समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार व प्रदोष
उद्देश्य:धैर्य व सहनशीलता (Patience)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ जटाधराय नमः शिव अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 34 है, जिसका अर्थ है “जटा धारण करने वाले शिव को नमस्कार”। उन्हीं जटाओं में गंगा समाई हैं, मस्तक पर चंद्र है और सर्प लिपटे हैं। परंपरा में इसे धैर्य, सहनशीलता व उत्तरदायित्व-निर्वाह के भाव से जोड़ा जाता है।
FAQ
ॐ जटाधराय नमः — सामान्य प्रश्न
जटाधर अर्थात् "जटाओं को धारण करने वाले"। शिव की जटाएँ तप का चिह्न भी हैं और धारण-पात्र भी — उन्हीं में गंगा समाई हैं, मस्तक पर चंद्र है और सर्प लिपटे हैं। यह नाम अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 34 पर आता है।
दोनों शिव की जटाओं के ही नाम हैं, पर बल अलग है। "कपर्दिन्" (क्रम 8) गूँथे हुए जटा-जूड़े के रूप पर बल देता है, जबकि "जटाधर" (क्रम 34) उस धारण-सामर्थ्य पर — कि वे सब कुछ धारण कर लेते हैं।
परंपरा के अनुसार शिव की जटाओं में गंगा प्रवाहित होती हैं, मस्तक पर द्वितीया का बालचंद्र सुशोभित है और सर्प आभूषण के रूप में लिपटे रहते हैं। यही तीनों उनके गङ्गाधर, चन्द्रशेखर व भुजङ्गभूषण नामों का आधार हैं।
परंपरा में ब्रह्म मुहूर्त, सोमवार और प्रदोष काल विशेष माने जाते हैं। भारी उत्तरदायित्व या कठिन दौर में धैर्य के संकल्प के साथ भी इसका जप प्रचलित है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
"जटा" में "ट" मूर्धन्य है — जीभ तालु से लगाकर बोलें, "जता" नहीं। परंपरा में कहा जाता है कि मंत्र-जप में शुद्ध उच्चारण का विशेष महत्व है, इसलिए आरंभ में धीरे-धीरे व स्पष्ट बोलकर अभ्यास करें और गति बाद में बढ़ाएँ।
पर्व
