लिंग पुराण: अलिंग से लिंग तक

ज्योति-स्तंभ के रूप में प्रकट शिव, ओंकार, पाशुपत योग, श्वेत और दधीचि की मृत्यु पर विजय, नंदी का जन्म, सुदर्शन चक्र, उपमन्यु और काशी

संक्षेप में

लिंग पुराण अठारह महापुराणों में ग्यारहवाँ है, जिसे पहले ब्रह्मा ने ईशान कल्प के प्रसंग में कहा था। यह शिव-उपासना का प्रमुख पुराण है: इसमें लिंग का दार्शनिक अर्थ, ब्रह्मा और विष्णु के बीच प्रकट अनंत ज्योति-स्तंभ, ओंकार, पाशुपत योग, नंदी, दधीचि, सुदर्शन चक्र, उपमन्यु और काशी की कथाएँ हैं।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में ग्यारहवाँ (विष्णु पुराण 3.6.22; लिंग 1.2.3 भी स्वयं को ग्यारहवाँ कहता है)
मूल वक्ता
ब्रह्मा, ईशान कल्प के वृत्तांत को लेकर (1.2.1); नैमिषारण्य में सूत, नारद की उपस्थिति में
श्लोक-संख्या
11,000 (लिंग 1.2.4; भागवत 12.13; मत्स्य 53 में भी 11,000)
विभाग
पूर्व भाग (108 अध्याय, GRETIL पाठ में 6,831 श्लोक) और उत्तर भाग (55 अध्याय, विकिस्रोत पाठ में लगभग 2,358 श्लोक)
केंद्रीय विचार
"अलिंग शिव हैं, लिंग शैव है": अव्यक्त से व्यक्त जगत, यही लिंग (1.3.1)
प्रसिद्ध कथाएँ
लिंगोद्भव, श्वेत मुनि, क्षुप-दधीचि, नंदी, शरभ, जलंधर, सुदर्शन, दारुक और तांडव, उपमन्यु
व्रत और मंत्र
पाशुपत व्रत, उमा-महेश्वर व्रत, पंचाक्षर (नमः शिवाय), शिव-सहस्रनाम

लिंग पुराण क्या है?

लिंग पुराण की कथा नैमिषारण्य से शुरू होती है। नारद मुनि शैलेश, संगमेश्वर, अविमुक्त, केदार, गोप्रेक्षक और ऐसे अनेक शिव-क्षेत्रों में लिंगों की पूजा करके नैमिषारण्य पहुँचे, और ऋषियों के बीच लिंग-माहात्म्य की कथा कहने लगे। तभी व्यास के शिष्य सूत वहाँ आए, और ऋषियों ने उनसे "लिंग-माहात्म्य से युक्त पुराण-संहिता" सुनाने की प्रार्थना की। सूत ने महादेव, ब्रह्मा, जनार्दन और व्यास को नमस्कार करके कथा शुरू की।

पुराण अपना परिचय भी देता है: यह उत्तम लिंग पुराण पहले ब्रह्मा ने ईशान कल्प के वृत्तांत को आधार बनाकर रचा था। देवलोक में पुराण सौ करोड़ श्लोकों का है, व्यासों ने उसे चार लाख में संक्षिप्त किया और अठारह भागों में बाँटा, जिनमें लिंग ग्यारहवाँ है। "इसका ग्रंथ-मान यहाँ ग्यारह हज़ार श्लोक है।" भागवत भी लिंग की संख्या ग्यारह हज़ार ही बताता है, और विष्णु पुराण की सूची में भी यह ग्यारहवाँ है।

मत्स्य पुराण के अनुसार लिंग वह पुराण है जिसमें अग्नि-लिंग में स्थित महेश्वर ने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उपदेश किया। Wilson ने लिखा कि आज का लिंग पुराण इस वर्णन से अच्छी तरह मेल खाता है: ग्यारह हज़ार श्लोक, ब्रह्मा का रचा हुआ, और उसका मूल लिंग एक तेजोमय स्तंभ है जिसमें महेश्वर विराजते हैं। अंतर केवल कल्प के नाम में है।

अस्यैकादशसाहस्रे ग्रन्थमानमिह द्विजाः । तस्मात्संक्षेपतो वक्ष्ये न श्रुतं विस्तरेण यत् ॥

हे द्विजो, यहाँ इसका ग्रंथ-मान ग्यारह हज़ार (श्लोक) है; इसलिए जो विस्तार से नहीं सुना गया, उसे मैं संक्षेप में कहूँगा।

— लिंग पुराण, पूर्व भाग (अध्याय 1–108) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.2.4

लिंग का अर्थ: अलिंग और लिंग

लिंग पुराण का तीसरा अध्याय एक वाक्य से शुरू होता है जो पूरे पुराण की कुंजी है: "अलिंग लिंग का मूल है; अव्यक्त को लिंग कहा जाता है। अलिंग शिव कहे गए हैं, और लिंग शैव (शिव से उत्पन्न) माना गया है।" फिर समझाया गया है: जो गंध, रंग, रस, शब्द और स्पर्श से रहित, निर्गुण, ध्रुव और अक्षय है, वह अलिंग है, शिव का लक्षण। और जो गंध, रंग, रस, शब्द, स्पर्श से युक्त है, जगत की योनि, स्थूल और सूक्ष्म महाभूत, जगत का शरीर, वह लिंग है, जो अलिंग से अपने आप प्रकट हुआ।

यानी लिंग पुराण में "लिंग" का पहला अर्थ "चिह्न" या "प्रकट रूप" है: अदृश्य शिव का दृश्य जगत में प्रकट होना। सत्रहवें अध्याय में ब्रह्मा भी यही कहते हैं: "लिंग क्या है और लिंगी कौन? प्रधान (प्रकृति) को लिंग कहा गया है, और लिंगी परमेश्वर हैं।" पुराण पूजा के लिंग को इसी बड़े सत्य का प्रतीक मानता है।

Wilson ने 1840 में यूरोपीय लेखकों की ग़लत धारणाओं का खंडन करते हुए लिखा कि लिंग पुराण में लिंग-उपासना पूरी तरह "रहस्यात्मक और आध्यात्मिक" है। उनके अनुसार लिंग दो प्रकार का है, बाहरी और भीतरी: जिन्हें दृश्य चिह्न चाहिए वे लकड़ी या पत्थर के "चिह्न" (लिंग शब्द का सही अर्थ) से शिव को पूजते हैं, और ज्ञानी मन में उस अदृश्य चिह्न का ध्यान करते हैं जो स्वयं शिव है। पुराण का अपना वाक्य इससे मेल खाता है: प्रभु का साकार रूप सब मनुष्यों के ध्यान के योग्य है, और निष्कल रूप केवल योगियों के लिए।

अलिङ्गो लिङ्गमूलं तु अव्यक्तं लिङ्गमुच्यते । अलिङ्गः शिव इत्युक्तो लिङ्गं शैवमिति स्मृतम् ॥

अलिंग (जिसका कोई चिह्न नहीं) लिंग का मूल है; अव्यक्त को लिंग कहते हैं। अलिंग को शिव कहा गया है, और लिंग को शैव (शिव से उत्पन्न) माना गया है।

— लिंग पुराण, पूर्व भाग (अध्याय 1–108) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.3.1

लिंगोद्भव: ब्रह्मा और विष्णु के बीच ज्योति-स्तंभ

लिंगोद्भव की कथा पुराण में स्वयं ब्रह्मा देवताओं को सुनाते हैं। प्रलय के बाद सब एक अंधकारमय समुद्र था, और उसमें हज़ार सिर, हज़ार आँखों वाले नारायण सो रहे थे। माया से मोहित ब्रह्मा ने उन्हें हाथ से झकझोरकर जगाया और पूछा, "तुम कौन हो?" विष्णु ने मुस्कुराकर कहा, "आओ, वत्स पितामह।" ब्रह्मा इस "वत्स" से क्रोधित हुए: "मैं जगत का कर्ता हूँ, मुझे वत्स क्यों कहते हो?" विष्णु ने कहा, "तुम मेरे ही अंग से उत्पन्न हुए हो; मैं ही परब्रह्म हूँ।" दोनों के बीच प्रलय-समुद्र में रोंगटे खड़े कर देने वाला युद्ध छिड़ गया।

तभी उनके विवाद को शांत करने और उन्हें जगाने के लिए उनके सामने एक लिंग प्रकट हुआ: हज़ारों ज्वालाओं से घिरा, सैकड़ों प्रलय-अग्नियों जैसा, जिसका न आदि था, न मध्य, न अंत। विष्णु ने कहा, "इस अग्नि-स्तंभ की परीक्षा करें: मैं नीचे जाता हूँ, तुम ऊपर जाओ।" विष्णु ने दस योजन चौड़े, सौ योजन लंबे, मेरु जैसे काले वराह का रूप लिया और नीचे गए; ब्रह्मा सफ़ेद हंस बनकर मन और वायु के वेग से ऊपर उड़े। ब्रह्मा कहते हैं, "तभी से मुझे हंस कहते हैं।" हज़ार वर्ष तक चलकर भी वराह को स्तंभ का मूल नहीं मिला, और ब्रह्मा भी थककर, अंत न पाकर नीचे लौट आए।

दोनों ने मिलकर उस स्तंभ को प्रणाम किया। तभी "ॐ" का स्पष्ट प्लुत नाद गूँजा। लिंग के दक्षिण भाग में सूर्य-मंडल जैसा "अ", उत्तर में अग्नि जैसा "उ", बीच में चंद्र-मंडल जैसा "म", और उनके ऊपर शुद्ध स्फटिक जैसे प्रभु दिखे: तुरीय से परे, निष्कल, बाहर-भीतर से रहित और फिर भी सबके बाहर-भीतर। तीन मात्राएँ और अर्धमात्रा ऋग्, यजुः और साम वेद थीं। विष्णु ने वेद-शब्दों से ही उस परमेश्वर का चिंतन किया, जिस तक मन सहित वाणी भी नहीं पहुँचती और जो केवल एकाक्षर (ॐ) से कहे जाते हैं।

अगले अध्यायों में ब्रह्मा और विष्णु ओंकार-रूप रुद्र की स्तुति करते हैं ("एकाक्षर रुद्र को, अकार-रूप आत्मा को, उकार-रूप आदिदेव को नमस्कार"), और महादेव प्रसन्न होकर कहते हैं, "मैं तुम दोनों से प्रसन्न हूँ; मुझे देखो और सब भय छोड़ दो।" Wilson ने भी इस कथा का सार यही बताया: लिंग पर ॐ दिखता है, उससे वेद निकलते हैं, और उन्हीं से ब्रह्मा और विष्णु को ज्ञान होता है। ध्यान दें कि इस पुराण के पाठ में ब्रह्मा के झूठ बोलने या केतकी के फूल का कोई प्रसंग नहीं है; ब्रह्मा स्वयं मानते हैं कि वे अंत नहीं पा सके।

संरचना: पूर्व भाग के 108 अध्याय

लिंग पुराण दो भागों में है: पूर्व भाग और उत्तर भाग। पूर्व भाग बड़ा है, 108 अध्याय और 6,831 श्लोक (GRETIL पाठ); उत्तर भाग 55 अध्यायों का है, और संस्कृत विकिस्रोत के पाठ में उसके अध्यायों के श्लोक जोड़ने पर लगभग 2,358 श्लोक बनते हैं। यानी आज के पाठ में कुल लगभग 9,190 श्लोक हैं, जबकि पुराण स्वयं अपना मान ग्यारह हज़ार बताता है। दोनों भागों के विषय नीचे अलग-अलग दिए गए हैं।

दूसरे अध्याय में पुराण अपनी पूरी अनुक्रमणिका देता है, और उसकी लंबी सूची से पता चलता है कि यह कितना व्यापक है: सृष्टि, अंड और उसके आठ आवरण, युग और कल्प, ब्रह्मा-विष्णु विवाद और लिंगोद्भव, शिलाद का तप, व्यास-अवतार, लिंग की आराधना और स्नान-विधि, वाराणसी-माहात्म्य, दक्ष का शाप, पाशुपत योग, युग-धर्म, शिव का विवाह, नंदी का जन्म, पशु-पाश विचार, वसिष्ठ-वंश और पराशर, भुवन और ग्रह, जीवित-श्राद्ध, पंचयज्ञ, प्रायश्चित्त, नरक, दान, पंचाक्षर-कल्प, वृत्र-इंद्र युद्ध, श्वेत और मृत्यु, देवदारु वन, क्रम-संन्यास, कृष्ण-कथा, जलंधर-वध और सुदर्शन की उत्पत्ति, शिवलोक और पाताल में हाटकेश्वर।

लिंग पुराण, पूर्व भाग: अध्याय और विषय (GRETIL पाठ के अनुसार)
अध्यायविषयस्रोत
1–2नैमिषारण्य में नारद और सूत; पुराण की अनुक्रमणिकालिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.1–1.2
3–10अलिंग और लिंग; प्राकृत सृष्टि; ब्रह्मा की सृष्टि; अग्नियाँ; शिव का प्रभाव; योग-स्थान और योग के विघ्नलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.3–1.10
11–16सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष, ईशान का दर्शन; रक्त, पीत, असित, विश्वरूप कल्पलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.11–1.16
17–24लिंगोद्भव और ओंकार; पद्म कल्प; विष्णु-ब्रह्मा की स्तुति; शिव के 28 अवतारलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.17–1.24
25–28लिंग-पूजा, स्नान, गायत्री का आवाहन, लिंगार्चन-विधिलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.25–1.28
29–36दारुवन; श्वेत मुनि और मृत्युंजय; क्षुप और दधीचि, महामृत्युंजय मंत्रलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.29–1.36
37–45शिलाद का तप और नंदी का जन्म, गणों का अभिषेक; कलियुगलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.37–1.45
46–62भुवन-कोश: द्वीप, मेरु, नदियाँ, ग्रह-चार, सूर्य-चंद्र के रथ, ध्रुवलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.46–1.62
63–69देव-दानव उत्पत्ति; शक्ति, वसिष्ठ और पराशर; सूर्य और चंद्र वंश, यदु-वंशलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.63–1.69
70–74आदि सर्ग विस्तार से; त्रिपुर-दाह; देवताओं के अपने-अपने लिंगलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.70–1.74
75–91निष्कल-सकल शिव, लिंग-प्रतिष्ठा; पाशुपत व्रत; व्यपोहन स्तव; उमा-महेश्वर व्रत; पंचाक्षर; ध्यान-यज्ञ; योग-सिद्धियाँ; शौच; यतियों का प्रायश्चित्त; मृत्यु के संकेतलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.75–1.91
92वाराणसी (अविमुक्त) का माहात्म्यलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.92
93–98अंधक; हिरण्याक्ष और वराह; हिरण्यकशिपु और नरसिंह; शरभ; जलंधर; विष्णु को सुदर्शन चक्रलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.93–1.98
99–108सती और पार्वती, शिव-विवाह; विनायक का जन्म; दारुक-वध और तांडव; उपमन्यु; कृष्ण को पाशुपत व्रतलिंग पुराण (मूल संस्कृत), 1.99–1.108

उत्तर भाग: विष्णु-भक्तों की कथाएँ, शिव की अष्टमूर्ति और महादान

उत्तर भाग की शुरुआत चौंकाती है, क्योंकि शिव के इस पुराण का उत्तर भाग विष्णु-भक्ति की कथाओं से खुलता है। ऋषि पूछते हैं कि कृष्ण किससे प्रसन्न होते हैं, और सूत वह कथा सुनाते हैं जो मार्कण्डेय ने राजा अंबरीष को सुनाई थी। त्रेता युग में कौशिक नाम का एक ब्राह्मण विष्णु-क्षेत्र में ताल, लय और स्वर के साथ हरि का गान करता था। पद्माक्ष नाम के ब्राह्मण ने उसे भोजन दिया, मालव नाम का वैश्य रोज़ दीपमाला सजाता था, और उसकी पत्नी मालवी मंदिर को गोबर से लीपती थी।

कलिंग के राजा ने कौशिक से अपना यश गाने को कहा। कौशिक ने उत्तर दिया, "मेरी जिह्वा और वाणी हरि के सिवा किसी की स्तुति नहीं करेंगी," और उसके शिष्यों ने भी यही कहा। राजा ने ज़बरदस्ती अपना गान सुनवाना चाहा, तो ब्राह्मणों ने कानों में लकड़ी की कीलें डाल लीं, और कौशिक और उसके साथियों ने अपनी जिह्वा के अग्रभाग काट लिए। देश-निकाला मिला, और समय आने पर मृत्यु। तब ब्रह्मा ने स्वयं उनका स्वागत किया और उन्हें विष्णुलोक ले गए; विष्णु ने कौशिक को अपने लोक में रहने का वर दिया, उसके साथी कुशस्थल के ब्राह्मणों को साध्य देवता बनाया, पद्माक्ष को धन का स्वामी बनाया, और मालव और मालवी को अपने लोक में स्थान दिया। विष्णु ने कहा, "कौशिक के गान से मेरी योगनिद्रा भी चली गई।"

उसी सभा में लक्ष्मी के आने पर तुंबरु बुलाए गए और उनका सम्मान हुआ, पर नारद बाहर रह गए। दुखी नारद ने हज़ार दिव्य वर्ष तप किया, और तीसरे अध्याय में उन्हें गान-विद्या में तुंबरु जैसी सिद्धि मिलने की कथा है। चौथा अध्याय विष्णु-भक्त के लक्षण बताता है: जहाँ विष्णु-भक्त है, वहाँ नारायण हैं; हरि-कीर्तन पर जिसे रोमांच हो, कंप और आँसू आएँ। पाँचवें में राजा अंबरीष की पुत्री श्रीमती की कथा है, और छठे में अलक्ष्मी की।

श्रीमती की कथा शिव पुराण वाली कथा का दूसरा रूप है। यहाँ नारद और पर्वत, दोनों मुनि, अंबरीष की पुत्री श्रीमती से विवाह चाहते हैं। राजा कहते हैं कि कन्या जिसे वरे, उसी को दूँगा। दोनों अलग-अलग जाकर विष्णु से गुप्त प्रार्थना करते हैं कि दूसरे का मुख वानर जैसा कर दें, और विष्णु दोनों की बात मान लेते हैं। स्वयंवर में श्रीमती को दोनों के मुख वानर के दिखते हैं, और उनके बीच खड़ा एक सुंदर, लंबी भुजाओं वाला पुरुष; वह उसी को माला पहनाती है और अदृश्य हो जाती है, क्योंकि विष्णु उसे ले गए। दोनों मुनि राजा को अंधकार का शाप देते हैं, विष्णु का चक्र उन्हें दौड़ाता है, और अंत में विष्णु दोनों पक्षों का हित करते हैं।

अलक्ष्मी की कथा में बताया गया है कि समुद्र-मंथन में विष के बाद, और श्री (लक्ष्मी) से पहले, अशुभ अलक्ष्मी निकलीं, इसलिए वे "ज्येष्ठा" कहलाईं, और दुःसह नाम के मुनि ने उनसे विवाह किया। मार्कण्डेय दुःसह को बताते हैं कि अलक्ष्मी कहाँ न जाएँ: जहाँ "नारायण, हृषीकेश, गोविंद" और "रुद्र, शिव, शंकर, महादेव" के नाम लिए जाते हों, वेद-घोष और होम का धुआँ हो, भस्म लगाए लोग हों, और जिस घर में अग्निहोत्र, शिवलिंग, वासुदेव की मूर्ति या चंडिका हों। विष्णु और शिव के नाम यहाँ एक साथ, एक ही रक्षा के रूप में आते हैं।

सातवें और आठवें अध्याय मंत्रों के हैं: द्वादशाक्षर, अष्टाक्षर "नमो नारायण", और "ॐ नमः शिवाय" जैसे शिव-मंत्र। इसके बाद उत्तर भाग पूरी तरह शैव हो जाता है: पाशुपत व्रत, महेश्वर की महिमा, शिव और शिवा की विभूतियाँ, विश्वरूप, अष्टमूर्ति, पंचब्रह्म (सद्योजात आदि पाँच रूप), शिव-तत्त्व, शिव-पूजा, शैव दीक्षा, ध्यान, अर्चन, अघोर-पूजा और राजा का जयाभिषेक। ग्यारहवाँ अध्याय शिव और शिवा को हर जोड़े में देखता है: शिव अर्थ हैं और शिवा वाणी, शिव दिन और शिवा रात, शिव समुद्र और शिवा तट, शिव वृक्ष और शिवा लता।

अध्याय 28 से 44 तक महादानों की विधियाँ हैं: तुलापुरुष, हिरण्यगर्भ, तिल-पर्वत, सुवर्ण-मेदिनी, कल्पवृक्ष, हेम-धेनु, गो-सहस्र, कन्या-दान, गज-दान, लोकपालाष्टक और विष्णु-दान आदि। फिर जीवित रहते हुए अपना श्राद्ध (जीवच्छ्राद्ध), लिंग-प्रतिष्ठा, गायत्री-पूजा, अघोर-स्थापना और मंत्र, वज्रेश्वरी विद्या, षट्कर्म, मृत्युंजय विधि (रुद्राध्याय से घी, तिल, कमल, दूर्वा और दूध-मधु का होम), त्र्यंबक मंत्र से बाणलिंग या स्वयंभू लिंग की पूजा, और अंतिम अध्याय में योग के भेद और मोक्ष देने वाला ज्ञान।

अर्थः शंभुः शिवा वाणी दिवसोऽजः शिवा निशा ॥ ... समुद्रो भगवान् रुद्रो वेला शैलेन्द्रकन्यका ।

शंभु अर्थ हैं और शिवा वाणी; अजन्मा (शिव) दिन हैं और शिवा रात। ... भगवान रुद्र समुद्र हैं और पर्वतराज की कन्या (पार्वती) उसका तट।

— लिङ्गपुराणम् (पूर्वभाग और उत्तरभाग, विषयानुक्रमणिका सहित) — संस्कृत विकिस्रोत, पृष्ठ 2.11.4–2.11.6
शिव की अष्टमूर्ति: लिंग पुराण, उत्तर भाग, अध्याय 13 के अनुसार
नामरूपपत्नीपुत्रस्रोत
शर्वपृथ्वी (विश्वंभर)विकेशीअंगारक (मंगल)लिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.3–2.13.4
भवजल (लोकों को जीवन देने वाला)उमाशुक्रलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.5–2.13.6
पशुपतिअग्निस्वाहाषण्मुख (कार्तिकेय)लिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.7–2.13.8
ईशानवायुशिवामनोजवलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.9–2.13.10
भीमआकाशदसों दिशाएँसर्गलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.11–2.13.12
रुद्रसूर्यसुवर्चलाशनैश्चरलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.12–2.13.14
महादेवसोम (चंद्रमा)रोहिणीबुधलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.14–2.13.16
उग्र (ईशान भी)यजमानदीक्षासंतानलिंग पुराण (मूल संस्कृत, उत्तर भाग सहित), 2.13.16–2.13.18

लिंग में त्रिदेव, और देवताओं के अपने लिंग

लिंग पुराण लिंग के भीतर तीनों देवताओं को देखता है: लिंग के मूल में ब्रह्मा, बीच में तीनों लोकों के स्वामी विष्णु, और ऊपर प्रणव-रूप सदाशिव महादेव; और लिंग की वेदी (पीठ) त्रिगुणमयी महादेवी अंबिका है। जो वेदी सहित लिंग की पूजा करता है, उसने देवी और देव दोनों की पूजा कर ली।

उसी अध्याय में एक सुंदर सूची है कि ब्रह्मा की आज्ञा से विश्वकर्मा ने किस देवता को किस वस्तु का लिंग दिया: विष्णु इंद्रनील (नीलम) के लिंग की पूजा करते हैं, इंद्र पद्मराग (माणिक) की, कुबेर सोने की, विश्वेदेव चाँदी की, वायु पीतल की, अश्विनीकुमार मिट्टी की, वरुण स्फटिक की, आदित्य ताँबे की, चंद्रमा मोती की, अनंत आदि नाग मूँगे की, लक्ष्मी बेल-वृक्ष की, कार्तिकेय गोबर की, मुनि कुश के अग्रभाग की, सरस्वती रत्न की, और वेद दही की।

फिर लिंग के छह प्रकार बताए गए हैं: शैलज (पत्थर का), रत्नज, धातुज, दारुज (लकड़ी का), मृण्मय (मिट्टी का) और क्षणिक (थोड़ी देर के लिए बनाया गया), और इनके कुल चौवालीस भेद। पत्थर का लिंग सब सिद्धियाँ देने वाला और उत्तम, धातु का मध्यम कहा गया है; रत्न का लक्ष्मी देता है, धातु का धन, और लकड़ी का भोग। अंतिम वाक्य है: "अधिक क्या कहें, यह सारा चर-अचर जगत शिवलिंग की पूजा करके ही टिका है।"

मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः । रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः ॥ लिङ्गवेदी महादेवी त्रिगुणा त्रिमयांबिका ।

(लिंग के) मूल में ब्रह्मा, बीच में तीनों लोकों के स्वामी विष्णु, और ऊपर प्रणव कहलाने वाले सदाशिव महादेव रुद्र हैं; लिंग की वेदी त्रिगुणमयी महादेवी अंबिका है।

— लिंग पुराण, पूर्व भाग (अध्याय 1–108) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.74.19–1.74.20

मृत्यु पर विजय: श्वेत मुनि और दधीचि

श्वेत नाम के एक मुनि की आयु पूरी हो चुकी थी, और वे पर्वत की गुफा में भक्ति से "नमस्ते रुद्र" वाले रुद्राध्याय से शिव की स्तुति कर रहे थे। काल उन्हें ले जाने आया। श्वेत ने काल को देखकर भी त्र्यंबक का स्मरण करते हुए पूजा जारी रखी और कहा, "मृत्यु मेरा क्या करेगी? मैं तो मृत्यु की भी मृत्यु (के उपासक) का हूँ।" काल ने हँसकर कहा कि ब्रह्मा, विष्णु या रुद्र, कोई भी मेरे पकड़े हुए को नहीं बचा सकता, और पाश से श्वेत को बाँध लिया: "इस लिंग में बैठा तुम्हारा रुद्र तो निश्चेष्ट है, वह क्या करेगा?"

तभी स्वयं सदाशिव, त्रिनेत्र, अंबा, नंदी और गणों सहित प्रकट हुए। शिव की एक दृष्टि पड़ते ही बलवान काल मुनि के पास गिरकर मर गया। देवताओं ने शिव और उमा को प्रणाम किया, और आकाश से मुनि पर फूल बरसे। इसलिए पुराण कहता है: भोग और मोक्ष देने वाले मृत्युंजय शंकर की भक्ति से पूजा करो। फिर यह भी कहता है कि शिव की यह भक्ति दान, तप, विद्या, यज्ञ, होम, व्रत, वेद या योग-शास्त्र से नहीं, केवल उनकी कृपा से मिलती है।

दूसरी कथा दधीचि की है। ब्रह्मा की छींक से जन्मे राजा क्षुप दधीचि के मित्र थे, पर एक दिन दोनों में विवाद हुआ कि क्षत्रिय श्रेष्ठ है या ब्राह्मण। क्षुप ने कहा कि राजा आठों लोकपालों का शरीर धारण करता है, इसलिए पूज्य है। दधीचि ने बाएँ हाथ से उसके सिर पर प्रहार किया, और क्षुप ने वज्र से दधीचि को काट डाला। शुक्राचार्य ने योग से दधीचि का शरीर फिर जोड़ा और उन्हें शिव से मिला "मृतसंजीवन" मंत्र दिया: "त्र्यंबकं यजामहे..."। पुराण इस मंत्र के हर शब्द का अर्थ भी समझाता है: सुगंधि वैसे ही जैसे फूलों में सूक्ष्म गंध, और पुष्टिवर्धन इसलिए कि प्रकृति, विष्णु, ब्रह्मा और देवताओं की पुष्टि उन्हीं से है।

दधीचि ने तप करके शिव से वज्र जैसी अस्थियाँ, अवध्यता और अदीनता पाई, और इस बार पैर से क्षुप के सिर पर प्रहार किया; क्षुप का वज्र उन पर बेअसर रहा। क्षुप ने विष्णु की आराधना की, और विष्णु दधीचि से लड़ने आए। Wilson ने लिखा कि यह भागवत की अंबरीष-दुर्वासा कथा का उलटा है: यहाँ विष्णु का सुदर्शन चक्र दधीचि पर कुंठित होकर रह जाता है। पाठ में दधीचि कहते हैं, "यह शुभ चक्र तो भव (शिव) का दिया है, यह मुझे नहीं मारेगा।" अंत में ब्रह्मा ने बीच-बचाव किया, विष्णु लौट गए, क्षुप ने क्षमा माँगी, और वह स्थान स्थाणेश्वर तीर्थ बना।

किं करिष्यति मे मृत्युर्मृत्योर्मृत्युरहं यतः ।

(श्वेत मुनि:) मृत्यु मेरा क्या करेगी, जब मैं मृत्यु की भी मृत्यु (के आश्रय में) हूँ।

— लिंग पुराण, पूर्व भाग (अध्याय 1–108) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.30.6

नंदी का जन्म

लिंग पुराण की कई कथाएँ नंदी स्वयं सुनाते हैं, और अपने जन्म की कथा भी। उनके पिता शिलाद मुनि संतान चाहते थे और लंबे समय तक कठिन तप करते रहे। इंद्र प्रसन्न होकर आए, तो शिलाद ने "अयोनिज और मृत्यु-रहित" पुत्र माँगा। इंद्र ने कहा, "मैं गर्भ से जन्मा, मरने वाला पुत्र दे सकता हूँ; मृत्यु-रहित तो कोई है ही नहीं। ब्रह्मा भी नहीं दे सकते, वे स्वयं भी मृत्यु-रहित नहीं हैं।"

तब शिलाद ने महादेव की आराधना की। एक हज़ार दिव्य वर्ष क्षण की तरह बीत गए; उनके शरीर पर दीमक की बाँबी चढ़ गई, कीड़ों ने मांस, रक्त और त्वचा खा ली, और केवल हड्डियाँ बचीं। जब शिव ने अपने हाथ से उन्हें छुआ, तो सारी थकान मिट गई। शिव ने कहा, "ब्रह्मा और ऋषियों ने मुझसे अवतार की प्रार्थना की थी; मैं स्वयं तुम्हारा अयोनिज पुत्र बनूँगा, नंदी नाम से।"

शिलाद जब यज्ञ के लिए यज्ञ-भूमि में गए, तो वहीं से प्रलय-अग्नि जैसे तेजस्वी, तीन नेत्र, चार भुजाओं, जटा-मुकुट और शूल धारण किए बालक नंदी प्रकट हुए। बादल बरसे, अप्सराएँ नाचीं, और ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इंद्र, लक्ष्मी, सरस्वती सहित सब देवताओं ने उन्हें घेरकर गले लगाया। शिलाद ने कहा, "तुमने मुझे आनंदित (नंदित) किया है, इसलिए तुम्हारा नाम नंदी है।"

विष्णु का कमल-नेत्र और सुदर्शन चक्र

अध्याय 98 में ऋषि पूछते हैं कि विष्णु ने महेश्वर से सुदर्शन चक्र कैसे पाया। देवता और असुरों का भयंकर युद्ध छिड़ा था, और दानवों के अस्त्रों से हारकर देवता विष्णु की शरण में आए। विष्णु ने शिव की आराधना की: शिव के एक हज़ार नामों से उनकी स्तुति की (यही प्रसिद्ध शिव-सहस्रनाम है), उन्हें स्नान कराया, और हर नाम के साथ एक-एक कमल चढ़ाया।

परीक्षा के लिए शिव ने उन कमलों में से एक छिपा दिया। एक कमल कम देखकर विष्णु ने सोचा, फिर अपना कमल जैसा नेत्र निकालकर उसी नाम से अर्पित कर दिया। तब अग्नि-मंडल से करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी शिव प्रकट हुए और बोले, "मैं देवताओं का काम समझ गया; मैं तुम्हें सुदर्शन नाम का चक्र देता हूँ।" शिव ने चक्र भी दिया और कमल जैसा नेत्र भी लौटाया; "तभी से उन्हें पद्माक्ष (कमल-नयन) कहते हैं।"

वर माँगने को कहा गया तो विष्णु ने केवल शिव की भक्ति माँगी। शिव ने कहा कि तुम मेरे भक्त, देवताओं और असुरों के लिए वंदनीय और पूज्य बनोगे; और जब सती हिमालय की पुत्री उमा बनेंगी, तब तुम अपनी बहन उमा का विवाह मुझसे कराओगे, और मेरे संबंधी बनकर लोकों में पूज्य होगे। अध्याय कहता है कि जो इन हज़ार नामों से शिव की पूजा या जप करता है, वह परम गति पाता है।

नेत्रं च नेता जगतां प्रभुर्वै पद्मसन्निभम् । तदाप्रभृति तं प्राहुः पद्माक्षमिति सुव्रतम् ॥

जगत के नेता प्रभु (शिव) ने कमल जैसा नेत्र भी (लौटा) दिया; तभी से उन सुव्रत (विष्णु) को पद्माक्ष कहते हैं।

— लिंग पुराण, पूर्व भाग (अध्याय 1–108) — GRETIL e-text, पृष्ठ 1.98.177

शिव की और कथाएँ: शरभ, जलंधर, विनायक, तांडव

अंतिम अध्यायों में शिव की अनेक कथाएँ हैं। अंधक को गणपति-पद कैसे मिला, हिरण्याक्ष को मारने के लिए विष्णु ने वराह-रूप कैसे लिया, और हिरण्यकशिपु को नरसिंह ने कैसे मारा। फिर एक कथा आती है जो शैव पुराणों की विशेष है: नरसिंह का तेज जब शांत नहीं हुआ, तो देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने अपने भैरव-रूप वीरभद्र को भेजा, जिन्होंने शरभ नाम का भयंकर रूप लेकर उस तेज को शांत किया। अध्याय के अंत में वीरभद्र कहते हैं कि जैसे जल में जल, दूध में दूध और घी में घी मिल जाता है, वैसे ही विष्णु शिव में लीन हैं, और नरसिंह-रूप भी पूजने योग्य हैं।

यह कथा स्पष्ट रूप से शैव दृष्टि से कही गई है। Wilson ने लिंग पुराण की ऐसी कथाओं, जैसे दधीचि वाली, को वैष्णव और शैव परंपराओं की "प्रतिस्पर्धा" का उदाहरण माना। इसके बाद जलंधर का वध (अध्याय 97), और सुदर्शन चक्र की कथा आती है।

विनायक के जन्म की कथा (अध्याय 104–105) अलग ढंग से कही गई है। असुर, यातुधान और राक्षस यज्ञ और दान से शिव, ब्रह्मा और विष्णु की आराधना करके मनचाहे वर पाते जा रहे थे और देवताओं को हराते थे। तब देवताओं ने सोचा कि असुरों के कामों में विघ्न डालने, देवताओं के कामों को निर्विघ्न करने, और स्त्री-पुरुषों के कार्य सिद्ध करने के लिए शिव से "विघ्नेश" गणपति की रचना की प्रार्थना करें, और उन्होंने शिव की स्तुति की।

तांडव की कथा (अध्याय 106) भी अनोखी है। दारुक नाम का असुर, जिसे केवल स्त्री मार सकती थी, देवताओं को सता रहा था। शिव के कहने पर पार्वती अपने एक अंश से शिव के शरीर में प्रवेश कर गईं, और शिव के कंठ के विष से अपना रूप बनाया; शिव ने अपने तीसरे नेत्र से काले कंठ वाली काली को प्रकट किया, जिन्होंने दारुक को मारा। पर उनके क्रोध की आग से जगत जलने लगा। तब शिव माया से श्मशान में रोते हुए शिशु बने; काली ने उसे उठाकर दूध पिलाया, और शिशु दूध के साथ उनका क्रोध भी पी गया; वही बालक क्षेत्रपाल बना। फिर काली को प्रसन्न करने के लिए शिव ने संध्या के समय तांडव किया, और काली और योगिनियों ने भी आनंद से नृत्य किया।

उपमन्यु का दूध का सागर, और कृष्ण का पाशुपत व्रत

बालक उपमन्यु ने एक बार मामा के आश्रम में थोड़ा-सा दूध पिया, और मामा के बेटे को भरपेट दूध पीते देखा। घर आकर वह माँ से बार-बार गाय का मीठा दूध माँगने लगा। गरीब माँ ने उंछवृत्ति से इकट्ठे किए दानों को पीसकर पानी में घोला और "नकली दूध" दिया, पर बालक ने पहचान लिया। माँ ने उसका सिर सूँघकर, आँखें पोंछकर कहा: "भाग्यहीन और शिव-भक्ति से हीन लोग वह नहीं पाते। हमने पिछले जन्म में शिव की पूजा नहीं की, तो दूध कहाँ से हो?" बालक ने कहा, "माँ, शोक छोड़ो। यदि महादेव कहीं हैं, तो देर-सबेर मैं दूध का सागर पा लूँगा।"

उपमन्यु हिमालय पर जाकर केवल वायु पीकर तप करने लगे, और उनके तप से जगत तपने लगा। अंत में शिव अपने रूप में प्रकट हुए, और उनके चारों ओर दूध की हज़ार धाराएँ, क्षीर-सागर, दही, घी, मधु, फल और भोजन के सागर और पुओं के पहाड़ थे। शिव बोले, "उपमन्यु, यह पार्वती तुम्हारी माँ हैं; मैंने तुम्हें पुत्र बनाया और क्षीर-सागर दिया। महादेव तुम्हारे पिता हैं, जगन्माता तुम्हारी माता। मैंने तुम्हें अमरता और सदा के लिए गणपति-पद दिया।" पार्वती ने उन्हें योग-ऐश्वर्य, ब्रह्मविद्या और सदा कुमार रहने का वर दिया, और उपमन्यु ने केवल शिव में अटल श्रद्धा और उनका सान्निध्य माँगा।

पूर्व भाग का अंतिम अध्याय कृष्ण से जुड़ता है। अवतार लेकर भी कृष्ण पुत्र के लिए तप करने उपमन्यु के आश्रम गए, जो धौम्य के बड़े भाई थे। कृष्ण ने उन्हें तीन बार परिक्रमा करके प्रणाम किया; उपमन्यु ने उन्हें भस्म लगाकर दिव्य पाशुपत ज्ञान दिया। एक वर्ष के तप के बाद कृष्ण ने अंबा और गणों सहित महेश्वर के दर्शन किए और पुत्र पाया। कूर्म पुराण में भी कृष्ण के उपमन्यु-आश्रम में शिव-तप और साम्ब के जन्म की कथा है।

पाशुपत योग, पंचाक्षर और व्रत

लिंग पुराण का एक बड़ा भाग योग और उपासना का है। आठवें अध्याय में शिव के बनाए "योग-स्थान" हैं और नौवें में योग के विघ्न: पहले आलस्य, फिर रोग, प्रमाद, संशय और चित्त की अस्थिरता। अस्सीवें अध्याय में ऋषि पूछते हैं कि देवताओं ने पशुपति को देखकर अपना "पशुत्व" कैसे छोड़ा। "पशु" यानी बँधा हुआ जीव, "पाश" यानी बंधन, और "पशुपति" यानी शिव, जो बंधन से छुड़ाते हैं। इसी से पाशुपत व्रत आता है, जिसे पुराण के अनुसार पहले देवताओं ने किया था।

अध्याय 85 पंचाक्षर विद्या, यानी "नमः शिवाय" मंत्र, का है। पुराण कहता है कि सब व्रतों में उमापति की पूजा करके विधि से पंचाक्षरी विद्या का जप करना चाहिए। अगले अध्याय में यह भी कहा गया है कि जप से भी श्रेष्ठ, विरक्त और जागे हुए लोगों के लिए, ध्यान-यज्ञ है। इनके साथ उमा-महेश्वर व्रत, नंदी के मुख से कुमार ने सुना "व्यपोहन स्तव", और लिंग-प्रतिष्ठा की विधियाँ हैं।

पूर्व भाग के अंत में पाशुपत योगियों को दान का महत्व बताया गया है: सोने की मेखला, दंड, पंखा, लिखने का पात्र और कलम, या अपनी सामर्थ्य के अनुसार सोना, चाँदी या ताँबा। "अनित्य शरीर से नित्य वस्तु पाने का प्रयत्न करना चाहिए; पाशुपत (मार्ग) संसार-सागर से पार करने वाला है।"

वसिष्ठ-वंश, काशी और शिव के 28 अवतार

अध्याय 64 में वसिष्ठ के वंश की करुण कथा है। राजा कल्माषपाद के प्रसंग में, शक्ति के ही शाप के कारण और विश्वामित्र की प्रेरणा से, रुधिर नाम के राक्षस ने वसिष्ठ के पुत्र शक्ति को उनके भाइयों सहित खा लिया। यह सुनकर वसिष्ठ "हा पुत्र, पुत्र" कहते हुए अरुंधती सहित धरती पर गिर पड़े। पुराण की अनुक्रमणिका इस प्रसंग के आगे के भाग गिनाती है: अरुंधती का विलाप, बहू का भेजा जाना, गर्भ में स्थित बालक के वचन, पराशर, व्यास और शुक का अवतार, शक्ति-पुत्र पराशर द्वारा राक्षसों का विनाश, और गुरु पुलस्त्य की आज्ञा से पुराण की रचना।

अध्याय 92 वाराणसी का माहात्म्य है। विवाह के बाद शंकर हिमालय से देवी और गणों सहित वाराणसी आए, उन्हें अविमुक्तेश्वर लिंग दिखाया, और वहीं निवास किया। सूत कहते हैं कि इस अविमुक्त क्षेत्र का माहात्म्य विस्तार से सौ करोड़ वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।

लिंग पुराण के सातवें और चौबीसवें अध्याय में शिव के अट्ठाईस अवतारों की सूची है, हर द्वापर के व्यास के साथ। चौबीसवें अध्याय में शिव ब्रह्मा से कहते हैं कि अट्ठाईसवें परिवर्त में मैं "लकुली" नाम से प्रकट होऊँगा। Wilson ने इसे भागवत के चौबीस अवतारों का शैव प्रतिरूप माना, और यह भी लिखा कि ये अवतार और उनके "शिष्य" संभवतः योग-मार्ग के शैव आचार्य हैं। कूर्म पुराण (1.51) में भी यही सूची "नकुलीश" के साथ मिलती है।

विद्वानों के मत: कर्मकांड-ग्रंथ और उसका काल

Wilson ने लिंग पुराण को "पुराण से अधिक कर्मकांड का ग्रंथ" कहा। उनके अनुसार इसमें सृष्टि और वंश के अध्याय पुराण का रूप बनाए रखने के लिए दूसरे पुराणों से लिए गए हैं: ब्रह्माण्ड और वैवस्वत मन्वन्तर के राजवंशों का वर्णन "सार में और प्रायः शब्दों में भी" दूसरे पुराणों जैसा है, और उसके बाद पुराण अपने असली रूप में लौट आता है, यानी शिव के अनेक रूपों की कथाएँ, विधियाँ और स्तुतियाँ।

काल के बारे में Wilson ने माना कि प्रमाण कम हैं। उनका तर्क था कि शिव के अवतार और उनके शिष्य, और योग पर इतना ज़ोर, उन शैव योग-आचार्यों की ओर संकेत करते हैं जो उनके अनुसार आठवीं-नौवीं शताब्दी में फले-फूले; इसलिए यह ग्रंथ उससे पहले का होना कठिन है, और बाद का भी हो सकता है। साथ ही उन्होंने माना कि इसमें कुछ पुरानी शैव कथाएँ सुरक्षित हैं। यह 1840 का एक विद्वान का अनुमान है; बाद के विद्वानों ने पुराणों के काल पर अलग-अलग मत दिए हैं।

महत्व और आज के लिए अर्थ

आज जो करोड़ों लोग शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं, उनमें से बहुतों के लिए लिंग पुराण एक नई खिड़की खोल सकता है। यह कहता है कि लिंग वह है जिससे अव्यक्त शिव व्यक्त जगत बनते हैं; उसकी जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु और ऊपर सदाशिव हैं; और उसकी वेदी स्वयं देवी है। यानी एक शिवलिंग में पूरा ब्रह्मांड और तीनों देवता समाए हैं।

और इसकी कथाएँ एक ही बात बार-बार कहती हैं: भक्ति के आगे मृत्यु भी हार जाती है। श्वेत मुनि के लिए काल गिर पड़ा; दधीचि महामृत्युंजय मंत्र से अवध्य हुए; शिलाद को मृत्यु-रहित पुत्र मिला; और एक गरीब माँ का बेटा उपमन्यु, जिसे दूध तक नहीं मिलता था, दूध का सागर पा गया। इन कथाओं का संदेश यह है कि शिव की कृपा किसी बड़े साधन से नहीं, सच्ची श्रद्धा से मिलती है।

आगे पढ़ें

  • कूर्म पुराण — समुद्र-मंथन के समय कूर्म-रूप विष्णु ने इंद्रद्युम्न और ऋषियों को सुनाया: सृष्टि, त्रिदेव की एकता, देवी, वंश, काशी-प्रयाग, ईश्वर गीता और व्यास गीता
  • मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • महर्षि वसिष्ठ — शक्ति और पराशर की कथा
  • वेद व्यास — 28 द्वापरों के व्यास
  • अष्टांग योग — योग के विघ्न और साधन
  • वेद-विभाजन — व्यास-परंपरा

स्रोत एवं संदर्भ

लिंग पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न