श्री सरस्वती अष्टकम्

śrī sarasvatī aṣṭakam

Shri Saraswati Ashtakam

समय
3–4 मिनट
श्लोक
8
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बसंत पंचमी; गुरुवार; विद्यारंभ
उद्देश्य:विद्या (Knowledge)वाणी-सिद्धि (Eloquence)बुद्धि (Wisdom)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)

श्री सरस्वती अष्टकम् पद्म पुराण के आठ श्लोकों का पाठ है, जिसे "दिव्यज्ञानप्रदायक" कहा गया है। यह अन्य अष्टकों जैसी स्तुति नहीं, बल्कि एक संवाद है — जिसके अंत में स्वयं सरस्वती वचन देती हैं कि जो त्रिकाल इसका पाठ करेगा, उसके कंठ में वे सदा निवास करेंगी।

परिचय

माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं।

स्रोत: पद्म पुराण — "दिव्यज्ञानप्रदायक" सरस्वत्यष्टक स्तोत्र; संवाद-रूप में आठ श्लोक

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री सरस्वती अष्टकम्
IASTśrī sarasvatī aṣṭakam
देवतामाँ सरस्वती
मूल स्रोतपद्म पुराण — "दिव्यज्ञानप्रदायक" सरस्वत्यष्टक स्तोत्र; संवाद-रूप में आठ श्लोक
शुभ दिनबसंत पंचमी; गुरुवार; विद्यारंभ
पाठ समय3–4 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)
छंदअनुष्टुप्

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री सरस्वती अष्टकम् पद्म पुराण का आठ-श्लोकी पाठ है, और उसकी पुष्पिका इसे "दिव्यज्ञानप्रदायक" कहती है — दिव्य ज्ञान देने वाला।

पर सबसे पहले वह बात, जो इसे संग्रह के हर दूसरे अष्टक से अलग करती है: यह स्तुति नहीं, संवाद है। लिंगाष्टकम्, दुर्गाष्टकम्, रामाष्टकम्, सूर्याष्टकम् — इन सबमें आठों श्लोक देवता के गुण गिनाते हैं और हर श्लोक एक ही टेक पर लौटता है। यहाँ कोई टेक नहीं। यहाँ चार वक्ता हैं और श्लोक आपस में बात करते हैं।

क्रम इस प्रकार है। श्लोक 1–2 में शतानीक पूछते हैं — जिसका कर्म-बंधन क्षीण नहीं हुआ, वह मरण के समय किस जप्य का जप करे और किस भाव का स्मरण करे कि परम पद पा ले? श्लोक 3 में शौनक कहते हैं कि यही प्रश्न कभी युधिष्ठिर ने भीष्म से पूछा था। श्लोक 4 में युधिष्ठिर का प्रसंग आता है — बृहस्पति की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें कोटि सूर्यों के समान तेजोमय अपना रूप दिखाया। श्लोक 5 से संवाद सीधा हो जाता है: सरस्वती कहती हैं "वर माँगो", बृहस्पति कहते हैं "दिव्य ज्ञान दीजिए"। श्लोक 6 में देवी वर देती हैं। श्लोक 7 में बृहस्पति उस वर का फल कहते हैं। और श्लोक 8 में देवी स्वयं वह वचन देती हैं जो इस पाठ का सार है — *"त्रिसन्ध्यं प्रयतो नित्यं पठेदष्टकमुत्तमम्। तस्य कण्ठे सदा वासं करिष्यामि न संशयः"*, अर्थात जो संयमपूर्वक तीनों संध्याओं में इस उत्तम अष्टक का पाठ करेगा, उसके कंठ में मैं सदा निवास करूँगी — इसमें संशय नहीं।

यही वचन इसे विद्यार्थियों व वक्ताओं का पाठ बनाता है: वर वाणी में मिलता है, कहीं और नहीं।

एक बात पाठक के काम की है, और वह ईमानदारी से कहनी चाहिए — इस अष्टक का प्रचलित मुद्रित पाठ असामान्य रूप से भ्रष्ट है। दो प्रमुख स्रोतों की तुलना में छह स्थानों पर एक स्रोत अशुद्ध निकला और एक स्थान पर दूसरा। यहाँ का पाठ दोनों को मिलाकर बना है, और हर सुधार नीचे स्रोत-सूची में दर्ज है।

संपूर्ण अष्टकम्

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॥ शतानीक उवाच ॥ महामते महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद। अक्षीणकर्मबन्धस्तु पुरुषो द्विजसत्तम॥१॥

शतानीक बोले — हे महामति! हे महाप्राज्ञ! हे समस्त शास्त्रों में विशारद! हे द्विजश्रेष्ठ! जिस पुरुष का कर्म-बंधन अभी क्षीण नहीं हुआ है —

मरणे यज्जपेज्जाप्यं यं च भावमनुस्मरन्। परं पदमवाप्नोति तन्मे ब्रूहि महामुने॥२॥

— वह मरण के समय कौन-सा जप्य जपे और किस भाव का स्मरण करता हुआ परम पद प्राप्त करे? हे महामुनि, वह मुझे बताइए।

॥ शौनक उवाच ॥ इदमेव महाराज पृष्टवांस्ते पितामहः। भीष्मं धर्मविदां श्रेष्ठं धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः॥३॥

शौनक बोले — हे महाराज! यही प्रश्न आपके पितामह ने भी पूछा था — धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ भीष्म से।

॥ युधिष्ठिर उवाच ॥ पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद। बृहस्पतिस्तुता देवी वागीशाय महात्मने। आत्मानं दर्शयामास सूर्यकोटिसमप्रभम्॥४॥

युधिष्ठिर बोले — हे पितामह! हे महाप्राज्ञ! हे समस्त शास्त्रों में विशारद! बृहस्पति द्वारा स्तुति की गई देवी ने उन महात्मा वागीश को कोटि सूर्यों के समान तेजोमय अपना स्वरूप दिखाया।

॥ सरस्वत्युवाच ॥ वरं वृणीष्व भद्रं ते यत्ते मनसि वर्तते। ॥ बृहस्पतिरुवाच ॥ यदि मे वरदा देवि दिव्यज्ञानं प्रयच्छ मे॥५॥

सरस्वती बोलीं — तुम्हारा कल्याण हो; जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँग लो। बृहस्पति बोले — हे देवि! यदि आप मुझे वर देने वाली हैं, तो मुझे दिव्य ज्ञान प्रदान कीजिए।

॥ देव्युवाच ॥ हन्त ते निर्मलं ज्ञानं कुमतिध्वंसकारकम्। स्तोत्रेणानेन ये भक्त्या मां स्तुवन्ति मनीषिणः॥६॥

देवी बोलीं — लो, तुम्हें कुबुद्धि का ध्वंस करने वाला निर्मल ज्ञान दिया। और जो मनीषी इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करते हैं —

॥ बृहस्पतिरुवाच ॥ लभते परमं ज्ञानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥७॥

बृहस्पति बोले — वह परम ज्ञान प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। महामाया की कृपा से मनुष्य उसे नित्य प्राप्त करता है।

॥ सरस्वत्युवाच ॥ त्रिसन्ध्यं प्रयतो नित्यं पठेदष्टकमुत्तमम्। तस्य कण्ठे सदा वासं करिष्यामि न संशयः॥८॥

सरस्वती बोलीं — जो संयमपूर्वक तीनों संध्याओं में नित्य इस उत्तम अष्टक का पाठ करेगा, उसके कंठ में मैं सदा निवास करूँगी — इसमें कोई संशय नहीं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. शतानीक बोले — हे महामति! हे महाप्राज्ञ! हे समस्त शास्त्रों में विशारद! हे द्विजश्रेष्ठ! जिस पुरुष का कर्म-बंधन अभी क्षीण नहीं हुआ है —
  2. — वह मरण के समय कौन-सा जप्य जपे और किस भाव का स्मरण करता हुआ परम पद प्राप्त करे? हे महामुनि, वह मुझे बताइए।
  3. शौनक बोले — हे महाराज! यही प्रश्न आपके पितामह ने भी पूछा था — धर्मपुत्र युधिष्ठिर ने धर्म जानने वालों में श्रेष्ठ भीष्म से।
  4. युधिष्ठिर बोले — हे पितामह! हे महाप्राज्ञ! हे समस्त शास्त्रों में विशारद! बृहस्पति द्वारा स्तुति की गई देवी ने उन महात्मा वागीश को कोटि सूर्यों के समान तेजोमय अपना स्वरूप दिखाया।
  5. सरस्वती बोलीं — तुम्हारा कल्याण हो; जो तुम्हारे मन में हो, वह वर माँग लो। बृहस्पति बोले — हे देवि! यदि आप मुझे वर देने वाली हैं, तो मुझे दिव्य ज्ञान प्रदान कीजिए।
  6. देवी बोलीं — लो, तुम्हें कुबुद्धि का ध्वंस करने वाला निर्मल ज्ञान दिया। और जो मनीषी इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करते हैं —
  7. बृहस्पति बोले — वह परम ज्ञान प्राप्त करता है, जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। महामाया की कृपा से मनुष्य उसे नित्य प्राप्त करता है।
  8. सरस्वती बोलीं — जो संयमपूर्वक तीनों संध्याओं में नित्य इस उत्तम अष्टक का पाठ करेगा, उसके कंठ में मैं सदा निवास करूँगी — इसमें कोई संशय नहीं।

लाभ

  • श्लोक 8 में स्वयं देवी वचन देती हैं कि त्रिकाल पाठ करने वाले के कंठ में वे सदा निवास करेंगी — इसीलिए यह वक्ताओं व विद्यार्थियों का पाठ माना जाता है।
  • पुष्पिका इसे "दिव्यज्ञानप्रदायक" कहती है; श्लोक 6 के अनुसार यह कुबुद्धि का ध्वंस कर निर्मल ज्ञान देता है।
  • श्लोक 7 के अनुसार इससे वह परम ज्ञान मिलता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
  • केवल आठ श्लोक व 3–4 मिनट का पाठ है, अतः विद्यारंभ, परीक्षा-काल तथा बसंत पंचमी पर सुविधाजनक है।

कब करें पाठ

बसंत पंचमी परत्रिकाल — प्रातः, मध्याह्न व सायं संध्या में (जैसा श्लोक 8 कहता है)विद्यारंभ तथा परीक्षा-काल मेंगुरुवार को सरस्वती पूजन के समय

पाठ विधि

स्नान कर स्वच्छ (अधिमानतः श्वेत अथवा पीत) वस्त्र धारण करें और माँ सरस्वती के चित्र अथवा प्रतिमा के समक्ष घी का दीप जलाकर आसन पर बैठें। पहले "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" तीन बार कहकर आरंभ करें। ध्यान रहे — यह अष्टक संवाद-रूप में है, इसलिए हर श्लोक से पहले आने वाला वक्ता-सूचक (शतानीक उवाच, शौनक उवाच, सरस्वत्युवाच आदि) पढ़ना पाठ का अंग है; उसे छोड़ देने पर संवाद का क्रम टूट जाता है। श्लोक 8 स्वयं विधि बता देता है — त्रिसन्ध्यं प्रयतो नित्यम्, अर्थात संयमपूर्वक तीनों संध्याओं में नित्य पाठ। अंत में श्वेत पुष्प अर्पित कर आरती करें।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
स्रोत परंपराbrahmabhakti.com — सरस्वती अष्टकम् (आधार पाठ; पूर्ण पुष्पिका सहित — "इति श्रीपद्मपुराणे दिव्यज्ञानप्रदायकं सरस्वत्यष्टकस्तोत्रं सम्पूर्णम्") · drikpanchang.com — श्री सरस्वती अष्टकम्; क्रम व संवाद-संरचना की स्वतंत्र पुष्टि · तुलना-स्रोत के छह पाठ-दोष सुधारे गए: श्लोक 2 "यज्जोपेज्जाप्यं" → यज्जपेज्जाप्यं; श्लोक 4 "वागीशेन महात्मना" → वागीशाय महात्मने तथा "दर्शयामासं" → आत्मानं दर्शयामास; श्लोक 6 "निर्मलज्ञानं…कारणम्" → निर्मलं ज्ञानं…कारकम् तथा "स्तोत्रणानेन यो भक्तया…मनीषिण" → स्तोत्रेणानेन ये भक्त्या…मनीषिणः; श्लोक 7 "यतपरैरपि" → यत्सुरैरपि। · ⚠️ आधार-स्रोत का एक दोष भी सुधारा गया: श्लोक 3 में "भीष्मं धर्मविदां पृष्ठेदं" निरर्थक है; तुलना-स्रोत का "श्रेष्ठं" व्याकरण व प्रसंग दोनों से संगत है, अतः वही लिया गया। किसी एक स्रोत पर पूरा भरोसा संभव नहीं था। · ⚠️ पद्म पुराण का अध्याय-क्रमांक किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला, अतः वह नहीं दिया गया। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित।
रचयितापारंपरिक (पद्म पुराण)
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

माँ सरस्वती

Goddess Saraswati

माँ सरस्वती विद्या, बुद्धि, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं।

देवता वर्गविद्या · ज्ञान · संगीत · कला · वाणी
वाहनहंस
मुख्य मंत्रॐ ऐं सरस्वत्यै नमः
माँ सरस्वती के पाठ
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श्री सरस्वती अष्टकम् — सामान्य प्रश्न

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