वामन पुराण: तीन पग और कुरुक्षेत्र की कथाएँ

पुलस्त्य ने नारद को सुनाया: सती और शिव, कपालमोचन, धर्मात्मा राक्षस सुकेशी, कात्यायनी और महिषासुर, अंधक, प्रह्लाद की तीर्थयात्रा, गजेंद्र-मोक्ष, और कुरुक्षेत्र में बलि से तीन पग

संक्षेप में

वामन पुराण अठारह महापुराणों में चौदहवाँ है, जिसका नाम विष्णु के वामन (बौने ब्राह्मण) अवतार से है। इसमें ऋषि पुलस्त्य नारद को शिव और विष्णु दोनों की कथाएँ सुनाते हैं: कपालमोचन, कात्यायनी द्वारा महिषासुर-वध, अंधक, प्रह्लाद, और अंत में कुरुक्षेत्र में बलि से तीन पग भूमि। इसका बड़ा भाग कुरुक्षेत्र के तीर्थों का है।

एक नज़र में

क्रम
अठारह महापुराणों में चौदहवाँ (विष्णु पुराण 3.6.23)
वक्ता
ऋषि पुलस्त्य, नारद के प्रश्नों पर
परंपरागत श्लोक-संख्या
10,000 (भागवत 12.13.4–8; मत्स्य 53.45–46)
संस्करण (इस पृष्ठ का आधार)
A. S. Gupta, All India Kashiraj Trust, वाराणसी 1967: 69 अध्याय, और सरोमाहात्म्य के 26 अध्याय
कल्प (मत्स्य के अनुसार)
जिसमें ब्रह्मा ने त्रिविक्रम का माहात्म्य कहा
प्रसिद्ध कथाएँ
कपालमोचन, सुकेशी, कात्यायनी और महिष, अंधक, गजेंद्र-मोक्ष, बलि और वामन
स्वरूप
Wilson के अनुसार शिव और विष्णु दोनों को लगभग बराबर सम्मान देने वाला

वामन पुराण क्या है?

वामन पुराण पहले ही श्लोक में अपना केंद्र बता देता है: "उन श्रीधर को नमस्कार, जिन्होंने छल से वामन का रूप लिया।" फिर नारद पूछते हैं: "विष्णु ने पहले वामन-रूप क्यों धारण किया? और शंकर की प्रिय पत्नी, जो हिमालय के घर जन्मी, उनके बारे में मेरा बड़ा संशय है; और अनेक व्रतों की विधि भी बताइए।" उत्तर में ऋषि पुलस्त्य पूरा पुराण सुनाते हैं।

इसलिए यह पुराण एक साथ दो धाराओं में चलता है: एक ओर शिव, सती और पार्वती की कथाएँ, दूसरी ओर विष्णु के वामन अवतार की। Wilson ने लिखा कि वैष्णव नाम होने के बावजूद इसका बड़ा भाग लिंग-पूजा का है, और यह शिव और विष्णु के बीच "काफ़ी निष्पक्षता से" सम्मान बाँटता है; इसलिए उन्होंने इसे किसी एक संप्रदाय से बँधा नहीं माना।

अठारह पुराणों की विष्णु पुराण वाली सूची में वामन चौदहवाँ है। मत्स्य पुराण इसका परिचय देता है: जिसमें चतुर्मुख ब्रह्मा ने त्रिविक्रम (तीन पगों से तीनों लोक नापने वाले विष्णु) के माहात्म्य के प्रसंग में धर्म, अर्थ और काम का उपदेश दिया, दस हज़ार श्लोकों का। भागवत भी दस हज़ार ही बताता है।

संरचना: 69 अध्याय और सरोमाहात्म्य

वामन पुराण का एक आलोचनात्मक संस्करण 1967 में वाराणसी के All India Kashiraj Trust ने A. S. Gupta के संपादन में प्रकाशित किया। उसके GRETIL पाठ में मुख्य पुराण के 69 अध्याय हैं, और "सरोमाहात्म्य" नाम का भाग, जो कुरुक्षेत्र के पवित्र सरोवर और तीर्थों की महिमा है, अलग 26 अध्यायों में है। Wilson की प्रति लगभग सात हज़ार श्लोकों की थी।

नीचे की तालिका हर अध्याय का आरंभ पढ़कर बनाई गई है। Wilson ने इसकी शैली के बारे में लिखा कि नारद के प्रश्न एक-दूसरे से अचानक बदलते हैं, और पुलस्त्य के उत्तरों में विषयों का कोई कड़ा क्रम नहीं है; पर लगभग हर कथा किसी तीर्थ की पवित्रता से जुड़ती है, इसलिए यह पुराण एक तरह से माहात्म्यों की शृंखला है।

वामन पुराण: अध्याय-समूह और विषय (Gupta संस्करण, GRETIL पाठ)
अध्यायविषयस्रोत
1–5नारद के प्रश्न; सती का वर्षा में घर माँगना; दक्ष-यज्ञ; शिव की ब्रह्महत्या और कपालमोचनवामन पुराण (मूल संस्कृत), 1–5
6–10दक्ष की कन्याओं की संतानें; शिव का वियोग; प्रह्लाद का अभिषेक और नैमिष-यात्रा; इंद्र और दानवों के युद्धवामन पुराण (मूल संस्कृत), 6–10
11–17धर्मात्मा राक्षस सुकेशी और ऋषियों का धर्मोपदेश; जंबूद्वीप; सूर्य द्वारा सुकेशी के नगर का गिराया जाना; हरि और हर की आराधनावामन पुराण (मूल संस्कृत), 11–17
18–21महिषासुर का जन्म; देवताओं के तेज से कात्यायनी; विंध्य पर दुर्गा; चंड-मुंड; महिष-वधवामन पुराण (मूल संस्कृत), 18–21
22–30कुरुक्षेत्र और राजा कुरु; अनेक वंश; देवासुर संग्रामवामन पुराण (मूल संस्कृत), 22–30
31–46कुमार (कार्तिकेय) का जन्म; नरकों का वर्णन; शिव का मंदर-निवास; अंधकासुर; मरुतों की उत्पत्तिवामन पुराण (मूल संस्कृत), 31–46
47–51बलि का राज्य, प्रह्लाद मंत्र-दाता और शुक्र पुरोहित; देवताओं का ब्रह्मलोक जाना; असुरों का तेजहीन होनावामन पुराण (मूल संस्कृत), 47–51
52–61प्रह्लाद की तीर्थयात्रा; व्रत (नक्षत्र-पुरुष); गजेंद्र-मोक्ष आदि; वासुदेव-स्तुति; पापनाशक स्तोत्रवामन पुराण (मूल संस्कृत), 52–61
62–66कुरुक्षेत्र में बलि का यज्ञ; अपशकुन और शुक्र की चेतावनी; बलि का उत्तर और कोशकार की कथा; तीन पग; बलि को सुतलवामन पुराण (मूल संस्कृत), 62–66
67–69बलि का सुतल में नगर; मृत्यु के बाद की गति; फलश्रुतिवामन पुराण (मूल संस्कृत), 67–69
सरोमाहात्म्य 1–26कुरुक्षेत्र, सरस्वती और सन्निहत्या सरोवर, स्थाणु तीर्थ, आपगा नदी, सोम तीर्थ और अनेक तीर्थवामन पुराण, सरोमाहात्म्य (मूल संस्कृत), 1–27

सती का घर और शिव का कपालमोचन

पुराण की पहली कथा बहुत मानवीय है। गर्मी के बाद वर्षा ऋतु आई: आकाश में बादलों के बीच बिजली चमकने लगी, मोर बोलने लगे, कदंब, अर्जुन और केतकी फूलने लगे। सती ने शिव से प्रेम से कहा, "हे शंभु, यहाँ घर बनाइए, जिससे मैं सुख से रहूँ।" शिव ने हँसकर उत्तर दिया: "मेरे पास घर बनाने को धन नहीं; मेरा वस्त्र बाघ की खाल है, एक बाजूबंद है, मेरा कंबल एक सर्प है, और दूसरा सर्प धनंजय।" सती दुखी होकर बोलीं, "क्या मुझे वर्षा में पेड़ के नीचे रहना होगा?"

आगे दक्ष-यज्ञ की कथा आती है, जिसमें शिव को निमंत्रित नहीं किया गया। फिर एक भयानक प्रसंग: लाल केशों वाली, डरावनी "ब्रह्महत्या" शिव के पास आई और बोली, "मैं ब्रह्महत्या हूँ, मुझे स्वीकार करो, त्रिलोचन।" शिव उससे छूटने के लिए यमुना में नहाने गए, तो यमुना सूख गई; प्लक्षजा नदी में गए, तो वह अंतर्धान हो गई; सैंधव वन में स्नान किया, फिर भी ब्रह्महत्या ने उन्हें नहीं छोड़ा।

तब शिव चक्रपाणि विष्णु के पास गए और हाथ जोड़कर स्तुति की: "मैं बिना विचारे काम करने वाला जल गया हूँ, नष्ट हो गया हूँ; आप तीर्थ हैं, मुझे पवित्र कीजिए।" विष्णु ने उन्हें वाराणसी भेजा, जो वरणा और असी नदियों के बीच है और सब पापों को हरती है। शिव गरुड़ की तरह वेग से वाराणसी गए, तीर्थों में स्नान किया, और वहाँ उनके हाथ से (ब्रह्मा का) कपाल छूट गया। विष्णु ने कहा, "यह तीर्थ कपालमोचन नाम से प्रसिद्ध होगा।" Wilson ने भी यही लिखा कि दक्ष-यज्ञ की कथा का उद्देश्य शिव को बनारस के इस तीर्थ तक पहुँचाना है।

स्नातमात्रस्य चाद्यैव कपालं परिमोक्ष्यति । कपालमोचनेत्येवं तीर्थं चेदं भविष्यति ॥

(विष्णु शिव से:) यहाँ स्नान करते ही आज तुम्हारा कपाल छूट जाएगा; और यह तीर्थ कपालमोचन नाम से प्रसिद्ध होगा।

— वामन पुराण, अध्याय 1–69 — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.48–3.49

सुकेशी: धर्म पूछने वाला राक्षस

वामन पुराण की एक अनोखी कथा सुकेशी नाम के राक्षस की है। नारद पूछते हैं, "सूर्य ने उसे आकाश से धरती पर क्यों गिराया?" पुलस्त्य कहते हैं कि यह कथा वे वैसी ही सुना रहे हैं जैसी स्वयं ब्रह्मा ने उन्हें सुनाई थी। सुकेशी एक राक्षस का गुणवान पुत्र था, जिसे शत्रुओं से अजेय और अवध्य होने का वर मिला था, फिर भी वह अपने राक्षसों के साथ सदा धर्म के मार्ग पर चलता था। एक दिन उसने भावितात्मा ऋषियों के आश्रम देखे और विनम्रता से पूछा: "मैं आपको आज्ञा नहीं दे रहा, केवल पूछ रहा हूँ: सज्जनों में किससे पूजा मिलती है, और किससे मनुष्य सुख पाता है?"

ऋषियों ने उसे धर्म का उपदेश दिया, जिसमें अकृपणता (उदारता) और शौच जैसे गुण, विभिन्न लोकों और प्राणियों का धर्म, और जंबूद्वीप का वर्णन है। फिर सुकेशी ने अपने सब राक्षसों को बुलाकर धर्म की बात कही, और उन्हें हरि और हर, दोनों देवताओं की आराधना करने को कहा। नारद के प्रश्न से ही स्पष्ट है कि आगे चलकर सूर्य ने सुकेशी के आकाशचारी नगर को धरती पर गिरा दिया, और पुराण उसका कारण और प्रसंग विस्तार से सुनाता है। पर इस कथा का मूल संदेश स्पष्ट है: धर्म किसी जाति या योनि की बपौती नहीं; राक्षस भी पूछ और सीखकर धार्मिक हो सकता है।

कात्यायनी और महिषासुर

वामन पुराण में महिषासुर और देवी कात्यायनी की कथा मार्कण्डेय पुराण के देवी-माहात्म्य से कुछ अलग रूप में है। पहले महिष का जन्म: दानव रंभ ने वर माँगा कि उसे अपने से अधिक तेजस्वी, तीनों लोक जीतने वाला पुत्र मिले; उसने एक सुंदर तीन वर्ष की भैंस (महिषी) से संबंध किया, और उससे इच्छानुसार रूप बदलने वाला महिष जन्मा। यानी इस पुराण में महिष "रंभ का पुत्र" है।

महिष ने स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को निकाल दिया, और वे पृथ्वी पर भटकने लगे। तब विष्णु, शिव, ब्रह्मा और इंद्र आदि के मुख से महान तेज निकला, और महर्षि कात्यायन ने भी अपना अद्वितीय तेज उसमें मिलाया। उसी से चंचल, विशाल नेत्रों वाली, योग से शुद्ध देह वाली देवी जन्मीं, जो "कात्यायनी" नाम से जगत में प्रसिद्ध हुईं। यम के तेज से उनके केश बने, हरि के तेज से अठारह भुजाएँ, वरुण के तेज से जंघाएँ, और वसुओं के तेज से उँगलियाँ।

फिर कथा विंध्य पर्वत से जुड़ती है। अगस्त्य ने ऊँचे शिखर वाले विंध्य को नीचा किया था और कहा था कि मेरे लौटने तक ऐसे ही रहना; उसी विंध्य के ऊँचे शिखर पर, मुनियों से स्तुत, दानवों के नाश के लिए दुर्गा विराजीं, और अप्सराएँ उनके साथ रहीं। महिष के दूत चंड और मुंड ने उन्हें देखा और महिष को उस सुंदर कन्या के बारे में बताया। अंत में देवी ने वाहन सहित महिष का वध किया। पुराण वृक्षों की उत्पत्ति के प्रसंग में यह भी कहता है कि कात्यायनी (के हाथ) से शमी और लक्ष्मी के हाथ से बेल उत्पन्न हुआ, और कात्यायनी को "सदा वर देने वाली दुर्गा" कहता है।

तस्माच्च जाता तरलायताक्षी कात्यायनी योगविशुद्धदेहा ।

उस (तेज) से चंचल और विशाल नेत्रों वाली, योग से शुद्ध देह वाली कात्यायनी उत्पन्न हुईं।

— वामन पुराण, अध्याय 1–69 — GRETIL e-text, पृष्ठ 19.8

कुमार, अंधक और शिव की कथाएँ

पुराण का मध्य भाग शिव की कथाओं का है, जैसा Wilson ने भी लिखा: उमा से शिव का विवाह, कामदेव का दहन (जिससे हिमालय के केदारेश्वर और बदरिकाश्रम के लिंगों की पवित्रता जुड़ी है), और कुमार कार्तिकेय का जन्म। अध्याय 31 और 32 में कुमार के जन्म और प्रताप का वर्णन है, और भव, गिरिजा और अग्नि को प्रणाम करके कथा आगे बढ़ती है।

अध्याय 33 से 44 तक अंधकासुर की लंबी कथा है: शिव का मंदर पर्वत पर निवास, अंधक का शुक्राचार्य के पास जाकर बात करना, और फिर मंदर पर हर से युद्ध। इसके बीच अध्याय 35 में नरकों का वर्णन आता है, जो एक सुंदर वाक्य से शुरू होता है: "सब प्राणियों के प्रति कठोरता, यही पहला नरक कहा गया है।"

अंधक-युद्ध में एक अद्भुत प्रसंग शुक्राचार्य का है। युद्ध में जो दानव मारे जाते, शुक्र अपनी (संजीवनी) विद्या से उन्हें फिर जीवित कर देते। नंदी ने शिव से कहा कि मरे हुओं को फिर जिलाना असह्य है, और शुक्र की विद्या के कारण हमारा बल घट रहा है। शिव ने कहा, "मैं उन्हें वश में करूँगा।" नंदी दानव-सेना में घुसे, पाँच दानव-योद्धाओं से लड़े, और जैसे सिंह छोटे मृग को पकड़ता है, वैसे रथ से शुक्र को उठा लाए। शिव ने शुक्र को अपने उदर में रख लिया। वहाँ शुक्र ने शिव की स्तुति की ("शंकर, महेश, त्र्यंबक, कामदेव के लिए अग्नि, काल के शत्रु, वामदेव को नमस्कार") और वर माँगा कि मैं आपके उदर से बाहर निकल सकूँ। शिव के उदर में घूमते हुए शुक्र ने भुवन, समुद्र, पाताल, यक्ष, गंधर्व, अप्सराएँ, पेड़, पर्वत और सब प्राणी देखे; एक दिव्य वर्ष वहीं बीत गया, और अंत में वे विनम्र होकर शिव की शरण में आए।

छठे से दसवें अध्याय में दक्ष की कन्याओं की संतानें, सती के वियोग में काम के बाणों से व्याकुल शिव का भटकना, दानवों के राजा के रूप में प्रह्लाद का अभिषेक, प्रह्लाद का नैमिष जाना और पवित्र सरस्वती को देखना, और इंद्र और दानवों के युद्ध हैं। यानी पुराण में विष्णु के भक्त प्रह्लाद आरंभ से हैं, जो आगे बलि के पितामह और मंत्र-दाता के रूप में फिर आते हैं।

प्रह्लाद की तीर्थयात्रा और गजेंद्र-मोक्ष

बलि के राज्य वाले अध्यायों में बताया गया है कि बलि ने धर्म से त्रिलोक का पालन किया; प्रह्लाद उसके मंत्र-दाता थे और शुक्र पुरोहित। इंद्र शची के साथ ब्रह्मा के पास गए, और ब्रह्मा के कहे अनुसार असुर तेजहीन हो गए। फिर नारद पुलस्त्य से प्रह्लाद की तीर्थयात्रा सुनाने को कहते हैं, और पुराण प्रह्लाद को एक-एक तीर्थ, जैसे लिंगभेद पर्वत, सुवर्णाक्ष और नैमिष, में ले जाता है।

इसी भाग में व्रत भी हैं, जैसे नक्षत्र-पुरुष व्रत से (विष्णु की) आराधना और चैत्र अष्टमी को जनार्दन की पूजा; और प्रश्न कि विष्णु ने लोक-पूजित सुदर्शन चक्र क्यों दिया। अध्याय 58 में नारद गजेंद्र-मोक्ष जैसी चार कथाएँ पूछते हैं, और अध्याय 59 एक क्रूर, दूसरों को पीड़ा देने वाले स्वभाव के वर्णन से शुरू होता है। अध्याय 60 "वासुदेव, नमस्ते; बहुरूप, नमस्ते" वाली स्तुति है, और 61 एक ऐसा पाठ है जिसके अध्ययन से पाप नष्ट होते हैं।

आचरण के नरक और गजेंद्र की शरणागति

वामन पुराण का नरक-वर्णन (अध्याय 35) बाकी पुराणों से अलग ढंग से शुरू होता है: यहाँ पहले "नरक" किसी जगह का नाम नहीं, बल्कि बुरे आचरण का है। "सब प्राणियों के प्रति कठोरता पहला नरक है; वृक्षों को काटना दूसरा; धन के लिए झगड़ा तीसरा; अपना धर्म छोड़ना चौथा।" आगे की सूची में अकेले मीठा खाना, दूसरों के वाहन चुराना, राज्य का अहित करना, बंधुओं से विरोध, शास्त्र की चोरी और धर्म का नाश, संस्कारों से हीन होना, समझौते तोड़ना, असत्य वचन, घरों में आग लगाना और ईर्ष्या गिनाए गए हैं। और यह भी कहा गया है कि जो संतान के साथ (वंश चलाकर) जगत के स्वामी को प्रसन्न करता है, वह "पुम्" नाम के घोर नरक का नाश करता है।

गजेंद्र-मोक्ष (अध्याय 58) का वर्णन यहाँ विशेष रूप से सुंदर है। सुमेरु पर्वत का पुत्र, सूर्य जैसा तेजस्वी एक पर्वत समुद्र को भेदकर उठा था, जिसके तीन विशाल शिखर थे और तीसरा शिखर ब्रह्मा का धाम था; उस पर आम, कदंब, चंदन और चंपा के वन थे। वहाँ सोने के कमलों से भरे सरोवर में हाथियों का शत्रु एक ग्राह रहता था। काजल जैसे रंग का, मद से भरा गजराज अपनी हथिनियों के बीच कमल-वन में क्रीड़ा कर रहा था, तभी ग्राह ने उसे पकड़ लिया, और वह वरुण के पाशों जैसे बंधन में बँधकर असहाय हो गया।

पूरी शक्ति से संघर्ष करके और ज़ोर से चिंघाड़कर भी जब वह नहीं छूटा, तब परम संकट में उसने मन से हरि का स्मरण किया; पुराण कहता है कि जन्म-जन्मांतर के अभ्यास से उसमें गरुड़ध्वज के प्रति भक्ति थी। उसने स्तुति की: "निराश्रय, निःस्पृह, अव्यक्त, अप्रमेय, सनातन, पुराण देव को नमस्कार; गोविंद को, विश्वेश्वर, शिव और हरि को नमस्कार; उन सहस्रशीर्ष अनंत की मैं शरण लेता हूँ।" प्रसन्न विष्णु गरुड़ पर आए, ग्राह से गजेंद्र को उबारा और उसे बंधनों से मुक्त किया; और ग्राह भी, जो पहले एक गंधर्व था, भगवान के हाथों मरकर स्वर्ग गया। पुराण कहता है कि इन कथाओं के स्मरण से बुरे स्वप्न नष्ट होते हैं।

वामन और बलि: कुरुक्षेत्र में तीन पग

पुराण का शीर्षक-कथा अंत के पास आती है, और इसकी पृष्ठभूमि कुरुक्षेत्र है, जैसा Wilson ने भी ध्यान दिलाया। विरोचन का पुत्र बलि यज्ञ करने कुरुक्षेत्र आया; शुक्राचार्य ने भृगुवंशी श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाया और स्वयं विधि से बलि को यज्ञ की दीक्षा दी। यज्ञ के समय अपशकुन होने लगे: समुद्र क्षुब्ध हो गए, आकाश में नक्षत्र-मंडल उलटी गति से चलता दिखा, अग्नियाँ मंत्रों से दी गई असुरों की आहुतियाँ भी ग्रहण नहीं कर रही थीं, और दिशाएँ अंधकार से भर गईं। बलि ने हाथ जोड़कर शुक्र से कारण पूछा। शुक्र ने ध्यान से जानकर कहा, "निश्चय ही वासुदेव आ रहे हैं; यज्ञ का भाग खाने वाले देवता बाहर कर दिए गए हैं, इसलिए उनके लिए हरि आ रहे हैं। हे विभो, यज्ञ में उन्हें तिनके की नोक भर भी, भूमि या सोना कुछ भी मत देना।"

पर बलि ने गुरु की बात नहीं मानी। उसका तर्क था: "जिनके उदर में पृथ्वी, भुवन, लोकपाल और रसातल सदा बसते हैं, वे लोकपति जनार्दन यदि याचक बनकर आएँ, तो मैं उन्हें कैसे मना करूँ?" उसने कहा कि मन, वाणी और शरीर से किया कर्म दूसरे जन्मों तक साथ जाता है, और इसके प्रमाण में मलय पर्वत के कोशकार नाम के ब्राह्मण के पुत्र की कथा सुनाई। उस पुत्र को लोग गूँगा और अंधा समझते थे; एक राक्षसी उसे उठा ले गई, कोशकार ने बदले में मिले राक्षस-शिशु को पाला, और दोनों का उपनयन कराया। अपने पुत्र निशाकर को जड़ समझकर पिता ने उसे एक कुएँ में डालकर ऊपर शिला रख दी। माँ ने उसे निकाला तो उसने बताया कि उसे अपने पूर्वजन्म याद हैं: वह पहले वृषाकपि का पुत्र था, शास्त्र पढ़कर भी मद से अंधा होकर दुष्कर्म में लगा, नरक गया, पशु बना, और उन्हीं अनुभवों से अब संसार से विरक्त होकर जड़ जैसा रहता है। बलि के लिए इस कथा का अर्थ यह था कि धर्म से किया दान ही साथ जाता है।

वामन यज्ञशाला में आए और बोले, "राजन, मेरे शरीर के माप से मुझे तीन पग दो।" बलि हँसा: "तुम मूर्खता से तीन पग माँगते हो! मुझ जैसे दाता से तीन पग माँगने में माँगने वाले और देने वाले, दोनों को लज्जा होगी। विष्णु, हाथी, घोड़े, भूमि, दासियाँ, सोना, जो चाहो माँगो; बताओ, इनमें से क्या दूँ?" वामन ने कहा, "मैं इतने का ही याचक हूँ; मुझे तीन पग दो।" तब बलि ने जल का पात्र (भृंगार) लेकर विष्णु को तीन पग दान कर दिए।

उसी क्षण विष्णु ने त्रिलोक को नापने के लिए बहुरूप, जगन्मय रूप लिया। एक पग से उन्होंने चर-अचर सहित पूरी पृथ्वी ले ली; उनकी नाभि तक आकाश, और सूर्य-चंद्र उनके बाएँ-दाएँ थे। तीसरा पग पूरा नहीं हुआ, तो भगवान बोले, "मेरा यह पग पूरा करो, नहीं तो बंधन स्वीकार करो।" पर पुराण यह भी कहता है कि ये तीन पग बलि के भी हित के लिए थे: भगवान ने उससे कहा कि सावर्णि मन्वन्तर आने पर बलि इंद्र बनेगा, और तब तक वह सुतल नाम के पाताल में निर्भय होकर रहे।

बलि ने सुतल में दानवेंद्रों के साथ निवास किया, और पुराण उसके वहाँ बने नगर का भी वर्णन करता है, जिसकी सीढ़ियाँ शुद्ध स्फटिक की थीं। अंत में पूछा जाता है कि मनुष्य मृत्यु के बाद किस गति को पाता है, और फलश्रुति कहती है कि जो इसे सुनता है वह परम कीर्ति और विष्णु-भक्ति के साथ विष्णु के पद को पाता है।

मच्छरीरप्रमाणेन देहि राजन्पदत्रयम् ।

(वामन:) राजन, मेरे शरीर के माप से मुझे तीन पग (भूमि) दो।

— वामन पुराण, अध्याय 1–69 — GRETIL e-text, पृष्ठ 65.8
बलिर्भृङ्गारमादाय ददौ विष्णोः क्रमत्रयम् । बलेरपि हितार्थाय कृतमेतत्क्रमत्रयम् ॥

बलि ने जल-पात्र (भृंगार) लेकर विष्णु को तीन पग दे दिए। ... ये तीन पग बलि के भी हित के लिए किए गए थे।

— वामन पुराण, अध्याय 1–69 — GRETIL e-text, पृष्ठ 65.17, 65.50

सरोमाहात्म्य: कुरुक्षेत्र और सरस्वती

Wilson ने लिखा कि वामन पुराण का बड़ा भाग "सरोमाहात्म्य" है, यानी स्थाणु तीर्थ, और थानेसर (स्थाण्वीश्वर) और कुरुक्षेत्र के अनेक लिंगों और सरोवरों की पवित्रता की कथाएँ, दिल्ली के उत्तर-पश्चिम का प्रदेश। Gupta संस्करण में यह भाग अलग 26 अध्यायों में है। इसका आरंभ भी वामन से जुड़ता है: ऋषि पूछते हैं कि बलि को कैसे बाँधा गया और इंद्र को राज्य कैसे मिला, और देवाधिदेव विष्णु वामन कैसे बने; फिर कश्यप, प्रह्लाद से बलि के प्रश्न, और शुक्र से बलि की बात आती है।

फिर कुरुक्षेत्र के तीर्थ: सरस्वती नदी का कुरुक्षेत्र में बहना और प्रवेश करना; वह स्थान जहाँ परशुराम ने तेज से (क्षत्रियों से) युद्ध किया; ब्राह्मणों से सेवित आपगा नदी; वह तीर्थ जहाँ शुक्र (उशना) सिद्ध होकर ग्रह बने; सरस्वती ने एक ऋषि को क्यों बहा दिया, इसकी कथा; सन्निहत्या सरोवर की उत्पत्ति और उसका धूल से भरना; स्थाणु-वट के पूर्व में सोम तीर्थ; और अंत में यह कि वहाँ किसने सिद्धि पाई। एक जगह यह भी कहा गया है कि यहाँ के हर तीर्थ में स्नान करने वाला हज़ार गायों के दान का फल पाता है।

सरोमाहात्म्य कुरुक्षेत्र के नाम और सीमा का भी वर्णन करता है: ब्रह्मा ने जिसे पहले "सन्निहित सरोवर" कहा, वह जहाँ तक ओघवती नदी बहती है वहाँ तक फैला है, और चारों ओर आधे योजन का है; विष्णु ने यहाँ हरि-रूप में निवास किया, और इसी तीर्थ की सेवा से हर (शिव) ने "स्थाणु" रूप पाया। कुरु के यहाँ (भूमि) जोतने से यह कुरुक्षेत्र कहलाया, और यह समंतपंचक पितामह ब्रह्मा की उत्तर वेदी कहा जाता है। सृष्टि-कथा में तो यहाँ तक कहा गया है कि ब्रह्माण्ड का अंड जिस स्थान पर था, वहीं सन्निहित सरोवर है, और उसी अंड के मध्य से ब्रह्मा उत्पन्न हुए।

कुरुक्षेत्र आज गीता की भूमि के रूप में प्रसिद्ध है, पर वामन पुराण दिखाता है कि यह गीता से भी पहले एक महातीर्थ था: सरस्वती का तट, ऋषियों की तपोभूमि, और वह स्थान जहाँ स्वयं बलि ने यज्ञ किया और वामन ने तीन पग नापे।

विद्वानों के मत: पंचलक्षण और काल

Wilson ने माना कि उनके पास का वामन पुराण वही ग्रंथ है जिसका Colonel Vans Kennedy और ईस्ट इंडिया कंपनी के पुस्तकालय की दो प्रतियों में उल्लेख है। पर उन्होंने यह भी लिखा कि इसके विषय "पुराण" कहलाने के दावे को मुश्किल से सिद्ध करते हैं: सृष्टि और मन्वन्तर के केवल प्रसंगवश उल्लेख हैं, और पुराण के पाँचों लक्षण कम हैं। स्वारोचिष मन्वन्तर के प्रसंग में बलि का उत्थान और वामन की कथा आती है।

काल के बारे में Wilson का अनुमान था कि यह संप्रदायों के उदय से पहले का हो सकता है, क्योंकि यह शिव और विष्णु दोनों का निष्पक्ष सम्मान करता है; पर इसमें प्राचीनता का भाव नहीं, और उन्होंने अनुमान लगाया कि इसे "तीन-चार सौ वर्ष पहले" बनारस के किसी ब्राह्मण ने संकलित किया होगा। यह 1840 का अनुमान है। बाद में All India Kashiraj Trust ने अनेक पांडुलिपियों की तुलना से इसका आलोचनात्मक संस्करण बनाया, जिससे स्पष्ट है कि इसकी पांडुलिपि-परंपरा काफ़ी विस्तृत है।

महत्व और आज के लिए अर्थ

वामन अवतार की कथा हर बच्चा जानता है, पर वामन पुराण उसके पीछे की दुनिया दिखाता है: बलि का धर्म से राज्य, प्रह्लाद का मार्गदर्शन, शुक्र का पौरोहित्य, और भगवान का यह आश्वासन कि तीन पग बलि के भी हित में थे। यह कथा दान की महिमा और अहंकार के अंत, दोनों को साथ रखती है।

और इसकी दूसरी कथाएँ भी आज के लिए अर्थ रखती हैं: सुकेशी बताता है कि धर्म पूछने और सीखने से आता है, जन्म से नहीं; कात्यायनी बताती हैं कि सब देवताओं की शक्ति मिलकर ही बुराई को हराती है; और कपालमोचन की कथा बताती है कि स्वयं शिव को भी पाप से छूटने के लिए तीर्थ और विष्णु की शरण लेनी पड़ी। हरि और हर एक-दूसरे के सहायक हैं, यही इस पुराण का स्वर है।

आगे पढ़ें

  • विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
  • श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
  • मार्कण्डेय पुराण — जैमिनि के प्रश्न और चार ज्ञानी पक्षी: हरिश्चंद्र, मदालसा की लोरी, दत्तात्रेय का योग, चौदह मन्वन्तर, और दुर्गा सप्तशती का मूल देवी-माहात्म्य
  • पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
  • माँ दुर्गा — कात्यायनी और महिषासुर-वध
  • महर्षि अगस्त्य — विंध्य को नीचा करने वाले ऋषि
  • वेद व्यास — पुराण-परंपरा

स्रोत एवं संदर्भ

वामन पुराण — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न