समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
कठिन
शुभ दिन
शुक्रवार, दीपावली व अमावस्या
उद्देश्य:धन प्राप्ति (Wealth)समृद्धि (Prosperity)साधना-सिद्धि (Sadhana)
✓ संपूर्ण साधना मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा — यह लक्ष्मी/कमला साधना परंपरा का बीज-सहित मंत्र है। इसके दोनों अंश शास्त्रीय हैं: “ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं” चतुरक्षरी कमला मंत्र है और “नमः कमलवासिन्यै स्वाहा” दशाक्षरी। ध्यान दें: इसे “महामंत्र” कहना किसी स्रोत से प्रमाणित नहीं।
FAQ
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा — सामान्य प्रश्न
किसी जाँचे गए स्रोत ने इसे "महामंत्र" नहीं कहा। परंपरा में "महामंत्र" शब्द गिने-चुने मंत्रों के लिए ही प्रयुक्त होता है, इसलिए इस पृष्ठ पर वह दावा नहीं किया गया — इसे साधना मंत्र के रूप में रखा गया है।
इसके दोनों अंश शास्त्रीय हैं। "ऐं श्रीं ह्रीं क्लीं" चतुरक्षरी कमला मंत्र है और "नमः कमलवासिन्यै स्वाहा" दशाक्षरी कमला मंत्र। पर दोनों को जोड़ने वाला यह संयुक्त रूप उस मंत्र-सूची में स्वतंत्र मंत्र के रूप में नहीं मिला — वह साधना परंपरा का संयोजन है।
कमला दश महाविद्याओं में से एक हैं और लक्ष्मी का ही तांत्रिक स्वरूप मानी जाती हैं। उनकी उपासना-परंपरा में अक्षर-संख्या के अनुसार मंत्रों की पूरी श्रेणी है — एकाक्षरी से दशाक्षरी तक।
"स्वाहा" आहुति-समर्पण का वाचक पद है और हवन-परंपरा के मंत्रों में आता है। इसी कारण परंपरा में इस मंत्र से हवन का भी विधान बताया जाता है, जिसमें प्रत्येक आवृत्ति पर आहुति दी जाती है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए कमलगट्टे की माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय शुक्रवार व अमावस्या की रात्रि है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए शुक्रवार, दीपावली व अमावस्या विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय शुक्रवार व अमावस्या की रात्रि है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — शुक्रवार को; दीपावली व अमावस्या की रात्रि में; धनतेरस व लक्ष्मी हवन में; गुरु-दीक्षा प्राप्त साधकों द्वारा नियमित साधना में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह साधना मंत्र है, सामान्य नाम-जप नहीं। परंपरा में इस श्रेणी के मंत्रों के लिए गुरु-दीक्षा को श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इनमें उच्चारण, संख्या तथा नियम का विशेष विधान बताया जाता है। जिन्हें दीक्षा प्राप्त न हो, उनके लिए परंपरा इष्ट के नाम-जप, स्तुति व आरती का मार्ग सुझाती है — वह सर्वथा खुला कहा गया है।
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