समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
नवरात्रि; अष्टमी व नवमी; मंगलवार व शुक्रवार
उद्देश्य:रक्षा (Protection)भय-नाश (Freedom from Fear)शक्ति (Strength)
✓ संपूर्ण
श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली माँ दुर्गा के 108 नामों की सूची है, जो श्री से आरंभ होकर दुर्गापरमेश्वरी पर समाप्त होती है। इसमें बारह नाम "त्रि" पर बने हैं और अंत में काली, भैरवी, भुवनेश्वरी व महात्रिपुरसुंदरी जैसे महाविद्या-नाम आते हैं। पाठ 8–10 मिनट का है।
FAQ
श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
पहला नाम ॐ श्रियै नमः है और 108वाँ नाम ॐ दुर्गापरमेश्वर्यै नमः है। अंतिम नाम स्वयं में एक कथन है — यह दुर्गा और परमेश्वरी दोनों को एक ही नाम में जोड़ देता है, अर्थात सूची उन्हें एक देवी के रूप में आरंभ करके परम तत्त्व के रूप में समाप्त करती है।
हाँ, और यह जान लेना ज़रूरी है। सबसे अधिक छपने वाली सूची "सती, साध्वी, भवप्रीता, भवानी, भवमोचनी…" से आरंभ होती है। किंतु उसकी एक तकनीकी विशेषता प्रायः किसी के ध्यान में नहीं आती — वह मूलतः नामावली नहीं, स्तोत्र है। वह प्रथमा विभक्ति में, "ईश्वर उवाच" की भूमिका सहित, श्लोक-रूप में मिलती है; "ॐ … नमः" वाले चतुर्थी-रूप में नहीं। यहाँ दी गई सूची मूलतः नामावली ही है और इसी रूप में दो स्वतंत्र स्रोतों पर उपलब्ध है। दोनों परंपराएँ प्रामाणिक हैं — भेद रूप का है, प्रामाणिकता का नहीं।
क्योंकि इस संग्रह का नियम है कि हर नामावली कम से कम दो स्वतंत्र स्रोतों से, उसी नमः-रूप में, क्रम सहित मिलनी चाहिए। "सती, साध्वी" वाली सूची जहाँ-जहाँ मिली, वहाँ या तो प्रथमा विभक्ति में स्तोत्र-रूप थी, या फिर नमः-रूप में मिलने पर पद-विच्छेद भिन्न होने से गिनती 108 पर ठीक नहीं बैठी (उदाहरण के लिए "चित्तरूपा / चिता / चिति" को कहीं तीन नाम, कहीं दो माना जाता है)। एक ही स्रोत के भरोसे 108 नाम छापने के बजाय वह सूची छोड़ दी गई और कारण यहाँ दर्ज है — गिनती जोड़-घटाकर बैठाई नहीं गई।
यह इसकी सबसे स्पष्ट बनावट है, और किसी और 108-सूची में इतनी नहीं मिलती — बारह नाम "तीन" पर बने हैं। नाम 43 त्रिनेत्रा, 61 त्रिलोकपालिनी, 63 त्रिसन्ध्या, 64 त्रिपुरान्तकी, 65 त्रिशक्ति, 66 त्रिपदा, 69 त्रैलोक्यवासिनी, 71 अत्रिसुता, 73 त्रिवर्णा, 74 त्रिस्वरा, 75 त्रिगुणा तथा 107 महात्रिपुरसुन्दरी। भाव यह है कि देवी तीनों लोकों, तीनों संध्याओं, तीनों गुणों व तीनों शक्तियों में व्याप्त हैं।
यह विरोध नहीं, इस सूची की दृष्टि है। नाम 75 कहता है कि वे तीनों गुणों वाली हैं और नाम 76 तुरंत कहता है कि वे गुणों से परे हैं — दोनों एक ही साँस में। यही शैली आगे भी चलती है: नाम 51 सूक्ष्मा के साथ 52 परात्परा, तथा नाम 78 निर्विकल्पा के साथ 79 निरंजना। सूची देवी को किसी एक कोटि में बाँधती नहीं।
हाँ — और यह सूची दुर्गा को समस्त देवियों का समुच्चय मानती है। इसमें सप्तमातृकाओं के नाम बिखरे हुए हैं — वाराही (11), वैष्णवी (23), ऐन्द्री (26), ब्राह्मी (68) तथा मातंगी (16); और उनके साथ सरस्वती (13), कमला (14) व महालक्ष्मी (56) भी। अंत में नाम 97–107 तक लगभग बिना रुके महाविद्या-नाम आते हैं — काली, महेश्वरी, चण्डी, भैरवी, भुवनेश्वरी तथा महात्रिपुरसुन्दरी।
नाम 34 — पद्मनाभसहोदरी, अर्थात *पद्मनाभ (विष्णु) की सहोदरा*। दुर्गा का यह वैष्णव संबंध बहुत कम सूचियों में मिलता है। इसके साथ नाम 71 अत्रिसुता (अत्रि की पुत्री) भी विरल है। और नाम 47 हीङ्कारी उल्लेखनीय है — वहाँ स्वयं "ह्रीं" बीज ही नाम बन गया है, जो इस सूची की तांत्रिक परत बताता है।
यह पुनरावृत्ति वास्तव में है, और उसे "सुधारा" नहीं गया। दोनों स्वतंत्र स्रोतों में यह समान रूप से मिलती है — नाम 1 ॐ श्रियै नमः और नाम 25 भी ॐ श्रियै नमः। नामावलियों में इस प्रकार की पुनरावृत्ति असामान्य नहीं है; कहीं-कहीं वह छंद अथवा गिनती की आवश्यकता से आती है। यहाँ स्रोत का पाठ जैसा है वैसा ही रखा गया है, क्योंकि उसे बदलना पाठ को "ठीक करना" होता, जो इस संग्रह का काम नहीं है।
तीन स्थानों पर — और तीनों वर्तनी/एन्कोडिंग के हैं, पाठभेद नहीं। नाम 47 में हींकार्यै बनाम हीङ्कार्यै (अनुस्वार बनाम ङ), नाम 106 में प्रियंकर्यै बनाम प्रियङ्कर्यै, और नाम 72 में "ढ़" का यूनिकोड-रूप भिन्न (पूर्वसंयुक्त अक्षर बनाम ढ + नुक़्ता) — उच्चारण तीनों में एक ही है। कुल समानता 97.2%, अर्थात कोई असली पाठभेद नहीं मिला। साथ ही आधार-स्रोत के 11 क्रमांक-चिह्न (१०, २०, … १००, १०८) यंत्रवत् जाँचे गए और सभी अपनी सही स्थिति पर निकले।
परंपरागत विधि अर्चना है — प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" के साथ पढ़ते हुए एक लाल पुष्प (गुड़हल अथवा गुलाब), अक्षत अथवा कुमकुम अर्पित करते जाना। दुर्गा पूजन में लाल वस्त्र, लाल पुष्प तथा घी या तिल के तेल का दीप विशेष माने गए हैं। यदि अर्चना संभव न हो तो रुद्राक्ष अथवा लाल चंदन की माला लेकर जप करें; 108 नाम पूरे होने पर ठीक एक माला पूर्ण होती है। आरंभ में "ॐ दुं दुर्गायै नमः" तीन बार कहने की परंपरा है। नवरात्रि में दुर्गा सप्तशती के पाठ से पूर्व अथवा पश्चात इसकी अर्चना की जाती है।
ये पूर्णतः भिन्न रचनाएँ हैं। अष्टोत्तर शतनामावली 108 नामों की सूची है, "श्री" से आरंभ होकर "दुर्गापरमेश्वरी" पर समाप्त, पाठ 8–10 मिनट का — यह अर्चना के लिए है। दुर्गा सप्तशती मार्कण्डेय पुराण का 700 श्लोकों का ग्रंथ है, जिसमें मधु-कैटभ, महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ के वध की तीन कथाएँ हैं; उसका पाठ कई घंटों का होता है और वह कथा-ग्रंथ है। समय कम हो तो नामावली पढ़ें, पर वह सप्तशती का संक्षेप नहीं है।
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