श्री सूर्याष्टकम्

śrī sūryāṣṭakam

Shri Suryashtakam

समय
4–5 मिनट
श्लोक
11
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
रविवार; रथ सप्तमी; मकर संक्रांति
उद्देश्य:आरोग्य (Health)ग्रह-शांति (Planetary Peace)तेज व यश (Vitality & Fame)
✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)

श्री सूर्याष्टकम् आठ श्लोकों की संस्कृत सूर्य-स्तुति है, जिसके अधिकांश श्लोक "तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्" — उस सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ — पर समाप्त होते हैं। इसे साम्ब द्वारा कथित माना जाता है, और इसके तीन फलश्रुति-श्लोक रविवार के आहार-नियम भी बताते हैं। पाठ 4–5 मिनट का है।

परिचय

सूर्य देव प्रत्यक्ष देव हैं — तेज, आरोग्य व ऊर्जा के स्रोत; गायत्री मंत्र के अधिष्ठाता सविता।

स्रोत: साम्ब पुराण परंपरा — साम्ब द्वारा कथित; आठ श्लोक तथा तीन फलश्रुति-श्लोक सहित

एक नज़र में

मंत्र / पाठश्री सूर्याष्टकम्
IASTśrī sūryāṣṭakam
देवताश्री सूर्य देव
मूल स्रोतसाम्ब पुराण परंपरा — साम्ब द्वारा कथित; आठ श्लोक तथा तीन फलश्रुति-श्लोक सहित
शुभ दिनरविवार; रथ सप्तमी; मकर संक्रांति
पाठ समय4–5 मिनट
कठिनाईसरल (Beginner)
छंदअनुष्टुप्

उद्भव / पृष्ठभूमि

श्री सूर्याष्टकम् आठ अनुष्टुप् श्लोकों की सूर्य-स्तुति है और इसके अधिकांश श्लोक उसी एक पंक्ति पर लौटते हैं — "तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्", अर्थात "उन सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।"

इसकी पहली विशेषता वक्ता है। पाठ "साम्ब उवाच" से आरंभ होता है — किसी ऋषि से नहीं, साम्ब से, जो श्रीकृष्ण के पुत्र थे। परंपरा में यह साम्ब पुराण का अंश माना जाता है, जहाँ साम्ब कुष्ठ-रोग से मुक्ति के लिए सूर्य की आराधना करते हैं। इसी कारण यह स्तोत्र आरोग्य-कामना से विशेष रूप से पढ़ा जाता है।

श्लोकों में सूर्य का रूप क्रम से खुलता है — सप्ताश्व रथ पर आरूढ़ (श्लोक 2), कश्यप के पुत्र, हाथ में श्वेत कमल; फिर लोहित रथ और "सर्वलोकपितामह" (3); फिर वे त्रिगुणात्मक तथा ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर स्वरूप कहे जाते हैं (4); फिर वे तेज का पुञ्ज, वायु और आकाश ही हो जाते हैं (5)।

श्लोक 6 की उपमा विशेष है — बन्धूकपुष्पसङ्काश, अर्थात बंधूक (दुपहरिया) के फूल जैसे रक्त-वर्ण। सूर्य के लिए यह उपमा विरल है और वह उनके उदय-कालीन अरुण रंग को ठीक पकड़ती है। उसी श्लोक में एकचक्ररथ भी है — एक पहिये वाला रथ, जो सूर्य-रथ की सबसे पुरानी पहचान है।

पर इस अष्टक की सबसे असामान्य बात इसकी फलश्रुति है, और वह प्रायः कहीं नहीं बताई जाती। अधिकांश अष्टकों की फलश्रुति केवल पाठ-फल गिनाती है; यहाँ श्लोक 10 और 11 सीधे आहार-नियम देते हैं — *"आमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने"*, अर्थात जो रविवार के दिन मांस व मधु का सेवन करता है वह सात जन्म रोगी रहता है; और *"स्त्रीतैलमधुमांसानि ये त्यजन्ति रवेर्दिने"*, अर्थात जो रविवार को स्त्री-संग, तैल, मधु व मांस का त्याग करते हैं वे व्याधि, शोक व दारिद्र्य से मुक्त होकर सूर्यलोक जाते हैं।

यानी यह स्तोत्र केवल स्तुति नहीं — रविवार-व्रत के नियमों का शास्त्रीय आधार भी है। रविवार को तेल व नमक से बचने की जो परंपरा घर-घर में चलती है, उसका सूत्र यहीं मिलता है।

संपूर्ण अष्टकम्

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॥ साम्ब उवाच ॥ आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते॥१॥

साम्ब बोले — हे आदिदेव! आपको नमस्कार है। हे भास्कर, मुझ पर प्रसन्न होइए। हे दिवाकर! आपको नमस्कार है; हे प्रभाकर, आपको नमस्कार हो।

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्। श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥२॥

जो सात अश्वों वाले रथ पर आरूढ़ हैं, प्रचण्ड तेजस्वी हैं, कश्यप के पुत्र हैं और श्वेत कमल धारण किए हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम्। महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥३॥

जो लोहित (रक्त-वर्ण) रथ पर आरूढ़ हैं, समस्त लोकों के पितामह हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम्। महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥४॥

जो त्रिगुणात्मक हैं, महाशूर हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर स्वरूप हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायुमाकाशमेव च। प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥५॥

जो वर्धमान तेज के पुञ्ज हैं, जो वायु तथा आकाश भी हैं, और जो समस्त लोकों के प्रभु हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

बन्धूकपुष्पसङ्काशं हारकुण्डलभूषितम्। एकचक्ररथं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥६॥

जो बंधूक (दुपहरिया) के फूल के समान रक्त-वर्ण हैं, हार व कुण्डलों से भूषित हैं और एक पहिये वाले रथ पर विराजते हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम्। महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥७॥

जो जगत् के कर्ता हैं, महान तेज से प्रकाशित करने वाले हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्। महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्॥८॥

जो जगतों के नाथ हैं, ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्ष देने वाले हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

॥ फलश्रुति ॥ सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडाप्रणाशनम्। अपुत्रो लभते पुत्रं दरिद्रो धनवान्भवेत्॥९॥

फलश्रुति: जो नित्य इस सूर्याष्टक का पाठ करता है, उसकी ग्रह-पीड़ा नष्ट होती है; निःसंतान को संतान मिलती है और दरिद्र धनवान् होता है।

आमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने। सप्तजन्म भवेद्रोगी जन्मजन्म दरिद्रता॥१०॥

जो मनुष्य रविवार के दिन मांस तथा मधु का सेवन करता है, वह सात जन्मों तक रोगी रहता है और जन्म-जन्म दरिद्रता भोगता है।

स्त्रीतैलमधुमांसानि ये त्यजन्ति रवेर्दिने। न व्याधिः शोकदारिद्र्यं सूर्यलोकं स गच्छति॥११॥

जो रविवार के दिन स्त्री-संग, तैल, मधु तथा मांस का त्याग करते हैं, उन्हें व्याधि, शोक व दारिद्र्य नहीं होता और वे सूर्यलोक को जाते हैं।

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अर्थ (हिन्दी)

  1. साम्ब बोले — हे आदिदेव! आपको नमस्कार है। हे भास्कर, मुझ पर प्रसन्न होइए। हे दिवाकर! आपको नमस्कार है; हे प्रभाकर, आपको नमस्कार हो।
  2. जो सात अश्वों वाले रथ पर आरूढ़ हैं, प्रचण्ड तेजस्वी हैं, कश्यप के पुत्र हैं और श्वेत कमल धारण किए हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  3. जो लोहित (रक्त-वर्ण) रथ पर आरूढ़ हैं, समस्त लोकों के पितामह हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  4. जो त्रिगुणात्मक हैं, महाशूर हैं, ब्रह्मा-विष्णु-महेश्वर स्वरूप हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  5. जो वर्धमान तेज के पुञ्ज हैं, जो वायु तथा आकाश भी हैं, और जो समस्त लोकों के प्रभु हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  6. जो बंधूक (दुपहरिया) के फूल के समान रक्त-वर्ण हैं, हार व कुण्डलों से भूषित हैं और एक पहिये वाले रथ पर विराजते हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  7. जो जगत् के कर्ता हैं, महान तेज से प्रकाशित करने वाले हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  8. जो जगतों के नाथ हैं, ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्ष देने वाले हैं और महापापों को हरने वाले हैं — उन सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
  9. फलश्रुति: जो नित्य इस सूर्याष्टक का पाठ करता है, उसकी ग्रह-पीड़ा नष्ट होती है; निःसंतान को संतान मिलती है और दरिद्र धनवान् होता है।
  10. जो मनुष्य रविवार के दिन मांस तथा मधु का सेवन करता है, वह सात जन्मों तक रोगी रहता है और जन्म-जन्म दरिद्रता भोगता है।
  11. जो रविवार के दिन स्त्री-संग, तैल, मधु तथा मांस का त्याग करते हैं, उन्हें व्याधि, शोक व दारिद्र्य नहीं होता और वे सूर्यलोक को जाते हैं।

लाभ

  • फलश्रुति के अनुसार नित्य पाठ से ग्रह-पीड़ा का नाश होता है — यही कारण है कि सूर्य-दोष व नवग्रह-शांति में यह विशेष रूप से पढ़ा जाता है।
  • साम्ब द्वारा रोग-मुक्ति के लिए की गई आराधना की परंपरा से जुड़ा होने के कारण यह आरोग्य-कामना से पढ़ा जाता है।
  • फलश्रुति में निःसंतान को संतान तथा दरिद्र को धन मिलने का उल्लेख है।
  • श्लोक 10–11 सीधे रविवार के आहार-नियम बताते हैं — यही घर-घर में चलने वाली रविवार-व्रत परंपरा का शास्त्रीय आधार है।
  • केवल आठ श्लोक व 4–5 मिनट का पाठ है, अतः प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देते समय सुविधाजनक रहता है।

कब करें पाठ

प्रत्येक रविवार को, सूर्य को अर्घ्य देते समयप्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समयरथ सप्तमी तथा मकर संक्रांति परसूर्य-दोष अथवा ग्रह-पीड़ा की शांति के संकल्प के साथ

पाठ विधि

प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ (अधिमानतः लाल अथवा गेरुआ) वस्त्र धारण करें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। ताम्र पात्र में जल, लाल पुष्प, अक्षत व रोली डालकर सूर्य को अर्घ्य दें, फिर "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" तीन बार कहकर पाठ आरंभ करें। आठों श्लोकों का लयबद्ध पाठ करें और हर श्लोक के अंत में आने वाली टेक "तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्" पर प्रणाम का भाव रखें। अंत में तीनों फलश्रुति-श्लोक पढ़ें। ध्यान रहे — फलश्रुति स्वयं रविवार को मांस, मधु व तैल के त्याग का विधान बताती है, अतः उस दिन इनसे बचना पाठ का ही अंग माना जाता है।

प्रामाणिकता व स्रोत

स्थिति✓ संपूर्ण (8/8 श्लोक)
स्रोत परंपराhindunidhi.com — श्री सूर्याष्टकम् (आधार पाठ; "साम्ब उवाच" शीर्षक सहित, आठ श्लोक व तीन फलश्रुति-श्लोक) · brahmabhakti.com — श्री सूर्य अष्टकम्; क्रम सहित स्वतंत्र पुष्टि · मुद्रण-दोष सुधारे गए (आधार hindunidhi): श्लोक 4 "त्रैगुण्यश्च" → त्रैगुण्यं च; श्लोक 5 "बृहितं तेजः पुञ्ज च वायु आकाशमेव च" → बृंहितं तेजसां पुञ्जं वायुमाकाशमेव च; श्लोक 7 का शब्द-विच्छेद ठीक किया गया। · पाठान्तर दर्ज: श्लोक 6 — "एकचक्ररथं" बनाम "एकचक्रधरं"; आधार-स्रोत इसे स्वयं कोष्ठक में देता है। · ⚠️ साम्ब पुराण का अध्याय-क्रमांक किसी उपलब्ध स्रोत में नहीं मिला, अतः वह नहीं दिया गया। · हिंदी अर्थ सत्यापित संस्कृत से अनूदित।
रचयितापारंपरिक (साम्ब-कथित)
अंतिम अद्यतनजून 2026

देव परिचय

श्री सूर्य देव

Lord Surya (Sun)

सूर्य देव प्रत्यक्ष देव हैं — तेज, आरोग्य व ऊर्जा के स्रोत; गायत्री मंत्र के अधिष्ठाता सविता।

देवता वर्गतेज · आरोग्य · ऊर्जा · यश
वाहनसप्त-अश्व रथ
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