समय
40 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
मध्यम
शुभ दिन
बुधवार व जन्माष्टमी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)प्रेम (Love)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण गायत्री मंत्र
कृष्ण गायत्री मंत्र — पारंपरिक कृष्ण गायत्री (गायत्री छंद)। हम देवकीनन्दन को जानते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे कृष्ण हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। परंपरा में इसे मुख्यतः भक्ति, प्रेम, आध्यात्मिक उन्नति के भाव से जपा जाता है, प्रायः 108 बार अर्थात एक माला।
FAQ
कृष्ण गायत्री मंत्र — सामान्य प्रश्न
यह कृष्ण-भक्ति व प्रेम बढ़ाता है, मन को एकाग्र करता है और आध्यात्मिक उन्नति में सहायक है।
प्रातः-संध्या, बुधवार व जन्माष्टमी को इसका जप विशेष लाभकारी माना जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः, संध्या व बुधवार है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है।
मंत्र के पदों का अर्थ इस प्रकार है — देवकीनन्दनाय — देवकी के पुत्र (कृष्ण) को; विद्महे — हम जानते हैं; वासुदेवाय — वसुदेव-पुत्र वासुदेव को; धीमहि — हम ध्यान करते हैं; तन्नो कृष्णः प्रचोदयात् — वे कृष्ण हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। पूरे मंत्र का भाव यह है: हम देवकीनन्दन को जानते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे कृष्ण हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
यह गायत्री मंत्र है, जिसमें स्वर तथा छंद का भी विधान होता है। परंपरा में ऐसे मंत्रों को गुरु के मुख से शुद्ध उच्चारण सहित सीखना श्रेष्ठ कहा जाता है। श्रद्धापूर्वक श्रवण तथा भावपूर्ण पाठ पर रोक नहीं बताई जाती।
"देवकी-नन्दनाय", "विद्-म-हे", "वा-सु-देवाय", "धी-म-हि" स्पष्ट बोलें। "धीमहि" में "धी" दीर्घ; "प्रचोदयात्" का "त्" हल्का हलन्त। परंपरा में मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व कहा जाता है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
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