समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार व प्रदोष
उद्देश्य:शीघ्र कृपा (Grace)मनोकामना पूर्ति (Fulfilment)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ आशुतोषाय नमः का अर्थ है “शीघ्र प्रसन्न होने वाले शिव को नमस्कार”। यह नाम शिव अष्टोत्तर शतनामावली या शिव शतनामावली — किसी सूची में नहीं आता; यह भक्ति-परंपरा का प्रचलित संबोधन है, जिसका आधार शिव के स्वभाव-वर्णन में है: उन्हें सामग्री नहीं, सच्चा भाव चाहिए।
FAQ
ॐ आशुतोषाय नमः — सामान्य प्रश्न
आशुतोष "आशु" (शीघ्र) और "तोष" (संतोष, प्रसन्नता) से बना है — अर्थात् "जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं"। परंपरा में शिव का यही स्वभाव सबसे अधिक कहा जाता है: उन्हें प्रसन्न करने के लिए विपुल सामग्री नहीं, सच्चा भाव चाहिए।
नहीं। शिव अष्टोत्तर शतनामावली (शक्तिप्रमोद) और शिव शतनामावली — दोनों सूचियों में यह नाम नहीं मिलता। "आशुतोष" भक्ति-परंपरा का व्यापक रूप से प्रचलित संबोधन है, जिसका आधार पुराण-कथाओं में वर्णित शिव के स्वभाव में है।
पुराण-कथाओं में कहा जाता है कि शिव ने भाव देखकर वरदान दिए, पात्र का पक्ष नहीं देखा — असुरों तक को। साथ ही उनकी पूजा-सामग्री भी सरलतम मानी जाती है: जल, बिल्वपत्र और भस्म। इन्हीं दोनों कारणों से यह नाम प्रचलित हुआ।
परंपरा में इसके लिए कोई जटिल विधान नहीं बताया जाता — यही इस नाम का भाव भी है। एक लोटा जल, एक बिल्वपत्र, स्वच्छ आसन और रुद्राक्ष माला से 108 बार जप पर्याप्त माना जाता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार व प्रदोष विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — प्रातः व संध्या नित्य पूजा में; सोमवार व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि व श्रावण मास में; किसी मनोकामना के संकल्प के साथ। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
