निमेष से वर्ष तक: काल की छोटी इकाइयाँ
विष्णु पुराण काल की गणना पलक झपकने से शुरू करता है। पंद्रह निमेष की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, और तीस कला का एक मुहूर्त; तीस मुहूर्त का मनुष्यों का एक दिन-रात, तीस दिन-रात का एक महीना जिसमें दो पक्ष होते हैं, छह महीनों का एक अयन, और दक्षिण और उत्तर, दो अयनों का एक वर्ष। और यहीं वह बड़ी कड़ी आती है: दक्षिणायन देवताओं की रात है और उत्तरायण उनका दिन, यानी मनुष्यों का एक पूरा वर्ष देवताओं का एक दिन-रात है।
यह पूरी गणना पराशर एक प्रश्न के उत्तर में देते हैं: जो ब्रह्म निर्गुण, अप्रमेय और शुद्ध है, वह सृष्टि का कर्ता कैसे हो सकता है? पराशर कहते हैं कि सब भावों की शक्तियाँ अचिंत्य हैं, जैसे अग्नि में उष्णता, और ब्रह्मा "उत्पन्न" केवल उपचार से कहे जाते हैं, वे वास्तव में नित्य हैं। फिर वे बताते हैं कि ब्रह्मा की आयु उनके अपने माप से सौ वर्ष है, और उस माप को समझाने के लिए काल का पूरा क्रम देते हैं।
| इकाई | बराबर | स्रोत |
|---|---|---|
| 1 काष्ठा | 15 निमेष | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.8 |
| 1 कला | 30 काष्ठा | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.8 |
| 1 मुहूर्त | 30 कला | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.8 |
| 1 दिन-रात (मानव) | 30 मुहूर्त | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.9 |
| 1 महीना | 30 दिन-रात (दो पक्ष) | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.9 |
| 1 अयन | 6 महीने | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.10 |
| 1 वर्ष (मानव) = देवताओं का 1 दिन-रात | 2 अयन (उत्तरायण दिन, दक्षिणायन रात) | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.10 |
चार युग: सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि
बारह हज़ार दिव्य वर्षों का एक "चतुर्युग" होता है, जिसमें कृत (सत्य), त्रेता, द्वापर और कलि, चार युग हैं। पुराने ज्ञानी इन युगों में क्रम से चार, तीन, दो और एक हज़ार दिव्य वर्ष बताते हैं। हर युग से पहले उतने ही सौ वर्षों की "संध्या" होती है, और बाद में उतने ही सौ वर्षों का "संध्यांश"; इन दोनों के बीच का काल ही असल में युग कहलाता है। भागवत यही बात कहता है: चार, तीन, दो और एक हज़ार, और उसके दुगुने सौ।
इस तरह संधि सहित कृत युग 4,800, त्रेता 3,600, द्वापर 2,400 और कलि 1,200 दिव्य वर्षों का होता है, कुल 12,000। विष्णु पुराण की अपनी मन्वंतर-गणना से पता चलता है कि एक दिव्य वर्ष 360 मानव वर्षों का है (आगे देखें), और उस अनुपात से कलियुग 4,32,000 मानव वर्ष, द्वापर 8,64,000, त्रेता 12,96,000, कृत युग 17,28,000, और पूरा चतुर्युग 43,20,000 मानव वर्ष का बनता है।
युगों का अंतर केवल लंबाई का नहीं, धर्म का भी है। भागवत के अनुसार कृत युग में धर्म चारों पैरों पर मनुष्यों के साथ रहता है, और बाद के युगों में अधर्म के बढ़ने से वह एक-एक पैर घटता जाता है। कलियुग का विस्तृत वर्णन विष्णु पुराण के छठे अंश में है, और उसके पृष्ठ पर इसका सार दिया गया है।
| युग | मूल (दिव्य वर्ष) | संध्या + संध्यांश | कुल दिव्य वर्ष | मानव वर्ष | स्रोत |
|---|---|---|---|---|---|
| कृत (सत्य) | 4,000 | 400 + 400 | 4,800 | 17,28,000 | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.12–13; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.11.19 |
| त्रेता | 3,000 | 300 + 300 | 3,600 | 12,96,000 | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.12–13; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.11.19 |
| द्वापर | 2,000 | 200 + 200 | 2,400 | 8,64,000 | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.12–13; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.11.19 |
| कलि | 1,000 | 100 + 100 | 1,200 | 4,32,000 | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.12–13; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.11.19 |
| चतुर्युग | 10,000 | 2,000 | 12,000 | 43,20,000 | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 1.3.11; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 3.11.18 |
मन्वंतर: चौदह मनुओं का काल
ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु होते हैं। हर मनु के काल, यानी "मन्वंतर", में सप्तर्षि, देवता, इंद्र, मनु और उसके पुत्र राजा एक साथ उत्पन्न होते हैं और पहले की तरह एक साथ समाप्त होते हैं। एक मन्वंतर इकहत्तर चतुर्युगों से कुछ अधिक का होता है। विष्णु पुराण इसकी ठीक गिनती देता है: दिव्य गिनती में आठ लाख बावन हज़ार वर्ष, और मानव वर्षों में तीस करोड़ सड़सठ लाख बीस हज़ार (30,67,20,000), "अधिक" भाग को छोड़कर। इन्हीं दो संख्याओं से एक दिव्य वर्ष = 360 मानव वर्ष का अनुपात निकलता है।
विष्णु पुराण चौदहों मनुओं के नाम देता है। बीते छह: स्वायंभुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत और चाक्षुष। अभी सातवाँ मन्वंतर है, विवस्वान (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव वैवस्वत मनु का; इसके देवता आदित्य, वसु और रुद्र आदि हैं, इंद्र पुरंदर हैं, और सप्तर्षि वसिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज। इक्ष्वाकु, नृग, शर्याति आदि वैवस्वत मनु के नौ पुत्र हैं। आने वाले सात मनु हैं: सावर्णि (आठवें), दक्षसावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, धर्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, रौच्य और भौत्य (चौदहवें)।
विष्णु पुराण यह भी कहता है कि विष्णु की शक्ति हर मन्वंतर में देवता के रूप में स्थित रहती है: स्वायंभुव मन्वंतर में यज्ञ, स्वारोचिष में अजित, उत्तम में सत्य, तामस में हरि, रैवत में मानस, चाक्षुष में वैकुंठ, और वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर में कश्यप और अदिति के पुत्र वामन, जिन्होंने तीन पगों में तीनों लोक जीतकर पुरंदर (इंद्र) को लौटा दिए। भागवत के अनुसार मन्वंतर के छह अंग हैं: मनु, देवता, मनु-पुत्र, इंद्र, ऋषि और भगवान के अंशावतार।
| क्रम | मनु | स्थिति | स्रोत |
|---|---|---|---|
| 1–6 | स्वायंभुव, स्वारोचिष, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष | बीत चुके | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.1.6 |
| 7 | वैवस्वत (श्राद्धदेव) | वर्तमान | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.1.7, 3.1.30 |
| 8 | सावर्णि | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.13–14 |
| 9 | दक्षसावर्णि | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.20 |
| 10 | ब्रह्मसावर्णि | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.25 |
| 11 | धर्मसावर्णि | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.29 |
| 12 | रुद्रसावर्णि | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.33 |
| 13 | रौच्य | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.37 |
| 14 | भौत्य | आने वाले | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.2.42 |
कल्प, ब्रह्मा का दिन-रात और परार्ध
एक हज़ार चतुर्युग ब्रह्मा का एक दिन है, और यही "कल्प" है; मन्वंतर का काल चौदह गुना करने पर भी ब्रह्मा का दिन बनता है। दिन के अंत में "नैमित्तिक" प्रलय होता है: भू, भुवः आदि तीनों लोक जल जाते हैं, ताप से पीड़ित महर्लोक के निवासी जनलोक चले जाते हैं, और तीनों लोकों के एक समुद्र बन जाने पर नारायण-रूप ब्रह्मा शेष-शय्या पर सोते हैं, जनलोक के योगी उनका ध्यान करते हैं। रात भी दिन जितनी ही लंबी होती है, और उसके अंत में वे फिर सृष्टि करते हैं। मानव वर्षों में एक कल्प, ऊपर के अनुपात से, चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष का बनता है।
ऐसे दिन-रातों से ब्रह्मा का वर्ष बनता है, और ऐसे सौ वर्ष उनकी पूरी आयु है। इस पूरी आयु को "पर" कहते हैं, और उसके आधे को "परार्ध"। विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा का एक परार्ध बीत चुका है, जिसके अंत में "पाद्म" नाम का महाकल्प हुआ; और अभी जो दूसरा परार्ध चल रहा है, उसका पहला कल्प "वाराह" कल्प है। दो परार्ध पूरे होने पर, यानी ब्रह्मा की आयु के अंत में, "प्राकृतिक" प्रलय होता है।
यही कारण है कि कई पुराण अपने आप को किसी कल्प से जोड़ते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार विष्णु पुराण वाराह कल्प के वृत्तांत को आधार बनाकर पराशर ने कहा, वायु पुराण श्वेत कल्प के प्रसंग में, और भविष्य अघोर कल्प के प्रसंग में। हर पुराण के पृष्ठ पर उसका अपना कल्प बताया गया है, और इस लेख की गणना उन सबके लिए एक साझा आधार है।
एकमस्य व्यतीतं तु परार्धं ब्रह्मणोऽनघ । तस्यान्तेऽभून्महाकल्पः पाद्म इत्यभिविश्रुतः ॥ द्वितीयस्य परार्धस्य वर्तमानस्य वै द्विज । वाराह इति कल्पोऽयं प्रथमः परिकीर्तितः ॥हे निष्पाप, ब्रह्मा का एक परार्ध बीत चुका है, जिसके अंत में "पाद्म" नाम से प्रसिद्ध महाकल्प हुआ। और हे द्विज, अभी चल रहे दूसरे परार्ध का यह पहला कल्प "वाराह" कहलाता है।
आगे पढ़ें
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- पुराण के पंच लक्षण — पुराण की सबसे पुरानी परिभाषा, भागवत के दस लक्षण, और यह सवाल कि आज के पुराण इस परिभाषा पर कितने खरे उतरते हैं
- महर्षि वसिष्ठ — वर्तमान मन्वंतर के सप्तर्षियों में
- महर्षि अत्रि — वर्तमान मन्वंतर के सप्तर्षियों में
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 1.3.8–10, 1.3.1–7, 1.3.8, 1.3.9, 1.3.10, 1.3.11–15, 1.3.12–13, 1.3.19–21, 6.1, 1.3.12–13, 1.3.11, 1.3.16–21, 3.1.6–7, 3.1.30–34, 3.2.13–42, 3.1.35–44, 3.1.6, 3.1.7, 3.1.30, 3.2.13–14, 3.2.20, 3.2.25, 3.2.29, 3.2.33, 3.2.37, 3.2.42, 1.3.15, 1.3.22–25, 1.3.5, 1.3.26–28, 6.3.2, 1.3.27–28
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 3.11.18–20, 3.11.19, 3.11.21, 3.11.18, 12.7.15
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.16, 53.18, 53.31
