समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व श्रावण मास
उद्देश्य:स्वास्थ्य (Health)रक्षा (Protection)मन की शांति (Peace)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ नीलकण्ठाय नमः का अर्थ है “नीले कंठ वाले शिव को नमस्कार”। समुद्र मंथन में निकला हलाहल विष शिव ने कंठ में धारण किया, इसी से यह नाम पड़ा। परंपरा में इसे विष, रोग व मानसिक ताप के शमन से जोड़ा जाता है। श्रावण मास व सोमवार इसके जप के लिए विशेष माने जाते हैं।
FAQ
ॐ नीलकण्ठाय नमः — सामान्य प्रश्न
समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को शिव ने सृष्टि की रक्षा हेतु पी लिया। माता पार्वती ने उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया, जिससे विष कंठ में ही रुक गया और कंठ नीला पड़ गया। इसी से वे नीलकण्ठ कहलाए।
परंपरा में इसे विष, रोग, क्रोध और मानसिक ताप के शमन से जोड़ा जाता है। कंठ व वाणी संबंधी उपासना में भी इसका जप प्रचलित है।
कोई अर्थभेद नहीं है। "नीलकण्ठ" संस्कृत की शास्त्रीय वर्तनी है और "नीलकंठ" उसी का हिन्दी में अनुस्वार-सहित प्रचलित रूप। उच्चारण दोनों का एक ही है।
परंपरा में समुद्र मंथन का प्रसंग श्रावण मास से जोड़ा जाता है, इसीलिए इस मास में शिव को जल व दूध से अभिषेक कर शीतलता प्रदान करने का विधान बताया गया है। नीलकण्ठ नाम का सीधा संबंध उसी प्रसंग से है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार, प्रदोष व श्रावण मास विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रातः व प्रदोष काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — श्रावण मास में प्रतिदिन; सोमवार व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि पर; रोग या मानसिक अशांति के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
