समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, गुरुवार व एकादशी
उद्देश्य:समन्वय व एकता (Harmony)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ हरिहराय नमः हरि (विष्णु) और हर (शिव) के संयुक्त स्वरूप का नाम-मंत्र है — यह विशुद्ध रूप से शिव-मंत्र नहीं है। इस स्वरूप में एक ही विग्रह का आधा भाग विष्णु का और आधा शिव का होता है। परंपरा में इसे शैव-वैष्णव समन्वय व अभेद-दृष्टि से जोड़ा जाता है।
FAQ
ॐ हरिहराय नमः — सामान्य प्रश्न
नहीं। हरिहर एक संयुक्त स्वरूप है — "हरि" अर्थात् विष्णु और "हर" अर्थात् शिव। इस स्वरूप में एक ही विग्रह का आधा भाग विष्णु का और आधा शिव का होता है। इसे केवल शिव-मंत्र कहना अधूरा होगा; यह दोनों देवों का संयुक्त नाम-मंत्र है।
इसका भाव यह है कि वैष्णव और शैव — दोनों मार्ग एक ही परम तत्त्व तक पहुँचते हैं और शिव व विष्णु में भेद करना अज्ञान माना जाता है। पुराणों में दोनों को परस्पर पूजक बताया गया है।
महाराष्ट्र का हरिहरेश्वर और कर्नाटक का हरिहर मंदिर इस संयुक्त स्वरूप की जानी-मानी पीठें हैं, जहाँ आज भी हरिहर उपासना की परंपरा जीवित है।
परंपरा में दोनों अर्पित करने का विधान बताया जाता है — तुलसी विष्णु को प्रिय है और बिल्वपत्र शिव को। इसी प्रकार माला भी रुद्राक्ष या तुलसी, दोनों में से कोई ली जा सकती है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष या तुलसी माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार, गुरुवार व एकादशी विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — सोमवार (शिव) व गुरुवार (विष्णु) — दोनों दिन; एकादशी व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि तथा वैष्णव पर्वों पर; शैव-वैष्णव समन्वय के संकल्प के साथ। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
