वेद को बचाने की ज़रूरत क्यों पड़ी
वेद मंत्र केवल अर्थ के लिए नहीं, सही उच्चारण के साथ बोलने के लिए थे। Macdonell लिखते हैं कि ऋग्वेद का पाठ एक बार निश्चित हो गया, तो उसे किसी भी बदलाव या हानि से बचाने के लिए "असाधारण सावधानियाँ" बरती गईं, और उनका परिणाम यह है कि वह ऐसी निष्ठा से सुरक्षित रहा जिसकी साहित्य के इतिहास में कोई मिसाल नहीं। शतपथ ब्राह्मण तो कुछ आचार्यों के उस सुझाव को भी ठुकरा देता है कि ऋग्वेद के एक मंत्र का पाठ बदला जाए, और कहता है कि ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता।
Macdonell के अनुसार ऋग्वेद की संहिता का पाठ ब्राह्मण ग्रंथों के बाद, लगभग 600 ईसा पूर्व के आसपास, अपने अंतिम रूप में बँधा। उनका तर्क यह है कि ब्राह्मण ग्रंथ कई शब्दों के अक्षर गिनाते हैं, और वे गिनतियाँ आज की संहिता से मेल नहीं खातीं, क्योंकि संहिता में स्वरों की संधि हो चुकी है; जबकि आरण्यक और उपनिषद ध्वनि-विज्ञान की चर्चा करते हैं और शाकल्य जैसे आचार्यों के नाम लेते हैं। उसके बाद जो रक्षा-व्यवस्था बनी, वही इस लेख का विषय है।
पद पाठ: शब्द-शब्द अलग करना
पहला क़दम "पद पाठ" था, यानी शब्दों का पाठ। संहिता में शब्द संधि से जुड़े रहते हैं; पद पाठ हर शब्द को उसके अपने, मूल रूप में अलग करके रखता है, और इस तरह पाठ को काफ़ी हद तक उसकी पुरानी अवस्था की ओर लौटा देता है। ऋग्वेद का पद पाठ शाकल्य ने बनाया। Macdonell के अनुसार शाकल्य यास्क से भी पुराने हैं, जो उन्हें उद्धृत करते हैं, और शौनक से भी, जिनका ऋग्वेद-प्रातिशाख्य पद पाठ पर ही आधारित है; और ऐतरेय आरण्यक के रचयिता भी पद पाठ को जानते थे।
पद पाठ से भारतीय व्याकरण की नींव भी पड़ी। इसके रचनाकार समास के हिस्सों को अलग करते थे, क्रिया के उपसर्गों को अलग करते थे, और संज्ञा के कुछ प्रत्यय और विभक्तियाँ भी अलग दिखाते थे। Macdonell के अनुसार वे शब्दों के चार भेद जानते रहे होंगे, जिन्हें पहली बार यास्क ने नाम दिए: नाम (संज्ञा), आख्यात (क्रिया), उपसर्ग और निपात। फिर भी पद पाठ अचूक नहीं था; उसमें कुछ स्पष्ट गलत व्याख्याएँ हैं, और यास्क, पाणिनि और पतंजलि कई जगह उससे असहमत होते हैं।
पद पाठ यह भी बताता है कि शाकल्य किन मंत्रों को सच्चा ऋग्वेदीय मानते थे। ऋग्वेद के छह मंत्र ऐसे हैं जिन्हें पद पाठ में शब्दों में तोड़ा नहीं गया, बस संहिता रूप में ही दोहरा दिया गया: 7.59.12, 10.20.1, 10.121.10 और 10.190.1–3। इनमें प्रसिद्ध महामृत्युंजय मंत्र "त्र्यम्बकं यजामहे" (7.59.12) भी है, और "ऋतं च सत्यं च" से शुरू होने वाले तीन मंत्र (10.190) भी। Macdonell के अनुसार ये छह मंत्र उन पुराने जोड़ों के बीच हैं जिन्हें शाकल्य ने स्वीकारा, और उन नए "खिल" मंत्रों के बीच जो पद पाठ में किसी भी रूप में नहीं आए।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥हम तीन नेत्रों वाले, सुगंधित और पुष्टि बढ़ाने वाले (रुद्र) की उपासना करते हैं; जैसे ककड़ी अपनी बेल के बंधन से छूटती है, वैसे ही मैं मृत्यु से छूटूँ, अमृत से नहीं।
क्रम, जटा और घन: शब्दों को बुनकर जाँचना
पद पाठ के बाद और भी कड़ी जाँच के लिए "क्रम पाठ" (क़दम-पाठ) बना। इसमें पद पाठ का हर शब्द दो बार आता है, एक बार पिछले शब्द के साथ और एक बार अगले के साथ। यह भी पुराना है; ऐतरेय आरण्यक का रचयिता इसे भी जानता है, और उस आरण्यक का तीसरा भाग तो संहिता, पद और क्रम, इन तीनों पाठों के रहस्य-अर्थ पर ही है। क्रम पर आधारित "जटा पाठ" (बुना हुआ पाठ) हर जोड़े को तीन बार बोलता है, बीच वाली बार उलटे क्रम में। और जटिलता का शिखर "घन पाठ" है।
इन पाठों का उद्देश्य सुंदरता नहीं, सुरक्षा था। जब एक ही मंत्र को सीधे, जोड़ों में, उलट-पलटकर और तीन-तीन शब्दों के झुंड में बोलना पड़े, तो एक शब्द भी छूटे या बदले तो पूरा क्रम टूट जाता है और गलती तुरंत पकड़ी जाती है। चार शब्दों के उदाहरण से (क, ख, ग, घ) यह व्यवस्था नीचे की तालिका में दिखती है।
| पाठ | शब्दों का क्रम | स्रोत |
|---|---|---|
| संहिता | कखगघ (संधि के साथ जुड़े हुए) | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
| पद | क । ख । ग । घ (हर शब्द अपने मूल रूप में अलग) | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
| क्रम | कख, खग, गघ | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
| जटा | कख खक कख; खग गख खग; गघ घग गघ | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
| घन | कख खक कखग गखक कखग; खग गख खगघ घगख खगघ | Macdonell, History of Sanskrit Literature (1900), ch. III |
स्वर: वेद का संगीत
वेद केवल अक्षरों से नहीं, स्वरों से भी बचाए गए। ऋग्वेद और दूसरी संहिताएँ, और दो ब्राह्मण ग्रंथ (शतपथ और तैत्तिरीय, उसके आरण्यक सहित), स्वर-चिह्नों के साथ हम तक पहुँचे हैं। Macdonell के अनुसार पाठ की पवित्रता के कारण सही और फलदायी पाठ के लिए स्वर बहुत महत्वपूर्ण था। वैदिक स्वर संगीतमय था, यानी आवाज़ की ऊँचाई (पिच) पर टिका था, बल (ज़ोर) पर नहीं, और पाणिनि के बाद तक संस्कृत का स्वर ऐसा ही रहा।
स्वर तीन हैं। "उदात्त" (उठा हुआ) सबसे मुख्य है; तुलनात्मक भाषा-विज्ञान बताता है कि संस्कृत में यह उसी अक्षर पर है जिस पर मूल आर्य भाषा में था, जैसे वैदिक "सप्त" और यूनानी "हेप्ता"। उदात्त से पहले का नीचा स्वर "अनुदात्त" (न उठा हुआ) है, और उदात्त के बाद आने वाला उतरता स्वर "स्वरित"। ऋग्वेद की लिखावट में अनुदात्त के नीचे आड़ी रेखा और स्वरित के ऊपर खड़ी रेखा लगती है, और उदात्त पर कोई चिह्न नहीं, क्योंकि उसे बाक़ी दोनों के बीच का स्वर माना जाता है। स्वर लिखने की चार अलग पद्धतियाँ हैं, जिनमें ऋग्वेद वाली सबसे अधिक प्रचलित है।
बोलचाल की संस्कृत में यह संगीतमय स्वर बाद में खो गया। Macdonell के अनुसार ईसा की सातवीं शताब्दी तक, और शायद बहुत पहले, संस्कृत का स्वर बल-आधारित हो गया, प्राकृत के प्रभाव से; आज संस्कृत का सामान्य उच्चारण वैदिक स्वर से कोई संबंध नहीं रखता, बल्कि अंतिम दो-तीन अक्षरों की लंबाई पर चलता है। इसीलिए वैदिक स्वर आज केवल वेद-पाठ की परंपरा में ही जीवित है, और यही इस परंपरा का सबसे नाज़ुक और अनमोल हिस्सा है।
शिक्षा, प्रातिशाख्य और अनुक्रमणी: रक्षा के ग्रंथ
उच्चारण के शास्त्र को "शिक्षा" कहते हैं। मुण्डक उपनिषद जब "अपरा विद्या" में चारों वेदों के बाद छह वेदांग गिनाता है, तो शिक्षा को सबसे पहले रखता है, फिर कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष। तैत्तिरीय उपनिषद का एक पूरा अनुवाक बस इतना है: "अब हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे: वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम, संतान।" शंकराचार्य के भाष्य के अनुसार वर्ण "अ" आदि अक्षर हैं, स्वर उदात्त आदि, मात्रा ह्रस्व-दीर्घ, बल उच्चारण का विशेष प्रयत्न, साम यानी अक्षरों को न बहुत तेज़ न बहुत धीमे, समान गति से बोलना, और संतान यानी संहिता, अक्षरों का जुड़ना। अगला ही अनुवाक "संहिता" का रहस्य-अर्थ लोक, ज्योति, विद्या, प्रजा और शरीर, इन पाँच दृष्टियों से बताता है।
हर वेद-शाखा के लिए "प्रातिशाख्य" बने, जो ठीक-ठीक बताते हैं कि पद पाठ से संहिता पाठ बनाने में कौन-से बदलाव होते हैं, और उच्चारण की सूक्ष्म चर्चा करते हैं। चार प्रातिशाख्य बचे हैं: ऋग्वेद का (तीन भागों में पद्य-ग्रंथ, परंपरा से शौनक का, बाद में "उपलेख" नाम से संक्षिप्त), तैत्तिरीय संहिता का (बीस आचार्यों के नाम लेने के लिए रोचक), वाजसनेयी संहिता का (आठ अध्याय, कर्ता कात्यायन), और अथर्ववेद का (चार अध्याय, सबसे अधिक व्याकरणिक)। Macdonell के अनुसार इन्हें सामान्यतः पाणिनि से पहले का माना जाता है, या कम से कम पाणिनि ने इनके किसी पुराने रूप का उपयोग किया।
अंत में "अनुक्रमणियाँ", यानी सूचियाँ, बनीं, जो ऋग्वेद को कई दृष्टियों से दर्ज करती हैं: हर सूक्त के ऋषि, देवता और छंद, और सूक्तों, मंत्रों, शब्दों और यहाँ तक कि अक्षरों की गिनती। जिस ग्रंथ के अक्षर तक गिने हुए हों, उसमें चुपके से कुछ जोड़ना या घटाना लगभग असंभव हो जाता है।
शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥अब हम शिक्षा की व्याख्या करेंगे: वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और संतान। यह शिक्षा का अध्याय कहा गया।
एक ही पाठ: शाखाएँ और उनकी सीमा
सूत्र-काल का ग्रंथ "चरणव्यूह" ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ बताता है: शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन और मांडूकेय। पर Macdonell के अनुसार आश्वलायन और शांखायन अलग पाठ नहीं थे; उनका शाकलों से अंतर बस इतना था कि वे ग्यारह वालखिल्य (पूरक) सूक्तों को, पूरे या थोड़ा घटाकर, मान्य मानते थे। बाष्कल पाठ में आठ अतिरिक्त सूक्त थे और पहले मंडल के एक समूह का स्थान अलग था। मांडूकों का कोई पाठ था भी, तो उसका कोई निशान नहीं बचा। आज जो ऋग्वेद है, वह शाकल शाखा का है, और Macdonell के अनुसार जहाँ तक हम जानते हैं, सच्चे अर्थ में वही एकमात्र पाठ था।
इस परंपरा की विश्वसनीयता का एक प्रमाण यह भी है कि ब्राह्मण ग्रंथ और शांखायन सूत्र जहाँ किसी सूक्त के मंत्रों की संख्या या उनका स्थान बताते हैं, वहाँ वे आज के पाठ से मेल खाते हैं। ब्राह्मणों और सूत्रों में मंत्रों के जो बदले रूप मिलते हैं, वे Macdonell के अनुसार किसी पुराने अलग पाठ के कारण नहीं, यज्ञ की नई ज़रूरतों के कारण हैं।
आज: एक जीवित धरोहर
वेद-पाठ की यह परंपरा किताबों में नहीं, लोगों में जीवित है। विश्व-समुदाय ने भी इसे पहचाना: UNESCO ने "Tradition of Vedic chanting" को 2003 में मानवता की मौखिक और अमूर्त धरोहर की उत्कृष्ट कृतियों में घोषित किया, और 2008 में इसे अपनी प्रतिनिधि सूची में दर्ज किया (तत्व संख्या 00062)। सामवेद के गान जैसी परंपराएँ तो पूरी तरह इसी जीवित गुरु-शिष्य परंपरा पर टिकी हैं।
इस परंपरा का सबसे बड़ा सबक यह है कि मनुष्य की स्मृति, अनुशासन से साधी जाए, तो किसी भी लिखावट जितनी भरोसेमंद हो सकती है। पद, क्रम, जटा और घन जैसे पाठ एक तरह से "त्रुटि पकड़ने की व्यवस्था" थे, जो लिखने की कला से भी पहले बन चुकी थी। जिस पाठ के अक्षर गिने गए, शब्द तोड़े गए, जोड़े उलटे-सीधे दोहराए गए और स्वर चिह्नित किए गए, वह हज़ारों साल बाद भी लगभग वैसा ही है।
आगे पढ़ें
- वेद ज्ञानकोश — ऋग्, साम, यजुः और अथर्व: हर वेद का स्वरूप, उसके ऋत्विज, ब्राह्मण और उपनिषद, और चारों की तुलना
- ऋग्वेद — दस मंडल, 1,028 सूक्त और 10,552 ऋचाएँ: अग्नि की पहली स्तुति से नासदीय सूक्त के प्रश्न तक
- सामवेद — ऋग्वेद की ऋचाएँ जब स्वर-लहरी में गाई जाती हैं, तो साम बनती हैं: पूर्वार्चिक, उत्तरार्चिक, उद्गाता और छान्दोग्य का ॐ
- वैदिक साहित्य की चार परतें — मंत्र से यज्ञ-विधि, यज्ञ-विधि से वन का चिंतन, और चिंतन से आत्मा का ज्ञान: वेद एक किताब नहीं, एक पूरा पुस्तकालय है
- वेदों का विभाजन — शाखाएँ और वेदव्यास
- व्याकरण की परंपरा — पद पाठ से पाणिनि तक
स्रोत एवं संदर्भ
- A History of Sanskrit Literature — A. A. Macdonell (1900) · ch. III, The Rigveda, ch. IX, The Sutras, ch. III, The Rigveda, फ़ुटनोट, ch. VIII, Aitareya Aranyaka, ch. III
- ऋग्वेद-संहिता (Aufrecht सं., 1877) — GRETIL e-text — Theodor Aufrecht (सं.); data entry: B. A. van Nooten, G. B. Holland (1877) · 7.59.12, 10.20.1, 10.121.10, 10.190.1–3, 7.59.12
- The Upanishads, Part II (Sacred Books of the East, vol. 15) — मुण्डक उपनिषद — F. Max Müller (अनु.) (1884) · Mundaka Upanishad 1.1.5
- तैत्तिरीयोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) — GRETIL e-text — GRETIL e-text · तैत्तिरीय उपनिषद 1.2.1 (शांकर भाष्य सहित), 1.3, तैत्तिरीय उपनिषद 1.2.1
- Tradition of Vedic chanting (Representative List, element 00062) — UNESCO Intangible Cultural Heritage (2008) · element 00062
