समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बुधवार; जन्माष्टमी; एकादशी
उद्देश्य:भक्ति (Devotion)अर्चना (Worship)शांति (Peace)
✓ संपूर्ण
श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली नारद पञ्चरात्र से ली गई श्रीकृष्ण के 108 नामों की सूची है। प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" रूप में पढ़ा जाता है, अतः यह अर्चना तथा माला-जप — दोनों के लिए उपयुक्त है। इन नामों में कृष्ण का पूरा जीवन क्रम से खुलता है।
FAQ
श्री कृष्ण अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
नारद पञ्चरात्र से। मूल स्तोत्र-रूप की पुष्पिका यही कहती है — "॥ इति श्रीनारदपञ्चरात्रे श्रीकृष्णाष्टोत्तरशतनामस्तोत्रं समाप्तम् ॥"।
क्योंकि दो अलग चीज़ें एक ही शीर्षक से प्रचलित हैं। एक है यह शास्त्रीय नामावली, जो नारद पञ्चरात्र से है और "ॐ … नमः" रूप में पढ़ी जाती है। दूसरी है अंग्रेज़ी वर्णक्रम में सजी एक लोकप्रिय सूची (अचल, अच्युत, अद्भुत, आदिदेव…), जो अनेक साइटों पर इसी नाम से छपती है। वह संकलन है, शास्त्रीय नामावली नहीं। यह पृष्ठ पहली वाली का है।
दोनों में वही 108 नाम होते हैं, केवल रूप अलग होता है। नामावली में हर नाम अलग-अलग "ॐ … नमः" के साथ आता है, जो अर्चना व जप के लिए बना है। स्तोत्र में वही नाम अनुष्टुप् छंद में पिरोकर श्लोकों के रूप में गाए जाते हैं। इसी कारण नामावली में कोई अलग ध्यान-श्लोक या फलश्रुति नहीं होती।
हाँ, एक छोटा अंतर मिलता है और उसका कारण स्पष्ट है। ग्यारहवाँ नाम एक लंबा समास है — "चतुर्भुजात्तचक्रासिगदाशङ्खाम्बुजायुधाय"। कुछ संस्करण इसे पूरा रखते हैं (जैसे यह पृष्ठ), तो कुछ इसे छोटा कर देते हैं, जिससे आगे की गिनती एक अंक खिसक जाती है — उनमें 107वाँ नाम "सर्वग्रहरूपिणे" और 108वाँ "परात्पराय" हो जाता है। नामों की कुल संख्या दोनों में 108 ही रहती है।
हाँ, और यही इसकी सुंदरता है। ये केवल पर्यायवाची नहीं हैं — इनमें श्रीकृष्ण का पूरा जीवन क्रम से आता है। आरंभ में अवतरण व स्वरूप (वसुदेवात्मज, देवकीनन्दन), फिर व्रज की बाल-लीला (नवनीतनट, यमलार्जुनभञ्जन), फिर गोवर्धन व द्वारका (गोवर्धनाचलोद्धर्ता, द्वारकानायक), फिर मथुरा व महाभारत (कंसारि, पार्थसारथि), और अंत में परब्रह्म-स्वरूप (गीतामृतमहोदधि, वेदवेद्य, परब्रह्म)। इसी क्रम के अनुसार यहाँ नामों को पाँच खंडों में बाँटा गया है।
दो विधियाँ प्रचलित हैं। अर्चना-विधि में प्रत्येक नाम बोलते हुए एक पुष्प, तुलसीदल अथवा अक्षत अर्पित किया जाता है — इसे पुष्पार्चन कहते हैं। जप-विधि में तुलसी की माला पर एक-एक नाम का उच्चारण किया जाता है; 108 नाम ठीक एक माला पूरी करते हैं, इसीलिए यह संख्या चुनी गई है।
परंपरा में 108 को पूर्णता का अंक माना जाता है और जप-माला में भी 108 दाने होते हैं। इसी कारण अनेक देवताओं की "अष्टोत्तर शतनामावली" (अष्टोत्तर = आठ अधिक, शत = सौ, अर्थात 108) बनी है — शिव, विष्णु, दुर्गा, गणेश तथा लक्ष्मी की भी।
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