परंपरा की मुख्य सूची
विष्णु पुराण कहता है कि पुराण जानने वाले अठारह पुराण बताते हैं, और फिर उनके नाम क्रम से देता है: ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय (सातवाँ), आग्नेय (आठवाँ), भविष्य (नौवाँ), ब्रह्मवैवर्त (दसवाँ), लैंग (ग्यारहवाँ), वाराह (बारहवाँ), स्कांद (तेरहवाँ), वामन (चौदहवाँ), कौर्म (पंद्रहवाँ), मात्स्य, गारुड और ब्रह्मांड। भागवत पुराण के बारहवें स्कंध की सूची में यही अठारह नाम हैं। Wilson ने भी लिखा कि सामान्यतः यही नाम मिलते हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि सूची में नाम विशेषण के रूप में हैं, "पुराण" शब्द समझा जाता है: "वैष्णव पुराण" का अर्थ है विष्णु का पुराण, "शैव पुराण" शिव का पुराण, और "ब्राह्म पुराण" ब्रह्मा का पुराण; "विष्णु पुराण" जैसा समास वाला रूप भी उतना ही सही है और अधिक प्रचलित।
हमारे ज्ञानकोश की मुख्य सूची भी यही है, शिव पुराण सहित और वायु पुराण के बिना, क्योंकि विष्णु और भागवत, दोनों की अपनी सूचियाँ यही देती हैं। पर यह याद रखना ज़रूरी है कि यह अकेली परंपरागत सूची नहीं; दूसरे पुराण कुछ नामों में अलग हैं, और उन अंतरों को नीचे दिखाया गया है।
वाराहं द्वादशं चैव स्कान्दं चात्र त्रयोदशम् । चतुर्दशं वामनं च कौर्मं पञ्चदशं स्मृतम् । मात्स्यं च गारुडं चैव ब्रह्माण्डं च ततः परम् ॥बारहवाँ वाराह, तेरहवाँ स्कांद, चौदहवाँ वामन, पंद्रहवाँ कौर्म, और फिर मात्स्य, गारुड और ब्रह्मांड।
श्लोक-संख्या: भागवत और मत्स्य की तुलना
Wilson के अनुसार अग्नि, मत्स्य, भागवत और पद्म जैसे कुछ पुराण अठारहों की श्लोक-संख्या भी देते हैं, जो एक-दो जगह अलग होकर भी सामान्यतः मेल खाती है। भागवत की गिनती में पद्म के लिए "पञ्चोनषष्टि", यानी साठ में पाँच कम, पचपन हज़ार है, और सबका योग "चतुर्लक्ष", यानी चार लाख श्लोक, जिनमें भागवत के अठारह हज़ार हैं।
मत्स्य पुराण इससे आगे एक बात कहता है: व्यास ने लोक-हित के लिए जो पुराण संक्षेप में कहा, वह यहाँ चार लाख का है, पर देवताओं में आज भी उसका विस्तार सौ करोड़ का है। Wilson के अनुसार यह कहा गया कि चार लाख श्लोक केवल संक्षेप हैं। दोनों पुराणों की संख्याओं में चार-पाँच जगह अंतर है: ब्रह्म (भागवत 10,000, मत्स्य 13,000), अग्नि (15,400 और 16,000), कूर्म (17,000 और 18,000) और ब्रह्मांड (12,000 और 12,200)।
| क्रम | पुराण | भागवत 12.13 | मत्स्य 53 | स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| 1 | ब्रह्म | 10,000 | 13,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.13 |
| 2 | पद्म | 55,000 | 55,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.14 |
| 3 | विष्णु | 23,000 | 23,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.17 |
| 4 | शिव (भागवत) / वायु (मत्स्य) | 24,000 | 24,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.4; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.18 |
| 5 | भागवत | 18,000 | 18,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.22 |
| 6 | नारद | 25,000 | 25,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.23 |
| 7 | मार्कण्डेय | 9,000 | 9,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.26 |
| 8 | अग्नि | 15,400 | 16,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.5; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.29 |
| 9 | भविष्य | 14,500 | 14,500 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.32 |
| 10 | ब्रह्मवैवर्त | 18,000 | 18,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.35 |
| 11 | लिंग | 11,000 | 11,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.6; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.38 |
| 12 | वराह | 24,000 | 24,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.40 |
| 13 | स्कंद | 81,100 | 81,100 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.43 |
| 14 | वामन | 10,000 | 10,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.7; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.46 |
| 15 | कूर्म | 17,000 | 18,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.48 |
| 16 | मत्स्य | 14,000 | 14,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.51 |
| 17 | गरुड़ | 19,000 | 19,000 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.54 |
| 18 | ब्रह्मांड | 12,000 | 12,200 | श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.13.8; मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.55 |
शिव पुराण या वायु पुराण?
सूचियों का सबसे बड़ा अंतर चौथे स्थान पर है। मत्स्य पुराण अपनी सूची में "शैव" नहीं, "वायवीय" रखता है, और उसकी परिभाषा देता है: जिसमें वायु ने श्वेत कल्प के प्रसंग में धर्म बताए और जो रुद्र के माहात्म्य से युक्त है, वह वायवीय पुराण है, चौबीस हज़ार श्लोकों का। Wilson के अनुसार जब किसी सूची में शिव पुराण नहीं होता, तो सामान्यतः उसकी जगह वायु पुराण होता है, और जब शिव होता है, जैसे भागवत में, तो वायु नहीं; इससे संकेत मिलता है कि दोनों एक ही ग्रंथ के दो नाम हो सकते हैं।
Wilson ने इसके पक्ष में तीन तर्क दिए: मत्स्य वायवीय को रुद्र (शिव) की महिमा वाला बताता है; बालम्भट्ट ने लिखा कि वायवीय को शैव भी कहते हैं, हालाँकि कुछ के अनुसार शैव एक उपपुराण का नाम है; और भागवत (शिव) और मत्स्य (वायु) दोनों इसकी संख्या चौबीस हज़ार देते हैं, जबकि Wilson को मिली शिव पुराण की प्रति में लगभग सात हज़ार श्लोक ही थे। Colonel Vans Kennedy के अनुसार पश्चिम भारत में शैव को उपपुराण माना जाता था। इसलिए Wilson का निष्कर्ष था कि भागवत का "शिव पुराण" वही है जिसे मत्स्य "वायवीय" कहता है।
आज छपा हुआ "शिव पुराण" (विद्येश्वर, रुद्र, शतरुद्र आदि संहिताओं वाला) एक अलग, विशाल ग्रंथ है, और "वायु पुराण" भी अलग से छपता है। इसलिए "शिव या वायु" का प्रश्न आज भी पूरी तरह सुलझा नहीं; हमारे ज्ञानकोश में शिव पुराण का अपना पृष्ठ है, और यहाँ यह अंतर दर्ज है।
दूसरे पुराणों की सूचियों में अंतर
Wilson ने अलग-अलग पुराणों की सूचियों के अंतर गिनाए: कूर्म पुराण की सूची अग्नि पुराण को छोड़कर वायु रखती है; अग्नि पुराण शिव को छोड़कर वायु रखता है; वराह पुराण गरुड़ और ब्रह्मांड को छोड़कर वायु और नरसिंह रखता है, और इसमें वह अकेला है; मार्कण्डेय पुराण विष्णु और भागवत की तरह वायु को छोड़ता है; और मत्स्य, अग्नि की तरह, शिव को छोड़ता है। गरुड़ पुराण की अपनी सूची में तो शैव और वायवीय दोनों हैं, पर वामन नहीं। यानी "अठारह" की संख्या लगभग हर जगह एक है, पर उन अठारह में कौन-से नाम आते हैं, यह हर पुराण की सूची में थोड़ा-थोड़ा बदल जाता है।
Wilson ने देवी-भागवत और रेवा-माहात्म्य की सूचियों का भी उल्लेख किया: दोनों शिव की जगह वायु रखती हैं, पर संख्याएँ अलग देती हैं। देवी-भागवत वायु को 10,600, अग्नि को 16,000, स्कंद को 81,000 और ब्रह्मांड को 12,100 श्लोक देता है; और रेवा-माहात्म्य वायु को 24,000, अग्नि को 16,000, स्कंद को 84,000 और ब्रह्मांड को 12,200। पद्म पुराण का उत्तर खंड इन्हीं अठारह को सात्त्विक, राजस और तामस में बाँटता है, जो एक अलग, सांप्रदायिक वर्गीकरण है; उसकी सूची का क्रम भी अलग है, क्योंकि वहाँ स्कंद सत्रहवाँ और ब्रह्मांड अठारहवाँ है।
| सूची | छोड़ा गया | जोड़ा गया | स्रोत |
|---|---|---|---|
| विष्णु, भागवत, मार्कण्डेय | वायु | (शिव सहित मुख्य सूची) | विष्णु पुराण (मूल संस्कृत, समीक्षित), 3.6.21–23; श्रीमद्भागवत (मूल संस्कृत), 12.7.23–24; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv |
| मत्स्य, अग्नि | शिव | वायु | मत्स्य पुराण (मूल संस्कृत), 53.18; विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv |
| कूर्म | अग्नि | वायु | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv |
| वराह | गरुड़, ब्रह्मांड | वायु, नरसिंह | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv |
| गरुड़ (1.223) | वामन | वायु (शिव के साथ) | गरुड़ पुराण (मूल संस्कृत), 1.223.15–16 |
| देवी-भागवत, रेवा-माहात्म्य | शिव | वायु | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxiv, फ़ुटनोट |
हर पुराण में पूरी सूची: एक रोचक प्रश्न
Wilson ने एक तार्किक बात उठाई: हर पुराण पूरे अठारह पुराणों के नाम देता है। पर जब तक कोई ग्रंथ पूरा न हुआ हो, उसकी सूची पूरी नहीं हो सकती थी; इसलिए यह सूची केवल उस एक पुराण में होनी चाहिए थी जो सबसे अंत में बना। चूँकि "सबसे अंतिम" कई हैं, उनके अनुसार नाम एक को छोड़कर बाक़ी सब में, सबके पूरे होने के बाद, जोड़े गए होंगे, और ये सूचियाँ अधिकांश में, शायद सब में, बाद का जोड़ हैं। यह बात यह भी समझाती है कि सूचियों में इतने छोटे-छोटे अंतर क्यों हैं।
संख्याओं के साथ भी ऐसा ही है। Wilson के अनुसार विष्णु पुराण की जितनी भी प्रतियाँ उन्हें पूरब और पश्चिम भारत से मिलीं, सात की सात, पूरी थीं, फिर भी उनमें सात हज़ार से कम श्लोक थे, जबकि मत्स्य और भागवत उसकी संख्या तेईस हज़ार बताते हैं। यानी परंपरा की श्लोक-संख्याएँ हर पुराण के आज के पाठ से मेल नहीं खातीं; कहीं पाठ छोटा है, और स्कंद जैसे पुराणों के नाम से मिलने वाली सामग्री कही गई संख्या से कहीं बड़ी।
आगे पढ़ें
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- महापुराण और उपपुराण — अठारह महापुराणों के अलावा जो पुराण गिनाए जाते हैं, वे कहाँ से आए: मत्स्य के चार "उपभेद", कूर्म और गरुड़ के कथन, उपपुराणों की अलग-अलग सूचियाँ और "भागवत या भार्गव" की बहस
- पुराण के पंच लक्षण — पुराण की सबसे पुरानी परिभाषा, भागवत के दस लक्षण, और यह सवाल कि आज के पुराण इस परिभाषा पर कितने खरे उतरते हैं
- शिव पुराण — सातों संहिताओं में: शिवरात्रि और ज्योति-स्तंभ, सती और दक्ष-यज्ञ, पार्वती का तप और शिव-विवाह, कार्तिकेय और गणेश, त्रिपुर और जलंधर, शिव के अवतार, बारह ज्योतिर्लिंग, रुद्राक्ष और पंचाक्षर
- स्कंद पुराण — सात खंडों में केदार से सेतु तक, तिरुपति से पुरी, अयोध्या से काशी, उज्जैन, नर्मदा, सोमनाथ और द्वारका तक: शिवरात्रि, सत्यनारायण, बर्बरीक, दिवोदास और इंद्रद्युम्न की कथाओं के साथ
- वेदव्यास — अठारह पुराणों के परंपरागत कर्ता
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.20–23, 3.6.21–23, 3.6.23
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.7.23–24, 12.13.4–9, 12.13.4, 12.13.5, 12.13.6, 12.13.7, 12.13.8
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, p. xxiii, Preface, p. xxiv, Preface, pp. xxxv–xxxvi, Preface, p. xxxvi, Preface, p. xxiv, फ़ुटनोट, Preface, pp. xxxiv–xxxv, lxxii
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.58–59, 53.13, 53.14, 53.17, 53.18, 53.22, 53.23, 53.26, 53.29, 53.32, 53.35, 53.38, 53.40, 53.43, 53.46, 53.48, 53.51, 53.54, 53.55
- शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता और वायवीय संहिता — GRETIL e-text — input: Sansknet project (2020) · 1.2.50–62
- गरुड़ पुराण (वेंकटेश्वर प्रेस, बंबई के पाठ पर) — GRETIL e-text — input: Sansknet project (2020) · 1.223.15–16
- पद्मपुराणम् (सृष्टि, भूमि, स्वर्ग, पाताल, उत्तर खंड) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · उत्तर खंड 236
