ऋषि रचते नहीं, देखते हैं
ऋग्वेद के हर सूक्त के ऋषि, देवता और छन्द की सबसे पुरानी सूची है सर्वानुक्रमणी। उसके अंत में लिखा है कि यह कात्यायन मुनि की रचना है।
आरंभ में ही वह बताती है कि यह ऋग्वेद की शाकल शाखा के सूक्तों की सूची है। हर सूक्त का आरंभिक शब्द, ऋचाओं की संख्या, ऋषि, देवता और छन्द।
फिर तीन परिभाषाएँ आती हैं। "यस्य वाक्यं स ऋषिः" — जिसके वचन हैं, वह ऋषि। "या तेनोच्यते सा देवता" — जिसके बारे में कहा गया, वह देवता।
और "यदक्षरपरिमाणं तच्छन्दः" — अक्षरों की जो नाप है, वह छन्द। अगला सूत्र कहता है कि कुछ पाने की इच्छा से ऋषि छन्दों के सहारे देवताओं के पास गए।
हर मण्डल के बारे में सर्वानुक्रमणी एक ही क्रिया लिखती है — "अपश्यत्", यानी देखा। जैसे "वसिष्ठ ने सातवाँ मण्डल देखा।" ऋषि को मन्त्र का द्रष्टा कहने का यही आधार है।
मत्स्य पुराण भी यही कहता है। कठिन तप करने वाले ऋषियों के सामने मन्त्र स्वयं प्रकट हुए। इसलिए वे मन्त्र के रचयिता नहीं, द्रष्टा कहलाए।
ऋषि का नाम जानना क्यों ज़रूरी माना गया
सर्वानुक्रमणी कहती है कि इस ज्ञान के बिना श्रौत और स्मार्त कर्म सिद्ध नहीं होते। जो मन्त्रों के ऋषि, छन्द और देवता जानकर पढ़ता-पढ़ाता है, उसे कल्याण मिलता है।
जो बिना जाने मन्त्र बरतता है, उसके लिए चेतावनी भी है। वह खूँटे से टकराता है, गड्ढे में गिरता है, या मरता है — ऐसा परंपरा से जाना जाता है।
दूसरे से सातवें मण्डल तक: छह ऋषि-कुल
दूसरा मण्डल गृत्समद का है। सर्वानुक्रमणी बताती है कि वे पहले आङ्गिरस शौनहोत्र थे, फिर भार्गव शौनक हुए, और उन्होंने दूसरा मण्डल देखा।
तीसरे मण्डल के पीछे एक छोटी कथा है। कुशिक ऐषीरथि ने इन्द्र जैसा पुत्र चाहकर ब्रह्मचर्य का पालन किया, और इन्द्र ही गाथी बनकर जन्मे।
गाथी के पुत्र विश्वामित्र थे, और उन्होंने तीसरा मण्डल देखा।
चौथा मण्डल वामदेव गौतम ने देखा। पाँचवें मण्डल के लिए नियम है — जहाँ गोत्र न कहा हो, वहाँ ऋषि को आत्रेय यानी अत्रि-वंशी जानो।
छठा मण्डल बृहस्पति-पुत्र भरद्वाज ने देखा, और सातवाँ वसिष्ठ ने। सातवें के अंत में लिखा है — "इति वासिष्ठं मण्डलं समाप्तम्।"
| मण्डल | द्रष्टा | सर्वानुक्रमणी का वचन | स्रोत |
|---|---|---|---|
| 1 | अनेक ऋषि ("शतर्चिन्") | "शतर्चिन आद्ये मण्डले" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 1, 13 |
| 2 | गृत्समद (भार्गव शौनक) | "गृत्समदो द्वितीयं मण्डलमपश्यत्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 13 |
| 3 | विश्वामित्र (गाथी के पुत्र) | "विश्वामित्रः स तृतीयं मण्डलमपश्यत्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 14–15 |
| 4 | वामदेव गौतम | "वामदेवो गौतमश्चतुर्थं मण्डलमपश्यत्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 17 |
| 5 | आत्रेय (अत्रि-वंश) | "पञ्चमे मण्डलेऽनुक्तगोत्रमात्रेयं विद्यात्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 19 |
| 6 | भरद्वाज (बृहस्पति के पुत्र) | "बार्हस्पत्यो भरद्वाजः षष्ठं मण्डलमपश्यत्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 22 |
| 7 | वसिष्ठ | "सप्तमं मण्डलं वसिष्ठोऽपश्यत्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 24 |
| 8 | मुख्यतः काण्व (कण्व-वंश) | "ऋषिश्चानुक्तगोत्रः प्राग्भृत्यात्काण्वः" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 27 |
| 9 | अनेक ऋषि; सब सूक्त सोम पवमान के | "नवमं मण्डलं समाप्तम्" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 36; ऋग्वेद, खण्ड 2 (Griffith अनु.), Book IX, सूक्तों के शीर्षक "Soma Pavamana" |
| 10 | अनेक ऋषि (छोटे-बड़े सूक्त) | "अन्त्ये क्षुद्रसूक्तमहासूक्ताः" | सर्वानुक्रमणी (Macdonell सं.), 1, 46 |
कुल-मण्डलों के कुछ प्रसिद्ध मन्त्र
तीसरे मण्डल के सूक्त 3.62 में अलग-अलग देवताओं के लिए तीन-तीन मन्त्रों के समूह हैं, जिनमें एक सविता का है। चौथे मन्त्र से आगे सब गायत्री छन्द में हैं।
उसी सविता-समूह का पहला मन्त्र है 3.62.10 — "हम सविता देव के उस श्रेष्ठ तेज को पाएँ। वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।" यही मन्त्र आज गायत्री-मन्त्र के नाम से जाना जाता है।
बृहदारण्यक उपनिषद कहता है कि आचार्य शिष्य को "सावित्री" मन्त्र सिखाते हैं। मैक्स मूलर की टिप्पणी के अनुसार यह आठ वर्ष के बालक को, शब्द-शब्द दोहराकर सिखाया जाता था।
इसी मण्डल में विश्वामित्र और नदियों का संवाद (3.33) है। सर्वानुक्रमणी बताती है कि विश्वामित्र नदी पार करना चाहते थे, और कुछ मन्त्र नदियों के वचन हैं।
सूक्त 3.53 के कुछ मन्त्रों पर एक अनोखी टिप्पणी है। वे वसिष्ठ के विरोध में हैं, और वसिष्ठ-वंशी उन्हें नहीं सुनते। विश्वामित्र-वसिष्ठ का पुराना विरोध यहाँ भी दिखता है।
वसिष्ठ के सातवें मण्डल में सूक्त 7.59 का अंतिम मन्त्र रुद्र का है। सर्वानुक्रमणी उसे "मृत्युविमोचनी" कहती है, यानी मृत्यु से छुड़ाने वाला।
वह मन्त्र है 7.59.12 — "त्र्यम्बक की हम उपासना करते हैं… ककड़ी जैसे बेल से छूटती है, वैसे मैं मृत्यु से छूटूँ। अमृत से नहीं।" इसे आज महामृत्युंजय कहते हैं।
उसी मण्डल में 7.103 मेंढकों का सूक्त है। सर्वानुक्रमणी कहती है कि वर्षा से प्रसन्न मेंढकों की, ऋषि ने पर्जन्य की स्तुति के रूप में प्रशंसा की।
भरद्वाज के मण्डल का अंतिम सूक्त 6.75 युद्ध का है। उसमें पायु भारद्वाज ने कवच, धनुष, डोरी, तरकश, सारथि और रथ — सबकी अलग-अलग स्तुति की।
पहला और आठवाँ मण्डल: कई ऋषि, कई कुल
सर्वानुक्रमणी के अनुसार पहले मण्डल के ऋषि "शतर्चिन्" हैं, अंतिम मण्डल के ऋषि छोटे-बड़े सूक्तों वाले, और बीच के मण्डलों के "माध्यम"।
ऋग्वेद का पहला सूक्त, "अग्निमीळे", मधुच्छन्दा वैश्वामित्र यानी विश्वामित्र-वंशी मधुच्छन्दा का है। सूक्त 1.12 कण्व-वंशी मेधातिथि का है।
इसी मण्डल में कण्व घौर (1.36 से), कुत्स (1.94, 1.101) और अगस्त्य के सूक्त हैं। सूक्त 1.166 पर अगस्त्य और वसिष्ठ के जन्म की कथा भी लिखी है।
आठवें मण्डल के आरंभिक भाग के लिए नियम है कि जहाँ गोत्र न कहा हो, वहाँ ऋषि काण्व हैं। पहले सूक्त पर एक कथा है — कण्व के भाई प्रगाथ घौर कण्व के पुत्र बन गए।
स्त्रियाँ भी मन्त्र-द्रष्टा
सूक्त 1.179 लोपामुद्रा और अगस्त्य का संवाद है। सर्वानुक्रमणी के अनुसार पास रहने वाले एक ब्रह्मचारी शिष्य ने यह संवाद सुना, और अंतिम मन्त्र देखे।
सूक्त 8.1 के अंतिम मन्त्र से आङ्गिरसी शश्वती ने अपने पति आसंग की प्रसन्न होकर स्तुति की।
सूक्त 8.91 के सात मन्त्र अत्रि-वंश की कन्या अपाला के हैं, और सर्वानुक्रमणी इसे "इतिहास" कहती है। सूक्त 10.10 के संवाद में यमी के वचन भी हैं।
यानी "यस्य वाक्यं स ऋषिः" का नियम सब पर एक है। जिसके वचन मन्त्र में हैं, वही उसका ऋषि है — पुरुष हो या स्त्री।
