समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार व प्रदोष
उद्देश्य:आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)मन की शांति (Peace)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ सदाशिवाय नमः शिव अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 53 है, जिसका अर्थ है “नित्य कल्याणकारी शिव को नमस्कार”। शैव सिद्धांत में सदाशिव पंचमुखी माने जाते हैं — सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष व ईशान। परंपरा में यह ध्यान व निर्गुण उपासना का मूल नाम-मंत्र है।
FAQ
ॐ सदाशिवाय नमः — सामान्य प्रश्न
सदाशिव अर्थात् "जो सदा शिव हैं"। "सदा" का अर्थ नित्य और "शिव" का अर्थ कल्याणकारी। यह नाम शिव के उस नित्य स्वरूप को दर्शाता है जो काल, स्थिति व परिस्थिति से अपरिवर्तित रहता है। यह शिव अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 53 पर आता है।
भाव में भेद नहीं, बल पर बल का अंतर है। "शिव" सामान्य नाम है, जबकि "सदाशिव" उनके नित्य व निर्गुण स्वरूप पर विशेष बल देता है। शैव सिद्धांत में सदाशिव को पंचमुखी — सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष व ईशान — माना जाता है।
परंपरा में इसे ध्यान व निर्गुण उपासना का मंत्र माना जाता है। इसका जप मंद, सम और लंबे स्वर में किया जाता है, और जप के बाद कुछ क्षण मौन बैठने का विधान बताया जाता है।
शैव सिद्धांत के अनुसार पाँच मुख सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोभाव और अनुग्रह — इन पाँच कार्यों के अधिष्ठाता माने जाते हैं। अष्टोत्तर शतनामावली में "सदाशिवाय" से ठीक पहले "पञ्चवक्त्राय" (पाँच मुख वाले) नाम आना इसी ओर संकेत करता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार व प्रदोष विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व प्रदोष काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान के समय; सोमवार व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि की चारों प्रहर पूजा में; मानसिक अस्थिरता या दुविधा के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
