अठारह महापुराणों की सूचियाँ: शिव या वायु, और श्लोक-संख्या की तुलना

विष्णु, भागवत, मत्स्य, कूर्म, अग्नि, वराह और गरुड़ पुराण अठारह पुराणों के नाम और श्लोक-संख्या कैसे देते हैं, कहाँ वे मेल खाते हैं और कहाँ नहीं

संक्षेप में

विष्णु और भागवत पुराण अठारह महापुराणों की एक ही सूची देते हैं: ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कंद, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्मांड। कुछ दूसरे पुराण शिव की जगह वायु पुराण रखते हैं। भागवत के अनुसार सबका योग चार लाख श्लोक है।

एक नज़र में

मुख्य सूची
विष्णु पुराण 3.6.21–23, भागवत 12.7.23–24 (और Wilson के अनुसार भागवत की यही सूची विष्णु में)
मुख्य अंतर
चौथा पुराण शिव या वायु
शिव की जगह वायु
मत्स्य, अग्नि (Wilson); कूर्म अग्नि की जगह वायु रखता है
कुल श्लोक
4,00,000 (भागवत 12.13.9; मत्स्य 53.58)
सबसे बड़ा
स्कंद (81,100), फिर पद्म (55,000)
सबसे छोटा
मार्कण्डेय (9,000)

परंपरा की मुख्य सूची

विष्णु पुराण कहता है कि पुराण जानने वाले अठारह पुराण बताते हैं, और फिर उनके नाम क्रम से देता है: ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय (सातवाँ), आग्नेय (आठवाँ), भविष्य (नौवाँ), ब्रह्मवैवर्त (दसवाँ), लैंग (ग्यारहवाँ), वाराह (बारहवाँ), स्कांद (तेरहवाँ), वामन (चौदहवाँ), कौर्म (पंद्रहवाँ), मात्स्य, गारुड और ब्रह्मांड। भागवत पुराण के बारहवें स्कंध की सूची में यही अठारह नाम हैं। Wilson ने भी लिखा कि सामान्यतः यही नाम मिलते हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि सूची में नाम विशेषण के रूप में हैं, "पुराण" शब्द समझा जाता है: "वैष्णव पुराण" का अर्थ है विष्णु का पुराण, "शैव पुराण" शिव का पुराण, और "ब्राह्म पुराण" ब्रह्मा का पुराण; "विष्णु पुराण" जैसा समास वाला रूप भी उतना ही सही है और अधिक प्रचलित।

हमारे ज्ञानकोश की मुख्य सूची भी यही है, शिव पुराण सहित और वायु पुराण के बिना, क्योंकि विष्णु और भागवत, दोनों की अपनी सूचियाँ यही देती हैं। पर यह याद रखना ज़रूरी है कि यह अकेली परंपरागत सूची नहीं; दूसरे पुराण कुछ नामों में अलग हैं, और उन अंतरों को नीचे दिखाया गया है।

वाराहं द्वादशं चैव स्कान्दं चात्र त्रयोदशम् । चतुर्दशं वामनं च कौर्मं पञ्चदशं स्मृतम् । मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम् ॥

बारहवाँ वाराह, तेरहवाँ स्कांद, चौदहवाँ वामन, पंद्रहवाँ कौर्म, और फिर मात्स्य, गारुड और ब्रह्मांड।

— विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text, पृष्ठ 3.6.23

श्लोक-संख्या: भागवत और मत्स्य की तुलना

Wilson के अनुसार अग्नि, मत्स्य, भागवत और पद्म जैसे कुछ पुराण अठारहों की श्लोक-संख्या भी देते हैं, जो एक-दो जगह अलग होकर भी सामान्यतः मेल खाती है। भागवत की गिनती में पद्म के लिए "पञ्चोनषष्टि", यानी साठ में पाँच कम, पचपन हज़ार है, और सबका योग "चतुर्लक्ष", यानी चार लाख श्लोक, जिनमें भागवत के अठारह हज़ार हैं।

मत्स्य पुराण इससे आगे एक बात कहता है: व्यास ने लोक-हित के लिए जो पुराण संक्षेप में कहा, वह यहाँ चार लाख का है, पर देवताओं में आज भी उसका विस्तार सौ करोड़ का है। Wilson के अनुसार यह कहा गया कि चार लाख श्लोक केवल संक्षेप हैं। दोनों पुराणों की संख्याओं में चार-पाँच जगह अंतर है: ब्रह्म (भागवत 10,000, मत्स्य 13,000), अग्नि (15,400 और 16,000), कूर्म (17,000 और 18,000) और ब्रह्मांड (12,000 और 12,200)।

अठारह महापुराण: श्लोक-संख्या (भागवत 12.13 और मत्स्य 53)
क्रमपुराणभागवत 12.13मत्स्य 53स्रोत
1ब्रह्म10,00013,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.13
2पद्म55,00055,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.14
3विष्णु23,00023,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.17
4शिव (भागवत) / वायु (मत्स्य)24,00024,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.18
5भागवत18,00018,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.22
6नारद25,00025,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.23
7मार्कण्डेय9,0009,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.26
8अग्नि15,40016,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.29
9भविष्य14,50014,500श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.32
10ब्रह्मवैवर्त18,00018,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.35
11लिंग11,00011,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.38
12वराह24,00024,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.40
13स्कंद81,10081,100श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.43
14वामन10,00010,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.46
15कूर्म17,00018,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.48
16मत्स्य14,00014,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.51
17गरुड़19,00019,000श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.54
18ब्रह्मांड12,00012,200श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.55

शिव पुराण या वायु पुराण?

सूचियों का सबसे बड़ा अंतर चौथे स्थान पर है। मत्स्य पुराण अपनी सूची में "शैव" नहीं, "वायवीय" रखता है, और उसकी परिभाषा देता है: जिसमें वायु ने श्वेत कल्प के प्रसंग में धर्म बताए और जो रुद्र के माहात्म्य से युक्त है, वह वायवीय पुराण है, चौबीस हज़ार श्लोकों का। Wilson के अनुसार जब किसी सूची में शिव पुराण नहीं होता, तो सामान्यतः उसकी जगह वायु पुराण होता है, और जब शिव होता है, जैसे भागवत में, तो वायु नहीं; इससे संकेत मिलता है कि दोनों एक ही ग्रंथ के दो नाम हो सकते हैं।

Wilson ने इसके पक्ष में तीन तर्क दिए: मत्स्य वायवीय को रुद्र (शिव) की महिमा वाला बताता है; बालम्भट्ट ने लिखा कि वायवीय को शैव भी कहते हैं, हालाँकि कुछ के अनुसार शैव एक उपपुराण का नाम है; और भागवत (शिव) और मत्स्य (वायु) दोनों इसकी संख्या चौबीस हज़ार देते हैं, जबकि Wilson को मिली शिव पुराण की प्रति में लगभग सात हज़ार श्लोक ही थे। Colonel Vans Kennedy के अनुसार पश्चिम भारत में शैव को उपपुराण माना जाता था। इसलिए Wilson का निष्कर्ष था कि भागवत का "शिव पुराण" वही है जिसे मत्स्य "वायवीय" कहता है।

आज छपा हुआ "शिव पुराण" (विद्येश्वर, रुद्र, शतरुद्र आदि संहिताओं वाला) एक अलग, विशाल ग्रंथ है, और "वायु पुराण" भी अलग से छपता है। इसलिए "शिव या वायु" का प्रश्न आज भी पूरी तरह सुलझा नहीं; हमारे ज्ञानकोश में शिव पुराण का अपना पृष्ठ है, और यहाँ यह अंतर दर्ज है।

दूसरे पुराणों की सूचियों में अंतर

Wilson ने अलग-अलग पुराणों की सूचियों के अंतर गिनाए: कूर्म पुराण की सूची अग्नि पुराण को छोड़कर वायु रखती है; अग्नि पुराण शिव को छोड़कर वायु रखता है; वराह पुराण गरुड़ और ब्रह्मांड को छोड़कर वायु और नरसिंह रखता है, और इसमें वह अकेला है; मार्कण्डेय पुराण विष्णु और भागवत की तरह वायु को छोड़ता है; और मत्स्य, अग्नि की तरह, शिव को छोड़ता है। गरुड़ पुराण की अपनी सूची में तो शैव और वायवीय दोनों हैं, पर वामन नहीं। यानी "अठारह" की संख्या लगभग हर जगह एक है, पर उन अठारह में कौन-से नाम आते हैं, यह हर पुराण की सूची में थोड़ा-थोड़ा बदल जाता है।

Wilson ने देवी-भागवत और रेवा-माहात्म्य की सूचियों का भी उल्लेख किया: दोनों शिव की जगह वायु रखती हैं, पर संख्याएँ अलग देती हैं। देवी-भागवत वायु को 10,600, अग्नि को 16,000, स्कंद को 81,000 और ब्रह्मांड को 12,100 श्लोक देता है; और रेवा-माहात्म्य वायु को 24,000, अग्नि को 16,000, स्कंद को 84,000 और ब्रह्मांड को 12,200। पद्म पुराण का उत्तर खंड इन्हीं अठारह को सात्त्विक, राजस और तामस में बाँटता है, जो एक अलग, सांप्रदायिक वर्गीकरण है; उसकी सूची का क्रम भी अलग है, क्योंकि वहाँ स्कंद सत्रहवाँ और ब्रह्मांड अठारहवाँ है।

किस पुराण की सूची में क्या अलग है (Wilson, p. xxiv, और गरुड़ 1.223)
सूचीछोड़ा गयाजोड़ा गयास्रोत
विष्णु, भागवत, मार्कण्डेयवायु(शिव सहित मुख्य सूची)विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.23–24; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv
मत्स्य, अग्निशिववायुमत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.18; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv
कूर्मअग्निवायुविष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv
वराहगरुड़, ब्रह्मांडवायु, नरसिंहविष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv
गरुड़ (1.223)वामनवायु (शिव के साथ)गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), 1.223.15–16
देवी-भागवत, रेवा-माहात्म्यशिववायुविष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv, फ़ुटनोट

हर पुराण में पूरी सूची: एक रोचक प्रश्न

Wilson ने एक तार्किक बात उठाई: हर पुराण पूरे अठारह पुराणों के नाम देता है। पर जब तक कोई ग्रंथ पूरा न हुआ हो, उसकी सूची पूरी नहीं हो सकती थी; इसलिए यह सूची केवल उस एक पुराण में होनी चाहिए थी जो सबसे अंत में बना। चूँकि "सबसे अंतिम" कई हैं, उनके अनुसार नाम एक को छोड़कर बाक़ी सब में, सबके पूरे होने के बाद, जोड़े गए होंगे, और ये सूचियाँ अधिकांश में, शायद सब में, बाद का जोड़ हैं। यह बात यह भी समझाती है कि सूचियों में इतने छोटे-छोटे अंतर क्यों हैं।

संख्याओं के साथ भी ऐसा ही है। Wilson के अनुसार विष्णु पुराण की जितनी भी प्रतियाँ उन्हें पूरब और पश्चिम भारत से मिलीं, सात की सात, पूरी थीं, फिर भी उनमें सात हज़ार से कम श्लोक थे, जबकि मत्स्य और भागवत उसकी संख्या तेईस हज़ार बताते हैं। यानी परंपरा की श्लोक-संख्याएँ हर पुराण के आज के पाठ से मेल नहीं खातीं; कहीं पाठ छोटा है, और स्कंद जैसे पुराणों के नाम से मिलने वाली सामग्री कही गई संख्या से कहीं बड़ी।

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स्रोत एवं संदर्भ

अठारह महापुराणों की सूचियाँ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न