समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार, प्रदोष व कार्तिक पूर्णिमा
उद्देश्य:विजय (Victory)रक्षा (Protection)मोक्ष (Liberation)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः शिव अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 38 है, जिसका अर्थ है “तीनों पुरों का अंत करने वाले को नमस्कार”। शिव ने एक ही बाण से तीन असुर-नगर भस्म किए थे। परंपरा में तीन पुर जीव के तीन बंधनों के प्रतीक हैं; कार्तिक पूर्णिमा इसी विजय का पर्व है।
FAQ
ॐ त्रिपुरान्तकाय नमः — सामान्य प्रश्न
त्रिपुरान्तक अर्थात् "त्रिपुर का अंत करने वाले"। परंपरा के अनुसार तारकासुर के तीन पुत्रों ने सोने, चाँदी व लोहे के तीन उड़ते दुर्ग प्राप्त किए थे, जिन्हें शिव ने एक ही बाण से भस्म किया। यह नाम अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 38 पर आता है।
परंपरा में तीन पुरों को जीव के तीन बंधनों का प्रतीक माना जाता है — आणव (अहंकार), कार्मिक (कर्म) और मायिक (माया)। इनका एक साथ नाश ही मुक्ति कहलाती है, और शिव का एक बाण उसी एकीकृत निवृत्ति का द्योतक माना जाता है।
कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुरारि पूर्णिमा या देव दीपावली कहा जाता है और इसे त्रिपुर-विजय के स्मरण में मनाया जाता है। इस दिन काशी के घाटों पर दीपदान की परंपरा है।
हाँ, अर्थ एक ही है — "त्रिपुर का शत्रु/अंतक"। शतनामावली में "त्रिपुरान्तकाय" रूप आता है, जबकि लोक-प्रचलन व पर्व-नाम में "त्रिपुरारि" अधिक सुनाई देता है।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय प्रदोष काल व संध्या है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार, प्रदोष व कार्तिक पूर्णिमा विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय प्रदोष काल व संध्या है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — कार्तिक पूर्णिमा — त्रिपुरारि पूर्णिमा पर; सोमवार व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि पर; शत्रु-बाधा या दीर्घ संघर्ष के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
पर्व
