वेद का अंग: व्याकरण
मुण्डक उपनिषद में अंगिरस शौनक को "अपरा विद्या" गिनाते हैं। उसमें चार वेदों के साथ शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष हैं।
विष्णु पुराण भी चौदह विद्याओं में छह वेदाङ्ग गिनाता है। अनुवाद के कोष्ठक में उनके नाम हैं, और उनमें व्याकरण भी है।
अनुवादक श्रीश चन्द्र वसु की भूमिका भी यही कहती है। व्याकरण वेदाङ्गों में गिना जाता है, और उनमें सबसे ज़रूरी है।
वसु के अनुसार पाणिनि के सूत्रों में लगभग वह सब है, जो वेद की भाषा समझने के लिए चाहिए। उनके सूत्र वेद-भाष्यों, काव्यों और धर्म-ग्रंथों में बार-बार उद्धृत होते हैं।
वसु ने अष्टाध्यायी की तुलना यूक्लिड की ज्यामिति से की है। जो काम यूक्लिड ने पश्चिम की बुद्धि के लिए किया, वही अष्टाध्यायी ने भारत में किया।
उन्होंने मैक्स मूलर का मत भी दिया है। पाणिनि के "आठ अध्यायों के नियमों की अद्भुत रचना" जैसा व्याकरण किसी भाषा में नहीं।
एक बात साफ़ कह दें। हमने जो ग्रंथ पढ़े, वे पाणिनि के जन्म, स्थान या जीवन के बारे में कुछ नहीं कहते। इसलिए यहाँ उनकी जीवन-कथा नहीं, केवल उनका काम है।
"अथ शब्दानुशासनम्" — ग्रंथ कैसे शुरू होता है
अष्टाध्यायी का पहला वाक्य है — "अथ शब्दानुशासनम्", यानी "अब शब्दों की व्याख्या।" वसु के अनुसार "अथ" शुरुआत बताता है, और "अनुशासन" का अर्थ है किसी शास्त्र की व्याख्या।
फिर बताया गया है कि सूत्र छह प्रकार के होते हैं। संज्ञा यानी परिभाषा, परिभाषा यानी व्याख्या का नियम, और विधि यानी सामान्य नियम।
बाकी तीन हैं नियम, अधिकार और अतिदेश। नियम किसी विधि को सीमित करता है। अधिकार आगे के कई सूत्रों पर लागू होता है। अतिदेश किसी नियम को दूसरी जगह भी लगाता है।
अनुवाद काशिका-वृत्ति पर आधारित है, जिसके रचयिता जयादित्य और वामन माने जाते हैं। वसु लिखते हैं कि उन्होंने इन्हीं टीकाकारों के पीछे-पीछे चलकर अनुवाद किया।
चौदह सूत्र: अक्षरों की एक अनोखी सूची
ग्रंथ के आरंभ में चौदह छोटे सूत्र हैं, जिन्हें प्रत्याहार-सूत्र कहते हैं। वे हैं — अइउण्, ऋऌक्, एओङ्, ऐऔच्, हयवरट्, लण्, ञमङणनम्, झभञ्, घढधष्, जबगडदश्, खफछठथचटतव्, कपय्, शषसर्, हल्।
वसु के अनुसार इनमें व्याकरण के काम के लिए संस्कृत के अक्षरों का क्रम है। अनुस्वार और विसर्ग इस सूची में नहीं हैं।
हर सूत्र के अंत का व्यंजन (ण्, क्, ङ्…) केवल संकेत है, गिनती में नहीं आता। व्यंजनों के साथ लगा "अ" भी केवल बोलने की सुविधा के लिए है।
इन्हीं से "प्रत्याहार" बनते हैं। किसी अक्षर को किसी संकेत-अक्षर से जोड़ दो, तो वह नाम बीच के सारे अक्षरों का हो जाता है।
जैसे "अच्" यानी सारे स्वर, और "हल्" यानी सारे व्यंजन। पूरे ग्रंथ के नियम इन्हीं छोटे नामों से लिखे गए हैं, इसलिए सूत्र इतने छोटे हैं।
पहले सूत्र: वृद्धि और गुण
पहला सूत्र है "वृद्धिरादैच्"। इसका अर्थ है — आ, ऐ और औ "वृद्धि" कहलाते हैं। यानी ग्रंथ एक परिभाषा से शुरू होता है।
वसु इसका उदाहरण देते हैं। "उपगु" नाम के एक ऋषि थे, और उनके पुत्र को "औपगव" कहते हैं। यहाँ "उ" बढ़कर "औ" हुआ — यही वृद्धि है।
उसी सूत्र की व्याख्या में मात्राएँ बताई गई हैं। छोटे स्वर की एक मात्रा, लंबे की दो, और व्यंजन की आधी।
दूसरा सूत्र "अदेङ् गुणः" है — अ, ए और ओ "गुण" कहलाते हैं। तीसरा सूत्र बताता है कि गुण या वृद्धि कहने पर बदलाव केवल इ, उ, ऋ और ऌ स्वरों में होगा।
सूत्रों में ऋषियों के नाम
अष्टाध्यायी कई जगह पुराने आचार्यों के मत नाम लेकर देती है। सूत्र 1.1.16–17 में "ऋषि शाकल्य के मत से" एक संधि-नियम है।
सूत्र 1.2.25 में "ऋषि काश्यप के मत से" एक नियम है। सूत्र 3.4.112 में "केवल शाकटायन के मत में" एक रूप बताया गया है।
वसु बताते हैं कि किसी ऋषि का नाम लेने के दो उद्देश्य होते हैं। या तो नियम को वैकल्पिक बनाना, या केवल उस ऋषि का सम्मान करना।
उनके अनुसार सूत्र 1.2.25 में काश्यप का नाम सम्मान के लिए है। यानी पाणिनि ने नियम के साथ अपने पूर्व आचार्य को भी याद किया।
पाणिनि की गोत्र-परिभाषा
गोत्र शब्द की सबसे साफ़ परिभाषा अष्टाध्यायी देती है। सूत्र 4.1.162 कहता है — पौत्र या उससे आगे की संतान "गोत्र" कहलाती है।
वसु इसे गर्ग के उदाहरण से समझाते हैं। गर्ग का पुत्र "गार्गि" कहलाएगा। पर पौत्र और उससे आगे की हर पीढ़ी गर्ग के संदर्भ में "गार्ग्य" है।
यानी पुत्र गोत्र नहीं कहलाता, पौत्र से गोत्र शुरू होता है। अगला सूत्र 4.1.163 कहता है कि जब तक पिता-पितामह की पंक्ति में कोई जीवित हो, तब तक वह वंशज "युवा" कहलाता है।
सूत्र 4.1.105 में "गर्ग आदि" शब्दों की एक लंबी सूची है, जिनसे गोत्र-वंशज का नाम बनता है। उसी की टिप्पणी में एक रोचक बात है।
जमदग्नि के पुत्र परशुराम "जामदग्न्य" कहलाते हैं, और पराशर के पुत्र व्यास "पाराशर्य"। पुत्र होने पर भी इन्हें गोत्र-रूप दिया गया — वसु इन्हें अपवाद बताते हैं।
जन्म का वंश, विद्या का वंश
सूत्र 2.1.19 की व्याख्या में "वंश" का अर्थ दिया गया है — एक मूल से चली अटूट पंक्ति, चाहे जन्म से हो या विद्या से।
वसु लिखते हैं कि गुरु-शिष्य की परंपरा भी उतना ही वंश है, जितनी पिता-पुत्र की। उस पंक्ति में जन्मा "वंश्य" कहलाता है।
इसका उदाहरण व्याकरण से ही है। "द्विमुनि व्याकरण" — जिसके दो मुख्य आचार्य हैं, पाणिनि और पतञ्जलि। और "त्रिमुनि" — जिसमें तीसरे आचार्य के लिए वसु "शाकटायन या कात्यायन" लिखते हैं।
यानी इस ग्रंथ की दृष्टि में परंपरा केवल जन्म से नहीं, विद्या से भी चलती है।
| सूत्र | क्या कहता है | स्रोत |
|---|---|---|
| आरंभ | "अथ शब्दानुशासनम्" — अब शब्दों की व्याख्या | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), पहला पृष्ठ |
| चौदह सूत्र | अइउण् से हल् तक अक्षरों का क्रम | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), पहला पृष्ठ |
| 1.1.1 | आ, ऐ, औ — वृद्धि | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 1.1.1 |
| 1.1.2 | अ, ए, ओ — गुण | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 1.1.2 |
| 1.1.71 | प्रत्याहार कैसे बनते हैं | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 1.1.71 |
| 1.2.25 | ऋषि काश्यप का मत (सम्मान के लिए) | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 1.2.25 |
| 2.1.19 | वंश — जन्म से या विद्या से | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 2.1.19 |
| 4.1.162 | पौत्र से आगे की संतान — गोत्र | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 4.1.162 |
| 4.1.163 | पूर्वज जीवित हों, तो वंशज "युवा" | अष्टाध्यायी (Vasu अनु.), सूत्र 4.1.163 |
