समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
बसंत पंचमी; गुरुवार; विद्यारंभ व परीक्षा-काल
उद्देश्य:विद्या (Knowledge)बुद्धि (Wisdom)वाणी-सिद्धि (Eloquence)
✓ संपूर्ण
श्री सरस्वती अष्टोत्तर शतनामावली माँ सरस्वती के 108 नामों की सूची है, जो सरस्वती से आरंभ होकर ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका पर समाप्त होती है। हर नाम "ॐ … नमः" रूप में पढ़ा जाता है, इसलिए यह अर्चना तथा माला-जप दोनों के लिए उपयुक्त है। पाठ में 8–10 मिनट लगते हैं।
FAQ
श्री सरस्वती अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
पहला नाम ॐ सरस्वत्यै नमः है। और 108वाँ अर्थात अंतिम नाम ॐ ब्रह्मविष्णुशिवात्मिकायै नमः है — ब्रह्मा, विष्णु व शिव, तीनों की आत्म-स्वरूपा। यह क्रम स्वयं एक कथन है: सूची उनके अपने नाम से आरंभ होकर उस स्थिति पर समाप्त होती है जहाँ वे त्रिदेव-स्वरूप कह दी जाती हैं।
यह पाठ-दोष नहीं, इस सूची की अपनी दृष्टि है। बीच में सूची अचानक शाक्त हो जाती है — नाम 55 चण्डिका, 75 शुम्भासुरप्रमथिनी, 78 रक्तबीजनिहन्त्री, 79 चामुण्डा, 81 मुण्डकायप्रहरणा, 82 धूम्रलोचनमर्दिनी, 86 कालरात्रि। ये सब दुर्गा सप्तशती के युद्ध-प्रसंग हैं। भाव यह है कि सरस्वती विद्या की देवी भर नहीं, आदिशक्ति का ही एक रूप हैं — और यही अंतिम नाम ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका में खुलकर कहा गया है।
"शिव की अनुजा" अर्थात छोटी बहन। सरस्वती के लिए यह संबंध बहुत कम स्थानों पर मिलता है और इसीलिए यह सूची का सबसे दुर्लभ नाम है। यह उन परंपराओं की ओर संकेत करता है जो उन्हें ब्रह्मा की पत्नी (नाम 69 ब्रह्मजाया) होने के साथ-साथ शैव-कुल से भी जोड़ती हैं। एक ही सूची में दोनों संबंध साथ रखे गए हैं।
यह ध्यान देने योग्य है। नाम 100 श्वेतानना (श्वेत मुख वाली) है ही, पर उसी के साथ नाम 29 पीता (पीत वर्ण), 101 नीलभुजा (नील भुजाओं वाली), 104 रक्तमध्या (रक्त-वर्ण मध्य भाग वाली) तथा 107 नीलजङ्घा भी हैं। यानी सूची उन्हें एक रंग में नहीं बाँधती — मुख श्वेत, भुजाएँ नील, मध्य रक्त। यह किसी विशिष्ट ध्यान-मूर्ति का वर्णन है, सामान्य चित्र का नहीं।
नहीं। नाम 102 है चतुर्वर्गफलप्रदा, अर्थात धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष — चारों पुरुषार्थों का फल देने वाली। इसके साथ नाम 5 श्रीप्रदा (ऐश्वर्य देने वाली), 46 भोगदा, 88 रूपसौभाग्यदायिनी तथा 97 कामप्रदा भी हैं। विद्या की देवी से यहाँ पूरा जीवन माँगा गया है, केवल पुस्तक-ज्ञान नहीं।
परंपरागत विधि अर्चना है — प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" के साथ पढ़ते हुए एक श्वेत अथवा पीत पुष्प अर्पित करते जाना। इस देवी की पूजा की एक विशिष्ट परंपरा यह है कि पूजा-स्थान पर पुस्तक, कलम अथवा वाद्य-यंत्र रखा जाता है — जो विद्या या कला साधक की है, वही अर्पित होती है। यदि अर्चना संभव न हो तो स्फटिक की माला लेकर जप करें; 108 नाम पूरे होने पर ठीक एक माला पूर्ण होती है। आरंभ में "ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः" तीन बार कहने की परंपरा है।
असामान्य रूप से कम। दो प्रमुख स्रोतों की तुलना में पूरी सूची में केवल एक स्थान भिन्न मिला — नाम 8, जहाँ एक स्रोत "पद्मवक्त्रकायै" छापता है। यह मुद्रण-दोष है (पद्मवक्त्रा = कमल-सदृश मुख वाली; बीच का "क" निरर्थक), अतः पद्मवक्त्रायै लिया गया। 99.1% समानता इसे इस संग्रह की सबसे स्थिर 108-सूचियों में रखती है।
ये दो अलग रचनाएँ हैं। अष्टोत्तर शतनामावली 108 नामों की सूची है, "सरस्वती" से आरंभ होकर "ब्रह्मविष्णुशिवात्मिका" पर समाप्त, पाठ 8–10 मिनट का — और इसका मूल ग्रंथ अनिश्चित है। सरस्वती सहस्रनाम स्कन्द पुराण की सनत्कुमार संहिता की 1008 नामों वाली स्वतंत्र रचना है, जो "वाच्" से आरंभ होती है और जिसका पाठ 35–45 मिनट का है।
पर्व
