पद्म पुराण क्या है?
पद्म पुराण अठारह पुराणों की हर सूची में दूसरे स्थान पर आता है, ब्रह्म के बाद। मत्स्य पुराण के अनुसार इसमें उस समय का वृत्तांत है जब जगत सोने के कमल (पद्म) के रूप में था, और इसीलिए यह "पाद्म" कहलाता है; इसकी संख्या पचपन हज़ार श्लोक है। भागवत भी यही संख्या देता है, और इस पुराण के अपने अध्यायों की पुष्पिकाएँ भी बार-बार इसे "पंचपंचाशत्साहस्री संहिता", यानी पचपन हज़ार श्लोकों की संहिता, कहती हैं।
पहले अध्याय में लोमहर्षण अपने पुत्र उग्रश्रवा को ज्ञानी मुनियों के पास भेजते हैं, और उग्रश्रवा (सौति) नैमिषारण्य के ऋषियों को यह पुराण सुनाते हैं। Wilson के अनुसार सौति वह दोहराते हैं जो मूल में ब्रह्मा ने पुलस्त्य को और पुलस्त्य ने भीष्म को बताया था। Wilson ने यह भी लिखा कि इसकी कही गई संख्या पचपन हज़ार "सच से बहुत दूर नहीं" है, यानी उनकी प्रतियाँ भी लगभग इतनी ही बड़ी थीं।
पद्म पुराण इतना विशाल है कि उसमें लगभग हर प्रकार की सामग्री मिलती है: सृष्टि और वंश, तीर्थ, व्रत, देवासुर संग्राम, रामायण का उत्तर-भाग, कृष्ण और वृंदावन, स्तोत्र, और दर्शन। पर उसका स्वर, विशेषकर अंतिम खंडों में, स्पष्ट रूप से वैष्णव है: विष्णु-नाम, एकादशी, तुलसी, कार्तिक, गीता और भागवत की महिमा।
संरचना: सात खंड, 693 अध्याय
Wilson ने 1840 में पद्म पुराण के पाँच खंड बताए थे: सृष्टि, भूमि, स्वर्ग, पाताल और उत्तर, और एक छठा प्रचलित भाग "क्रियायोगसार"। संस्कृत विकिस्रोत पर जो पाठ है, उसमें सात खंड हैं, क्योंकि उसमें स्वर्ग के बाद "ब्रह्म खंड" भी है: सृष्टि (82 अध्याय), भूमि (125), स्वर्ग (62), ब्रह्म (26), पाताल (117), उत्तर (255) और क्रियायोगसार (26), कुल 693 अध्याय। अलग-अलग छपे संस्करणों में खंडों का क्रम और अध्याय-संख्या कुछ अलग मिल सकती है।
Wilson ने यह भी लिखा कि खंडों के नाम उनकी सामग्री का अधूरा परिचय देते हैं। जैसे भूमि खंड पृथ्वी का वर्णन अंत के पास तक टालता है और उससे पहले सौ से अधिक अध्यायों में "तीर्थों" की कथाएँ कहता है, जिनमें पत्नी, माता-पिता और गुरु को भी तीर्थ माना गया है; और पाताल खंड का बड़ा भाग राम की कथा है।
| खंड | मुख्य विषय | स्रोत |
|---|---|---|
| सृष्टि (1–82) | पुराण का अवतरण; लक्ष्मी की उत्पत्ति; दक्ष-यज्ञ; पितर और श्राद्ध; यदु-वंश; गायत्री और सावित्री का विवाद; पुष्कर-माहात्म्य; व्रत; राम-अगस्त्य संवाद; तारक, कुमार, नरसिंह; गरुड़ की उत्पत्ति; पतिव्रता; अहल्या; रुद्राक्ष और तुलसी; देवासुर संग्राम | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), सृष्टि खंड 1–82 |
| भूमि (1–125) | शिवशर्मा और उसके पुत्र; सुव्रत, सोमशर्मा, सुमना; वृत्र-वध; पृथु और वेन; सुकला-चरित्र (पत्नी-तीर्थ); पितृ-तीर्थ और माता-पिता तीर्थ; ययाति; च्यवन और कुंजल तोता (गुरु-तीर्थ) | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), भूमि खंड, विषयानुक्रमणिका |
| स्वर्ग (1–62) | ऊपर के लोक और वैकुंठ; प्रसिद्ध राजाओं के चरित्र; वर्ण और आश्रम के आचार; अनेक कथाएँ | विष्णु पुराण, अंश 1 (Wilson अनु.), Preface, p. xxxi; पद्म पुराण (मूल संस्कृत), स्वर्ग खंड 1–62 |
| ब्रह्म (1–26) | ब्रह्मा-नारद संवाद में कर्म-विपाक, राधाष्टमी-माहात्म्य; सूत-शौनक संवाद में समुद्र-मंथन, जन्माष्टमी व्रत, हरिवासर, चरणोदक, राधा-दामोदर पूजा | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), ब्रह्म खंड, पुष्पिकाएँ |
| पाताल (1–117) | शेष-वात्स्यायन संवाद में राम का अश्वमेध: शत्रुघ्न और घोड़ा, अनेक युद्ध, लव-कुश; फिर वृंदावन और मथुरा का माहात्म्य, शिव-पार्वती संवाद, शालग्राम | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), पाताल खंड, पुष्पिकाएँ |
| उत्तर (1–255) | बदरी; जालंधर और वृंदा; तुलसी-शालग्राम; जन्माष्टमी; हर महीने की एकादशियाँ; चातुर्मास्य; विष्णु-सहस्रनाम; राम-रक्षा स्तोत्र; कार्तिक और माघ माहात्म्य; गीता-माहात्म्य; भागवत-माहात्म्य; कालिंदी और इंद्रप्रस्थ माहात्म्य; तामस शास्त्र | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), उत्तर खंड, पुष्पिकाएँ |
| क्रियायोगसार (1–26) | व्यास-जैमिनि संवाद: गंगा, प्रयाग, हरि-पूजा, अश्वत्थ, पुरुषोत्तम क्षेत्र, दान, एकादशी | पद्म पुराण (मूल संस्कृत), क्रियायोगसार, पुष्पिकाएँ |
पुष्कर, गायत्री और सावित्री का शाप
सृष्टि खंड का एक बड़ा भाग पुष्कर तीर्थ (आज के अजमेर के पास) की महिमा है, और Wilson ने भी इसे इस खंड की विशेषता बताया। इसकी सबसे प्रसिद्ध कथा अध्याय 17 में है: ब्रह्मा ने पुष्कर में यज्ञ किया, और यज्ञ के समय उनकी पत्नी सावित्री के आने में देर हुई। तब एक आभीर (ग्वाल) कन्या गायत्री को पत्नी के स्थान पर बैठाकर यज्ञ शुरू किया गया, और देवताओं ने इसका अनुमोदन किया।
जब सावित्री अपनी बहुओं और देव-स्त्रियों के साथ यज्ञ में पहुँचीं और यह देखा, तो इंद्र तक भयभीत हो गए, और सब सोचने लगे कि सावित्री क्या कहेंगी। क्रोधित सावित्री ने ब्रह्मा को शाप दिया कि कार्तिक मास की एक वार्षिक पूजा के सिवा उनकी पूजा नहीं होगी; और उन्होंने यज्ञ के ऋत्विज ब्राह्मणों को और उपस्थित देवताओं को भी शाप दिए। इसके बाद सावित्री पुष्कर में ही प्रतिष्ठित हुईं। पुराण यह भी बताता है कि गायत्री ने इन शापों को कुछ हद तक अनुग्रह में बदला, और नियम से पुष्कर आने वाले ब्रह्मा की पूजा करते हैं।
आज भी पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर को लेकर जो लोक-परंपरा है कि ब्रह्मा की पूजा मुख्य रूप से पुष्कर में होती है, उसका एक पौराणिक आधार यही कथा है। इसी खंड में पुष्कर के तीर्थ, उसमें स्नान की विधि, सप्तर्षियों का संवाद, अनेक व्रत (अंगारक चतुर्थी, आदित्य-शयन, रोहिणी-चंद्र-शयन), तालाब की प्रतिष्ठा की विधि, और "वेश्या-व्रत" जैसे विशेष व्रत भी हैं।
ॠते तु कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव ।(सावित्री ब्रह्मा से:) कार्तिक की एक वार्षिक पूजा के सिवा (तुम्हारी पूजा नहीं होगी)।
सृष्टि खंड की और कथाएँ
सृष्टि खंड के आरंभिक अध्याय सृष्टि, पितरों और वंशों के हैं, और Wilson के अनुसार ये प्रायः विष्णु पुराण की शैली में और कई बार उसी के शब्दों में हैं; उन्होंने यह भी लिखा कि ये वैध पौराणिक विषय जल्दी ही पुष्कर (अजमेर) की महिमा की नई कथाओं को जगह दे देते हैं। इनमें लक्ष्मी की उत्पत्ति, दक्ष-यज्ञ का विध्वंस, पितृ-माहात्म्य और श्राद्ध, यदु-वंश, अवतारों का चरित, और रुद्र से जुड़ा एक अध्याय है।
आगे की कथाओं में राम और अगस्त्य का संवाद, एक शूद्र तपस्वी का वध, वामन की प्रतिष्ठा, कमल का प्रकट होना, कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के समय का देवासुर युद्ध, तारक पर विजय, गौरी का विवाह, कुमार का जन्म और तारक-वध, नरसिंह का प्रादुर्भाव, गरुड़ की उत्पत्ति, गौ-माहात्म्य, सदाचार, पतिव्रता की कथा, अहल्या-हरण, रुद्राक्ष और तुलसी का माहात्म्य, गणपति-स्तोत्र, और देवासुर संग्राम में कालकेय, नमुचि, मधु, वृत्र और त्रिपुर के वध हैं। अंत में सूर्य-शांति, मंगल (भौम) की उत्पत्ति और ग्रह-पूजा है।
भूमि खंड: पत्नी, माता-पिता और गुरु भी तीर्थ हैं
भूमि खंड की सबसे सुंदर बात उसका यह विचार है कि तीर्थ केवल नदियाँ और मंदिर नहीं: पतिव्रता पत्नी, माता-पिता और गुरु भी तीर्थ हैं। इसकी शुरुआत शिवशर्मा नाम के ब्राह्मण और उसके पुत्रों की कथा से होती है। शिवशर्मा ने अपने पुत्रों की परीक्षा ली: एक पुत्र विष्णुशर्मा को इंद्र के पास से अमृत लाना पड़ा, और रास्ते में मेनका और इंद्र के अनेक विघ्न आए, जिन्हें पार करने पर डरे हुए इंद्र ने स्वयं अमृत का कलश दे दिया; छोटे पुत्र सोमशर्मा को घड़ा सौंपकर माता-पिता तीर्थयात्रा के बहाने चले गए, और लौटकर माया से कोढ़ से ग्रस्त शरीर में आए, ताकि देखें कि पुत्र उनकी सेवा कैसे करता है। माता-पिता की सेवा से संतुष्ट होकर चारों पुत्रों को गोलोक मिला।
इसी खंड में वेन की कथा भी अपने ढंग से है: सुशंख गंधर्व को मारने पर सुनीथा को कुपुत्र का शाप मिला, और उसका पुत्र वेन पहले धर्म से प्रजा का पालन करता रहा, पर पाप के उदय के समय छद्म-वेश धारण किए एक "पाप-पुरुष" के उपदेश से उसकी श्रद्धा टूटी, नास्तिक बुद्धि जागी और उसने वैदिक कर्म छोड़ दिए। पृथु की कथा भी इसी प्रसंग में है।
"भार्या-तीर्थ" की कथा वाराणसी के वैश्य कृकल की पत्नी सुकला की है (अध्याय 41 से 60)। पति तीर्थयात्रा पर गया, तो सुकला ने कठोर पतिव्रत निभाया, और सखियों के कहने पर भी शरीर को सुखाना नहीं छोड़ा, बल्कि उन्हें पतिव्रता धर्म की कथाएँ सुनाईं। इंद्र ने उसका व्रत तोड़ने के लिए कामदेव और रति के साथ अनेक उपाय किए, दूती भेजी, स्वयं रूप बदलकर आए, पर सुकला अडिग रही। उधर तीर्थयात्रा से लौटते कृकल को रास्ते में स्वयं धर्म ने उसके पितरों को बँधा हुआ दिखाया और कहा कि पत्नी के बिना की गई तीर्थयात्रा व्यर्थ है। कृकल ने घर लौटकर पत्नी के हाथ से अन्न पकवाकर श्राद्ध किया, और तब उसके पितर मुक्त हुए।
सुकला की इस कथा के भीतर ही, जब वह सखियों को पतिव्रता धर्म समझाती है, एक और कथा आती है (अध्याय 42 से 52): राजा इक्ष्वाकु अपनी पत्नी सुदेवा के साथ शिकार पर गए, और एक वराह-दल के मुखिया को मार गिराया। उसकी पत्नी शूकरी भी लड़ते हुए घायल होकर गिरी, और जब रानी सुदेवा ने उसके मुँह पर ठंडा जल छिड़का, तो वह मनुष्य की वाणी में बोल उठी। उसने अपने पिछले जन्म की कथा सुनाई: वह एक ब्राह्मण कन्या थी जो पति को धोखा देती रही, और पति के घर में सौत मंगला का पतिव्रत देखकर लज्जा और पछतावे से मर गई। इसी कथा के भीतर पद्मावती की कथा है, जिसके साथ गोभिल दैत्य ने उसके पति का रूप धरकर छल किया, और उसी गर्भ से कंस का जन्म बताया गया है। अंत में इक्ष्वाकु के कहने पर रानी सुदेवा ने अपने एक दिन के पतिव्रत का पुण्य शूकरी को दिया, और वह उस योनि से छूटकर स्वर्ग गई।
फिर "पितृ-तीर्थ" में कुंडल ब्राह्मण के पितृभक्त पुत्र सुकर्मा की कथा है: पिप्पल नाम का एक ब्राह्मण तप से सारे विश्व को वश में करने की शक्ति पाकर घमंडी हो गया, और एक सारस के कहने पर सुकर्मा के पास गया, जिसने केवल माता-पिता की सेवा से वह ज्ञान पाया था जो पिप्पल को तप से नहीं मिला। "माता-पिता तीर्थ" के प्रसंग में नहुष और ययाति का चरित है, और "गुरु-तीर्थ" के प्रसंग में च्यवन ऋषि और कुंजल नाम के ज्ञानी तोते और उसके चार पुत्रों का लंबा संवाद, जो इस खंड का अंत है।
भूमि खंड में ययाति: एक अलग कथा
पद्म पुराण के भूमि खंड में ययाति की कथा दूसरे पुराणों से काफ़ी अलग है। यहाँ ययाति इतने धर्मात्मा हैं कि इंद्र अपने पद के जाने के डर से उन्हें स्वर्ग बुलाने मातलि को भेजते हैं; ययाति अपने शरीर की प्रशंसा करते हुए स्वर्ग जाने से मना कर देते हैं और अपने राज्य में विष्णु-सेवा की घोषणा करवाते हैं। परिणाम यह कि पृथ्वी पर मृत्यु ही बंद हो गई, और यमराज इंद्र के पास शिकायत लेकर गए।
इंद्र के आदेश से कामदेव गंधर्वों के साथ नाटक करने ययाति की सभा में आए; नृत्य-गीत में डूबे ययाति के शरीर में शौच के एक छोटे-से छूटने से जरा (बुढ़ापा) प्रवेश कर गई। फिर शिकार में एक सरोवर के तट पर उन्होंने अश्रुबिंदुमती नाम की कन्या का गान सुना और उससे विवाह का वचन दिया। पुत्रों से जवानी माँगी; तीन ने मना किया और शाप पाया, चौथे पुरु ने अपनी जवानी दी। अंत में अश्रुबिंदुमती के आग्रह पर ययाति पुरु को नीति का उपदेश देकर राज्य और जवानी लौटाते हैं, और अपनी प्रजा के साथ इंद्र आदि के लोकों से होते हुए विष्णु-लोक जाते हैं। यह पूरी कथा सुकर्मा पिप्पल को माता-पिता की सेवा का फल बताने के लिए सुनाता है: पिता की आज्ञा मानने वाले पुरु को ही राज्य मिला।
स्वर्ग खंड: भारत के तीर्थों की एक लंबी यात्रा
स्वर्ग खंड को इसका पहला अध्याय "आदि खंड" भी कहता है। यह सृष्टि और ब्रह्मांड के वर्णन से शुरू होता है: मेरु पर्वत, द्वीप और वर्ष, विस्तार से भारतवर्ष के कुल-पर्वत, महानदियाँ और देश, फिर जंबू, शाक आदि द्वीप। Wilson ने लिखा कि इसके आरंभ में ऊपर के लोकों की स्थिति बताई गई है और सबसे ऊपर विष्णु का वैकुंठ रखा गया है, जो उनके अनुसार सबसे पुरानी ब्रह्मांड-कल्पना में नहीं था।
इसके बाद इस खंड का बड़ा भाग तीर्थों का है, नारद और युधिष्ठिर के संवाद में: नारद बताते हैं कि गंगाद्वार पर दिलीप को वसिष्ठ ने तीर्थों की महिमा कैसे सुनाई थी। फिर नर्मदा के तीर्थों की बहुत लंबी सूची (अमरकंटक, ज्वालेश्वर, शूलभेद, भृगुक्षेत्र और समुद्र-संगम तक), कश्मीर, कुरुक्षेत्र, गंगाद्वार और कनखल, यमुना, वाराणसी के विश्वेश्वर, कृत्तिवासेश्वर और कपर्दीश्वर, गया के अक्षयवट और फल्गु, और दक्षिण के गोदावरी, कावेरी और श्रीपर्वत तक। अंत में युधिष्ठिर ऋषियों के साथ तीर्थयात्रा पर निकलते हैं, और मार्कण्डेय उन्हें प्रयाग की विशेष महिमा सुनाते हैं: प्रयाग की सीमा, गंगा-यमुना संगम, और यह कि प्रयाग सब तीर्थों से बढ़कर है।
त्रिपुर-दहन की कथा यहाँ नर्मदा के एक तीर्थ से जुड़ी है: शिव की प्रेरणा से अग्नि ने त्रिपुर जलाया, बाणासुर की स्तुति से प्रसन्न होकर शिव ने उसे वर दिया, और जले हुए पुरों में से एक श्रीशैल पर और दूसरा अमरकंटक पर गिरा, जहाँ से ज्वालेश्वर तीर्थ बना। यमुना के माहात्म्य में हेमकुंडल वैश्य के दो पुत्रों, श्रीकुंडल और विकुंडल, की कथा है: दोनों बुरे मार्ग पर चले, पर मृत्यु के बाद एक को नरक और दूसरे को स्वर्ग मिला, क्योंकि विकुंडल ने यमुना में स्नान किया था; फिर विकुंडल ने अपने पिछले जन्मों का पुण्य देकर भाई को भी नरक से छुड़ाया।
खंड के अंतिम अध्याय "कर्म-योग" के रूप में वर्ण और आश्रम के धर्म बताते हैं: ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के आचार, भक्ष्य-अभक्ष्य का निर्णय, और दान के प्रकार। फिर भी इसका निष्कर्ष यही है कि संसार के दुःख देखते हुए सब धर्मों से बढ़कर विष्णु-भक्ति है, और अंतिम अध्याय पद्म पुराण के अपने माहात्म्य का है।
पाताल खंड: राम का अश्वमेध और वृंदावन
पाताल खंड पाताल का संक्षिप्त वर्णन करके राम के नाम पर आ जाता है, और Wilson के अनुसार यहाँ शेष, जो अब पुलस्त्य की जगह वक्ता हैं, राम की कथा कहते हैं। पुष्पिकाएँ इसे "शेष-वात्स्यायन संवाद" कहती हैं। इसमें राम की राजधानी, राज्याभिषेक, अगस्त्य का आगमन, रावण की उत्पत्ति, और फिर राम का अश्वमेध: शत्रुघ्न को घोड़े की रक्षा का भार, और घोड़े के पीछे-पीछे अनेक राज्यों से युद्ध, सुबाहु, वीरमणि, सुरथ आदि राजाओं से, और अंत में वाल्मीकि के आश्रम में लव का घोड़ा बाँधना, लव-कुश से युद्ध और जानकी का प्रसंग।
एक प्रसंग में अश्वमेध का घोड़ा हेमकूट के पास एक उद्यान में अचानक स्तंभित हो गया और बल लगाने पर भी नहीं हिला। Wilson ने इस कथा का सार दिया: बलि से ठीक पहले पता चलता है कि घोड़ा वास्तव में दुर्वासा के शाप से घोड़ा बना एक ब्राह्मण था, जो राम के संपर्क से पवित्र होकर दिव्य रूप में स्वर्ग गया। पाठ में भी उसे "राम-कीर्तन के पुण्य से" अपने विमान में स्वर्ग जाने को कहा जाता है।
पाताल खंड का अंतिम भाग वृंदावन और मथुरा का माहात्म्य है, जिसे शिव पार्वती को सुनाते हैं: श्रीकृष्ण के रूप का वर्णन, शालग्राम का निर्णय, और तिलक आदि का निर्णय। Wilson ने इस भाग में श्रीमद्भागवत की प्रशंसा, कृष्ण की बाल-लीलाएँ और विष्णु-पूजा की महिमा का उल्लेख किया, और लिखा कि यहाँ संवाद-शैली तंत्रों की तरह शिव-पार्वती की है।
उत्तर खंड: एकादशियाँ, कार्तिक और जालंधर
उत्तर खंड पद्म पुराण का सबसे बड़ा खंड है (255 अध्याय), और इसका अधिकांश भाग शिव और नारद (और शिव-पार्वती) के संवाद में है। इसमें बदरीनारायण-माहात्म्य, गंगा, प्रयाग और यमुना की स्तुति, तुलसी और शालग्राम का माहात्म्य, अन्नदान, गोपीचंदन, दीप-व्रत, जन्माष्टमी-व्रत, और दशरथ का रचा शनि-स्तोत्र है।
फिर साल भर की एकादशियों का एक पूरा क्रम आता है, हर एकादशी के नाम और कथा के साथ: एकादशी की उत्पत्ति और मुर-वध, पौष शुक्ल पुत्रदा, माघ कृष्ण षट्तिला, माघ शुक्ल जया, भाद्रपद कृष्ण अजा, भाद्रपद शुक्ल पद्मा, आश्विन शुक्ल पापांकुशा, कार्तिक कृष्ण रमा, और पुरुषोत्तम (अधिक) मास की कमला और कामदा एकादशी तक। एकादशी-व्रत की आज प्रचलित कथाओं का एक प्रमुख स्रोत यही भाग है। इसके बाद चातुर्मास्य की महिमा और उद्यापन।
उत्तर खंड का कार्तिक-माहात्म्य (अध्याय 88 से लगभग 123) कृष्ण और सत्यभामा के संवाद में है: कार्तिक के नियम, स्नान-विधि और उद्यापन, और इसी के भीतर जालंधर की कथा: जालंधर की उत्पत्ति, अमरावती की विजय, शिव से युद्ध, दैत्यों का कपट, जालंधर की पत्नी वृंदा का चिता में प्रवेश और ब्रह्म-पद पाना, और जालंधर-वध; फिर आँवला (धात्री) और तुलसी का माहात्म्य। जालंधर की यही कथा उत्तर खंड के आरंभ में भी नारद-युधिष्ठिर संवाद में आती है। इसके बाद माघ-माहात्म्य है, वसिष्ठ और दिलीप के संवाद में।
विष्णु-सहस्रनाम, गीता-माहात्म्य और भागवत-माहात्म्य
उत्तर खंड में विष्णु के हज़ार नामों का एक पाठ है (अध्याय 71–72), जिसे महादेव पार्वती को न्यास सहित सुनाते हैं: "विष्णु का सहस्रनाम परम निर्वाण देने वाला है; जहाँ यह सहस्रनाम स्थित है, वहाँ सब तीर्थ निवास करते हैं।" इसके बाद "राम-रक्षा" स्तोत्र, अपामार्जन स्तोत्र, विष्णु-महिमा, दोलोत्सव, दमनक-उत्सव, शयन-उत्सव और पवित्रारोपण जैसे वैष्णव उत्सवों के विधान हैं।
उत्तर खंड का "गीता-माहात्म्य" (अध्याय 176 से 192) विशेष है: भगवद्गीता के हर अध्याय के लिए एक अलग अध्याय, और हर एक में एक कथा कि उस गीता-अध्याय को पढ़ने से किसी का उद्धार कैसे हुआ। जैसे तीसरे अध्याय के माहात्म्य में एक व्यक्ति अपने वर्ण का धर्म छोड़कर व्यापार में लगा, धर्म-लोप से घोर ग्रह (प्रेत) बना, और उसके वेदज्ञ धर्मात्मा पुत्र ने गीता का तीसरा अध्याय जपकर उसका उद्धार किया। Wilson ने भी लिखा कि वसिष्ठ, शिव के मुख से, गीता का माहात्म्य दोहराते हैं और हर अध्याय की महिमा कथाओं से बताते हैं।
अध्याय 193 से "भागवत-माहात्म्य" आता है, जिसमें भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि का प्रश्न, और यह कथन है कि भागवत का एक महीने का श्रवण भक्ति देता है और सप्ताह (सात दिन) में सुना गया भागवत सर्वथा मुक्ति देने वाला है; और यह भी कि ब्रह्मा से पहले सुनी सप्ताह-श्रवण की विधि देवर्षि (नारद) ने सुनी। आज की "भागवत सप्ताह" परंपरा के प्रमुख आधारों में यह भाग गिना जाता है।
सर्वाणि तीर्थानि वसंति तत्र यत्र स्थितं नामसहस्रकं तत् ।जहाँ (विष्णु का) वह सहस्रनाम स्थित है, वहाँ सब तीर्थ निवास करते हैं।
तीन गुणों के पुराण और शास्त्र: एक सांप्रदायिक वर्गीकरण
उत्तर खंड के अध्याय 236 में पार्वती शिव से "तामस शास्त्र" पूछती हैं, और शिव जो सूची देते हैं, वह पद्म पुराण का एक बहुत चर्चित अंश है। उसमें कणाद का वैशेषिक, गौतम का न्याय, कपिल का सांख्य और बौद्ध शास्त्र तामस गिनाए गए हैं, और मायावाद को "छिपा हुआ बौद्ध" (प्रच्छन्न बौद्ध) असत्-शास्त्र कहा गया है। फिर अठारह पुराणों को तीन गुणों में बाँटा गया है: मत्स्य, कूर्म, लिंग, शिव, स्कंद और अग्नि तामस; विष्णु, नारदीय, भागवत, गरुड़, पद्म और वराह सात्त्विक; और ब्रह्माण्ड, ब्रह्मवैवर्त, मार्कण्डेय, भविष्य, वामन और ब्रह्म राजस। इसी तरह स्मृतियों को भी तीन वर्गों में बाँटा गया है।
इस अंश को समझते समय दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहली, यह स्पष्ट रूप से एक सांप्रदायिक (वैष्णव) दृष्टि है, और Wilson ने भी लिखा था कि उत्तर खंड "किसी और मत से कोई समझौता नहीं करता"। दूसरी, दूसरे पुराण इसी विषय पर अलग बात कहते हैं: मत्स्य पुराण (53.68–69) के अनुसार सात्त्विक पुराणों में हरि की, राजस में ब्रह्मा की, और तामस में अग्नि और शिव की महिमा अधिक है, और वहाँ इन्हें नरक का कारण नहीं कहा गया। यानी यह वर्गीकरण पुराण-परंपरा के भीतर की बहस का हिस्सा है, कोई सर्वमान्य निर्णय नहीं।
क्रियायोगसार और अंतिम माहात्म्य
उत्तर खंड के अंतिम भाग में कालिंदी (यमुना) का लंबा माहात्म्य, इंद्रप्रस्थ-माहात्म्य, वसिष्ठ-दिलीप संवाद, परम व्योम और विष्णु के व्यूहों का वर्णन, और शिव-पार्वती संवाद में अनेक तीर्थ हैं, जैसे साभ्रमती (साबरमती) और उसके तट के तीर्थ। Wilson ने लिखा कि इस खंड में अवतारों की, विशेषकर राम की, कथाएँ, विष्णु-भक्ति का स्वरूप, शरीर पर वैष्णव चिह्न और विष्णु की प्रतिमा बनाने के नियम शिव पार्वती को समझाते हैं।
"क्रियायोगसार" व्यास और जैमिनि का संवाद है, जिसे सूत ऋषियों को सुनाते हैं। Wilson के अनुसार इसका प्रश्न यह है कि कलियुग में, जब मनुष्य पहले जैसी तपस्या और ध्यान के योग्य नहीं रहे, धर्म का पुण्य कैसे मिले; और उत्तर है विष्णु की निजी भक्ति: उनका स्मरण, नाम-जप, उनके चिह्न धारण करना और उनके मंदिरों में पूजा। पाठ के अध्यायों में प्रयाग-वर्णन, गंगा-जल की बूँद का माहात्म्य, हरि-पूजा की विधि, अश्वत्थ (पीपल) का माहात्म्य, पुरुषोत्तम क्षेत्र, सब दानों की महिमा, अन्नदान और जलदान, और एकादशी-माहात्म्य हैं।
विद्वानों के मत: पुरानी और नई परतें
Wilson ने पद्म पुराण के खंडों में पुरानी और नई सामग्री का मिश्रण देखा। उनके अनुसार सृष्टि खंड की सृष्टि और वंश की सामग्री "वैध पौराणिक" है, पर जल्दी ही पुष्कर तीर्थ की महिमा बताने वाली नई कथाओं को जगह दे देती है; भूमि खंड की कुछ कथाएँ पुरानी और दूसरे पुराणों में भी हैं, पर अधिकांश इसकी अपनी हैं; और पाताल खंड की राम-कथा में उन्होंने कालिदास के रघुवंश का प्रभाव देखा।
उत्तर खंड को Wilson ने "बहुत विविध सामग्री का अत्यंत विशाल संग्रह, पर लगातार वैष्णव" कहा। Wilson ने यह भी लिखा कि Colonel Wilford ने ब्रह्माण्ड, स्कंद और पद्म को "चोरों के पुराण" कहा था, क्योंकि उनके नाम से अलग-अलग खंड जोड़ दिए जाते थे; पर Wilson का मत था कि यह बात पद्म पर लागू नहीं होती, क्योंकि यह भारत के अलग-अलग भागों में पूरा और एक जैसा मिलता है। आज के विद्वान भी पद्म पुराण के अलग-अलग खंडों को अलग-अलग समय की परतें मानते हैं, इसलिए पूरे ग्रंथ की एक तिथि देना संभव नहीं।
महत्व और आज के लिए अर्थ
आज के हिंदू घरों में व्रत-त्योहारों की जो कथाएँ पढ़ी जाती हैं, उनमें से बहुत-सी पद्म पुराण से आती हैं: एकादशियों की कथाएँ, कार्तिक-माहात्म्य, तुलसी और जालंधर-वृंदा की कथा, गीता के हर अध्याय का माहात्म्य, और भागवत-सप्ताह का विधान। इसलिए पद्म पुराण को पढ़े बिना भी लोग इसकी कथाएँ जानते हैं।
और इसका भूमि खंड एक ऐसा संदेश देता है जो हर समय के लिए है: सबसे बड़े तीर्थ हमारे अपने घर में हैं। माता-पिता की सेवा करने वाला सुकर्मा, पतिव्रता सुकला, और गुरु से ज्ञान पाने वाला कुंजल तोता, ये बताते हैं कि दूर की यात्रा से पहले अपने निकट के लोगों का सम्मान करना ही सच्चा धर्म है।
आगे पढ़ें
- विष्णु पुराण — पराशर और मैत्रेय का संवाद: सृष्टि, ध्रुव और प्रह्लाद, पृथ्वी के द्वीप, राजवंश, श्रीकृष्ण-चरित और प्रलय
- श्रीमद्भागवत महापुराण — शुकदेव और परीक्षित का संवाद: बारह स्कंध, 335 अध्याय; प्रह्लाद, ध्रुव, गजेंद्र, अंबरीष, दशम स्कंध का कृष्ण-चरित और उद्धव को उपदेश
- मत्स्य पुराण — मत्स्य-रूप भगवान ने प्रलय के जल में नाव पर बैठे राजा मनु को सुनाया: सृष्टि, पितर, वंश, व्रत, तीर्थ, गोत्र, सावित्री, राजधर्म, मूर्ति-मंदिर और सोलह महादान
- पुराण ज्ञानकोश — 18 महापुराणों के नाम, क्रम, वक्ता और श्लोक-संख्या; पंचलक्षण और दशलक्षण; महापुराण और उपपुराण
- श्रीकृष्ण — वृंदावन-माहात्म्य और गीता
- महर्षि अगस्त्य — राम-अगस्त्य संवाद
- महर्षि वसिष्ठ — माघ और गीता माहात्म्य के वक्ता
स्रोत एवं संदर्भ
- विष्णु पुराण, समीक्षित संस्करण (Oriental Institute, Vadodara 1997–99) — GRETIL e-text — M. M. Pathak (सं.); input: Peter Schreiner (1999) · 3.6.21
- मत्स्य पुराण, अध्याय 1–176 (Calcutta: Caukhamba Vidyabhavan 1954) — GRETIL e-text — input: Oliver Hellwig (1954) · 53.14, 53.68–69
- भागवत पुराण (श्रीमद्भागवत), स्कंध 1–12 — GRETIL e-text — Ulrich Stiehl (data entry) (2020) · 12.13.4–8
- पद्मपुराणम् (सृष्टि, भूमि, स्वर्ग, पाताल, उत्तर खंड) — संस्कृत विकिस्रोत — संस्कृत विकिस्रोत (sa.wikisource.org) · भूमि और उत्तर खंड की पुष्पिकाएँ, सृष्टि खंड 1, खंड 1–7, खंड 1–7, अध्याय-सूची, सृष्टि खंड 1–82, भूमि खंड, विषयानुक्रमणिका, स्वर्ग खंड 1–62, ब्रह्म खंड, पुष्पिकाएँ, पाताल खंड, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड, पुष्पिकाएँ, क्रियायोगसार, पुष्पिकाएँ, सृष्टि खंड 17, सृष्टि खंड 17.110–17.183, सृष्टि खंड 19–29, पुष्पिकाएँ, सृष्टि खंड 1–14, पुष्पिकाएँ, सृष्टि खंड 35–82, पुष्पिकाएँ, भूमि खंड 1–4, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 33–38, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 41–60, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 41–52, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 61–123, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 64–76, विषयानुक्रमणिका, भूमि खंड 76–82, विषयानुक्रमणिका, स्वर्ग खंड 1–9, विषयानुक्रमणिका, स्वर्ग खंड 10–49, विषयानुक्रमणिका, स्वर्ग खंड 14–15, 29–31, विषयानुक्रमणिका, स्वर्ग खंड 50–62, विषयानुक्रमणिका, पाताल खंड 2–62, पुष्पिकाएँ, पाताल खंड 47–48, पाताल खंड 73–83, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 2–33, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 34–65, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 4–18, 88–125, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 72.3–72.10, उत्तर खंड 73–87, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 176–192, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 177.1–177.9, उत्तर खंड 193.2–193.23, उत्तर खंड 236.1–236.26, उत्तर खंड 152–229, पुष्पिकाएँ, क्रियायोगसार 1–26, पुष्पिकाएँ, उत्तर खंड 34–125, 176–198, भूमि खंड 41–123, विषयानुक्रमणिका, सृष्टि खंड 17.146, उत्तर खंड 72.10
- The Vishnu Purana, vol. 1 (Book I) — H. H. Wilson (अनु.), F. Hall (सं.) (1864) · Preface, pp. xxix–xxxi, Preface, p. xxxii, Preface, pp. xxix–xxxiii, Preface, p. xxxi, Preface, pp. xxxi–xxxii, Preface, p. xxxiii, Preface, pp. xxxii, lxxxv
