वायु और आकाश के समान वीर्य वाला पुत्र मुझे मिले।" आगे शुक को लुभाने का प्रसंग और मोक्ष-धर्म का निरूपण आता है।

त्रिस्कन्धं ज्यौतिषां शास्त्रं चतुर्लक्षमुदाहृतम् । गणितं जातकं विप्र संहितास्कन्धसंज्ञिताः ॥

ज्योतिष का शास्त्र तीन स्कंधों वाला कहा गया है, जिसका विस्तार चार लाख (श्लोकों) का है: हे विप्र, गणित, जातक और संहिता, ये उसके स्कंध हैं।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.54.2

मंत्र और उपासना: सनत्कुमार का "महातंत्र"

तीसरे पाद में सनत्कुमार नारद को उपासना का विस्तृत शास्त्र देते हैं, जिसे अनुक्रमणिका "महातंत्र" कहती है। अध्यायों के नाम ही इसका विस्तार दिखाते हैं: संध्या आदि, देव-पूजा, गणेश-मंत्र का विधान, मंत्र-विधान, नृसिंह की उपासना और उनका मंत्र-गायत्री, हयग्रीव की उपासना, राम आदि की उपासना, हनुमान के मंत्र, दीप-विधि, कार्तवीर्य के माहात्म्य, मंत्र और दीप, कार्तवीर्य-कवच, हनुमत्-कवच और हनुमान का चरित्र।

फिर कृष्ण के मंत्र और उनके भेद, राधा-कृष्ण सहस्रनाम, पंचप्रकृति के मंत्र, देवी-मंत्र, यक्षिणी-मंत्र और उनकी साधना, दुर्गा के चार मंत्र, राधा आदि के मंत्र, "नित्या" देवियों का पटल, और अंत में महेश के मंत्र। यानी यह पाद वैष्णव, शैव और शाक्त, तीनों परंपराओं की उपासना-विधियों को एक साथ रखता है, भले पुराण का मूल स्वर वैष्णव है।

अठारहों पुराणों की अनुक्रमणिका

नारद पुराण का चौथा पाद पुराण-साहित्य के अध्ययन के लिए बहुत मूल्यवान है। इसमें सनातन पुराणों के लक्षण, प्रमाण और दान बताते हैं, और फिर ब्रह्मा एक-एक करके अठारहों महापुराणों की "अनुक्रमणिका", यानी विषय-सूची, सुनाते हैं: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, वायु, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्माण्ड। ध्यान दें कि इस सूची में चौथा पुराण "वायु" है, शिव नहीं।

हर पुराण की अनुक्रमणिका के अंत में यह भी बताया गया है कि उस पुराण की प्रति किस पर्व पर किस वस्तु के साथ दान करनी चाहिए। जैसे भागवत की अनुक्रमणिका के अंत में कहा गया है कि भाद्रपद की पूर्णिमा को सोने के सिंह के साथ यह किसी भागवत ब्राह्मण को प्रेम से दान करें, और जो इस अनुक्रमणिका को सुनाता या सुनता है, उसे भी पुराण सुनने का उत्तम फल मिलता है।

आज के विद्वानों के लिए यह सूची इसलिए उपयोगी है कि इससे पता चलता है कि नारद पुराण के संकलन के समय हर पुराण में कौन-से विषय माने जाते थे। कई पुराणों के आज के छपे रूप इस सूची से मेल खाते हैं, और कुछ नहीं, जिससे पुराणों के बदलते रूप का अनुमान होता है। VedikMarg के हर पुराण-पृष्ठ पर हमने उस पुराण का अपना परिचय भी दिया है।

उत्तर भाग: रुक्मांगद, मोहिनी और एकादशी

उत्तर भाग एक प्रश्न से शुरू होता है: "सूखे और गीले, जाने-अनजाने किए घोर पाप-रूपी ईंधन को कौन-सी आग जलाती है?" उत्तर है: एकादशी। "जो मनुष्य इंद्रियों को वश में रखकर विष्णु के दिन उपवास करता है, मधुसूदन की पूजा करता है और रात को जागरण करता है, वह पापों को वैसे ही साफ़ कर देता है जैसे जुआरी धन को। एकादशी नाम की आग से सौ जन्मों के पाप भी भस्म हो जाते हैं।"

फिर राजा रुक्मांगद की कथा। उन्होंने पूरी पृथ्वी में घोषणा करवा दी कि दोनों पक्षों की एकादशी को कोई भोजन न करे, जैसे ब्राह्मण को मारना वर्जित है। परिणाम यह हुआ कि लोग व्रत के प्रभाव से सीधे विष्णुलोक जाने लगे: सब नरक पापियों से ख़ाली हो गए, यम का मार्ग टूट गया, और चित्रगुप्त के लेखे मिट गए, उनके पास लिखने को कुछ न बचा। नारद ने धर्मराज यम से कहा, "आपके आँगन में नरकों का क्रंदन सुनाई नहीं देता।" लज्जित यम ब्रह्मलोक गए और विलाप किया।

तब ब्रह्मा ने मन से एक स्त्री रची, सब स्त्रियों में श्रेष्ठ, लोक को मोहित करने वाली: मोहिनी। (इसी अध्याय में ब्रह्मा पुराणों के उस विचार को भी दोहराते हैं कि स्त्री को काम-भाव से देखना मनुष्य को गिराता है।) मोहिनी ने कहा, "आपने मुझे किसी को क्षुब्ध करने के लिए रचा है; बताइए किसे, मैं निश्चय ही करूँगी।" उसे रुक्मांगद के पास भेजा गया। आगे के अध्यायों के नाम कथा बताते हैं: मंदराचल, रुक्मांगद और धर्मांगद का संवाद, मोहिनी का दर्शन, (विवाह की) शर्त तय करना, पिता-पुत्र संवाद, पतिव्रता-उपाख्यान, माता का सम्मान, धर्मांगद की दिग्विजय, और फिर वह क्षण जब मोहिनी अपनी शर्त माँगती है।

मोहिनी ने राजा से कहा कि या तो वे एकादशी का व्रत तोड़ें, या अपने पुत्र धर्मांगद का वध करें। अध्याय 33 का नाम "धर्मांगद का कथन" है, और उसके बाद राजा पुत्र-वध को उद्यत होते हैं। अध्याय 34 का नाम ही है: "पुत्र-वध को उद्यत रुक्मांगद को भगवान का दर्शन"। उस अध्याय में मेघ जैसे श्याम, निरंजन भगवान तीनों के सामने प्रकट होते हैं, और राजा पत्नी और पुत्र सहित हरि के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं; यह देखकर यम भयभीत होकर फिर ब्रह्मा के पास जाते हैं। इसके बाद मोहिनी को शाप, वसुओं से उसका संवाद, और गंगा-माहात्म्य आता है।

एकादशीसमाख्येन वह्निना पातकेन्धनम् । भस्मतां याति राजेन्द्र अपि जन्मशतोद्भवम् ॥

हे राजेंद्र, एकादशी नाम की आग से सौ जन्मों में इकट्ठा हुआ पाप-रूपी ईंधन भी भस्म हो जाता है।

— नारद पुराण (पूर्व और उत्तर भाग) — GRETIL e-text, पृष्ठ 2.1.10

उत्तर भाग का दूसरा हिस्सा: तीर्थ-माहात्म्य, मोहिनी का अंत और "मोहिनी-वेध"

उत्तर भाग में मोहिनी को शाप मिलने के बाद कथा एक लंबी तीर्थ-यात्रा बन जाती है। मोहिनी का पुरोहित वसु नाम का ब्राह्मण उसे एक-एक तीर्थ का माहात्म्य सुनाता है, और अध्यायों के नाम ही इसका नक्शा हैं: गंगा (अध्याय 43 तक: गंगा-स्नान के समय और स्थान, दान और गुड़-धेनु), गया (44–47), काशी (48–51), पुरुषोत्तम क्षेत्र (52–61), प्रयाग (62–63), कुरुक्षेत्र (64–65), हरिद्वार (66), बदरिकाश्रम (67), कामोदा और कामाक्षा (68–69), प्रभास (70), पुष्कर (71), गौतम आश्रम और त्र्यंबकेश्वर (72–73), गोकर्ण (74), लक्ष्मणाचल (75), सेतु (76), नर्मदा (77), अवंतिका (78), मथुरा (79) और वृंदावन (80)।

हर माहात्म्य में ठोस बातें हैं। गया में अक्षयवट पर पितरों को दिया गया दान अक्षय बताया गया है, गदाधर विष्णु "विष्णुपद" आदि पदों के रूप में पितरों की मुक्ति के लिए स्थित हैं, और यह भी कहा गया है कि गुरु के सिंह राशि में होने पर भी गया-श्राद्ध न छोड़े। पुरुषोत्तम क्षेत्र के दस अध्यायों में राजा इंद्रद्युम्न की चिंता और पांचरात्र विधि से पूजा, इंद्रद्युम्न सरोवर, भगवान का अभिषेक और क्षेत्र-यात्रा का फल है। प्रयाग में पश्चिम की ओर बहती गंगा का कालिंदी से संगम और माघ-स्नान की महिमा है; कुरुक्षेत्र की यात्रा में वह स्थान भी है जहाँ वामन का जन्म हुआ; नर्मदा के दोनों तटों पर चार सौ मुख्य तीर्थ गिनाए गए हैं; और मथुरा में चौबीस तीर्थ।

इक्यासीवें अध्याय में वसु की अपनी कथा पूरी होती है। वह ब्रह्मलोक जाकर ब्रह्मा को मोहिनी का सारा वृत्तांत सुनाता है। ब्रह्मा कहते हैं कि जिस मोहिनी को मैंने देव-कार्य के लिए रचा था, वह काम पूरा न कर सकी, तुम्हारे शाप से नष्ट हुई, और मेरी आज्ञा से तुमने ही उसे फिर जीवित करके कृतार्थ किया; वर माँगो। वसु वृंदावन में रहने का वर माँगता है, और पाँच हज़ार वर्ष तप करता है; तब दो-तीन प्रिय ग्वाल-सखाओं के साथ हरि स्वयं प्रकट होकर उसे वृंदावन में सदा रहने का वर देते हैं। वहीं नारद उसे कृष्ण का पूरा भावी चरित सुनाते हैं, जो शिव ने गोलोक में सुरभि गाय से सुना था: पूतना और कालिय जैसे प्रसंग, ब्रह्मा, इंद्र और वरुण का मद तोड़ना, ग्यारह वर्ष ब्रज की लीला, मथुरा में कंस-वध, द्वारका, रुक्मिणी आदि आठ पटरानियाँ, और पृथ्वी का भार उतारकर फिर अपने धाम जाना।

अंतिम अध्याय में मोहिनी की कथा पूरी होती है। वसु के बताए क्रम से वह गंगा, गया (जहाँ उसने पति का पिंडदान किया), काशी, पुरुषोत्तम, सेतु, गोकर्ण, प्रभास, द्वारका, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, बदरी, अयोध्या, अमरकंटक और नर्मदा, त्र्यंबक और पुष्कर होते हुए मथुरा पहुँचती है, बीस योजन की परिक्रमा करती है, मथुरा-वासियों को दस हज़ार गायें दान करती है, और कालिंदी (यमुना) में प्रवेश कर जाती है। पुराण कहता है, "वह आज तक बाहर नहीं निकली," और यम की तिथि के अंत में स्थित है।

यहीं "मोहिनी-वेध" की बात आती है, जो एकादशी के नियमों में आज भी सुनी जाती है। पाठ के अनुसार मोहिनी स्मार्तों के व्रत को सूर्योदय पर, श्रौतों के व्रत को अरुणोदय पर, और वैष्णवों के व्रत को आधी रात (निशीथ) पर पहुँचकर दूषित करती है; जो मनुष्य मोहिनी-वेध से रहित एकादशी का उपवास करके द्वादशी को विष्णु की पूजा करता है, वह निःसंदेह वैकुंठ जाता है। कारण भी दिया गया है: एकादशी विष्णु से जन्मी है और मोहिनी ब्रह्मा से; मोहिनी रुक्मांगद को व्रत से न रोक सकी, और वह एकादशी से स्पर्धा करती हुई आज भी वहीं स्थित है।

पुराण अपने अंत में अपना परिचय भी देता है: यह दस लक्षणों से युक्त है, पच्चीस हज़ार श्लोकों की, पाँच पादों वाली संहिता है, जिसे हंस-रूप भगवान ने सनक आदि को, उन्होंने नारद को, नारद ने व्यास को और व्यास ने सूत को दिया। और एक सुंदर तुलना: जैसे व्रतों में एकादशी, नदियों में गंगा, वनों में वृंदावन, क्षेत्रों में कुरुक्षेत्र, पुरियों में काशी, तीर्थों में मथुरा और सरोवरों में पुष्कर, वैसे ही पुराणों में यह। यह भी कहा गया है कि गणेश, सूर्य, विष्णु, शक्ति और शिव, पाँचों के भक्त इसके अधिकारी हैं।

मोहिनी विधिजा देवी विष्णुजैकादशी द्विजाः । विष्णुजास्पर्द्धया धात्रा मोहिनी सा विनिर्मिता ॥

हे द्विजो, मोहिनी देवी ब्रह्मा से जन्मी है और एकादशी विष्णु से। विष्णु से जन्मी (एकादशी) से स्पर्धा के कारण ब्रह्मा ने मोहिनी को रचा था।

— नारदपुराणम् (पूर्वार्ध और उत्तरार्ध, 82 अध्याय) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 2.82.25

विद्वानों के मत: नारदीय और बृहन्नारदीय

Wilson ने 1840 में लिखा कि उनकी प्रति का "नारदीय पुराण" केवल तीन हज़ार श्लोकों से कुछ अधिक था, और "बृहन्नारदीय" नाम की कृति उनकी तीन और कंपनी के पुस्तकालय की पाँच प्रतियों में लगभग साढ़े तीन हज़ार श्लोकों की थी; इसलिए उन्हें संदेह था कि मत्स्य का बताया पच्चीस हज़ार श्लोकों का नारद पुराण अस्तित्व में है भी। आज GRETIL पर उपलब्ध पाठ, जिसकी पुष्पिकाएँ "बृहन्नारदीय पुराण" कहती हैं, केवल पूर्व भाग में ही तेरह हज़ार से अधिक संदर्भों का है, यानी Wilson की प्रतियों से बहुत बड़ा।

Wilson ने इन ग्रंथों को पंचलक्षण की परिभाषा से मेल न खाने वाला, विष्णु-भक्ति के सिद्धांत के लिए संकलित माना, जिनमें प्रार्थनाएँ, व्रत और हरि-भक्ति की महिमा की कथाएँ हैं। उन्होंने लिखा कि नारदीय में ध्रुव और प्रह्लाद की कथाएँ हैं और दूसरा भाग मोहिनी और राजा रुक्मांगद की कथा का है। उनके सारांश में राजा अपने पुत्र को मार देता है; पर GRETIL पाठ में अध्याय 34 का नाम ही "पुत्र-वध को उद्यत रुक्मांगद को भगवान का दर्शन" है, और वहाँ भगवान प्रकट होकर तीनों को अपने में ले लेते हैं।

काल के बारे में Wilson का तर्क यह था कि यह पुराण भागवत के वक्ताओं शुक और परीक्षित का उल्लेख करता है, इसलिए भागवत के बाद का है; और इसके अंतिम वाक्य में कहा गया है कि इसे "गो-घातकों" और देवताओं की निंदा करने वालों के सामने न पढ़ा जाए, जिससे उन्होंने अनुमान लगाया कि यह भारत में मुस्लिम शासन के समय का, शायद सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी का, संकलन है। यह 1840 का एक विद्वान का अनुमान है; आज के बड़े पाठ में अनेक परतें हो सकती हैं।

महत्व और आज के लिए अर्थ

नारद पुराण एक साथ तीन काम करता है। यह भक्त के लिए एकादशी, हरि-नाम और व्रतों का मार्गदर्शक है; विद्यार्थी के लिए वेदांगों, यानी व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद, का संक्षिप्त परिचय; और पुराणों के जिज्ञासु के लिए अठारहों पुराणों की विषय-सूची। इतनी विविधता के कारण यह पुराण-साहित्य के लिए एक संदर्भ-ग्रंथ जैसा है।

और रुक्मांगद की कथा, जिसमें यमराज ख़ुद शिकायत लेकर ब्रह्मा के पास जाते हैं क्योंकि एक राजा की भक्ति से नरक ख़ाली हो गए, एक मीठा संदेश देती है: सच्ची भक्ति केवल अपना नहीं, पूरे समाज का उद्धार कर सकती है।

आगे पढ़ें

  • श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
  • व्याकरण — वेदांगों की परंपरा
  • वेद व्यास — शुक के जन्म की कथा
  • श्रीकृष्ण — कृष्ण के मंत्र और सहस्रनाम

स्रोत एवं संदर्भ

नारद पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न