समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व आर्द्रा नक्षत्र
उद्देश्य:आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)कला व सृजन (Creativity)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ नटराजाय नमः शिव के नृत्य-स्वरूप का नाम-मंत्र है, जिसका अर्थ है “नृत्य के अधिपति को नमस्कार”। परंपरा में नटराज का ताण्डव सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव व अनुग्रह — पाँच कार्यों का प्रतीक है। यह नाम शतनामावली में नहीं, चिदंबरम की जीवित उपासना परंपरा में मिलता है।
FAQ
ॐ नटराजाय नमः — सामान्य प्रश्न
नटराज शिव का नृत्य-स्वरूप हैं — "नृत्य के राजा"। परंपरा में उनका ताण्डव सृष्टि के पाँच कार्यों का प्रतीक माना जाता है: डमरू से सृष्टि, अभयमुद्रा से रक्षा, अग्नि से संहार, दबाया हुआ अपस्मार पुरुष तिरोभाव और उठा हुआ चरण अनुग्रह।
इस रूप में नहीं। शिव अष्टोत्तर शतनामावली और शिव शतनामावली — दोनों में "नटराज" नाम नहीं मिलता। शिव सहस्रनाम में इसी भाव का नाम "नर्तकः" (क्रम 176) आता है। "ॐ नटराजाय नमः" चिदंबरम नटराज उपासना की जीवित परंपरा का प्रचलित नाम-मंत्र है।
तमिलनाडु स्थित चिदंबरम नटराज मंदिर इस स्वरूप की प्रधान पीठ है और पंच भूत स्थलों में आकाश तत्त्व का स्थल माना जाता है। वहाँ का "चिदंबर रहस्य" इसी भाव को दर्शाता है कि परम तत्त्व आकाश की भाँति निराकार है।
हाँ। भारतीय शास्त्रीय नृत्य व संगीत की परंपरा में नटराज को कला का अधिष्ठाता माना जाता है, इसलिए अनेक नर्तक व संगीतज्ञ अभ्यास या प्रस्तुति से पूर्व नटराज को प्रणाम कर यह मंत्र जपते हैं।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार, प्रदोष व आर्द्रा नक्षत्र विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — सोमवार व प्रदोष काल में; नृत्य, संगीत या कला-साधना आरंभ करने से पूर्व; आर्द्रा नक्षत्र व आरुद्रा दर्शनम् पर; महाशिवरात्रि की रात्रि में। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
