समय
30 सेकंड
जप संख्या
108
कठिनाई
सरल
शुभ दिन
सोमवार व प्रदोष
उद्देश्य:ज्ञान व विवेक (Knowledge)रक्षा (Protection)आध्यात्मिक उन्नति (Spiritual Growth)
✓ संपूर्ण नाम जाप
ॐ विरूपाक्षाय नमः शिव अष्टोत्तर शतनामावली का नाम 7 है, जिसका अर्थ है “विषम नेत्रों वाले शिव को नमस्कार” — क्योंकि उनके तीन नेत्र हैं। परंपरा में इसे अंतर्दृष्टि, विवेक व भ्रम-नाश से जोड़ा जाता है। हम्पी का श्री विरूपाक्ष मंदिर इस नाम की प्रसिद्ध पीठ है।
FAQ
ॐ विरूपाक्षाय नमः — सामान्य प्रश्न
विरूपाक्ष अर्थात् "विषम नेत्रों वाले"। "वि-रूप" का अर्थ विषम या असामान्य और "अक्ष" का अर्थ नेत्र। शिव के तीन नेत्र होने से यह संख्या विषम है, इसीलिए यह नाम पड़ा। यह शिव अष्टोत्तर शतनामावली में क्रम 7 पर आता है।
कर्नाटक के हम्पी में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित श्री विरूपाक्ष मंदिर इसी नाम की प्रधान उपासना-पीठ है। यह विजयनगर साम्राज्य का प्रमुख देवालय रहा और आज भी सक्रिय पूजा-स्थल है।
परंपरा में इसे अंतर्दृष्टि, विवेक और भ्रम-नाश से जोड़ा जाता है, क्योंकि शिव का तीसरा नेत्र ज्ञान का प्रतीक और अज्ञान का नाशक माना जाता है। नेत्र-संबंधी उपासना में भी इसका जप प्रचलित है।
दोनों नाम शिव के तीन नेत्रों की ओर संकेत करते हैं। "त्र्यम्बक" सीधे "तीन नेत्रों वाले" कहता है, जबकि "विरूपाक्ष" उन नेत्रों की विषमता व असामान्यता पर बल देता है। दोनों अष्टोत्तर शतनामावली में अलग-अलग रूपों में मिलते हैं।
परंपरा में इस मंत्र का जप 108 बार — अर्थात एक माला — करने का विधान कहा जाता है, और इसके लिए रुद्राक्ष माला का प्रयोग बताया जाता है। जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व प्रदोष काल है। संख्या से अधिक महत्व नियमितता तथा शुद्ध उच्चारण का माना गया है — प्रतिदिन एक माला, बीच-बीच में छोड़कर की गई अधिक संख्या से श्रेष्ठ कही जाती है।
परंपरा में इसके लिए सोमवार व प्रदोष विशेष कहे जाते हैं। दैनिक जप का सुझाया गया समय ब्रह्म मुहूर्त व प्रदोष काल है। इसके अतिरिक्त परंपरा में ये अवसर बताए जाते हैं — प्रातः स्नान के बाद; सोमवार व प्रदोष काल में; महाशिवरात्रि पर; किसी कठिन निर्णय या दुविधा के समय। सामान्य नियम यह कहा जाता है कि समय जो भी चुनें, वह प्रतिदिन एक ही रहे — इससे जप में स्थिरता आती है।
यह नाम-मंत्र है, अर्थात इष्ट के नाम का जप। परंपरा में नाम-जप के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं मानी जाती — इसे स्त्री-पुरुष, किसी भी आयु व किसी भी वर्ग का व्यक्ति श्रद्धापूर्वक जप सकता है। यही नाम-मार्ग की विशेषता कही जाती है कि इसमें पात्रता की शर्त भाव है, विधि नहीं।
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