समय
8–10 मिनट
कुल नाम
108
कठिनाई
सरल (Beginner)
शुभ दिन
गुरुवार; नौ गुरुवार का साईं व्रत; रामनवमी, गुरुपूर्णिमा व विजयादशमी
उद्देश्य:श्रद्धा-सबूरी (Faith & Patience)कष्ट-निवारण (Relief from Suffering)आरोग्य (Health)
✓ संपूर्ण
श्री साईं बाबा अष्टोत्तर शतनामावली शिरडी साईं बाबा के 108 नामों की सूची है, जो श्री सायिनाथ से आरंभ होकर श्रीसमर्थसद्गुरुसायिनाथ पर समाप्त होती है। इसमें नाम 97 समसर्वमतसम्मत (समस्त मतों में समान रूप से सम्मत) है — सर्वधर्म-समभाव का सीधा कथन। पाठ 8–10 मिनट का है।
FAQ
श्री साईं बाबा अष्टोत्तर शतनामावली — सामान्य प्रश्न
पहला नाम ॐ श्री सायिनाथाय नमः है और 108वाँ नाम ॐ श्रीसमर्थसद्गुरुसायिनाथाय नमः। क्रम स्वयं एक कथन है: सूची जिस नाम से आरंभ हुई थी उसी पर लौट आती है — पर अब उसके आगे समर्थ और सद्गुरु जुड़ चुके हैं।
यह शिरडी साईं बाबा की है — और यह भ्रम बहुत होता है, इसलिए स्पष्ट कर देना आवश्यक है। शिरडी साईं बाबा (महासमाधि 1918) और सत्य साईं बाबा भिन्न व्यक्ति हैं, और उनकी 108-सूचियाँ भी भिन्न हैं; इंटरनेट पर दोनों की सामग्री प्रायः एक ही वर्ग में साथ-साथ रखी मिलती है। इस सूची का आंतरिक प्रमाण नाम 5 है — गोदावरीतटशिरडीवासिने, अर्थात *गोदावरी के तट पर शिरडी में निवास करने वाले*।
नाम 97 — समसर्वमतसम्मत, अर्थात *समस्त मतों में समान रूप से सम्मत*। किसी 108-सूची में सर्वधर्म-समभाव का इतना सीधा कथन विरल है, और यह शिरडी परंपरा का केंद्रीय भाव भी है। इसके साथ नाम 107 समरसन्मार्गस्थापन (सम-रस सन्मार्ग की स्थापना करने वाले) आता है — अर्थात सूची अंत में यही कहती है कि उनका काम कोई नया मत खड़ा करना नहीं, मतों के बीच समरसता लाना था।
"भक्तों के अधीन रहने वाले।" और उसके ठीक आगे नाम 44 है — भक्तानुग्रहकातर, अर्थात *भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए व्याकुल*। "कातर" शब्द असाधारण है: वह विवशता का शब्द है, महिमा का नहीं। ये दोनों नाम मिलकर इस सूची का सबसे मार्मिक अंश बनाते हैं — कृपा यहाँ देवता का उपकार नहीं, उसकी अपनी विवशता कही गई है। इसी क्रम में नाम 20 भक्तावनप्रतिज्ञ, नाम 72 असहायसहाय तथा नाम 73 अनाथनाथदीनबन्धु भी हैं।
हाँ — और यही इसे अन्य देव-नामावलियों से अलग करता है। नाम 21 अन्नवस्त्रद (अन्न और वस्त्र देने वाले), नाम 22 आरोग्यक्षेमद, नाम 23 धनमाङ्गल्यप्रद, नाम 25 पुत्रमित्रकलत्रबन्धुद तथा नाम 26 योगक्षेमवह। यह सूची अमूर्त मोक्ष से पहले भोजन और कपड़ा माँगती है — और यह शिरडी की स्मृति के अनुरूप भी है, जहाँ बाबा स्वयं भिक्षा माँगकर बाँटते थे।
नहीं — सूची आरंभ में ही यह स्पष्ट कर देती है। नाम 2 लक्ष्मीनारायण, नाम 3 कृष्णरामशिवमारुत्यादिरूप (कृष्ण, राम, शिव व मारुति आदि के रूप वाले), नाम 4 शेषशायी; और आगे नाम 78 वासुदेव तथा नाम 98 श्रीदक्षिणामूर्ति। वैष्णव, शैव व स्मार्त — तीनों परंपराओं के नाम एक ही सूची में हैं, और नाम 97 समसर्वमतसम्मत उसे शब्द दे देता है।
वह विरोध नहीं, इस सूची की दृष्टि है। नाम 65 है अरूपव्यक्त — *रूप-रहित होकर भी व्यक्त*; और नाम 71 है सुलभदुर्लभ — *सुलभ भी और दुर्लभ भी*। सूची विरोध को छिपाती नहीं, एक ही नाम के भीतर रख देती है। इसी शैली में नाम 53 गुणातीतगुणात्मा (गुणों से अतीत होकर भी गुणों की आत्मा वाले) तथा नाम 75 अकर्मानेककर्मासुकर्मी भी आते हैं।
नहीं — और यह जाँचा गया है। दोनों सूचियों की तुलना करने पर इस 108-सूची के केवल 22 नाम (20.4%) ही 1000-नामों वाली साईं सहस्रनामावली में शब्दशः मिलते हैं। अर्थात वे दो स्वतंत्र रचनाएँ हैं, एक दूसरे का सार अथवा विस्तार नहीं। सहस्रनामावली "अखण्डसच्चिदानन्द" से आरंभ होती है और वर्णमाला के क्रम से चलती है, जबकि यह सूची "श्री सायिनाथ" से आरंभ होकर भाव के क्रम से चलती है।
नहीं। शिरडी साईं बाबा 20वीं सदी के संत हैं; महासमाधि 1918 में हुई। अतः यह नामावली किसी पुराण से नहीं आ सकती — यह 20वीं सदी की रचना है, और शिरडी की नित्य पूजा-पद्धति में प्रयुक्त होती है। रचयिता का नाम किसी उपलब्ध स्रोत ने नहीं दिया, अतः यहाँ कोई नाम गढ़ा नहीं गया। यह प्रामाणिकता का प्रश्न नहीं, सही परिचय का है।
आरंभ में "ॐ श्री सायिनाथाय नमः" तीन बार कहें — यह इसी सूची का पहला नाम भी है। परंपरागत विधि अर्चना है: प्रत्येक नाम "ॐ … नमः" के साथ पढ़ते हुए एक पीत पुष्प, अक्षत अथवा तुलसी-दल अर्पित करते जाना; साईं-पूजन में पीला रंग तथा घी का दीप विशेष माने गए हैं। अर्चना संभव न हो तो तुलसी अथवा रुद्राक्ष माला से जप करें; 108 नाम पूरे होने पर ठीक एक माला पूर्ण होती है। पाठ 8–10 मिनट का है। अंत में आरती करके ऊदी (धूनी की भस्म) व प्रसाद वितरित करने की परंपरा है।
पर्व
