श्री शिव अष्टोत्तर शतनामावली

śrī śiva aṣṭottara śatanāmāvalī

Shri Shiva Ashtottara Shatanamavali (108 Names)

समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व महाशिवरात्रि
उद्देश्य:आरोग्य (Health)मन की शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण

श्री शिव अष्टोत्तर शतनामावली भगवान शिव के 108 नामों की सूची है, जो शिव से आरंभ होकर परमेश्वर पर समाप्त होती है। हर नाम "ॐ … नमः" रूप में पढ़ा जाता है, इसलिए यह अभिषेक-अर्चना तथा माला-जप दोनों के लिए उपयुक्त है। पाठ में 8–10 मिनट लगते हैं।

परिचय

महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

स्रोत: पारंपरिक अष्टोत्तर शतनामावली — शिव से आरंभ, परमेश्वर पर समाप्त; 13 श्लोकों का स्तोत्र-रूप भी प्रचलित

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री शिव अष्टोत्तर शतनामावली
IASTśrī śiva aṣṭottara śatanāmāvalī
देवताश्री शिव
मूल स्रोतपारंपरिक अष्टोत्तर शतनामावली — शिव से आरंभ, परमेश्वर पर समाप्त; 13 श्लोकों का स्तोत्र-रूप भी प्रचलित
शुभ दिनसोमवार, प्रदोष व महाशिवरात्रि
पाठ समय8–10 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री शिव अष्टोत्तर शतनामावली भगवान शिव के 108 नामों की सूची है। यही 108 नाम 13 श्लोकों के स्तोत्र-रूप में भी प्रचलित हैं — "शिवो महेश्वरः शम्भुः पिनाकी शशिशेखरः…" से आरंभ होकर "अपवर्गप्रदोऽनन्तस्तारकः परमेश्वरः" पर समाप्त। नामावली और स्तोत्र दो अलग रचनाएँ नहीं हैं; एक ही सूची है, एक में चतुर्थी विभक्ति (नमः के साथ) और दूसरे में प्रथमा।

सूची का क्रम यादृच्छिक नहीं है। आरंभ के अठारह नाम पहचान और रूप के हैं — शिव, महेश्वर, शम्भु, पिनाकी, शशिशेखर, कपर्दी, नीललोहित। फिर उग्र रूप और आयुध आते हैं — उग्र, कपाली, शूलपाणि, खट्वाङ्गी, परशुहस्त, मृगपाणि। फिर संहार के प्रसंग — कामारि, अन्धकासुरसूदन, त्रिपुरान्तक। और अंत में तत्त्व — अव्यक्त, अनन्त, अपवर्गप्रद, परमेश्वर। स्तुति रूप से आरंभ होकर तत्त्व पर जाकर ठहरती है।

सबसे रोचक जोड़ी नाम 60 और 61 है, और अधिकांश पाठक इसे टाइपो समझ लेते हैं। नाम 60 है गिरीश और नाम 61 है गिरिश — केवल एक दीर्घ "ई" का अंतर, पर अर्थ अलग है। गिरीश = गिरि + ईश, अर्थात पर्वत (कैलास) के स्वामी। गिरिश = गिरि + श, अर्थात पर्वत पर शयन अथवा निवास करने वाले। एक स्वामित्व बताता है, दूसरा निवास। दोनों को साथ रखना जानबूझकर है, भूल नहीं — और यही कारण है कि रोमन लिप्यंतरण में दोनों प्रायः एक-जैसे "Girishaya" लिखे जाते हैं, जिससे भ्रम और बढ़ता है।

एक और बात जो कम देखी जाती है — दक्ष-यज्ञ का पूरा प्रसंग तीन नामों में बँटा हुआ है, और वे लगातार नहीं हैं। नाम 97 है पूषदन्तभिद् (जिन्होंने पूषा के दाँत तोड़े), नाम 99 है दक्षाध्वरहर (जिन्होंने दक्ष का यज्ञ ध्वस्त किया) और नाम 101 है भगनेत्रभिद् (जिन्होंने भग के नेत्र फोड़े)। बीच में 98, 100, 102 पर तत्त्व-नाम रखे हैं — अव्यग्र, हर, अव्यक्त। यानी कथा और तत्त्व एक-दूसरे में गुँथे हुए चलते हैं।

इस शैव सूची में दो नाम वैष्णव भी हैं, और यह संयोग नहीं है। नाम 13 है विष्णुवल्लभ (विष्णु को प्रिय) और नाम 96 है हरि। शिव-नामावली में विष्णु का नाम रखना उस पुरानी परंपरा का संकेत है जो हरि और हर को भेद-रहित मानती आई है।

और नाम 45 पहली बार पढ़ने पर उलटा लगता है — अनीश्वर, जिसका शाब्दिक अर्थ "जो ईश्वर नहीं" निकलता दिखता है। वास्तविक अर्थ इसके विपरीत है: जिनके ऊपर कोई ईश्वर नहीं, अर्थात जो स्वयं सर्वोपरि हैं। यही भाव गणेश-नामावली के "विनायक" में भी है — जिनके ऊपर कोई नायक नहीं।

नाम सूची (Name List)

लिपि:

मूल नाम व स्वरूप (नाम 1–18)

  1. 1.
    ॐ शिवाय नमःकल्याणस्वरूप
  2. 2.
    ॐ महेश्वराय नमःमहान ईश्वर
  3. 3.
    ॐ शम्भवे नमःशं अर्थात कल्याण उत्पन्न करने वाले
  4. 4.
    ॐ पिनाकिने नमःपिनाक धनुष धारण करने वाले
  5. 5.
    ॐ शशिशेखराय नमःजिनके मस्तक पर चंद्रमा शोभित है
  6. 6.
    ॐ वामदेवाय नमःसुंदर व मनोहर देव; शिव के पंचमुखों में एक
  7. 7.
    ॐ विरूपाक्षाय नमःविषम अर्थात तीन नेत्रों वाले
  8. 8.
    ॐ कपर्दिने नमःजटा-जूट धारण करने वाले
  9. 9.
    ॐ नीललोहिताय नमःनीले तथा लाल वर्ण वाले
  10. 10.
    ॐ शङ्कराय नमःकल्याण करने वाले
  11. 11.
    ॐ शूलपाणिने नमःजिनके हाथ में त्रिशूल है
  12. 12.
    ॐ खट्वाङ्गिने नमःखट्वांग (मुण्ड-दण्ड) धारण करने वाले
  13. 13.
    ॐ विष्णुवल्लभाय नमःभगवान विष्णु को प्रिय
  14. 14.
    ॐ शिपिविष्टाय नमःकिरणों में प्रविष्ट; तेज में व्याप्त
  15. 15.
    ॐ अम्बिकानाथाय नमःमाता अम्बिका के नाथ
  16. 16.
    ॐ श्रीकण्ठाय नमःजिनका कंठ श्री अर्थात शोभा से युक्त है
  17. 17.
    ॐ भक्तवत्सलाय नमःभक्तों पर वात्सल्य रखने वाले
  18. 18.
    ॐ भवाय नमःसंसार-स्वरूप; उत्पत्ति के कारण

उग्र रूप, आयुध व संहार-प्रसंग (नाम 19–36)

  1. 19.
    ॐ शर्वाय नमःसबका संहार करने वाले
  2. 20.
    ॐ त्रिलोकेशाय नमःतीनों लोकों के ईश
  3. 21.
    ॐ शितिकण्ठाय नमःनीले कंठ वाले
  4. 22.
    ॐ शिवाप्रियाय नमःशिवा अर्थात पार्वती जी के प्रिय
  5. 23.
    ॐ उग्राय नमःउग्र स्वरूप वाले
  6. 24.
    ॐ कपालिने नमःकपाल धारण करने वाले
  7. 25.
    ॐ कामारये नमःकामदेव के शत्रु
  8. 26.
    ॐ अन्धकासुरसूदनाय नमःअंधकासुर का वध करने वाले
  9. 27.
    ॐ गङ्गाधराय नमःगंगा को धारण करने वाले
  10. 28.
    ॐ ललाटाक्षाय नमःजिनका तीसरा नेत्र ललाट पर है
  11. 29.
    ॐ कालकालाय नमःकाल के भी काल; मृत्यु के नाशक
  12. 30.
    ॐ कृपानिधये नमःकृपा के भंडार
  13. 31.
    ॐ भीमाय नमःभयंकर स्वरूप वाले
  14. 32.
    ॐ परशुहस्ताय नमःजिनके हाथ में परशु है
  15. 33.
    ॐ मृगपाणये नमःजिनके हाथ में मृग है
  16. 34.
    ॐ जटाधराय नमःजटा धारण करने वाले
  17. 35.
    ॐ कैलासवासिने नमःकैलास पर निवास करने वाले
  18. 36.
    ॐ कवचिने नमःकवच धारण करने वाले

त्रिपुरान्तक से सदाशिव — वृषभ, वेद व यज्ञ (नाम 37–54)

  1. 37.
    ॐ कठोराय नमःदृढ़ व अटल
  2. 38.
    ॐ त्रिपुरान्तकाय नमःत्रिपुर का अंत करने वाले
  3. 39.
    ॐ वृषाङ्काय नमःजिनकी ध्वजा पर वृषभ का चिह्न है
  4. 40.
    ॐ वृषभारूढाय नमःवृषभ (नंदी) पर आरूढ़
  5. 41.
    ॐ भस्मोद्धूलितविग्रहाय नमःजिनका शरीर भस्म से लिपटा है
  6. 42.
    ॐ सामप्रियाय नमःसामगान जिन्हें प्रिय है
  7. 43.
    ॐ स्वरमयाय नमःस्वर-स्वरूप
  8. 44.
    ॐ त्रयीमूर्तये नमःतीनों वेदों की मूर्ति
  9. 45.
    ॐ अनीश्वराय नमःजिनके ऊपर कोई ईश्वर नहीं; जो स्वयं सर्वोपरि हैं
  10. 46.
    ॐ सर्वज्ञाय नमःसब कुछ जानने वाले
  11. 47.
    ॐ परमात्मने नमःपरम आत्मा
  12. 48.
    ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमःचंद्र, सूर्य व अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं
  13. 49.
    ॐ हविषे नमःहवि अर्थात यज्ञ में अर्पित आहुति-स्वरूप
  14. 50.
    ॐ यज्ञमयाय नमःयज्ञ-स्वरूप
  15. 51.
    ॐ सोमाय नमःसोम-स्वरूप; तथा "स-उमा" अर्थात उमा सहित
  16. 52.
    ॐ पञ्चवक्त्राय नमःपाँच मुख वाले
  17. 53.
    ॐ सदाशिवाय नमःसदा कल्याणकारी
  18. 54.
    ॐ विश्वेश्वराय नमःविश्व के ईश्वर

गण, गिरि व मृत्युञ्जय (नाम 55–72)

  1. 55.
    ॐ वीरभद्राय नमःवीरभद्र-स्वरूप
  2. 56.
    ॐ गणनाथाय नमःगणों के नाथ
  3. 57.
    ॐ प्रजापतये नमःप्रजा के पति
  4. 58.
    ॐ हिरण्यरेतसे नमःजिनका तेज स्वर्णमय है
  5. 59.
    ॐ दुर्धर्षाय नमःजिन्हें कोई पराजित न कर सके
  6. 60.
    ॐ गिरीशाय नमःगिरि + ईश — पर्वत (कैलास) के स्वामी
  7. 61.
    ॐ गिरिशाय नमःगिरि + श — पर्वत पर शयन व निवास करने वाले (नाम 60 से भिन्न; FAQ देखें)
  8. 62.
    ॐ अनघाय नमःपाप-रहित
  9. 63.
    ॐ भुजङ्गभूषणाय नमःसर्पों को ही आभूषण बनाने वाले
  10. 64.
    ॐ भर्गाय नमःतेजोमय; पापों को भस्म करने वाले
  11. 65.
    ॐ गिरिधन्विने नमःमेरु पर्वत ही जिनका धनुष है
  12. 66.
    ॐ गिरिप्रियाय नमःपर्वत जिन्हें प्रिय हैं
  13. 67.
    ॐ कृत्तिवाससे नमःगजचर्म को वस्त्र बनाने वाले
  14. 68.
    ॐ पुरारातये नमःत्रिपुर के शत्रु
  15. 69.
    ॐ भगवते नमःषड्ऐश्वर्य-संपन्न भगवान्
  16. 70.
    ॐ प्रमथाधिपाय नमःप्रमथ गणों के अधिपति
  17. 71.
    ॐ मृत्युञ्जयाय नमःमृत्यु को जीत लेने वाले
  18. 72.
    ॐ सूक्ष्मतनवे नमःसूक्ष्म शरीर वाले

व्यापकता, अष्टमूर्ति व पाश-मोचन (नाम 73–90)

  1. 73.
    ॐ जगद्व्यापिने नमःसमस्त जगत् में व्याप्त
  2. 74.
    ॐ जगद्गुरवे नमःजगत् के गुरु
  3. 75.
    ॐ व्योमकेशाय नमःआकाश ही जिनके केश हैं
  4. 76.
    ॐ महासेनजनकाय नमःमहासेन अर्थात कार्तिकेय के जनक
  5. 77.
    ॐ चारुविक्रमाय नमःसुंदर पराक्रम वाले
  6. 78.
    ॐ रुद्राय नमःदुःख का नाश करने वाले
  7. 79.
    ॐ भूतपतये नमःसमस्त भूतों (प्राणियों) के पति
  8. 80.
    ॐ स्थाणवे नमःअचल व स्थिर
  9. 81.
    ॐ अहिर्बुध्न्याय नमःगहराई में स्थित सर्प-रूप वैदिक देवता
  10. 82.
    ॐ दिगम्बराय नमःदिशाएँ ही जिनका वस्त्र हैं
  11. 83.
    ॐ अष्टमूर्तये नमःआठ मूर्तियों वाले — पंचभूत, सूर्य, चंद्र तथा यजमान
  12. 84.
    ॐ अनेकात्मने नमःअनेक रूपों वाले
  13. 85.
    ॐ सात्त्विकाय नमःसत्त्वगुण-युक्त
  14. 86.
    ॐ शुद्धविग्रहाय नमःशुद्ध स्वरूप वाले
  15. 87.
    ॐ शाश्वताय नमःनित्य व शाश्वत
  16. 88.
    ॐ खण्डपरशवे नमःखण्डित परशु धारण करने वाले
  17. 89.
    ॐ अजाय नमःअजन्मा
  18. 90.
    ॐ पाशविमोचकाय नमःपाश अर्थात बंधन से मुक्त करने वाले

दक्ष-यज्ञ प्रसंग व परमेश्वर पर समापन (नाम 91–108)

  1. 91.
    ॐ मृडाय नमःसुख देने वाले
  2. 92.
    ॐ पशुपतये नमःसमस्त जीवों (पशुओं) के पति
  3. 93.
    ॐ देवाय नमःदेव-स्वरूप
  4. 94.
    ॐ महादेवाय नमःदेवों के भी महादेव
  5. 95.
    ॐ अव्ययाय नमःजिनका कभी क्षय नहीं होता
  6. 96.
    ॐ हरये नमःहरि-स्वरूप; हर लेने वाले
  7. 97.
    ॐ पूषदन्तभिदे नमःदक्ष-यज्ञ में पूषा के दाँत तोड़ने वाले
  8. 98.
    ॐ अव्यग्राय नमःजो कभी व्यग्र नहीं होते
  9. 99.
    ॐ दक्षाध्वरहराय नमःदक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने वाले
  10. 100.
    ॐ हराय नमःपापों व दुःखों को हर लेने वाले
  11. 101.
    ॐ भगनेत्रभिदे नमःदक्ष-यज्ञ में भग के नेत्र फोड़ने वाले
  12. 102.
    ॐ अव्यक्ताय नमःअव्यक्त; इंद्रियों से परे
  13. 103.
    ॐ सहस्राक्षाय नमःसहस्र नेत्रों वाले
  14. 104.
    ॐ सहस्रपदे नमःसहस्र चरणों वाले
  15. 105.
    ॐ अपवर्गप्रदाय नमःअपवर्ग अर्थात मोक्ष देने वाले
  16. 106.
    ॐ अनन्ताय नमःजिनका कोई अंत नहीं
  17. 107.
    ॐ तारकाय नमःसंसार-सागर से तारने वाले
  18. 108.
    ॐ परमेश्वराय नमःपरम ईश्वर

अर्थ (हिन्दी)

    लाभ

    • परंपरा में सोमवार, प्रदोष तथा महाशिवरात्रि पर अभिषेक के साथ इन 108 नामों की अर्चना की जाती है — जल-धारा के साथ नाम-पाठ का विधान है।
    • नाम 71 "मृत्युञ्जय" तथा नाम 29 "कालकाल" के कारण यह नामावली आरोग्य व दीर्घायु के संकल्प से भी पढ़ी जाती है।
    • नाम 90 "पाशविमोचक" के भाव से यह बंधन व अटके कार्यों की स्थिति में पढ़ी जाने वाली परंपरा है।
    • सूची रूप से आरंभ होकर तत्त्व पर समाप्त होती है — अपवर्गप्रद, अनन्त, तारक, परमेश्वर; इसलिए पाठ के साथ शिव-तत्त्व का क्रमिक स्मरण भी होता है।
    • सहस्रनाम की तुलना में यह बहुत छोटी है (8–10 मिनट), अतः नित्य पूजन में सुविधाजनक रहती है।

    कब करें पाठ

    सोमवार को शिव पूजन व अभिषेक के समयप्रदोष काल मेंमहाशिवरात्रि तथा श्रावण मास मेंरुद्राभिषेक के साथ अर्चना-रूप में

    पाठ विधि

    आरंभ में "ॐ नमः शिवाय" तीन बार कहें। नामावली-पाठ की परंपरागत विधि अर्चना है — प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" के साथ पढ़ते हुए शिवलिंग पर एक बेलपत्र, पुष्प अथवा अक्षत अर्पित करते जाना; अभिषेक के समय जल-धारा के साथ भी यही किया जाता है। यदि यह संभव न हो तो रुद्राक्ष की माला लेकर जप किया जा सकता है — 108 नाम पूरे होने पर ठीक एक माला पूर्ण होती है। पाठ लगभग 8–10 मिनट में पूरा होता है। अंत में शिव चालीसा अथवा लिंगाष्टकम् पढ़कर आरती करने की परंपरा है।

    प्रामाणिकता व स्रोत

    स्थिति✓ संपूर्ण
    मूल ग्रंथपारंपरिक शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र (13 श्लोक) — मूल पुराण-संदर्भ अनिश्चित
    स्रोत परंपराdrikpanchang.com — भगवान शिव की अष्टोत्तर शतनामावली (108 नाम) · stotranidhi.com — श्री शिव अष्टोत्तरशतनामावली; 108/108 नामों की क्रम सहित स्वतंत्र पुष्टि। प्रत्येक नवें नाम पर दिए क्रमांक-चिह्न यंत्रवत् जाँचे गए — सभी सही स्थान पर, एक भी विचलन नहीं। · stotranidhi.com — श्री शिवाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (वही 108 नाम, 13 श्लोकों में प्रथमा विभक्ति सहित)। विभक्ति-संबंधी दोनों निर्णय इसी से तय हुए। · विभक्ति-दोष सुधारे गए (प्रत्येक स्रोत में एक-एक): नाम 65 "गिरिधन्वने" → गिरिधन्विने (स्तोत्र: "गिरिधन्वी"); नाम 74 "जगद्गुरुवे" → जगद्गुरवे (स्तोत्र: "जगद्गुरुः"; गुरु उ-कारान्त)। · ⚠️ मूल पुराण व अध्याय-क्रमांक किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला — परंपरा में विष्णु द्वारा पार्वती जी को उपदेश कहा जाता है, कहीं आदि शंकराचार्य-कृत; निर्णायक संदर्भ न मिलने से कोई ग्रंथ-नाम नहीं दिया गया। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित।
    रचयितापारंपरिक
    अंतिम अद्यतनजून 2026

    संपादकीय टिप्पणी: यह शिव सहस्रनाम नहीं है, न उसका छोटा रूप। शिव सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन पर्व की रचना है, 1037 नामों की, और "स्थिरः स्थाणुः प्रभुर्भीमः" से आरंभ होती है — यह अष्टोत्तर शतनामावली एक पूर्णतः स्वतंत्र, बहुत छोटी सूची है जो "शिव, महेश्वर, शम्भु" से आरंभ होती है। दोनों में नामों का साझा होना स्वाभाविक है, पर वे एक ग्रंथ के दो रूप नहीं हैं। मूल ग्रंथ अनिश्चित है — परंपरा में कहा जाता है कि ये नाम विष्णु ने पार्वती जी को बताए, कहीं इसे आदि शंकराचार्य-कृत भी कहा जाता है, पर किसी स्रोत ने पुराण व अध्याय-क्रमांक नहीं दिया, इसलिए यहाँ कोई ग्रंथ-नाम नहीं गढ़ा गया।

    देव परिचय

    श्री शिव

    Lord Shiva

    महादेव शिव त्रिदेवों में संहारक और कल्याणकारी देव हैं — योग, ध्यान और मोक्ष के अधिपति।

    देवता वर्गसंहार · योग · ध्यान · कल्याण · मोक्ष
    वाहननंदी (वृषभ)
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    मुख्य मंत्रॐ नमः शिवाय
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